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  • बोरसी भर आँच: एक महसूस करने वाली अनुभूति

    यतीश कुमार की किताब ‘बोरसी भर आँच’ को आये दो साल हो गये लेकिन आज भी लोग उसको पढ़ रहे, उसके ऊपर लिख रहे। यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक अविनाश कुमार ने। अविनाश कुमार का पहला उपन्यास ‘ग्रामकहानी’ हाल में ही प्रकाशित हुआ है। आप उनकी लिखी यह टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर 

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    बचपन में गाँव की सर्दियों की अपनी एक अलग ही दुनिया हुआ करती थी—कच्चे घरों की दीवारों से टकराती ठंडी हवा, साँझ होते ही चहुँओर पसरी चुप्पी, और उस चुप्पी के बीच अँगीठी में सुलगती आग। उस आग को देर तक जीवित रखने के लिए बोरसी का सहारा लिया जाता था—मिट्टी का एक छोटा-सा पात्र, जिसमें लकड़ी के टुकड़े या गोइठे धीरे-धीरे सुलगते रहते। वह केवल गर्माहट का साधन नहीं था, बल्कि आग को सुरक्षित ढंग से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का माध्यम भी था—हथेली भी जलने से बच जाती और आँच भी सुरक्षित रहती।

    यतीश कुमार की किताब “बोरसी भर आँच” को पढ़ते हुए बार-बार यही बिंब मन में उभरता है। ऐसा लगता है जैसे लेखक अपने भीतर वर्षों से एक ऐसी ही आँच लिए घूम रहा है—धीमी, मगर अडिग; शांत, लेकिन जीवनदायी। यह आँच केवल स्मृतियों की नहीं, बल्कि उन अनुभवों की है जो भीतर कहीं गहरे धँसकर व्यक्ति को गढ़ते हैं—संघर्ष, अभाव, अपमान, और उन सबके बीच टिके रहने की जिद।

    यह आत्मकथा अपने स्वरूप में केवल ‘मैं’ की कथा नहीं है; यह उस समय, उस समाज और उस मनःस्थिति की सामूहिक कथा है जिसमें एक बच्चा अस्सी के दशक में बड़ा हो रहा है। बिहार की किउल नदी के किनारे बीता वह बचपन जहाँ साधन भी सीमित हैं और संभावनाएँ भी संकुचित दिखाई पड़ती है। ऐसे में लेखक की जीवनयात्रा में आगे बढ़ते चले जाना पाठक का परिचय एक मार्मिक और जीवंत दस्तावेज़ से करवाता है।

    भौतिक संपन्नता से रहित, लेकिन अनुभवों और संवेदनाओं से परिपूर्ण वह बचपन; भावनात्मक असुरक्षाओं के बीच सुरक्षा को खोजता हुआ एक मन; और एक ऐसा सामाजिक परिवेश जहाँ विद्रूपताएँ केवल दिखाई नहीं देतीं, बल्कि अपने चारों ओर के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी होती हैं—इन सबके बीच यह किताब एक गहरी मानवीय कहानी कहती है।

    इस किताब में जो बात बार-बार उभरकर सामने आती है, वह है लेखक के जीवन में स्त्री चरित्रों का गहरा और निर्णायक महत्व। ये स्त्रियाँ केवल पृष्ठभूमि में उपस्थित नहीं हैं, बल्कि वे वह अदृश्य छाया हैं, जिनकी शीतलता और संरक्षण ने लेखक के व्यक्तित्व को आकार दिया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो जीवन के हर कठिन मोड़ पर कोई न कोई स्त्री-आकृति उनके लिए ढाल बनकर खड़ी रही हो।

    स्त्री का स्वभाव ही पालन और पोषण से जुड़ा माना जाता है, पर इस पुस्तक में यह एक सामान्य कथन भर नहीं रह जाता, बल्कि जीवंत अनुभव के रूप में सामने आता है। विशेष रूप से एक स्त्री का चरित्र यहाँ अत्यंत सशक्त और दीर्घजीवी प्रभाव के साथ उभरता है। वह केवल परिवार का भरण-पोषण करने वाली नहीं है, बल्कि एक नैतिक आधार-स्तंभ की तरह पूरे घर को थामे रहती है। सामाजिक कुरूपताओं, आर्थिक अभावों और निजी संघर्षों के बीच वह टूटती नहीं, बल्कि अपने भीतर एक अलग ही दृढ़ता विकसित करती है। वही दृढ़ता आगे चलकर उसके बच्चों के लिए आश्रय बनती है। वह उनके भीतर केवल सपने नहीं बोती, बल्कि उन सपनों में विश्वास करना भी सिखाती है। वह यह भरोसा जगाती है कि जीवन केवल परिस्थितियों को सहने का नाम नहीं, बल्कि उन्हें बदलने की संभावना भी अपने भीतर रखता है। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह उन सपनों को केवल कल्पना में नहीं छोड़ती—वह उन्हें दिशा देती है, उन्हें जीने का साहस देती है, और जहाँ तक संभव हो, उनके पूरे होने की राह भी प्रशस्त करती है। इस अर्थ में वह केवल माँ या अभिभावक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, एक मौन शिल्पी बन जाती है।

    ठीक इसी भावभूमि पर “दिदिया” का चरित्र भी उभरता है—कम शब्दों में, लेकिन गहरे प्रभाव के साथ। दिदिया केवल एक संबंध नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक उपस्थिति है, जो कठिन समय में सहारा देती है, बिना किसी अपेक्षा के। उनका स्नेह किसी उद्घोष की तरह नहीं, बल्कि बोरसी की उसी आँच की तरह है—धीमा, स्थिर, और लंबे समय तक भीतर गर्माहट देता हुआ।

    इन स्त्री चरित्रों के माध्यम से यह पुस्तक कहीं न कहीं यह स्थापित करती है कि जीवन की सबसे बड़ी संरचनाएँ अक्सर अदृश्य हाथों से निर्मित होती हैं—वे हाथ, जो दिखते कम हैं, लेकिन थामे सबसे अधिक रहते हैं।

    किताब पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभूति होती है कि परिवार एक स्थिर संरचना नहीं है। यह एक जीवंत, लचीली इकाई है, जहाँ परिस्थितियाँ भूमिकाओं को निर्धारित करती हैं। जब एक व्यक्ति अनुपस्थित होता है, तो दूसरा अनायास ही उसकी जगह ले लेता है। यह स्थानापन्न होना किसी औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्यता से जन्म लेता है। यही इस पुस्तक की एक बड़ी सच्चाई है—कि जीवन खाली जगहों को अपने ढंग से भर लेता है।

    लेखक की भाषा इस पुस्तक की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है। इसमें किसी प्रकार का अलंकारिक आग्रह नहीं है, फिर भी यह भीतर तक उतर जाती है। वे अपनी पीड़ा को सजाते नहीं, उसे जस का तस रखते हैं—कभी-कभी कच्ची, कभी असहज, लेकिन हमेशा सच्ची। यही सच्चाई पाठक के भीतर एक भरोसा जगाती है कि यह कथा गढ़ी नहीं गई, जी गई है।

    “बोरसी भर आँच” दरअसल उन सूक्ष्म उष्माओं की कहानी है, जिनके सहारे मनुष्य जीवन के सबसे कठिन और ठंडे दौर से गुजरता है। यह हमें उन छोटे-छोटे सहारों की याद दिलाती है—किसी का स्पर्श, किसी का विश्वास, या भीतर की कोई अनाम जिद—जो हमें टूटने नहीं देते।

    यह पुस्तक कहीं न कहीं यह भी सिखाती है कि अभाव केवल कमी नहीं होते; वे व्यक्ति को एक विशेष प्रकार की दृष्टि भी देते हैं। वही दृष्टि आगे चलकर संवेदना में बदलती है, और संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती है।

    अंततः, यह किताब एक गहरे विश्वास के साथ समाप्त होती प्रतीत होती है—कि जिस पौधे को सचमुच आसमान छूना होता है, उसे प्रकृति अपने ढंग से सींच ही देती है। परिस्थितियाँ चाहे जितनी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि भीतर वह ‘आँच’ बची रहे, तो रास्ते बनते जाते हैं।

    “बोरसी भर आँच” केवल पढ़ी जाने वाली किताब नहीं है, यह महसूस की जाने वाली अनुभूति है—धीरे-धीरे सुलगती हुई, भीतर तक गर्माहट देती हुई, और लंबे समय तक हमारे साथ बनी रहने वाली। शायद इसी में इस पुस्तक का सौंदर्य भी है और उसकी सार्थकता भी—कि यह किसी तेज़ आग की तरह नहीं, बल्कि बोरसी की आँच की तरह हमें छूती है… धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से।

    —अविनाश कुमार, लेखक (ग्रामकहानी)

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