• कथा-कहानी
  • हरि मृदुल की कहानी ‘पटरी पर गाड़ी’

    बीस साल पहले आज ही के दिन यानी 26 जुलाई, 2005 को मुंबई में हुए जल प्लावन में हजारों की जान चली गई थी और अरबों की संपत्ति मटियामेट हो गई थी। इस भीषण त्रासदी पर सुपरिचित कवि-कथाकार-पत्रकार हरि मृदुल ने तब एक मार्मिक कहानी लिखी थी – ‘पटरी पर गाड़ी’। यह कहानी ‘वागर्थ’ में प्रकाशित हुई थी। आप देखेंगे कि इस कहानी में मुंबई जैसे महानगर में बाढ़ की विभीषिका का बयान बड़े ही सटीक ढंग से अभिव्यक्त हुआ है। इस कहानी का अब तक कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। आप सबके लिए पेश है यह कहानी :

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    खट खट खटाक… खट खट खटाक… खट खट खट खट…।

    गाड़ी फिर से पटरी पर है, लेकिन लय बिगड़ी हुई है। लग रहा है कि पहिए एक-दूसरे को बस ठेल रहे हैं। जैसे-तैसे गाड़ी को आगे बढ़़ाने की कोशिश कर रहे हैं। बीच-बीच में चींऽऽऽ की आवाज के साथ जब लोकल रुकती है, तो लोग आशंकित हो जाते हैं।

    वातावरण में एक अलग ही गंध है। ऐसी गंध पहले कभी महसूस नहीं की थी। डिब्बे ठसाठस हैं, लेकिन मुर्दनी-सी छाई हुई है। जगह-जगह से जख्मी अजगर की तरह सरकती हुई आगे बढ़ रही है गाड़ी। मैं बड़ी मुश्किल से दरवाजे पर खड़े होने की जगह बना पाया हूं। पूरी कोशिश करने के बावजूद मुझे अंदर जाने का मौका नहीं मिल पा रहा है। जहां-जहां गाड़ी खड़ी हो रही है, वहीं बर्बादी के वीभत्स दृश्य दिखाई दे रहे हैं। जगह-जगह कुत्तों, बकरियों, गायों और भैसों के शव हैं।

    कौओं की कांव-कांव का शोर है।

    ग्राउंड फ्लोर तक डूबी बिल्डिगें हैं।

    पहले माले तक डूबी चालें हैं।

    पूरी तरह उजड़ चुकीं झोपड़पट्टियां हैं।

    हजारों की संख्या में बेघर हुए लोगों का हुजूम है।

    आंसू हैं। हाहाकार है। चीख-पुकार है…।

    गाड़ी गोरेगांव से थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि एक बार फिर चींऽऽऽ की आवाज करते हुए एक झटके के साथ रुक गई। सुबह के छह बजने को हैं। पिछली रात मैंने अंधेरी स्टेशन पर गुजारी। उससे पहले की रात ऑफिस में बीती। दो दिन से घर नहीं गया हूं। घर से कोई संपर्क भी नहीं हो पाया है। घर में सिर्फ पत्नी है और छठी कक्षा में पढ़ रहा बेटा राहुल। मंगलवार यानी भीषण बरसात की शुरुआत वाले इस दिन राहुल भी स्कूल गया था। पता नहीं मां-बेटे किस हाल में हैं?

    मेरे जैसे हजारों लोग हैं। सभी को अपने-अपने घरों की खबर जानने की व्यग्रता है। सभी के घरों में इंतजार हो रहा है। दो दिन बाद भी जिनके मोबाइल फोनों में थोड़ी-बहुत जान बची है, आज वे बजने लगे हैं…।

    अचानक विलाप शुरू हो गया है। एक मोबाइल में दुखद खबर आई है। उसका भाई नहीं रहा। कांदिवली की जिस चाल में रहता था, उसके ठीक ऊपर की पहाड़ी खिसक गई। पंद्रह लोगों ने घटना स्थल पर ही दम तोड़ दिया और छत्तीस घायल हो गए। लोग उस आदमी को सांत्वना दे रहे थे कि एक और बुरी खबर…। वह एक बूढ़ा आदमी था। उसका मोबाइल बजा, तो उसकी आंखों की चमक देखने लायक थी। उसके घर से फोन था। परंतु फोन सुनने के बाद उसका चेहरा आंसुओं में डूब गया और वह धम्म से गिर पड़ा और बेहोश हो गया। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। लोगों ने उसे किसी तरह संभाला।

    इसी समय अचानक मेरा मोबाइल बजा। मैंने तत्काल रिसीव किया। मुन्ना अभी तक लौटा नहीं है, उधर से कलपती आवाज थी। दो दिन पहले स्कूल गया मुन्ना अभी तक नहीं लौटा है…!!! मैंने नंबर गौर से देखा। मेरे घर का नहीं था। लेकिन था वसई इलाके का ही, जहां मेरा घर है। शोरगुल में आवाज समझ में नहीं आ रही थी कि यह मेरी पत्नी की है या किसी और की?  मैंने राहुल के लिए पत्नी के मुंह से कभी मुन्ना पुकारना नहीं सुना था। मैं जरूर उसे कभी-कभी प्यार से मुन्ना कह देता था…।

    दो दिन पहले ऑफिस पहुंचते ही पत्नी से फोन पर बात हुई थी, तब तक राहुल स्कूल से वापस नहीं आया था। सुबह से ही तेज बारिश थी। ऑफिस जाते समय पता नहीं क्यों मेरे मुंह से निकल पड़ा था- अपने मुन्ने का खयाल रखना। उसके बाद मेरी घर में बातचीत नहीं हो पाई, पूरी मुंबई की फोन लाइनें ठप पड़ गई थीं।

    मैं अपने घर का नंबर डायल करने लगा। टूं टूं टूं टूं…। दस बार नंबर डायल करने के बाद भी यही आवाज। इसके बाद मैंने वह नंबर डायल किया, जहां से थोड़ी देर पहले मुझे फोन किया गया था। फोन व्यस्त था। इधर मेरे फोन की भी बैटरी पूरी तरह डाउन होने को थी। मैंने तत्काल वह मोबाइल नंबर अपनी डायरी में नोट कर लिया। तभी एक बार फिर मोबाइल बजा। इस बार भी कातर स्वर था,  मुन्ना अभी तक घर नहीं लौटा है…। आप सुन रहे हैं ना…?  मैं जवाब दे पाता, मोबाइल ने धोखा दे दिया। बैटरी खत्म हो चुकी थी।

    अब मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्नी ने घर का फोन खराब होने की स्थिति में किसी और फोन से बात करने की कोशिश की है…। कभी लगता कि नहीं, यह रांग नंबर है। मेरी पत्नी की आवाज कतई ऐसी नहीं है।

    इस बीच वृद्ध आदमी को होश आ गया था। अब वह बेचारा बोरीवली उतरने के लिए संघर्ष कर रहा था। मेरी रुलाई फूट पड़ी। मुझे अपने बेटे की याद आई, पता नहीं कहां होगा और किस हालत में होगा। राहुल मेरा बच्चा… मेरा बेटा…। मेरी हालत देखकर एक आदमी खड़ा हो गया। उसने अपनी सीट पर मुझे बिठाया। एक दूसरे आदमी ने पीने को पानी दिया। मेरे आंसू अज्ञात आशंका से थम नहीं पा रहे थे। मेरा मोबाइल फोन अब किसी काम का नहीं था। मैंने पानी देने वाले आदमी से मोबाइल मांगा। डायरी में नोट किए उस नंबर पर एक बार फिर फोन करने लगा, जिससे मुझे फोन किया गया था। कोई रेस्पांस नहीं था – टूं टूं टूं टूं…। घर फोन लगाया। फिर वही टूं टूं टूं टूं…।

    किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि मंगलवार का वह दिन इतना मनहूस साबित होगा। सभी नौकरी पेशा और व्यवसायी लोगों ने सोमवार की तरह ही यह दिन सिर्फ तेज बरसात वाला माना था और अपने काम पर निकल गए थे। अभी दोपहर के बारह नहीं बजे थे कि टीवी चैनलों ने समाचारों में घर से न निकलने की सलाह देनी शुरू कर दी थी। लेकिन सारे लोग तो सुबह ही घर छोड़ चुके थे।

    दो बजे थे कि भायंदर से एक दोस्त का फोन आ गया। उसने सलाह दी कि जितनी जल्दी हो सके ऑफिस से निकल लो, वरना फंस जाओगे…। मैंने फौरन अपना काम समेटा और फोर्ट स्थित ऑफिस से सीधे चर्चगेट स्टेशन के लिए टैक्सी कर ली। सभी ने मुझे रोका कि स्थिति काफी डेंजरस है। बीच में फंसने के चांस ज्यादा हैं। लेकिन मैंने निकल जाने में ही अपनी भलाई समझी। परंतु मेरे चर्चगेट पहुंचते-पहुंचते विरार की सारी ट्रेनें कैंसिल हो चुकी थीं। चर्चगेट पर सैकड़ों लोगों का जमघट था। आधे घंटे तक हालात का जायजा लेने के बाद मुझे दोबारा ऑफिस लौटने का निर्णय लेना पड़ा।

    ऑफिस में मैनेजर सुंदर पिल्लै, एकाउंटेंट नितिन भाटिया और क्लर्क रवि कांबले मौजूद थे। बाकी लोग मेरी देखा-देखी निकल चुके थे। उनमें से अभी कोई वापस नहीं लौटा था। अब तक बिजली भी गुल हो चुकी थी। गनीमत यही कि कहीं से मोमबत्ती का जुगाड़ कर लिया गया था। सुंदर ने बताया,  सारे होटल फुल हो चुके हैं। यूं भी हममें से किसी के पास इतने रुपए नहीं हैं कि इस महंगे इलाके के किसी होटल के कमरे का किराया दे सकें। खाने का ऑर्डर फोन से दे दिया है, जो दो घंटे से पहले नहीं मिल पाएगा।

    दो घंटे बीत चुके थे, लेकिन खाना अभी तक नहीं आया था। रेस्टोरेंट में फोन घुमाया, तो पता चला कि फोन डेड हो चुके हैं। मोबाइलों ने भी काम करना बंद कर दिया था। जब भूख असहनीय हो गई, तो रवि कांबले हिम्मत करके घुटनों-घुटनों पानी में रेस्टोरेंट तक जा पहुंचा। लेकिन वहां कुछ भी नहीं बचा था। रेस्टोरेंट में इतनी भीड़ थी कि लोग एक-एक दाने के लिए छीना-झपटी करने को तैयार बैठे थे।

    अब पानी पीकर रात गुजारने के अलावा कोई चारा नहीं था। अपनी-अपनी कुर्सियों में ही हम लोग झपकी लेने की सोचने लगे। लेकिन ऐसी हालत में नींद किसे आती। रात तीन बजे तक किसी को नींद नहीं आई।

    ये है मुंबई मेरी जान…। देश की आर्थिक राजधानी। पूर्व का पेरिस। शहरों का शहर। सिर्फ एक दिन की बरसात ने हुलिया बदल दिया। एक बौछार में सारी चमक धुल गई। लोकल गाड़ियां ऐसे थम गईं, जैसे धमनी में खून जम गया हो। साले शंघाई बनाएंगे मुंबई को…। नितिन भाटिया पर जैसे हिस्टीरिया का दौरा पड़ गया था। वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था…।

    सुंदर भी शुरू हो गया। इसी महानगर से पिछले चुनाव में चूतिया बनाने वाले नारों ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ की शुरूआत हुई थी। बरसात ने यह हुलिया बना दिया है मुंबई का, कभी यहां भूकंप आ गया तो?

    सुंदर की बात ने अंदर तक हिला दिया।

    नितिन का स्वर डूबा हुआ था। उसने बताया कि उसकी बीवी पेट से है। आठवां महीना चल रहा है। आज सास आनेवाली थी उसके घर। क्या पता आ पाई कि नहीं?

    तीन बजे बाद हमने ऊंघना शुरू कर दिया और फिर नींद आ गई। तब तक मोमबत्ती भी जल कर पूरी खत्म हो चुकी थी। गाढ़ा अंधेरा और ऊपर से तेज बरसात की आवाज। अचानक मुझे लगा कि कोई दरवाजा पीट रहा है। मैंने दरवाजा खोला, तो देखा कि टॉर्च जलाए हुए वॉचमैन खड़ा है। उसने लगभग चीखते हुए कहा कि बिल्डिंग में कोई नहीं है सिर्फ उसके सिवा। पानी जिस तेजी से बरस रहा है, इस बिल्डिंग को गिरने से कोई नहीं रोक सकता। मैंने अपने चारों ओर जल्दी से एक नजर मारी, वाकई वहां कोई नहीं था। न सुंदर, न नितिन और न ही रवि। तब तक वॉचमैन जा चुका था। मेरी रूह तक कांप उठी। मैं इतनी तेजी से बाहर निकला कि सीधे सड़क़ के पानी में गिरा छपाक…। गले-गले तक पानी। पता नहीं क्या-क्या बह कर आ रहा था। अचानक मैंने देखा कि तेजी से एक बच्चे की लाश बह कर आई और मेरे नजदीक पानी में गोल-गोल चक्कर घूमने लगी। मैं सिहर उठा। मैंने फौरन आंखें बंद कर लीं। जब आंखें खोलीं, तो लाश एकदम सामने थी। राहुल… मेरा बेटा…।

    मेरी चीख सुनकर सभी जग गए थे। सुबह के साढ़े पांच बजे थे। मैंने एक भयानक सपना देखा था।

    इसके बाद किसी को नींद नहीं आई। बाहर पानी रात की तरह ही तेज बरस रहा था। मैंने आखिरी बार अपने घर फोन लगाने की कोशिश की, कुछ परिणाम नहीं निकला।

    इस बीच रवि ऑफिस से बाहर का एक चक्कर लगा आया। उसके हाथ में अखबार था। सोहल पन्ने का राष्ट्रीय दैनिक आज चार पन्ने ही छपा था। अखबार में तबाही के मंजर थे…।

    कुर्ला में एक स्कूली बस डूब गई थी। बच्चों के शव बहते देखे गए।

    सांताक्रुज में मैटरनिटी हॉस्पिटल ले जाते समय एक महिला की मौत हो गई। उसकी डिलीवरी डेट नजदीक थी।

    मुंब्रा में एक बिल्डिंग की पहली मंजिल पानी पहुंच गया था। ग्राउंड फ्लोर पर रहनेवाले वृद्ध दंपति की जल समाधि हो गई थी। उनका बेटा चार दिन पहले ही दुबई गया था।

    वर्ली में दो बिल्डिगें गिर गई थीं।

    जोगेश्वरी के एक तबेले की पैंसठ भैसें डूब कर मर गईं। वे बंधी हुई थीं और तबेले में पानी भर गया था।

    सिर्फ मुंबई में ही सौ से ज्यादा लोगों की मौत की खबर थी। कल्याण,  उल्हासनगर, अंबरनाथ, बदलापुर और कलंबोली जैसे उपनगरों की दुर्घटनाओं को मिलाने पर यह संख्या पांच गुना हो गई थी।

    एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी कही जानेवाली धारावी का सबसे बुरा हाल था। गिने-चुने ही घर ऐसे होंगे, जिनमें तीन-चार फुट तक पानी न घुसा हो।

    बाहर से आनेवाली और बाहर जानेवाली सभी गाड़ियां रद्द कर दी गर्ईं थीं। सारी हवाई उड़ानें भी कैंसिल की जा चुकी थीं।

    इस बीच जानकारी मिली कि बांद्रा तक लोकल ट्रेनें चलने लगी हैं, लेकिन रुक रुक कर। किसी तरह बांद्रा पहुंच जाएं, तो वहां से टैक्सी कर अंधेरी पहुंचा जा सकता है। अंधेरी से विरार तक की ट्रेनें भी धीमे चल रही थीं। मैंने और नितिन ने निकलने की ठान ली। लेकिन सुंदर ने तय किया कि ऐसी हालत में वह कतई रिस्क नहीं लेगा। रवि ने भी ऑफिस में ही रहने की सोची। नितिन और मैं टैक्सी कर चर्चगेट स्टेशन पहुंच गए। चर्चगेट का हाल किसी शरणार्थी कैंप की तरह लग रहा था। पिछले चौबीस घंटे से लोग इसी इंतजार में थे कि कब ट्रेनें शुरू हों और कब वे घर पहुंचें?

    इस बीच मैं बांद्रा वाली ट्रेन में अंदर घुसने में कामयाब हो गया। बहुत भीड़ थी। नितिन पता नहीं कौन से डिब्बे में घुस गया। लेकिन बांद्रा पहुंच कर महसूस होने लगा कि ऑफिस से निकल कर गलती की। यहां से आगे के लिए ट्रेनें तो नहीं ही चल रही थीं, टैक्सी मिलने में भी मुश्किल हो रही थी। टैक्सी वाले मनमाना भाड़ा वसूल रहे थे। इस भाड़े को चुकाने लायक जेब में रुपए भी नहीं थे। अब क्या किया जाए?

    वही किया, जो दूसरे कर रहे थे।

    सभी को उम्मीद थी कि हर हालत में शाम तक विरार लोकल शुरू हो जाएगी। रेलवे विभाग भी लगातार ऐसी ही घोषणाएं कर रहा था। इसी उम्मीद में बांद्रा स्टेशन पर ही शाम के चार बज गए। इस बीच तमाम लोगों ने पैदल ही अंधेरी स्टेशन जाना तय कर लिया। मैंने भी यही फैसला लिया। पानी अभी भी मूसलाधार बरस रहा था। स्टेशन के बाहर घुटनों-घुटनों पानी। जितना आगे बढ़ते गए, पानी बढ़ता गया। कमर कमर तक और फिर गले गले तक। आंखों के सामने लोगों को डूबते हुए देखा। खुद भी कई बार डूबते-डूबते बचा। हर कदम पर जिंदगी और मौत का फासला एक तिनके भर रह जाता था। जरा सा पैर डगमगाया नहीं कि खेल खत्म। इसीलिए एक दूसरे का हाथ पकड़ कर रस्सी की शक्ल में चल रहे थे लोग। मजबूरी में ही सही, एक अनोखा भाईचारा निभा रहे थे लोग। आखिरकार लगातार छह घंटे पानी में चल कर अंधेरी पहुंचे। लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी। अंधेरी से भी कोई गाड़ी विरार के लिए नहीं थी। रात अंधेरी स्टेशन पर ही जैसे-तैसे काटनी पड़ी…।

    यह गुरुवार की सुबह है। मैं आठ बजे घर पहुंचा हूं। घर का दरवाजा देखकर ऐसा लगा कि जैसे मुझे दूसरी जिंदगी मिली है। दरवाजा थपथपाया, पत्नी जैसे पास ही आस लगाए खड़ी थी। उसने तत्काल खोला। वह जार-जार रोने लगी थी।

    मेरी आंखें राहुल को खोज रही थीं। मैं तेजी से बेडरूम में गया। राहुल सो रहा था। मैंने सोए हुए ही उसे बाहों में भर लिया।

    इस बीच लाइट भी आ गई थी और फोन भी चलना शुरू हो गया था। मैंने फौरन वह नोट किया फोन नंबर डायल किया, जिससे दो बार फोन आया था कि मुन्ना स्कूल से नहीं लौटा है…।

    फोन एक आदमी ने उठाया।

    ‘क्या मुन्ना स्कूल से लौट आया?’

    ‘आप कौन बोल रहे हैं?’ फिर पूछने वाले ने जवाब का इंतजार किए बगैर ही जानकारी दी,  मुन्ना के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही हैं। वह आदमी भरसक रुलाई दबाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था।  ‘मुन्ना के साथ तीन लड़के और थे। कोई नहीं बचा। जिस दीवार के सहारे वे गले-गले पानी में घर लौट रहे थे, वह ही ढह गई…।’ मैं अवाक् था। दूसरी ओर फोन में आर्तनाद था।

    फोन रखने के बाद मेरी जोरों से रुलाई फूट पड़ी। पत्नी चाय बना रही थी, वह दौड़ी चली आई। पत्नी ने आकुल स्वर में पूछा,  क्या कोई बुरी खबर है? किससे बात हो रही थी?  मैंने उसे सारी बातें बताईं,  वह भी सुबक उठी।

    थोड़ी देर बाद टीवी चालू किया। हर चैनल पर हृदयविदारक खबरें थीं –

    घाटकोपर में एक मजदूर महिला, जिसकी गोद में पंद्रह दिन का बच्चा था, पानी में गिर गया और देखते ही देखते बह गया। परदे पर रोती-बिलखती वह महिला थी…।

    हरियाणा का एक युवक, जिसकी शादी कुछ दिन पहले ही हुई थी, बीवी को घुमाने मुंबई आया था। चौपाटी के समंदर ने उसे लील लिया। परदे पर उस युवक की लाचारी, बेबसी और घुटा घुटा रुदन था…।

    गोरेगांव में डॉक्टर के यहां गए एक दंपती गटर में गिर गए। उनका शव अभी तक नहीं निकाला जा सका है…।

    चेंबूर में एक चॉल ढह गई, जिस वजह से पांच की मौत हो गई और तीन घायल हो गए…।

    विलेपार्ले में तबाही के मंजर देखकर एक बूढ़े व्यक्ति का हार्ट अटैक हो गया…।

    बीसियों बुलेटिन एक के बाद एक फ्लैश हो रहे थे। सभी के सभी हृदयविदारक थे।

    परदे पर नावें भी थीं, समूचे कौतूहल के साथ। इन्हें पानी भरी सड़कों पर चलाया जा रहा था। इनमें विभिन्न न्यूज चैनलों के संवाददाता थे।

    मैं रिमोट से चैनल पर चैनल बदलता जा रहा था। कहीं भी कोई राहत की खबर नहीं। आखिरकार जिस चैनल पर मैं रुका,  उसमें ‘पटरी पर गाड़ी’ शीर्षक के तहत समाचार चल रहे थे –

    बारिश की मार से मुंबई पूरी तरह अस्त-व्यस्त और त्रस्त…।

    मुंबई और ठाणे में मरनेवालों की संख्या आठ सौ से ज्यादा…।

    लेकिन मुंबई की धड़कन कही जानेवाली लोकल रेलगाड़ियां अब पटरियों पर…।

    .. .. ..

    कथाकार का परिचय : हरि मृदुल सुपरिचित कवि-कथाकार-पत्रकार हैं। ‘सफेदी में छुपा काला’, ‘जैसे फूल हजारी’, ‘बदले वक्त के मापक यंत्र’ (कविता संग्रह), ‘चयनित कविताएं’, अंग्रेजी में अनूदित एक कविता संग्रह ‘You Are Worth Millions Sir’ (जनाब आप करोड़ों के हैं) और एक कहानी संग्रह ‘हंगल साहब, जरा हँस दीजिए’ प्रकाशित हो चुके हैं। बाल साहित्य की दो पुस्तकों ‘सपना एक मछली का’ और ‘चतुर बाज’ के नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से कुमाउँनी अनुवाद भी छपे हैं। व्यंग्य और लघुकथाएं लिखी हैं और बाल साहित्य का भी सृजन किया है। इधर नवभारत टाइम्स, मुंबई में व्यंग्य कॉलम ‘आमची मुंबई’ काफी लोकप्रिय है। फिल्मों पर लिखा महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है। एक कविता आईसीएसई और सीबीएसई बोर्ड के विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाई जा रही है। विभिन्न रचनाओं के मराठी, पंजाबी, उर्दू, कन्नड़, नेपाली, असमिया, बांग्ला, अंग्रेजी और स्पेनिश आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

    सम्मान और पुरस्कार : महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का संत नामदेव पुरस्कार (2008), हेमंत स्मृति कविता सम्मान (2007), ‘कथादेश’ पत्रिका का अखिल भारतीय लघुकथा पुरस्कार (2009), कादंबिनी अखिल भारतीय लघुकथा पुरस्कार (2010), वर्तमान साहित्य कमलेश्वर कहानी पुरस्कार (2012), प्रियदर्शिनी पुरस्कार (2018), हिमांशु राय फिल्म पत्रकारिता पुरस्कार (2011), रामप्रसाद पोद्दार पत्रकारिता पुरस्कार (2019), Afternoon Voice  Best journalist Award (2023), डॉ. हरिवंश राय बच्चन कविता पुरस्कार (2024) और मुंशी प्रेमचंद कहानी पुरस्कार (2025) प्राप्त हो चुके हैं।

    नूतन सवेरा, दैनिक जागरण, अमर उजाला में वरिष्ठ पदों पर रहकर पत्रकारिता करने के बाद आजकल टाइम्स ग्रुप के हिंदी समाचार पत्र नवभारत टाइम्स, मुंबई में सहायक संपादक हैं।

    संपर्क : harimridul@gmail.com

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