सिनेमा संगीत का जरूरी ‘हमसफ़र’

कई बार ऐसी ऐसी किताबों की इतनी इतनी चर्चा हो जाती है कि कारण समझ में नहीं आता तो कई बार अच्छी-अच्छी किताबों की भी कोई ख़ास चर्चा नहीं होती- तब भी कोई कारण समझ में नहीं आता. ऐसी ही किताब अभी हाल में पढ़ी ‘हमसफ़र’, जिसके लेखक हैं युवा संगीतविद तीन्द्र मिश्र. यतीन्द्र के संगीत-लेखन का मैं शुरू से ही कायल रहा हूँ. उनके लेखन की एक ख़ास विशेषता है जो आकर्षित करती है. वह है साधारण पाठकों के लिए सहज, रोचक ढंग से संगीत के शास्त्रीय पहलुओं को लेकर लिखना. आम तौर पर संगीत पर लिखने वाले संगीत के जानकारों के लिए लिखते हैं, उनकी दृष्टि में आम पाठक नहीं होते हैं. लेकिन यतीन्द्र जैसे लेखक मुझे लगता है कहीं बड़ा काम कर रहे हैं- आम पाठकों तक संगीत की शास्त्रीयता को पहुंचाने का.


बहरहाल, ‘हमसफ़र’ हिंदी सिनेमा के संगीतकारों को लेकर है. लेखक ने सिनेमा इतिहास के कुछ जरूरी संगीतकारों की एक ऐसी फिल्म का चुनाव किया है जिसमें लेखक के अनुसार उनकी संगीत-कला अपने शिखर पर पहुँची और उस एक फिल्म के माध्यम से लेखक ने उस संगीतकार के योगदान का, उनकी विशेषताओं का मूल्यांकन किया है.  लेखक ने पंकज मलिक, अनिल विश्वास, सी. रामचंद्र, नौशाद, बसंत देसाई, हेमंत कुमार, गुलाम मोहम्मद, सलिल चौधरी, चित्रगुप्त, शंकर-जयकिशन, एस. डी. बर्मन, ओ. पी. नैयर, खैयाम, रोशन, मदन मोहन, रवि, जयदेव, आर. डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, शिव-हरि, हृदयनाथ मंगेशकर, भूपेन हजारिका जैसे संगीतकारों का चयन किया है. ये वे संगीतकार हैं जिनके बिना हिंदी सिनेमा के संगीत पर कोई भी चर्चा अधूरी ही मानी जाएगी.

बहरहाल, यतीन्द्र ने ऐसा नहीं किया है कि इन संगीतकारों की सबसे चर्चित फिल्म उठाई और उसके संगीत के बहाने संगीतकार के रूप में उस संगीतकार के योगदान का मूल्यांकन कर दिया. बल्कि लेखक ने अपने तई उस संगीतकार की ऐसी फिल्म का चयन किया है जिसमें उसके अनुसार उस संगीतकार की संगीत कला विशेष तौर पर निखर कर आई. जिसमें उस संगीतकार की शास्त्रीयता सबसे मुखर हुई. अब जाहिर है कि इसमें कई संगीतकार ऐसे हैं जिनकी किसी एक फिल्म का चुनाव करना अपने आप में बहुत मुश्किल काम था, जैसे नौशाद की एक फिल्म के रूप में ‘बैजू बावरा’ का चयन या शंकर-जयकिशन की एक फिल्म के रूप में ‘चोरी-चोरी’ का चयन या लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की एक फिल्म के रूप में सत्यम शिवम् सुन्दरम का चयन. बहरहाल, यह लेखक का विशेषाधिकार होता है.

सिर्फ इतना ही नहीं है. इस किताब को पढ़ते हुए कई संगीतकारों एक बारे में ऐसी ऐसी बातों का पता चला जो मेरी जानकारी में नहीं थी, जैसे यह कि संगीतकार-गायक हेमंत कुमार संगीत के क्षेत्र में आने से पहले बंगला की प्रसिद्द पत्रिका ‘देश’ में कहानियां लिखा करते थे. या यह कि हमारे बिहार के चित्रगुप्त सबसे पढ़े-लिखे और डिग्रीधारी संगीतकार थे. या मदन मोहन के सुन्दर गज़लों में लखनऊ की भूमिका को लेकर. लेखक ने पाकीज़ा के संगीतकार गुलाम मोहम्मद पर काफी मन से लिखा है और उनके उस दुर्भाग्य पर भी कि जिस कीर्ति के लिए वे उम्र भर तरसते रहे वह उनको मरने के बाद मिली, फिल्म ‘पाकीज़ा’ से. लेखक की शैली, उनके लिखने का हुनर सबसे अधिक निखर कर आया है ऐसे संगीतकारों पर लिखते हुए जिनकी पृष्ठभूमि शास्त्रीय संगीत की थी, जैसे बसंत देसाई, शिव-हरि आदि.

एक किस्सागो की तरह लिखी गई यह किताब आदि से अंत तक बाँधे रहती है. अगर आप सिनेमा के म्यूजिक के इतिहास को समझना चाहते हैं तो यह एक मस्ट किताब है.

और हाँ, साथ में गीतों की एक सीडी भी दी जा रही है.

किताब- हमसफ़र; लेखक यतीन्द्र मिश्र; प्रकाशक- पेंगुइन बुक्स, मूल्य- 299

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