रज़ा न्यास द्वारा हाल में आयोजित युवा में संभवतः सबसे कम उम्र के प्रतिभागी रहे अभिषेक कुमार अंबर। 26 साल के इस युवा ने लखनऊ और प्रसिद्ध लेखक अमृतलाल नागर के ऊपर पर्चा पढ़ा। अभिषेक दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं। लेखकों की रचनाओं और लेखकों के रिश्ते को लेकर लिखते रहे हैं। जानकी पुल पर इन्होंने निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ तथा रानीखेत के रिश्ते तथा मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ तथा नैनीताल के रिश्ते को लेकर लिखा था जो बहुत चर्चित रहे। आज आप इनका लिखा यह पर्चा पढ़ें- मॉडरेटर
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मैं अक्सर सोचता हूँ आख़िर क्या पैमाना है कि किसी शहर को लेखक के नाम से मंसूब कर दिया जाता है। जैसे कृष्णा सोबती की दिल्ली, जयशंकर प्रसाद का इलाहाबाद, पंत का अल्मोड़ा, रेणु का पूर्णिया या अमृतलाल नागर का लखनऊ।
अगर जन्म को आधार माने तो न कृष्णा सोबती दिल्ली में जन्मीं, न अमृतलाल नागर लखनऊ में। नागर जी के पूर्वज गुजरात से आकर उत्तर प्रदेश में बसे। उन का जन्म भी आगरा में हुआ।
मुझे लगता है कोई शहर लेखक के नाम से तब मंसूब होता है जब लेखक उस शहर की आत्मा को अपने लेखन में उतार देता है। वह शहर को केवल सामान्य पृष्ठभूमि के रूप में प्रयोग नहीं करता बल्कि उसे एक पात्र बना देता है एवं उस शहर की संस्कृति, सभ्यता और समाज हमसे संवाद करने लगते हैं। वह केवल शहर का वैभव ही नहीं पराभव भी, ग्लेमर ही नहीं यथार्थ भी हमारे सामने रखता है।
जब कोई पाठक लेखक के शहर में क़दम रखे और उसे लेखक के पात्र वर्णित स्थानों पर घूमते दिखाई देने लगें, उनके संवादों की गूँज सुनाई देने लगे, दृश्य आँखों के आगे फ़िल्म की तरह चलने लगें तो वह शहर उस लेखक का होकर रह जाता है।
इसी आधार पर मुझे लखनऊ, अमृतलाल नागर का शहर लगता है। नागर जी ने अपने जीवन का बेशतर हिस्सा लखनऊ में गुज़ारा। बचपन उनका कंपनी बाग़ के सामने इलाहाबाद बैंक की कोठी में बीता और बाक़ी का जीवन चौक में। इसलिए चौक नागर जी के साहित्य की धुरी रहा है। कहानियों में टहलते हुए वह बनारसी बाग़, नखास, हज़रत गंज या सिकंदर बाग़ तक जाते ज़रूर हैं पर फिर जल्द ही पलट कर चौक के चबूतरे पर आ बैठते हैं।
1934 में हाई स्कूल पास नागर जी से जब पिता ने पूछा कि तुमने कुछ सोचा है? आख़िर पढ़ लिख कर क्या करोगे?
उन्होंने तपाक जवाब दिया – “मैं लेखक बनूँगा।”
यह उनके लेखक बनने की रुचि ही थी कि वह कम उम्र में ही कलकत्ता जाकर शरतचंद्र, बनारस में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, गोपालराम गहमरी जैसे साहित्यकारों के दर्शन कर आए।
1935 में ‘वाटिका’ नामक अपनी पहली कृति उन्होंने प्रेमचंद को भेजी। प्रेमचंद ने उन्हें ख़त लिखा। “…यह तो गद्य-काव्य की-सी चीज़ें हैं। मैं रीयलिस्टिक कहानियाँ चाहता हूँ। जिनका आधार जीवन हो। जिनसे जीवन पर कुछ प्रकाश पड़े। मैंने ‘वाटिका’ में दो चार फूल सूंघे, अच्छी ख़ुशबू है।”
इस पत्र के बाद 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ में प्रेमचंद का भाषण सुनने के बाद नागर जी के लेखन की शैली बदल गई। अब वह रीयलिस्टिक कहानियाँ लिखने लगे। वह उन बस्तियों के चित्र देने लगे जहाँ सफ़ेदपोश लोग दिन में जाने से भी हिचकिचाएं। बक़ौल ज्ञानचंद जैन “अंग्रेज़ी में जिन बस्तियों को स्लम कहते हैं उनके चित्र। गढ़ेवाली सराय या चावल मंडी में रहने वाली सिफलिस के दानों से मुँह को सजाए रखने वाली कलाविहीन, फिर भी कलात्मक दुअन्नीवालियों के चित्र। मानव समाज के नंगे चित्र- गांधी की ज़बान की भाँति सच्चे चित्र।”
अमृतलाल नागर जिस रफ़्तार से सोचते थे उस रफ़्तार से उनका हाथ लिख नहीं पाता था इसलिए बोलकर लिखवाने के लिए उन्होंने एक लिपिक रखा हुआ था। कहते हैं नागर जी के लिपिक का कार्य करके कई सफल संपादक बन गए।नागर कहते थे इसका एक लाभ यह भी है कि जब लिपिक आएगा तो बाध्य होकर लिखने के लिए बैठ जाना पड़ेगा। इसी का परिणाम है कि उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की। और मेरे जैसा हिन्दी का विद्यार्थी जब प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उनकी रचनाओं के नाम याद करता है तो उनके लिपिक को कोसता ज़रूर है कि क्या वह कुछ रोज़ छुट्टियों पर नहीं जा सकता था।
नागर जी कहीं भी गए हों उनसे लखनऊ कभी नहीं छूटा। लखनऊ की यह ख़ासियत है कि जो इस शहर में आया इसका होकर रह गया। यह शहर जिसको बनाता है तो अर्श पर बैठा देता है और जिसको लूटता है तो उसे फर्श भी नसीब नहीं होता। बिस्मिल सईदी का शेर है –
किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत ‘बिस्मिल’
मगर ख़ुदा की क़सम लखनऊ ने लूट लिया
नागर जी जब बम्बई में सफल पटकथा लेखक बन गए तब भी लखनऊ की याद उन्हें बराबर सताती रही। इसलिए वह बम्बई में ज़्यादा दिन टिक नहीं पाए।
1947 में बम्बई को हमेशा के लिए अलविदा कहने के बाद लखनऊ से नागर जी ने अपनी पत्नी को ख़त में लिखा है, “…कुछ पता नहीं, बड़े अँधेरे में भटक रहा हूँ, ईश्वर इतने शून्य में ले जाकर क्या दिखलाना चाहता है, इसी की प्रतीक्षा है। मेरी क़िस्मत अब इसी भूमि से खुलेगी, अब मेरी लंबी हलचलों का अंत निकट है, ऐसा आभास होने लगा है…।”
वाकई नागर जी की क़िस्मत लखनऊ की भूमि से ही खुली। नागर जी का मानना था कि किसी शहर का चरित्र खोजना है तो उसके जन में बसे किस्से-कहानियों में खोजा जाए। इसलिए उन की दृष्टि सामाजिक, पारिवारिक और मोहल्ला जीवन पर हमेशा बनी रही। लोगों से बात-चीत करना, साक्षात्कार लेना और फिर उनसे प्राप्त जानकारी को अपनी रचनाओं में प्रयोग करना उनका पसन्दीदा कार्य था।
थे हाई स्कूल पास, लेकिन उनकी विषय पर पकड़, उनका अध्ययन बड़े-बड़े ज्ञाताओं को मात देता था। अवध के इतिहास की जितनी गहरी जानकारी नागर जी को थी उतनी, किसी इतिहासकार को भी नहीं होगी। ‘ग़दर के फूल’ लिखने से पूर्व उन्होंने सन 1857 में अवध में जहाँ-जहाँ लड़ाइयाँ हुई थीं वहाँ जाकर, बढ़े-बूढ़ों को खोजकर उनसे किवंदतियां एकत्रित की। तब जाकर वह रचना मंज़रे-आम पर आई।
नागर जी का लखनऊ, आम आदमी का लखनऊ है। उन्होंने केवल यहाँ के नवाबों पर नहीं लिखा, बल्कि उन्होंने यहाँ के साधरण, दमित और शोषित लोगों के संघर्ष को आवाज़ दी।
लखनऊ के पत्थरों, इमारतों, खंडहरों की भी आवाज़ें सुनीं। वह सबकी ज़बान बने। उनकी रचनाओं में लखनऊ के बेशतर इलाक़े अपनी बात कहते नज़र आते हैं जैसे चौक, नखास , पाटा नाला, अकबरी दरवाज़ा, निशात गंज, अमीनाबाद, नज़ीराबाद , विक्टोरिया पार्क तथा हज़रत गंज आदि।
बहुत से पात्र इन स्थानों पर घूमते दिखाई दे जाते हैं जैसे चौक में सब्ज़ी बेचती खटकिन भाभी और उमाशंकर महाराज की दुकान, नखास के बाज़ार में साबुन बेचते, गली से गुज़रती औरतों से हँसी-मज़ाक़ करते मियाँ नज़ीर तथा पाटा नाला पर जंतर मंतर कहानी के शाह जी का डेरा जिन के यहाँ मुख्यमंत्री पंथ जी भी ताबीज लेने आते हैं। चौक की गलियों में आटे का पुतला बनाकर किसी के दरवाज़े पर रखती ताई। तभी रामविलास शर्मा ने कहा है, कि “लखनऊ वह शहर है जहाँ पत्थर भी बोलते हैं, बस सुनने वाला नागर जैसा कलाकार होना चाहिए।”
अमृतलाल नागर की कहानियों के नामों से पता चलता है कि उनकी कहानियों लखनऊ के आम-जनमानस की कहानियाँ हैं। यह इत्तेफाक़ नहीं है कि नागर जी की बेशतर कहानियों के नाम ‘नाम’ ही हैं या कोई संबंधबोधक शब्द साथ लिए हैं। जैसे मुंशी घिर्राऊलाल, तुलाराम शास्त्री, हमारे पड़ोसी मुंशी बख्तावरलाल, नज़ीर मियाँ , भारतपुत्र नौरंगीलाल, शकीला की माँ, क़ादिर मियाँ की भौजी तथा खटकिन भाभी आदि। कहानियों के यह नाम, समाज एवं पात्रों से उनके जुड़ाव को दर्शाते हैं। अक्सर उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए रेखाचित्र पढ़ने का गुमान होता है।
नागर जी की कहानियाँ लखनऊ के समाज के विभिन्न वर्गों को केंद्र में लिख कर लिखी गयी है। उनके साहित्य में दलित, स्त्री, किन्नर तथा अन्य तबकों की मार्मिक अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनकी कुछ कहानियों का ज़िक्र करना चाहूँगा।
‘बसंती’ (जनवरी 1938) कहानी किन्नरों के जीवन पर आधारित कहानी है । मुझे लगता है कि यह LGBTQ विमर्श पर लिखी प्रारंभिक कहानियों में से एक होगी। बसंती सब सुख, सुविधाओं, आदर तथा प्रेम के होते हुए भी स्वयं को अकेला महसूस करती है। क्योंकि वह किसी के सामने अपने अस्तित्त्व को नहीं स्वीकार सकती। लेकिन एक किन्नर से अपनी सारी व्यथा बता कर उसके साथ घर छोड़ कर भाग जाना। तथा किन्नर समाज के साथ रहना दर्शाता है जीवन के लिए स्वतंत्रता एवं अपने अस्तित्व की स्वीकार्यता पहली शर्त होती है । वह कहती है “वहाँ भूखे रह कर भी मुझे जितना सुख मिलेगा उतना यहाँ नहीं”।
मरघट के कुत्ते (1941) कहानी में नागर जी दर्शाते हैं कि किस तरह समाज में कुछ लोग व्यक्ति के मरने के बाद भी उससे अपने स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। यह कहानी मनुष्य की मानवीयता पर प्रश्न खड़े करती है। कहानी का शीर्षक ‘मरघट के कुत्ते’ प्रतीकात्मक है। कहानी में क़फ़न को लेकर महापात्र और मेहतर में कुत्तों की तरह छीना छपटी दिखाई गई है। कहानी के अंत में जब अघोरी तपेसरी के बेटे मोहन पर क्रिया करने लगता है। तो सामने खड़ा तपेसरी अघोरी के मंत्रों में अपने बेटे और अपनी जाति का नाम सुन कर आवेश में आ जाता है तथा अपने बेटे की लाश के दुरुपयोग और जाति के अपमान का बदला लेने के लिए वह अघोरी के मुँह में हवनकुंड की जलती लकड़ी डाल देता है। यह कहानी इस मरहले पर प्रेमचंद की ‘सद्गति’ कहानी का अगला चरण नज़र आती है।
अमृतलाल नागर की कहानी जय – पराजय (1946) दर्शाती है कि स्वाधीनता हेतु संघर्ष करने वाले नेता जेलों में बंद रहे तथा उनका परिवार ग़रीबी में गुज़र-बसर करता रहा जबकि तथाकथित नेताओं ने बिना कुछ किये ही सत्ता पा ली। कहानी में अगस्त क्रांति में शहर भर में चर्चित और मोर्चा संभालने वाले शिवनाथ की 4 साल बाद जेल से रिहाई हुई है। कांग्रेस का शासन आ चुका है। शिवनाथ की जेल से रिहाई के अवसर पर शहर भर में कांग्रेस के नेताओं ने जुलूस निकाला। शिवनाथ को याद आया कि जेल में जाते समय उसकी बीवी गर्भवती थी। उसके मन में बच्चे को देखने की लालसा पनपती है। आखिर जब वह जुलूस के बाद घर जाता है तो देखता है। खंडहर नुमा घर में शिवनाथ की बीवी किशोरी बच्चे की ओर मुँह किये बैठी है। वह शिवनाथ की पुकार का भी कोई जवाब नहीं देती। शिवनाथ देखता है कि किशोरी कंकाल हो कर रह गयी है। बच्चे का पीला सूखा चेहरा, कफ़ की गड़गड़ाहट, धीमी, टूटती साँसें चल रही हैं। किशोरी कहती है कि “नन्हे का मुँह देख लो, पहली बार देख रहे हो! शिवनाथ के लिए यह पहली बार अंतिम बार बन जाता है। उसके लिए आज़ादी की ख़ुशी और बच्चे की मौत एक साथ आती है। शिवनाथ जब बीवी से पूछता है कि क्या बीमारी हुई थी” तो किशोरी जवाब देती है “ग़रीबी”। अजीब विडम्बना है कि आज भी यही बीमारी हिंदुस्तान में सर्वाधिक है।
नागर जी की गोरख धंधा कहानी को पढ़कर लगता है कि आज़ादी से पूर्व 1937 में लिखी यह कहानी 78 साल बाद भी कितनी प्रासंगिक है। कहानी में एक बे-रोजगार नौजवान अर्ज़ियाँ लिख लिख थक गया है। रोज़ दिन भर में बैठ कर नई नई युक्तियाँ सोचता है अमीर बनने की, अंत में अपनी बीवी से कहता है “अब ये तकलीफ़ें सही नहीं जाती। चलो कांग्रेस में नाम लिखा लें। मिनिस्ट्री अब ख़त्म हो ही गई है आंदोलन छिड़ेगा ही। अरे, कम से कम जेल में रोटियाँ तो मिल ही जाएँगी”।
नागर की यह कहानियाँ तत्कालीन लखनऊ के सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन के चित्र हमारे सामने खींचती हैं।
अमृतलाल नागर की भाषा का भी अपना एक अलग जादू है। उनकी भाषा ठेठ लखनवी ज़बान है। न पूरी तरह हिन्दी और न पूरी तरह उर्दू, यानी हिन्दुस्तानी। लखनऊ की दास्तानगोई शैली की झलक भी उनकी लेखन शैली में दिखाई देती है और गप्प मारने की प्रवृत्ति भी। वैसे भी नागर जी ग़ज़ब के क़िस्सा-गो थे। लेकिन नागर जी के लिए भाषा केवल क़िस्सा बयान करने का ज़रिया नहीं है, वह उनके लिए प्रयोगशाला भी है जिसमें वह तरह-तरह के एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं। इन्हीं एक्सपेरीमेंट्स का कमाल है कि नागर जी की भाषा में वह चुटीलापन आ गया है कि गंभीर से गंभीर विषय पर भी वह अपनी बात बड़े हल्के-फुल्के अंदाज़ में कह जाते हैं।
नागर जी की कहानी जुलाब की गोली में उनके भाषा के प्रयोग दृष्टव्य हैं। कैसे वह एक शब्द से नए-नए शब्द गढ़ते हैं और उनको नए-नए मानी देते हैं। कहानी में छुन्नन नामक तवायफ़ पात्र है। जिसकी आत्महत्या पर यह कहानी लिखी गई है। अब उदाहरण देखिए।
– एक बार सुना कि संविलया नवाब की बारहदरी में छुन्नन छूम-छनन करेगी
– मौत तो किसी न किसी दिन आ ही मिलेगी मगर रात की नींद तो हमारे लिए छुन्नन हो गई!
– हमारा दिल तो छुन्नन के छपके में बिंधा है भाई जान!
अब इसमें छूम-छनन, नींद का छुन्नन होना और छुनन का छपका, नागर जी की ईजाद है।
लखनऊ, उसमें भी ख़ास तौर पर चौक क्षेत्र के रहवासी नागर जी के यहाँ एक संसार का निर्माण करते हैं। उन्हों ने “बूँद और समुद्र” में लखनऊ के इसी मोहल्ला जीवन के चित्र बनाए हैं। चौक की भीड़-भरी गलियाँ, उनमें घूमते कुत्ते, गायें, साइकिल सवारी के करतब दिखलाते हुए लोग, कहीं पनचक्की में आटे की गर्द से सफ़ेद बुर्राक हुए मजदूर, कहीं दर्जी की दुकान पर सड़-सड़ करती गूँज, सुईं चलाते मेहंदी रंगी दाड़ी वाले मुल्लाजी जैसे दृश्य उनकी कहानियों में अक्सर देखने को मिलते हैं।
मुझे एक क़िस्सा याद आता है। जिसका जिक्र रामविलास शर्मा जी ने अपनी पुस्तक ‘पंचरत्न’ में किया है। रामविलास शर्मा ने नागर जी से कहा: “अब तुम पीएच.डी. कर डालो।”
इस पर नागर जी बोले : “पहले इंटर करना पड़ेगा, फिर बी.ए, फिर एम.ए.। बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी । और पढ़कर करूँगा भला क्या ?”
शर्मा जी उन्हें एकटक निहारते रहे।
नागर जी ने हौले से मुस्कराते हुए कहा : “आपको तो पता ही है, चौक हमारी युनिवर्सिटी है और हम उसके वाईस चांसलर।”
प्रेमचंद ने गोदान में अवध के ग्रामीण जीवन का महाकाव्य रचा, लेकिन कहते हैं वह शहरी जीवन को उतने अच्छे से नहीं उकेर पाए। आगे चलकर अमृतलाल नागर ने लखनऊ के शहरी जीवन, उसमें भी मुहल्ला जीवन का महाकाव्य ‘बूँद और समुद्र’ नाम से रच कर इस कमी को पूरा किया।
रामविलास शर्मा को अपने पत्र में नागर जी ने लिखा है, “मेरा उपन्यास Origin of the family के आधार पर है। उसके सोचने की पद्धति और ऐतिहासिक श्रृंखला को मोहल्ले के इतिहास में समेटना चाहता हूँ।”
आमतौर पर यह माना जाता है कि मोहल्लों में कम पढ़े-लिखे,अनपढ़ और जाहिल लोग बस्ते हैं। ज़माने भर की गंदगी और कुरीतियाँ यहाँ होती है। लेकिन नागर जी ‘बूँद और समुद्र’ उपन्यास के माध्यम से समाज में प्रचलित इस धारणा को बदलते हैं वह दिखाते हैं कि अब मोहल्ले भी धीरे-धीरे जहालत और धर्मांधता जैसी बुराइयों से बाहर निकल रहे हैं। वहाँ भी नई सोच रखने वाले लोगों की तादाद बढ़ने लगी है।
पुराने और नई सोच रखने वालों का विरोधाभास भी देखने को मिलता है। एक तरफ़ ताई एवं नंदो जैसी रूढ़िवादी स्त्रियाँ हैं तो दूसरी तरफ़ वनकन्या और तारा जैसी आधुनिक सोच वाली स्त्रियाँ। एक तरफ़ प्रगतिशील विचारों वाले शंकरलाल और ‘छोटी’ हैं तो दूसरी तरफ़ पुरातन सोच वाला मनिया और उसकी बीवी ‘बड़ी’। एक परिवार में ही विविधताओं का अनोखा संगम। उपन्यास का नायक सज्जन, नए चित्र बनाने के लिए विषय नहीं मिलने पर अपनी और समाज की अगति का कारण जानने के लिए मोहल्ले में बसता है और कहता है।
“एक तरह से मुझे अफ़सोस है कि जीवन के इतने बरस एक ग़लत किस्म की दुनिया में बिता दिए। दरअस्ल कैरेक्टर्स तो यहाँ गली-मुहल्लों में हैं। जीवन की विभिन्नता तो यहाँ देखने को मिलती।’
रईसज़ादे सज्जन का चौक के मोहल्ले में बसना ‘बूँद’ का ‘समुद्र’ में विलय होना है।
“बूँद और समुद्र” उपन्यास का रचना काल 1952 से 1955, भारतीय राजनीति के हिसाब से भी बहुत महत्वपूर्ण था। देश ने नई-नई स्वतंत्रता प्राप्त की और प्रथम आम चुनाव हुआ, कांग्रेस सत्ता में आई। नागर जी ने चौक के माध्यम से दिखाया है कि कैसे स्वाधीनता के बाद का ‘स्वराज’ आम आदमी के लिए केवल ‘मोहभंग’ लेकर आया।
उपन्यास में मोहल्ला जीवन के ज़रिए देश और लखनऊ की राजनीति की सरगोशियाँ सुनाई देती हैं। नागर जी उपन्यास के माध्यम से संदेश देना चाहते हैं कि लोग अपने भारतीय होने को प्राथमिकता दें, न कि पार्टियों के हित में पड़ कर देश हित के ख़िलाफ़ चले जाएँ। लेकिन दुख होता है कि शायद हम आज तक उनकी बात पर ठीक से अमल नहीं कर पाए। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूँ शायद आप इस उदहारण से समझ जाएँ।
“इस बात का खयाल आप लोगों को ज़रूर रखना चाहिए, चाहे अच्छी हो या बुरी, देश को संभालनेवाली एकमात्र राष्ट्रीय संस्था यही है। इस समय कांग्रेस को नुकसान पहुंचाना देश के साथ गद्दारी करना है।” हैरत होती है कि कमोबेश आज भी स्थितियाँ वैसी ही हैं।
“बूँद और समुद्र” में स्त्रियों की स्थिति विशेष रूप से दृष्टव्य है। वनकन्या, पढ़ी लिखी लड़की है अपने हक़ की बात करती है इसलिए शहर में उसे कम्युनिस्ट माना जाता है। कम्युनिस्ट यानी देश और समाज के दुश्मन। परित्यक्त और निःसंतान ताई, एक मनहूस और टोने-टोकने करने वाली औरत।
हम देखते हैं कि उपन्यास के कई पात्रों के पर-स्त्रियों से संबंध है। जैसे लेखक महिपाल दुनिया के सामने बड़ी आदर्शवादी बातें करता है किंतु स्वयं डॉक्टर शीला स्विंग से विवाहेतर संबंध रखता है। सज्जन कलाकार है प्रगतिशील सोच का पुरुष है। किन्तु मन में नारी को वह अक्सर इस्तेमाल में आने वाली चीज़, मनोरंजन और दैहिक-स्फूर्ति देने का साधन मानता है। वह अपने जीवन में आई स्त्रियों को तीन वर्गों में बाँटकर देखता है पहला, जिनसे वह पैसे देकर आनन्द खरीदता है। दूसरा,जिनसे वह प्रेमोपहार में रस पाता है। तीसरा जिनसे केवल शिष्टाचार का ऊपरी नाता रखता है। यह दर्शाता है कि स्त्रियों की स्थिति तत्कालीन समाज में क्या थी। विडम्बना है कि आज भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है।
एक प्रसंग जिसका मैं ज़िक्र करना चाहूँगा। जिसमें
विवाहेतर संबंध की परिणति स्त्री और पुरुष के लिए कैसे अलग-अलग होती है यह नागर जी ने कवि विरहेश के प्रेम-प्रसंग के ज़रिए दर्शाया है। विरहेश, सज्जन के मोहल्ले में ‘बड़ी’ से प्रेम-प्रसंग चलाता है। एक दिन दोनों पकड़े जाते हैं तो मनिया अपनी बीवी ‘बड़ी’ को मार-मार कर घर के बाहर चौराहे पर अधमरा कर देता है। दिन भर सारा मोहल्ला यह तमाशा देखता है। मनिया के शब्दों में “बड़ी अब उसके लायक नहीं रही, वह अब उसके घर में नहीं रह सकती,” जबकि मनिया के स्वयं विवाहेतर संबंध रह चुके हैं। इस प्रसंग में कवि विरहेश को बस इतनी सज़ा मिलती है कि बड़ी को उसके हवाले कर दिया जाता है। यहाँ नागर जी समाज का दोहरा मापदंड दिखाते हैं कैसे हमारे पितृसत्तात्मक समाज में एक ही जुर्म की स्त्री और पुरुष को अलग-अलग सज़ा मिलती है।
“बूँद और समुद्र” के ज़रिए नागर जी संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक है जब वह समाज के साथ क़दम से क़दम मिला कर चले। इसका आशय यह नहीं है व्यक्ति, व्यक्ति न रहे। बल्कि व्यक्तिवादी चिंतन के साथ साथ सामाजिक चिंतन भी रहे, बहुजन के सुख-दुख में साथ रहे। यानी व्यक्ति से व्यक्ति का अटूट संबंध ऐसे रहे जैसे बूँद से बूँद का। जैसे बूँद से बूँद मिलकर समुद्र का निर्माण करती हैं उसी प्रकार व्यक्ति से व्यक्ति मिलकर एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकेंगे।
नागर जी ने लखनऊ के चौक मोहल्ले को केंद्र में रखकर जो ‘समुद्र’ मंथन किया, उससे जो ‘विष’ निकला वह समाज की बुराइयों का प्रतीक था और जो ‘अमृत’ निकला वह मानवीय प्रेम और भाईचारे का । ‘बूँद और समुद्र’ यह सिद्ध करता है कि कोई भी व्यक्ति समाज से कटकर पूर्ण नहीं हो सकता; उसे समाज की विसंगतियों और संघर्षों के बीच रहकर ही अपनी सार्थकता ढूँढनी होगी ।
आज हम भले साहित्यकारों के बहाने उनके शहरों को याद कर रहे हैं लेकिन अब शहर अपने साहित्यकारों को याद नहीं करते। वह कृतघ्न हो चुके हैं। वह अपने साहित्यकारों को तब ही याद करते हैं जब साहित्यकार का परिवार या मित्र उन पर कोई आयोजन करता है। शहर के चौराहों पर भले हम उनकी मूर्तियाँ खड़ी कर दें। पर उन्हें अपनी जयंती या पुण्यतिथि पर एक फूल माला भी नसीब होगी यह कहना मुश्किल है। अंत में यही कहूँगा कि अमृतलाल नागर ने लखनऊ के समाज का ऐसा विहंगम ख़ाका खींचा है कि जब तक लखनऊ शहर रहेगा तब तक नागर जी को लखनऊ से और लखनऊ को नागर से से जोड़ कर देखा जाता रहेगा। लखनऊ चाहे उन्हें आवाज़ दे या न दे। नागर जी लखनऊ की आवाज़ बने रहेंगे।
नगर जी की एक पुस्तक है ‘हम फिदा ए लखनऊ’ जब इस किताब का उनवान पढ़ा, तो ज़हन में कुछ मिसरे अनायास ही आए। उन्हीं से अपनी बात ख़त्म करता हूँ।
लखनऊ उन पर फिदा था वो फिदा ए लखनऊ
गो कि अमृतलाल नागर थे सदा-ए-लखनऊ
नित नए क़िस्से सुनाता चौक की हर शाख़ पर
था कभी बुलबुल कभी वो था हुमा -ए-लखनऊ
ज़िन्दगी भर लखनऊ की ख़ाक को रौंदा किये
मर गए तो ओढ़ ली तन पर रिदा-ए-लखनऊ
– अभिषेक कुमार अम्बर

