कौस्तुभ उपाध्याय की कुछ कविताएँ

आज पढ़िए कौस्तुभ उपाध्याय की ग़ज़लनुमा कुछ कविताएँ।कौस्‍तुभ उपाध्याय मूलतः पत्रकार हैं और आजकल इंडिया वॉटर पोर्टल में सीनियर एडिटर की भूमिका निभा रहे हैं। आइये उनकी कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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हमको चलना था, लीक से हटकर
गुम हुए फिर भी, भेड़चाल में ही।

जिसको समझा था, तुरुप का इक्का
कट गया वो तो पहली चाल में ही।

वो न उतरा हमारे शीशे में,
फंस गए हम, खुद उसके जाल में ही।

दे न पाया जो, वो जवाब हमें
उसने घेरा हमें, सवाल में ही।

वस्ल की रात भी अजीब सी थी,
कट गई हिज़्र के ख्याल में ही।

दफ्न था दिल में जो जज़्बों का ग़ुबार,
उसको ‘ठंडक’ पड़ी उबाल में ही।

कल अधूरे से थे, उरूज़ में हम
अब मुकम्मल हुए ज़वाल में ही।

हमने हंस कर गुजारनी चाही,
जिंदगी कट गई मलाल में ही।

तुरुप : ताश के खेल में ट्रंप
उरूज़ : उत्‍कर्ष, उत्‍थान
ज़वाल : अवनति, उतार

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जिनका मुआशरे में मेरे नाम बहुत है
उनको मेरी तकलीफ़ से आराम बहुत है।

बदनाम कर मुझे, क्या मिलेगा भला तुम्हें
मुझ पर तुम्हारे इश्क का इल्ज़ाम बहुत है।

ठहरे हुए पानी में, मैं लहरें उठा रहा।
बेचैनियों में मुझको, इत्मीनान बहुत है।

मुझको मेरे मोहल्ले में कोई जानता नहीं,
दुनिया में मगर, मेरा एहतराम बहुत है।

देखे बिना गुज़र गया मैं उसको आज फ़िर
महबूब से ये मेरा इंतक़ाम बहुत है।

पहुंचा हूं जहां खुद से मैं रस्ते तलाश कर
मेरे लिए तो मेरा वो मुकाम बहुत है।

महफ़िल हो शायरों की या हो हुस्न का बाज़ार
दोनों ही ठिकानों पे मेरा नाम बहुत है।

मुआशरे : समाज, समुदाय
एहतराम : आदर, सम्‍मान

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क्यों निकट तुम्हारे…
क्यों निकट तुम्हारे अनायास ही
खिंचा चला मैं आता हूं।
आसक्ति ये मेरे मन की है
या शक्ति तुम्हारे यौवन की।
क्यों निकट तुम्हारे…

क्यों तुम्हें देखती हैं आंखें
तुम देखो तो झुक जाती हैं।
नयनों की अटखेलियां हैं या
अभिव्यक्ति है प्रणय-निमंत्रण की।
क्यों निकट तुम्हारे…

क्यों आती-जाती सांस मेरी
इक नाम तुम्हारा लेती है।
क्यों दिल के भीतर दबे हुए
सब राज़ हवा से कहती है।
यह महक हृदय का विभ्रम है
या सुरभि प्रेम के चंदन की।
क्यों निकट तुम्हारे…

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प्रेम-अगन
प्रेम अगन है, इश्क आग है, दुनिया हमसे कहती थी।
पर अपनी ही बर्बादी की यह अभिलाषा कैसी थी।

ऐसा बंधन बंधा कि बाकी सारे बंधन टूट गए
भीतर उठी आग ऐसी, हम स्वयं अग्‍नि में कूद गए।

मिली आग से आग जहां, फिर राख सिवा क्या मिलना था।
परवाने की किस्मत में तो, बस जलना और जलना था।

खाक़ हुए सपने सारे, कि तारे हमसे रूठे थे।
सच्ची थी सारी दुनिया, इक हम दुनिया में झूठे थे।

हारी प्रीत की रीत, नियम दुनिया का हमने माना है।
जान गई, तो जान ए जाना, हमने तुमको जाना है।

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उजालों पर कयामत

डूब जाने दो इसे तीरगी के सागर में
रात ठहरी तो उजालों पर कयामत होगी।

अपनी, किस्मत से भला यूं ही कहां बनती है
और बिगड़ी तो यक़ीनन ही बग़ावत होगी।

छिपा गए हैं वो खंजर हमारे बिस्तर में
हम हटा दें तो अमानत में ख़यानत होगी।

कितना मुस्का के दे रहे हैं ज़हर का प्याला
उनको इन्कार तो तौहीन ए मोहब्बत होगी।

हम अपने क़त्ल का इल्जाम खुद पर लेते हैं
ख़्वाह-मख़्वाह उनकी ज़माने में मज़म्मत होगी।

डूब जाने दो इसे तीरगी के सागर में

तीरगी : अंधेरा
ख़यानत : अमानत रखी वस्तु को चुरा लेना
ख़्वाह-मख़्वाह : अनावश्यक, बेवजह
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क्या करेंगे आप
उस ओर से लगा के आग, ये तो सोचिए
बदलेगी ये हवातो रुख, तो क्या करेंगे आप।

हम तो हैं दिलजले सनम, सह लेंगे हर तपिश
पर आप हैं नाज़ुक मिज़ाज क्या करेंगे आप।

हमको सिखाइये सबक, ये सोचकर हुज़ूर
कल ज़िंदगी के इम्तेहां में क्या लिखेंगे आप।

दौलत की अहमीयत है बहुत, मानते हैं हम
पर साथ न जाएगी ये, तो क्या करेंगे आप।

शोहरत के पीछे दौड़िये, रिश्तों को छोड़कर
खुद को शिखर पर चार सू तन्हा मिलेंगे आप।

चार सू : चारों ओर
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घना कोहरा
क्या घना कोहरा यहां छाया हुआ है।
सय्याद ही बुलबुल का हमसाया हुआ है।
बन के फरियादी है मालिक गिड़गिड़ाता
और खादिम खुद पर इतराया हुआ है।
क्या घना कोहरा…

हां में हां हरदम हुकूमत की मिलाओ
संतरी संकेत दे तो सिर हिलाओ।
भक्तगण की मंडली में हो के शामिल
झाल झटपट ताल में इनकी बजाओ।
देश का क्या बैंड बजवाया हुआ है।
क्या घना कोहरा यहां छाया हुआ है।

लोकशाही को लगा है श्राप देखो।
सब तमाशा बैठकर चुपचाप देखो।
झूठ-सच, अच्छा-बुरा सब भूल जाओ।
इस मदारीपन पे बस ताली बजाओ।
उस्तरा बंदर को पकड़ाया गया है।
क्या घना कोहरा यहां छाया हुआ है।

सय्याद : बहेलिया, शिकारी

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तलाश जारी है…

कहीं जिगर, कहीं दिमाग़, कहीं दिल क़ाबिज़
बदन में रूह कहां है, तलाश जारी है।

सारे चेहरे तो हैं बेशक्ल, कैसे पहचानूं
मेरा वज़ूद कहां है, तलाश जारी है।

निखर उठेगी जिसमें तप के मेरी शख्सियत
वो कड़ी धूप कहां है, तलाश जारी है।

गुज़र के जिससे रोशनी में रंग आ जाए
वो कोहिनूर कहां है, तलाश जारी है।

मेरे जलने से रोशनी हो और सुगंध उठे
मग़र कपूर कहां है, तलाश जारी है।

जो भी आता है, इक ज़ख्म दे के जाता है
राह महफ़ूज़ कहां है, तलाश जारी है।

मैं जिसको हाथ बढ़ाकर के चला था छूने
वो कितनी दूर, कहां है? तलाश जारी है।

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