फ़रवरी, जिसे प्रेम का महीना भी कहा जाता है। इसके बीतने के पहले आइए कुछ प्रेम-कविताएँ पढ़ते हैं। ये कविताएँ युवा कवि मनीष यादव की हैं, जिन्हें हाल ही में उनके पहले काव्य-संग्रह ‘सुधारगृह की मालकिनें’ को ‘अमर उजाला अलंकरण समारोह’ में ‘शब्द सम्मान’ प्रदान किया गया है- अनुरंजनी
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*पोस्टकार्ड /
1.
अपनी छोटी आँखों में क़ैद कर लेती हो पूरा शहर!
यह साल का कैसा मौसम है तुम्हारे आने से
पहाड़ों का रंग सफ़ेद हो चुका है
और धूप तुम्हारे हाथों में बर्फ़ देख बाहर नहीं आना चाहती
प्रेम तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा सर्दी से ठिठुरता ‘लैंपपोस्ट’ है
जो बाँट ले रहा है अपनी रोशनी
और खींच लेना चाहता है तुम्हारी परछाई के साथ एक तस्वीर
सड़कें चाहती हैं तुम दौड़ो
फूल तुमसे ख़ुशबू चुरा लेना चाहती है
और लकड़ियों का ढेर पहली बार ख़ुश है ख़ुद के जला दिए जाने पर
मैं संगीतकार होता तो बनाता तुम्हारी बालियों की आवाज़ से धुन,
चित्रकार होता तो बनाता तुम्हारा चेहरा,
पौधा होता तो उग आता तुम्हारी हथेलियों पर कत्थई रंग लिए
लेकिन मैं बौराया हुआ आदमी हूँ
जो कहीं फूलों की घाटी में लोट रहा है
और पूछ रहा है–धूप! क्या लौटते हो तुम, चूम के उसके पाँव?
जैसे ख़ाली कर दिए जाते हैं कमरे और छोड़ दिए जाते हैं शहर
नई नौकरी मिलने पर,
चार पहियों पर चलते हुए हम भूल जाते हैं
रिक्शे के चक्कों की आवाज़,
जले हुए चाय के पतीलों से नहीं आती अब कोई गंध
जैसे ऑफ़िस के बाहर नहीं मिलता एक दिन
रोज़ाना की तरह फूल बेचता सत्तर बरस का वह बूढ़ा
यह जीवन होने से अधिक
छूट जाने के लिए बना है।
बिस्तर के सिकुड़े कोने में जब मौजूद होती हो तुम
नींद का तुम्हारी आँखों से ग़ायब होना ज़ुल्म है
तुम गीतों से बातें करने वाली लड़की हो
जिसकी उँगलियों को छूने से बारिश हो जाए
दोस्त, जिसकी याद आने से कौंध जाता है मन
गला हो जाता है भारी
जिसके चले जाने से लौटती है उदासी
वह नहीं बनना मुझे
मैं तुमसे किसी अजनबी की तरह मिलूँ
पुनः मिलने की आशंका साथ लिए!
चिट्ठी की तरह मिलूँ पढ़े जाने के लिए,
छोटे गाँव की तरह मिलूँ जहाँ राही प्यास बुझाते हों।
उस प्रेमी की तरह नहीं मिलना चाहता मैं
जो भुला दिये जाते हैं अंततः।
2.
मेरा प्रेम दूर कहीं पसरा मिट्टी का ढेर था जिसे तुमने अपने हाथों से छूकर रूप दिया
तुमने मुझे गढ़ा और आज़ाद किया
स्मृतियाँ धीरे-धीरे बंद मुट्ठी से गिरते रेत की तरह ख़ाली हो गयी हैं
ह्रदय ने स्वीकार लिया है तुम्हारे न लौटने को
प्रतीक्षा, विलम्ब में बदल चुकी है
मैं बढ़कर दूर आ गया हूँ
बस की भीड़ में बैठा शांत, मन गीत रचता है और फेंक देता है
पानी के बुलबुले के ऊपर बनाकर एक कागज़ की नाव!
वह पहला प्रेम था जब मैं भागा गिलहरियों की तरह
तुम वह आख़िरी नदी थी जहाँ मैं डूब जाना चाहता था
मेरी यादों में मौजूद वह आख़िरी पता था
जहाँ मैंने भेजे अनगिनत पोस्टकार्ड
लौट आने के लिए बार-बार
दोस्त मैं इंतज़ार में हूँ
तुम्हारे युवा चेहरे को ढूँढता हुआ
मुझे बताना है—
कहीं खो गया है तुम्हारा घर
और मेरी बातों पर ठहाके मारकर हँसने वाली वह लड़की भी
जो मेरे बालों में हाथ फेर कहती थी
तुम इसे हमेशा ऐसे ही क्यों छोड़ देते हो
3.
तुम्हारी उँगलियों में समा जाए
सर्दी की शीत
तुम्हारी हथेलियों में रिक्त रहे
चूमे जाने की प्रतीक्षा
तुम समंदर के पास बैठो
तो देह में उठे स्पर्श की लहर!
तुम मुझे याद करो
जब-जब
मैं मौजूद होकर भी तुम्हारी आँखों में
छू मंतर सा ग़ायब होता रहूँ
पानी में उतरो
पानी की तरह बह जाने को
जैसे तुम प्रेम में उतरती हो
उफ्फ, ऐसा प्रेम
जिसके ताप से मिट्टी सोना हो जाए
4.
यह क्या बात हुई
कि मैं तुमसे अब और रूठा
नहीं रह सकता
तुमसे बातें होती हैं
और तुम्हारा एक वाक्य
मेरे मन में तुम्हारे लिए जो प्रेम बसा है
उसे और भी गहरा कर देता है
प्रेम में होते हुए सोचता हूँ
प्रेम अगर कहीं पास है
जैसे हमारे पास सुंदर आकाश है
सामने दीखता है घास का मैंदान
जिसमें दौड़ रही हो तुम
अपने हिस्से की ज़मीन लिए
तुम दूर पुकारती हो तो लगता है
इस आवाज़ के पीछे
पूरा जीवन लेकर दौड़ जाना चाहिए
5.
यह दिसंबर का महीना है और ओस तुम्हारे पाँव को बरसात की तरह
चूम लेना चहती है
तुम इस सर्द सुबह कोहरे के बीच खड़ी हो
उन खेतों में
जहाँ से सूरज तुम्हारी तस्वीर खींच रहा है
गेहूँ और चने के पौधे सोच रहे हैं
यह कैसी महक है तुम्हारे आने से
तुम्हारे केशों में कोई फूल भी नहीं दिखता
जिसके चेहरे को समेट लिया था तुमने अपनी आँखों में
पहली बार
क्या उसे एकटक निहारते उससे लिपट जाना चहती थी तुम?
इस दिसंबर ने देखा था
दो परछाईं की दूरियों को एक हो जाते
और कत्थई हाथों के रंगों को गाढ़ा कर चुके उन हथेलियों को भी
तुम वह जादू हो जिसे देख
प्रेमी पत्र लिखना भूल जाए
यात्री अपनी राह छोड़ तुम्हारे पीछे चलने लगे
और तितलियाँ गुलाबी फूलों से तुम्हारे लिए रास्ता बनाने लगे
फिर प्रेम से भरे कमरे में
उदास क्यों रहता है तुम्हारा मन
कौन है जो तुम्हें पीछे बुलाता है बार-बार
कलकत्ते की पीली टैक्सीयों की भीड़ में
तुम्हारा जीवन
इतना धीरे कैसे हो सकता है
सोचता हूँ!
तुम्हारे शहर के चौक पर खोल दूँ क़िताबों की दुकान
तुम्हारे घर की ओर जाती बसों में
चले सिर्फ तुम्हारे पसंदीदा गीत
दोस्त तुम इतनी ख़ूबसूरत हो
कि जिससे तुमने प्यार किया
उसकी आँखों में, तुम्हारे चेहरे को तस्वीर की तरह सजा दिया जाना चाहिए।
6.
धूप को देख चिढ़ती हो
कभी उसी की प्रतीक्षा में सुबह
बैठ जाती हो
हथेलियों में धीमा सर्द तापमान लिए
तुम होती तब कहता—
थोड़ा पास आओ
इतना तो ज़रूर!
हमारे बीच की ओस की बूँदे पिघल जाए
तुम्हारा सर मेरे कंधे पर रखा हो
और बकबक करती तुम
और भी बच्ची बन जाओ
मैं बताता तुम्हें
तुम्हारे लिए मैंने
बगीचे में कुछ फूल उगाये हैं
रातों को वहाँ कोई नहीं जाता
कुछ गाढ़ी ख़ुशबू
मौजूद होती है
और साथ में तुम्हारे आने का इंतज़ार
7.
प्रेम, दिसंबर तक पहुँचा पतझड़ का कोई इंतज़ार नहीं है
जहाँ आने वाले पीले पत्तों की आस
प्रतिदिन तुम्हें बाग़ीचे तक खींच लाती हो
अकेले आहिस्ते से गुनगुनाते प्रेम संगीत को सुना है मैंने
उस धुन की गहराई को जानने की तीव्र इच्छा
मुझे तुम्हारी तरफ खींचती है
पर तुम दूसरी यात्रा पर हो।
कहना था तुमसे—
किसी के पीछे ख़ुद को मत घसीटो
साथ चलते रहने के भ्रम से
बाहर निकल आओ
तुम उससे प्रेम करती हो
वह अपने प्रेम से परेशान होकर तुम्हारे पास आता है
तुम्हारा समर्पण उसके लिए बस एक ख़ाली स्थान मात्र है
जहाँ वह अपनी सारी उदासी और चिढ़ भरने को उपस्थित है
तुम यह जानते हुए भी
उसके समीप जाने का व्यर्थ
प्रयत्न कर रही हो
पता है वह तुम्हें कभी नहीं अपना सकेगा
तुम्हारा प्रेम प्रतीक्षा कर रहा है
तुम किसी सघन उदासी की ओर जाने को आतुर हो
प्रेम में इंसान कितना बुद्धु हो जाता है प्रिय
लगता है जैसे प्रेम जिस व्यक्ति से हो
वह उसे क्यों न मिले।
लोग इन दिनों प्रेम में भागना ही पसंद कर रहे
सबकुछ भुलाकर अपने प्रिय के पीछे भागना
जैसे कोई तुम्हें यह सबकुछ समझाते हुए,
तुम्हें और सुंदर बनाए रखना चाहता है
वह जो तुम्हें परेशान नहीं देखना चाहता
तुम्हारे पीछे अपने प्रेम की तलाश में भाग ही तो रहा है
हर बरस की तरह इस बरस भी प्रतीक्षा में,
टहल रहे होंगे तुम्हारी एक याद लिए
कि इस बार बसंत पहले आएगा!
या अपना प्रेम लिए तुम।
* पत्नी की मृत्यु के बाद /
1. थरथराते होठों से निकलती है प्रार्थनाएँ
बुदबुदाते हुए पुकारता हूँ
आवाज़ फँसती है जैसे गले में अटका पड़ा हो
रिसता हुआ महीन दुःख
सिकुड़ी त्वचा को टटोलता हुआ
घर के बाहर जाता हूँ हर रोज़
खोजता हूँ आँसुओं के गिरने की रिक्त जगह
अकेला नहीं
कम हो गया हूँ
बहुत–बहुत
जिसका होना आँखों में पानी का होना नहीं था
जिसे देखा अपने साथ बहते
जीवन के हर समय
उसके न होने से मेरे भीतर डूब रहा कुछ हर घड़ी
कितना सुन्दर गाती थी तुम
कोहबर-गीत
कितने अथाह प्रेम से देती रही तुम ताने
लौट आओ कि कितने दिनों से नहीं दिया तुमने
तुलसी को पानी!
कौन सिखाएगा बच्चों को बनाना
मुरब्बे, बड़ी, अचार
नए कुर्ते का टूटा बटन
जिसके न मिलने पर बदल दिए जाते हैं विकल्प
तुम्हारे न होने पर
अपनी खुली आँखो से स्वप्न देखता
वैसा हो गया हूँ
तुम थी तो इन खुरदरी हाथों में भी सौंदर्य था
तुम नहीं हो तो
इन आँखों का होना व्यर्थ है
और जीवन औपचारिकता।
2.
प्रेम था
जैसे दोपहर की नींद में सोया
बच्चा
गोद से तुम्हारे लिपट
रोया कितनी बार
अनगिनत फूलों के मध्य भी
कुछ काँटों से क्यूँ करता हूँ प्रेम
तुम अलग हुई
पेड़ के आख़िरी पत्ते की तरह
तुम जीवन में ऐसे थी
जैसा होता है—
पिता की इच्छाओं का
संसार।
3.
तुम्हारे कोमल पैरों का भार
नहीं होता पृथक
पटकती हो मेरे माथे पर नृत्य के पाँव
भभक उठती मद्धिम आँच की कुलबुलाहट
सीने में
जब भी देखता हूँ तुम्हारी तस्वीर
टटोलता हूँ—
अपना चेहरा
गाढ़ी स्मृतियों का रंग
जिसे अपने ललाट पर ओढ़ता हूँ!
यह समय सारी सुन्दर यादों के नष्ट होने का नहीं
पुनः
देर से लौटने का है
नहीं बसती आँखों में नमी
उसकी पानी में उतर गया जो देह
फिसलन बची है पैरों में
जिससे गिरता हूँ
गिरता रहता हूँ
उठता नहीं, क्योंकि चाहता नहीं
एक शहर
जहाँ ठहर
बार-बार तुम्हारे पास लौटना चाहता हूँ
मुझे तुम्हारे पास लौटने से नहीं
इस शहर से नफ़रत है—
जिसने तुम्हारी रीढ़ को जकड़ लिया
अपनी मिट्टी के साथ।
4.
तुम आषाढ़ की तरह बरसती
और इस महीने के धूप की तरह
निकलती
ग़ायब होती
सुंदर हरे रंग के दृश्यों में
जब दौड़ते थे तुम्हारे पैर!
अब नहीं हो उसके पास
जिसकी प्रतीक्षा में
भर जाते थे देह में कत्थई रंग
तुम्हारी यादें बरसती हैं तेज़
मेरा मन टीन की छत की तरह
करता है आवाज़
तब चीखते हुए नहीं
ख़ुद को ढूँढते हुए रोता हूँ
तुम्हारी गोद में ही
छूट गया हूँ मैं भी
लेकिन कोई नहीं सुनता
मैं तुम्हारे पते पर
लौटना चाहता हूँ
सब कहते हैं—
मैं नदी की तरफ़ भागता हूँ
पानी में कूद जाने को
वह मुझे दूर ले जाते हुए
यह नहीं जानते
मैं पानी में डूबना नहीं चाहता
तुम्हें निकाल लाना चाहता हूँ वापस
यकायक ताकता हूँ चौखट
जहाँ ख़ुश है कोई बच्ची
एक आदमी को लौटते हुए देख
यह आदमी इन दिनों पैदल चलता है
स्मृतियों की रेखा में
तभी देखता—तुम्हारे जीवन के रंग
पानी में छूट गए!
और मेरे हाथ अब भी
फूलों से क्यों भरे हैं?
5.
यह वही फरवरी है जब
उनकी दृष्टि में चमक का एक अलग मद्धिम रंग होगा,
अंतस में गुलाबी इच्छाओं का संसार
फूलों की तरह उखड़ जाएंगी मिट्टी के रंग को अकेला छोड़
और कई तो सफेद फूल को देखते ही दौड़ पड़ती होंगी
प्रेमी को ओर
नीले आसमान के नीचे किसी अनजान शहर में
गाड़ियों पर बैठी ,
सड़क पर टहलती ,
पहाड़ों से बतियाती,
प्रेमियों से झगड़ती इठलाती लड़कियाँ होंगी
कुछ आहिस्ते से निकलते पीले सूरज से पूर्व
समाप्त कर लेंगी अपनी मुलाक़ात।
गाँव के छत पर किसी का इंतज़ार करती
हल्की धूप से बचने का छांव लिए
गहरे लाल रंग का दुप्पटा होगा – उसके मेहंदी लगे कत्थई हाथों में
एक औरत होगी नाराज़
जो पति के दूर रहने को कोसती
सूप में फटक रही होगी दाल
वसंत को समझती एक बूढ़ी औरत होगी
जो फाल्गुन के आने की आहट को पहचानती
याद कर रही होगी अपना चश्मा
जो बहुत बात करने की इच्छा के बाद भी
रहती है बिल्कुल चुप
और बच्चों को कहानियों से कहाँ रहा अब प्रेम – सोचती है!
नदी किनारे भीड़ होगी
मंदिरों में प्रार्थनाओं का भार होगा अधिक
चौराहों पर हाथ पकड़े जोड़े होंगे
कुछ अधेड़ पुरुष होंगे जो
देते होंगे गूढ़ ज्ञान
कि प्रेम तो एक बीमारी है
अन्तिम एक कोने में दुबके
अदृश्य होने की इच्छा में बैठे कुछ छोड़ दिए गये लड़के होंगे
जो अपनी हरेक दृष्टि में देख रहे होंगे
अपनी प्रेमिका के आंखों का रंग – जिसमें धुल गया उनका मासूम चेहरा
मैं पूछता हूँ अपने आप से – तुम उदास प्रेम के लिए रहते हो
या अपने उस प्रेम में डूबे चेहरे के लिए।

