मोहित नेगी ‘मुंतज़िर’ की कविताएँ

आज पढ़िए मोहित नेगी ‘मुंतज़िर’ की कविताएँ। उत्तराखण्ड के रहने वाले मोहित पेशे से इंजीनियर हैं। लेकिन अपने साहित्य प्रेम के कारण नौकरी से छुट्टी लेकर कुमाऊँ विश्वविद्यालय से हिन्दी में पीएचडी कर रहे हैं। शेर भी कहते हैं। फ़िलहाल उनकी कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर
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1
संस्कृति की क़ब्रगाह

मैंने टिहरी नहीं देखा
मगर मैंने देखे
बाँध का पानी कम होने के बाद
उभर आये खेत
मोहल्ले और तिबारें*
टूटी हुई
पगडंडियों के अवशेष

जो शायद
उभर आई हों
कहने को
अपनी व्यथा
अपना दुःख
जताना चाहती हो
अपना प्रतिरोध
जो नहीं जता पाए
वहाँ रहते लोग
या जताने पर बन्द कर दी गई
उनकी आवाज़ें

वो आज हो गई हैं मुखर
मुझ पर चिल्लाते खेत
कह रहे हैं कुछ
मगर मैं न समझ सका

सुनाई पड़ रहा है पगडंडियों का रुदन
वे मना रही हैं मातम
जैसे किसी जवान के मरने पर मनाती हैं
घर की औरतें
टूटी हुई तिबारों के खम्भे
दरक रहे हैं
ऐसी आवाज़ कि जैसे
कहीं हुआ हो बज्रपात
उभर आए हिस्से में भरी है गाद

धीरे-धीरे पानी से उभर रहा है
पूरा क्षेत्र
उभर रही है
एक संस्कृति की क़ब्रगाह!

*तिबार= पहाड़ी स्थापत्य वाले घरों का लकड़ी की नक़्क़ाशीदार बालकनी

2
बाँध

जब मैं पढ़ रहा था
फ्लुइड मैकेनिक्स के जटिल सूत्र
और बांधों के बनाने के सिद्धांत
तो तभी मेरी कल्पना में आया
बाँध बनने के बाद का
विशाल जलाशय
जलाशय में डूबी भूमि
और भूमि के विस्थापित बाशिंदे!

मैं पढ़ रहा था
अर्थन फिल डैम
बनाने के सिद्धांत
और मुझे ध्यान आया टिहरी
और उसका वो अंतिम दिन
जब उसके लोग
ढो रहे थे अपना सामान
और देख रहे थे
आखिरी बार अपने घरों को
जो थीं उनके पिताओं की
उनको सौंपी गई
आखिरी ज़ागीरें

जिस दिन मैंने
सीखी निकालनी
बाँध की सेंटर ऑफ ग्रेविटी
उस रात मेरे सपने में आये
टिहरी के
वो डूबे हुए गाँव
जो थे बाँध की
सेंटर ऑफ ग्रेविटी पर,

अगले दिन
मैंने अध्यापक से पूछा
जिन्होंने गढ़े बाँध बनाने के सिद्धांत
क्या उन्होंने गढ़े हैं
विस्थापितों के,
दुख कम करने के सिद्धांत
उन्होंने यह कह कर
कि विस्थापित नहीं हैं
हमारे सिलेबस का हिस्सा
चुप करा दिया मुझे
वैसे ही
जैसे इतिहास में बने
तमाम बाँधों के विस्थापितों
को कर दिया गया था चुप।

3
अस्थिपंजर

जब मैंने देखे
संग्रहालय में तुम्हारे अवशेष …
तो लगा
देख रहा हूँ
सारनाथ में बुद्ध के अवशेष..
फिर एक पल लगा
जैसे आया हूँ
समाधि पर
अपने पूर्वजों की

तुम्हारे तिबार के खम्बों से
सुनाई दे रही थीं
रियासत की राजाज्ञाएँ
दरबार की मन्त्रणाएँ

पीतल के गेडुओं* से
पहाड़ी दालों की
अद्भुत सुगन्ध!

तुम्हारी गाथा का
सस्वर वाचन करते
अनेकानेक धूल-धूसरित ग्रन्थ

दिखाई दे रही थी
राजमहलों के किवाड़ों से
बाहर झाँकती राजकन्याएँ

टिहरिया नथ बनाते
तुम्हारे सिद्धहस्त सुनार
भोजों में भात बनाते
तुम्हारे सरोला ब्राह्मण

सुनो टिहरी!
तुम्हारे अवशेष
मर चुकी मानवता के
अस्थिपंजर हैं।

*गेडु-= पीतल की बड़ी देगची

4
टिहरी

तुम्हारा होना भी अकस्मात् था
और तुम्हारा जाना भी,
जब अंग्रेजों ने छीना श्रीनगर
तो आना पड़ा नरेश को
तुम्हारे पास!
और तुम फलते-फूलते बनी
सिंगोड़ी* वाली टिहरी
टिहरिया नथ वाली टिहरी

और जब तुम गई
तो नहीं आई थी कोई आपदा
नहीं आया था कोई प्रलय
राजतंत्रों ने तय किया
तुम्हारा आना भी
और जाना भी
टिहरी
तुम जैसे आई थी वैसे ही गई!

*सिंगोड़ी= टिहरी गढ़वाल की प्रसिद्ध मिठाई

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