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  • ओमा शर्मा: मैं और मेरा समय

    वरिष्ठ लेखक ओमा शर्मा ने ‘मैं और मेरा समय’ लिखा है जिसमें उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई के दिनों पर, और उनके प्रभावों पर विस्तार से लिखा है। ‘कथादेश’ में पूर्व प्रकाशित इस आत्मपरक टिप्पणी को आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    डी-स्कूल और परिणितियाँ

    • ओमा शर्मा

    (Remembrance of things past is not necessarily remembrance of things as they were— Marcel Proust)

    अरसा पहले दूरदर्शन पर ‘महाभारत’ की शुरुआत में ‘समय’ को इंगित करता घूमता पहिया उद्घोषक की ठहरी हुई आवाज़ के साथ किंचित रहस्यमय, डरावने अंदाज में इसकी अजर-अमर प्रकृति के बारे में कुछ सख्त से फलसफे बयान करता जो ‘समय’ के संदर्भ और मायनों को अपनी तरह से विकराल बनाता जाता। शुक्र था कि कथा शुरू होते ही हम मानवीय सरोकारों और भावनाओं में यूं डूब जाते कि पहिया और वह आवाज़ अपने तमाम रहस्यों के साथ ओझल हो जाते। आधी सदी के पार जा लगा जीवन इतने मोड़ों, पड़ावों और अंतरालों से गुजरा होता है कि उसमें कोई एक धागा, ढब या कोई साफ तरतीब ढूँढना मशक्कत सा लगता है। क्या सचमुच जीवन में कोई एकसूत्रता होती है? और अगर होती है, तो क्या वह हर किसी की ज़िंदगी में कमोबेश मौजूद नहीं रहती?

    पीछे मुड़कर देखना एक किस्म की बौद्धिक विलासिता है या अपने समय के प्रति एक जवाबदेही? या फिर महज नोस्टेलजिया!

    देखने लगो तो भ्रम होता है: मैं कितनी तरह के अलग-अलग समयों से निकलकर आया हूँ… बचपन में गुजरा गांव का समय, दिल्ली और उसके दो शानदार विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने का दौर, केन्द्रीय सिविल सेवा के सिलसिले में देश के विभिन्न राज्यों-लोगों-कारोबारों की अंदरूनी वाकफियत, घर-परिवार के बदलते हालात के बीच बहता हुआ वक़्त… और एक दूसरे स्तर पर – गुजरा हुआ पूरा अतीत और आज का समय, जिसमें छल-फरेब और दगाबाजियों घुली हुई हैं – और उसके बर-अक्स मेरे भीतर अब भी ज़िंदा वह उजला, जद्दोजहद करता ‘आगे’ का वक़्त…

    मैं इन्हें एक-दूसरे से लगातार टकराते हुए महसूस करता हूँ।

    क्या ऐसा फरेबी, झूठा, झगड़ालू ना-उम्मीद करता समय पहले कभी रहा था? या मैं ही उसे नहीं देख पा रहा था?

    और इसी के समानांतर साहित्य की दुनिया का बदलता समय जिसने इस समय के वातावरण से कदम-ताल सी करते हुए अपना रूप बदला है…या फिर आपसी संबंधों के बदलाव और बिखराव का सामाजिक समय जिसका मैं उसी तरह साक्षी और भुक्तभोगी रहा होऊंगा जितना दूसरे… टूटते परिवार, बिखरते आदर्श, अवसाद और अकेलापन, शहरीकरण-प्रदूषण, आर्थिक संघर्ष, हवस और अंधी सी दौड़ और विकलताओं में लिथड़े समय को क्या सिर्फ इसलिए ‘मेरा’ कह दूँ क्योंकि मैं इसका,  भले दूरस्थ, मूक सा गवाह हूँ?

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    मैं सोचता हूं कि एक लेखक के पास ले-देकर प्रथमतः या अंततः उसका लिखा ही बचता है जिसके जरिए वह जाने-अनजाने अपने समय को दर्ज करता है। लेकिन यह भी हकीकत है कि जीवन और लेखन की एक जटिल गुत्थम-गुत्था बराबर जारी रहती है जिसमें हार-जीत अनिर्णीत बनी रहती होगी। लेखक उसके खास टुकड़ों को अपनी तरह रेखांकित या दर्ज कर पाता है। कभी आत्मसात करते हुए, कभी उसके बरक्स उड़ान भरते हुए। लेखन की एक खूबी यह भी है कि अपने कलागत रचाव से वह समय के टुकड़ों में ऐसा कुछ सत्य या सत्व आविष्कृत कर सकता है जो एक तरफ अपने समय का कमोबेश प्रामाणिक रंग लिए रहता है तो दूसरी तरफ आगत की आहटों का भी अंदाजा देता जाता है।

    इन दिनों का राजनीतिक वातावरण- जिसकी शुरुआत और संदर्भ यूरोप और दूसरे विश्वयुद्ध से थोड़े समय पहले की स्थितियों की याद की मार्फत आता है- यानी सत्ता का फरेबी, अमानवीय और हिंसक रूप- दैनंदिन और मानसिकता पर इतना हावी हो गया है कि उससे बचना मुश्किल है। उसकी कितनी भी बात की जाए- जो पत्रकारिता बतौर पेशा करती है- हमेशा अधूरी और अपर्याप्त रहती है। मैं सोचता हूं कि सत्ता के बारे में लेखक यदि चुटकी भर और इशारे से भी बात कर ले तो उसका काम चल जाएगा। लेकिन सिर्फ इतना ही। जैसे आटे में नमक। अन्यथा वह शीघ्र ही वह उन तमाम अंतर्विरोधों और रतौंध का शिकार होने लगेगा जिसे राजनीति ओढ़े रहती है और जो वस्तुतः उसकी प्रकृति और अस्तित्व से जुड़े हैं। एक लेखक के लिए राजनीति किसी दूसरे तत्व या विषय के अध्ययन जितनी ही महत्वपूर्ण है हालांकि राजनीति एक राजकीय-सामाजिक व्यवस्था को चलाने की पद्धति होने के साथ एक खास वैचारिकी को भी समेटे रहती है जिसके अपने खतरे और सीमाएं हैं। उसका महत्व मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार पर पड़ते उसके प्रभावों के कारण है जिनसे लेखक का वास्ता होता है। उस लेखक के लिए जो ‘प्रतिबद्धता’ की बजाय ‘स्वतंत्रता’ को चुनता है – राजनैतिक इलाकों की तरफ न्यूनतम और जरूरत भर ही जाना मुनासिब होता है। राजनैतिक-चेतना संपन्न होना अलग बात है।

    अलबत्ता, यहां बात करते हुए लगता है कि अपने समय के बारे में बात करते हुए हमें सिर्फ अपनी सोच और स्मृति को खुला रखना होगा: वे सारे नोट्स, अध्ययन या स्मृति को सहारा देने वाली दूसरी चीजें यथा-संभव परे ही रहें तो बेहतर, क्योंकि वे बात को अधिक तार्किक या सुदृढ़ तरीके से प्रस्तुत करने में तो मदद कर सकती हैं मगर उस सादा और निश्छल निरपेक्षता का बदल शायद नहीं हो सकतीं जो अपने दौर को दर्ज करने के लिए दरकार होती है। कहा भी गया है कि हमारे अवचेतन और स्मृति अपनी तरह से तरतीब लिए होते हैं।

    इस शीर्षक के मिजाज में कुछ अटपटापन है। वह इस तरह कि ‘मैं’ जिस समय में हूं- या जिस समय का हिस्सा हूं- उसमें ‘मेरा’ कुछ नहीं है; और न वह ‘केवल मेरा’ है। समय की अवधारणा में (अनंतता और नैरंतर्य के अलावा) एक सामूहिकता या बहुलता समाहित रहती है। वह मेरा उतना ही है जितना तमाम दूसरों का। मगर उसमें हर किसी का अपने खाते का वैयक्तिक भी मौजूद रहता है। इस समय के दरम्यान चलते, कभी-कभार उसे चीरते हुए, मैं अपना रास्ता तय करता हूं जिससे शायद औरों को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह वस्तुतः एक जनसमूह के ऊपर छाया ऐसा गर्द-गुबार है जो उसे चौतरफा घेरे-जकड़े हुए है, उसे निर्धारित-अनुशासित करता है मगर स्वयं उससे शायद ही प्रभावित होता है। इसके आच्छादित होने के तत्वों में एक रहस्यमय साजिश घुली हुई है। कभी कोई धमाका-सा होता है जो इस कोहरे को कुछ देर के लिए चीर देता है, लेकिन वही कोहरा उसी पहले जैसी अयाचित सूरत में फिर फैल जाता है। शायद यह कहना अधिक मुनासिब हो कि यह वह समय है जिसके भीतर मैं अपने इंसानी क्रिया-कलाप करता हूं और यह इस अर्थ में मेरा समय है कि मेरे तमाम क्रिया-कलाप इसी के तहत होते हैं। यह मेरा खामोश गवाह है जो इन दिनों मुझ पर नजर भी गड़ाए रहता है।

    लेकिन यह समय मेरा नहीं है। कम से कम मेरा चयनित तो हरगिज़ नहीं जिसके दम पर मैं इसे इत्मीनान से ‘मेरा’ कह सकूं। हाँ, इस मायने में इसे मैं ‘मेरा’ कह सकता हूं कि मैंने इसी के भीतर जीते हुए ऐसी मानवीय उपस्थितियों और पर्यावरण को देखा है जिससे मेरे भीतर मनुष्य की विराटता, मानवता और रचे जाने की संभाविता में भरोसा और अचरज बना रहा है। यहां मेरी मुराद अनेक निजी सौभाग्यों के अलावा उन उर्वर मस्तिष्कों और उदार हृदयों से है जो मेरे समय में स्थाई निवास करते रहे हैं। उनसे निर्मित स्मृति या चेतना मुझे अपने ‘आज’ की कुत्साओं और पस्ती के खिलाफ न केवल संबल देती है बल्कि समय की किसी अवधारणा में मेरे होने को ‘लोकेट’(प्रकाशित) भी करती है।

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    ‘दिल्ली स्कूल ऑफ एकोनॉमिक्स’ यानी ‘डी-स्कूल’ में अध्ययन करने के दिनों में प्रो. सुखमय चक्रवर्ती, के.एल कृष्णा, राज कृष्णा, विश्वनाथ पंडित, सुरेश तेंदुलकर, मृणाल दत्ताचौधरी, धर्मा कुमार जैसे एक से एक प्रखर और उदारवादी अध्यापकों से पढ़ने और उनकी सोहबत में रहने से जो उदात्त अनुभव और एहसास मेरे हिस्से आए, उसकी गूंज साथी-सहपाठियों की सोहबत में भी बराबर सुनाई देती रही। वे साथी जो पता नहीं किस संयोग के चलते देश भर के तमाम छोटे-बड़े इलाकों से वहाँ पढ़ने आए थे, अपनी अलग पृष्ठभूमियों के बावजूद एक साझा बौद्धिक ताप और उदारता का हिस्सा बन गए थे। उनकी संगत ने वहाँ के अनुभवों को और गहरा और अर्थपूर्ण बनाया। अमर्त्य सेन, जगदीश भगवती और प्रणव बर्धन जैसे दिग्गज कुछ अरसा डी-स्कूल में बिताने के बाद नामचीन विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाने चले गए थे जबकि के.एन राज त्रिवेंद्रम में खोले ‘सेंटर फोर डेवलपमेंट स्टडीज’ को संभालने चले गए थे। लेकिन किसी व्याख्यान आदि के बहाने सभी अपने प्रिय पूर्व-प्रांगण में आते रहते। सभी को छात्रों के संग गुफ्तगू करना अच्छा लगता। उधर वे सभी हमें खूब पसंद तो आते, जाने-माने जर्नल्स में प्रकाशित उनके शोध-लेखों को भी हम खंगाल लेते लेकिन हमें दूर-दूर तक यह गुमान नहीं था कि वे सभी अपने मौलिक शोध या नीतिगत योगदान के कारण दुनिया भर में कितने विख्यात और सम्मानित हैं। मसलन, लंदन स्कूल ऑफ एकोनॉमिक्स से दो बरस पूर्व पीएचडी करके भारत लौटे के.एन राज सत्ताईस बरस की उम्र में डी-स्कूल में प्रोफेसर बनने के साथ तभी, यानी 1951 में, योजना आयोग के सदस्य के नाते उन दिनों शुरू हुई पहली पंचवर्षीय योजना के कर्णधार रहे थे। दिल्ली के दूसरे छोर पर बसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से बेशक अलग जिसकी आबोहवा में बौद्धिकता पर वामपंथी मिजाज छाया रहता। लेकिन उस उम्र में फैशनेबल हो चुके वामपंथी रुझान से डी-स्कूल ने हमें मुक्त ही रखा। हम मार्क्स को पढ़ते थे मगर किसी अंतिम सत्य के पैगंबर या खुदा की हैसियत से नहीं बल्कि एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो, माल्थस और जॉन स्टुअर्ट मिल जैसों की उन्नत परंपरा में… पूंजी संचयन या मूल्य निर्धारण की संकल्पना या दूसरे ऐसे ही किसी मुद्दे पर उनके संभावित आपसी संकल्पनागत फ़र्क को समझने के लिए। स्वतंत्रता वहाँ तार्किकता की उड़ान भरने और वास्तविक अर्थों में बौद्धिक आजमाइश का स्पेस रचती थी हालांकि हम इस बाबत भी सचेत नहीं थे। हमारा वास्ता तो उन उच्चतर गणितीय समीकरणों (एकोनोमेट्रिक्स) को समझने-सुलझाने से था जो अपने यकीनन जटिल और ताजातरीन वैश्विक संस्करणों में हमसे मुकाबिल रहते थे। चंद व्यवस्थागत या व्यवहार की मान्यताओं के सहारे, सांख्यिकी, केलकुलस, लीनियर प्रोग्रामिंग आदि के औजारों से जहां आर्थिक लॉजिक उत्तरोत्तर ऐसे विकल्पों की तरफ रूपांतरित होता दिखता, कि भले पसीने छूट जाएँ मगर ‘यूरेका’ की अनुभूति स्पर्श करती। मसलन, क्या भूमि सुधारों का कोई आदर्श (ऑपटिमम) स्वरूप हो सकता है? इस वायवीय प्रश्न को प्रो.राज कृष्णा ने आधा दर्जन पन्नों में फैले समीकरणीय मॉडल से स्थापित कर रखा था! किसी अर्थव्यवस्था में कितनी बचत आदर्श रहेगी? इसे गणितीय तरीके से हल किया जा सकता था!

    इस संदर्भ में कुछ स्पष्टीकरण देना शायद गैर-मुनासिब न हो। कहना होगा कि यह मेरे समय की उस बुनियाद से ताल्लुक रखता है जिनकी आंशिक घेराबंदी में यह कहा जा रहा है।

    एक विषय के तौर पर कोई ढाई सौ बरस पहले जब अर्थशास्त्र ने अपने पांव पसारने शुरू किए तो चीजों को एक तार्किक गद्य-भाषा में रखा जाता था… एक हजार पृष्ठों में ‘लिखी’ एडम स्मिथ की ‘वेल्थ ऑफ नेशंस’ जो कहती है, शब्दों और भाषा में ही कहती है… समाज में सब लोग केवल अपना-अपना हित साधते हैं, एक ‘अदृश्य हाथ’ लोगों को अपने-अपने कार्य करने को प्रेरित करता है, मांग और पूर्ति से कीमत तय होगी और उसी हिसाब से संसाधनों को उपयोग में लिया जाएगा, काम-काजी दुनिया में सरकारी हस्तक्षेप शून्य (लेज़े-फेयर) रहे तो पूरी व्यवस्था आगे बढ़ती रहेगी…। बाद में जब नव-क्लासिकी दौर आया तो तर्क ने, भाषा से परे, ज्यामितीय शक्लें अख़्तियार कर लीं …मसलन एक अक्ष पर मात्रा और दूसरे पर कीमत संकल्पित करके, गिरती हुई मांग वक्र और उठती हुई आपूर्ति वक्र- और उनके प्रतिच्छेदन बिन्दु से- किसी वस्तु के कीमत निर्धारण यानी साम्यावस्था को पहले के मुकाबले बेहतर समझा जा सकता था। ह्रासमान उपयोगिता नियम, कटोरे (रोमन U) की  शक्ल के लागत-वक्र आदि इसी तरह अधिक सहज और तार्किक लगे। लेकिन बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में स्वतंत्र रूप से कई देशों में अर्थशास्त्र में गणितीय विवेक की धमाकेदार आमद हुई। विज्ञान और तकनीकी ने अर्थव्यवस्थाओं और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार– उत्पादन, वितरण, उपभोग या फिर लेन-देन– की क्रियाओं को बहुस्तरीय और बहुपरतीय बना दिया था। उन्हें तब उपलब्ध नव-क्लासिकी आर्थिक औजारों से समझने-समझाने में निश्चित कठिनाई और सीमा पेश होती दिखी जिसके चलते गणितीय विवेक से लैस आर्थिकी को समझने और व्याख्यायित किए जाने की पहल ने नई संभावनाएं पेश कीं। अब हर आर्थिक समस्या या संकल्पना समीकरणों में ढलने लगी। उन्हें सरल और हल करने के कुछ तरीके तो पहले से मौजूद थे और कुछ नई चुनौतियों के साथ-साथ ईजाद किए जाने लगे। यानी किसी आर्थिक विचार-संकल्पना-सिद्धांत को पहले के ढुलमुल निबंध-नुमा विस्तार की बनिस्बत बारीक और सटीक ढंग से, दूसरे किसी विज्ञान की मानिंद – दर्शाया, रचा और सिद्ध किया जा सकता था। इसका एक अतिरिक्त और जाहिर फायदा यह भी था कि आर्थिक भविष्यवाणी (forecasting) करना अपेक्षाकृत आसान हुआ। इस मुहिम में पॉल सेमुएलसन, रेगनार फ्रिच, यान टिम्बर्गन, वेसीली लीऑनटिफ, रॉबर्ट सोलो, केनेथ ऐरो, जॉन नुमान, जॉन मेनार्ड कीन्स… समेत और भी दर्जनों ऐसे अर्थशास्त्री अग्रणी थे जिनकी गणित और विज्ञान में गहरी सामर्थ्य और दिलचस्पी थी। यह नया उभरता अर्थशास्त्र जो विचारधारा के रंग से मुक्त, समीकरणों की जुबान में बात करता था- वाक-समझाइश के बजाय विवेक की आजमाइश का विषय हो गया। जीवन या सैद्धांतिकी से जन्मे किसी विचार को एक गणितीय धरातल पर रचना, दूसरों द्वारा इसका विस्तार या प्रतिकार रचना, अब महज बहस-मुबाहसे का मामला नहीं रह गया था; उसे सार्वभौमिक गणितीय व्याकरण- और उसके समस्त अनुशासन- का निर्वाह करना था जो अथाह संभावना लिए हुए था। नवोन्मेषी शोध को अब पोथियों की दरकार नहीं रह गई थी। सत्व है तो उसे संक्षेप से समीकरणबद्ध रचा जा सकता है। उनतीस बरस की उम्र में लिखी जिस पीएचडी थीसिस (‘इंपोसिबीलिटी थिऑरम’) पर केनेथ ऐरो को बाद में नोबेल मिला वह बमुश्किल तीस पन्नों की थी।

    अर्थशास्त्र के इस नए और घोर गणितीय संस्करण की हर नब्ज को उसी अवांगार्द शिद्दत से समझने और उसमें चमत्कारी ढंग से कोई योगदान करने वाला अगर कोई भारतीय सितारा था तो निस्संदेह वे प्रो. सुखमय चक्रवर्ती थे जो पिछले सदी के नौवे दशक में डी-स्कूल में हमें इकनॉमिक थियरी पढ़ाते थे। नहीं, माइक्रो-मेक्रो के रस्मी विभाजन में बंटी हुई थियरी नहीं (क्योंकि उसे पढ़ाने के लिए दूसरे काबिल अध्यापक थे), बल्कि हाल के वर्षों में या अभी प्रमुख आर्थिक शोध-पत्रिकाओं में महदूद— नयी उभरती सरहदों पर उसकी ऐतिहासिकता के परिप्रेक्ष्य और नए प्रश्नों के संदर्भ में उसकी भूमिका का स्वाद चखाते जो शायद कोई दूसरा न करा पाता। यह वार्षिक परीक्षा के लिए उतना नहीं जितना मौलिकता, खिलंदड़ेपन और बौद्धिक ताप के साथ डी-स्कूल की ज्ञान-शान परंपरा को विस्तार देने के लिए होता। प्रो. सुखमय चक्रवर्ती का यहाँ जिक्र किंचित विस्तार ले सकता है क्योंकि अपने समय के गठन– और उसकी स्मृति के बनने-बचे रहने– में मुझे प्रतीकात्मक रूप में एक व्यक्ति की भूमिका को चुनना हो तो वे प्रो. सुखमय चक्रवर्ती ही होंगे।

    सन 1934 में जन्मे सुखमय की गणित, भौतिकशास्त्र और दर्शन में गहन रुचि थी लेकिन सन 1951 में जब कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लेने का वक्त आया तो उन्हें भारत की पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत का पता चला और उन्होंने अपना रुख अर्थशास्त्र की तरफ कर लिया। सन 1955 में प्रेसिडेंसी से एम.ए करने के साथ ही एक मैथमेटिकल जीनियस के रूप में वे ऐसे मशहूर हुए कि कलकत्ता के भारतीय सांख्यिकी संस्थान(आई. एस. आई) के सर्वेसर्वा और योजना आयोग से जुड़े प्रशांत महलोनोबिस ने उन्हें अपने साथ उस मॉडल की अंदरूनी साम्यता सँवारने के लिए अपना सहयोगी बना लिया जिसे दूसरी पंचवर्षीय योजना की आधारभूत आवाज यानी ‘महलोनोबिस मॉडल’ के रूप में जाना जाता है और जो वस्तुतः किसी बड़े लोकतान्त्रिक मुल्क में आर्थिक विकास का परिक्रमा-पथ ऊंचा करने की पहली सुचिन्तित मनोभूमि थी। लेकिन शीघ्र ही वे यान टिम्बर्गन के निर्देशन में अपनी पीएच.डी. करने नेदरलैंड चले गए जहां उन्होंने दो बरस के भीतर योजनागत विकास की सैद्धांतिकी का मौलिक शिल्प रचा। इस अभूतपूर्व योगदान के मद्देनजर यान ने उन्हें अपने संस्थान में नियुक्ति दी और उनके शोध को अपने प्राक्कथन के साथ ‘लॉजिक ऑफ इनवेस्टमेंट प्लानिंग – शीर्षक देकर ‘कॉनट्रिब्यूशन टू इकोनॉमिक एनालसिस’ श्रंखला में नॉर्थ-हॉलैंड से प्रकाशित कराया। कोई एक दशक बाद, यान को सन 1969 में अर्थशास्त्र का पहला नोबेल पुरस्कार मिला था। जल्द ही अमेरिका के एम.आई.टी विश्वविद्यालय ने उन्हें अपने यहाँ पढ़ाने को आमंत्रित किया जहां पॉल सेमुएलसन जैसे नामी अर्थशास्त्री उनके सहयोगी अध्यापक-रिसर्चर बने। सुखमय की दूसरी महत्त्वपूर्ण किताब- कैपिटल एण्ड डेवलपमेंट प्लानिंग– सन 1969 में एम.आई.टी से ही आई जिसकी प्रस्तावना सेमुएलसन ने लिखी। उसके अगले बरस यानी सन 1970 में सेमुएलसन को अर्थशास्त्र का दूसरा नोबेल सम्मान प्राप्त हुआ। उन्नीस सौ साठ में प्रेसिडेंसी कॉलिज ने पाँच बरस पूर्व के अपने छात्र को सीधे प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति दे दी। तब सुखमय पच्चीस बरस के थे। प्लानिंग मॉडल्स पर उनके कार्य और ‘महलोनोबिस मॉडल’ पर उनकी अहम भूमिका के मद्देनजर तीसरी पंचवर्षीय योजना की बुनियाद भी उसी मॉडल पर रखी गयी जिसे सुखमय चक्रवर्ती द्वारा विकसित किया गया था। उसमें लक्ष्य विकास दर हासिल करने में अतीत की कई खामियों का निराकरण तथा अर्थव्यवस्था की वृहत्तर अंतर्भूत स्थितियों के बीच साम्य को गणितीय तरीके से सुलझाया गया था। यह काम इस तरह अंजाम दिया गया कि अर्थव्यवस्था को सिर्फ महलोनोबिसी ‘उपभोग और निवेश’ सेक्टरों में देखने के बजाय आपस में सम्बद्ध सेक्टर-बहुल अर्थव्यवस्था के रूप में समझा गया और उनकी आपसी गति-प्रगति को यथा-तथ्य आधार पर संकल्पित करते हुए संसाधनों को आवंटित किया गया। योजनाबद्ध विकास का यही मूल आधार है जिसमें अर्थव्यवस्था के विभिन्न अवयवों की आपसी क्षमता और निर्भरता के मद्देनजर उपलब्ध पूंजीगत संसाधनों को निवेशित किया जाता है। सन 1963 में सुखमय बतौर प्रोफेसर डी-स्कूल में नियुक्त हुए और आजीवन उससे जुड़े रहे। बैंकों के राष्ट्रीकरण और प्रिवीपर्स (रजवाड़ों के विशेषाधिकार) समाप्त करने के फैसले से कुछ हल्कों में पैदा हुए विरोध और गुस्से के माहौल में अपनी साख बहाल  करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रो. सुखमय चक्रवर्ती जैसे धारदार और गैर-राजनैतिक अर्थशास्त्री को ‘योजना आयोग’ का सदस्य बनाया। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई दक्षता से ‘गरीबी हटाओ’ और ‘आत्मनिर्भरता’ जैसे नारों को पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में इस तरह समाहित किया कि योजनागत विकास की संभावनाएं नए भरोसे के साथ उभर कर सामने आयीं। बाद में, इंदिरा गांधी ने आर्थिक मामलों को समझने और उनसे निपटने के लिए अलग से ‘प्रधानमंत्री की आर्थिक परामर्श परिषद’ का गठन किया जिसका उन्हें अध्यक्ष बनाया। यह सिलसिला अगले दो प्रधान-मंत्रियों के दौर में भी जारी रहा।

    डी-स्कूल में हमें पढ़ाने के दिनों में उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा नवाजा गया बुलंद रुतबा हासिल था लेकिन उसमें उनकी कोई खास दिलचस्पी न थी- सिवाय इसके कि अध्ययन, अध्यापन और शोध के साथ इससे उन्हें अपने लोकतांत्रिक देश के अहम आर्थिक मामलों में नीतिगत परामर्श का अतिरिक्त अवकाश मुहैया था।

    लेकिन डी-स्कूल में वे खालिस अकादमिक और अध्यापक ही रहते— मित्र सहकर्मियों से गुफ्तगू करते, छात्रों की खैर-खबर लेते। उनकी तबियत में, जैसा महान लोगों में होता है, दूसरों को सुनने का प्रशांत धैर्य रहता। मोटे फ्रेम का चश्मा, बुनियादी संजीदगी और उसी के साथ चेहरे पर एक उदार खिलापन। उनकी सैद्धांतिक समझ, वैश्विक पहचान और प्रधानमंत्री के परामर्शदाता होने के चर्चे कानाफूसी की तरह कॉरीडोर्स में ज़रूर घूमते रहते मगर उससे उनका कोई वास्ता मालूम न होता। उनकी भंगिमा में एक संत सरीखी मासूमियत और कशिश मुसलसल चस्पाँ रहती जो बाद में निर्मल वर्मा को देखकर मेरी स्मृति में और प्रगाढ़ हो गयी। वह मेधा और जीनियस जो उनके शोधपत्रों और व्याख्यानों से गुजरते हुए (अक्सर पूरी तरह समझे बगैर ही) सगर्व महसूस होती, आमने-सामने की मुलाकात में जैसे ओझल हो जाती क्योंकि तब वे महज ऐसे स्नेही खैर-ख़्वाह होते जिसे आपकी किसी निजी या वैचारिक उलझन को जानने-समझने मात्र की दिलचस्पी हो। वे शायद अकेले ऐसे थे जो तमाम व्यस्तताओं के बीच डी-स्कूल की रतन टाटा लायब्रेरी के तीसरे-चौथे माले पर अलमारियों के सन्नाटे में किसी होनहार जिज्ञासु की तरह अपनी मनचाही किताब या जर्नल खोजते नियमित मिल जाते। किसी संदर्भ ग्रंथ की तलाश में एक बार मैं जब उन नीम-अंधेरी रेक्स के बीच पहुंचा तो उन्हें वहाँ देखकर खुशी से चौंक पड़ा। मुझे कुछ सहमा सा देखकर उन्होंने बड़ी नर्मी से उस किताब का नाम पूछा जिसकी तलाश मुझे वहाँ लाई थी। मैंने बताया तो जरा ठहरकर मुस्कराए और बोले: वह तो शायद तुम्हें महीने भर बाद मिलेगी… उसे ‘डेमेज़्ड’ सेक्शन में शिफ्ट कर दिया गया है, नई जिल्द के लिए…।

    उस औचक एहसास को बयान करने के लिए उपलब्ध भाषा के सारे शब्द अपर्याप्त होंगे।

    ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ पता नहीं कितना करीबी-कामचलाऊ हो!

    ये जनाब जिनके रिसर्च गाइड यान टिंबर्गन यह कहते न थकते थे कि उन्होंने सुखमय से सीखा ज्यादा, सिखाया कम, जो चौबीस की उम्र में एम.आई.टी में पढ़ाने लगे थे, अट्ठाइस की वय में ‘इकोनोमेट्रिका’ और ‘इंटरनेशनल एकोनॉमिक रिव्यू’ में छप गए थे, जो स्वातंत्र्योत्तर भारत की दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं के शिल्पकारों में रहे और मुमकिन है आज डी-स्कूल आने से पहले किसी पेचीदा आर्थिक मसले पर प्रधानमंत्री को मशविरा देकर आए हों, और जो अभी कुछ ही देर पहले लेक्चर हॉल में पियरे श्राफा के अति-जटिल मोनोग्राफ ‘प्रोडक्शन ऑफ कमोडिटीज बाय मीन्स ऑफ कमोडिटीज’ की भूल-भुलैयों से हमारे लिए खास उत्प्रेरणा निकाल रहे थे… फिर भी… फिर भी उन्हें लायब्रेरी के एक गुमनाम से जर्नल की ‘सेहत’ की खबर है!

    तो क्या इस लाइब्रेरी की सारी किताबों की इन्हें खबर रहती होगी?

    वैसे, ऐसा लगता तो था क्योंकि रतन टाटा लाइब्रेरी के इशू काउंटर पर हर दफा मैंने उन्हें आधा दर्जन से ज्यादा किताबें ले जाते देखा। अपने इस खास सपूत को लाइब्रेरी ने कार्ड संभालने की जहमत से बरी कर रखा था; उन्हें बस एक आयताकार पर्ची पर किताबों की संख्या के नीचे अपने हस्ताक्षर करने होते। दस्तखत करते हुए वे उस कर्मचारी से हाल-चाल भी लेते जाते।

    उनके हस्ताक्षर, अहा, उनके मिजाज की तरह कितने सीधे और सादा थे। वर्तुल, लगभग केलीग्राफ़िक सुंदरता में लिखे ‘चक्रवर्ती’ से पहले अंग्रेजी के छोटे अक्षर वाला ‘एस’। वह घसीट गणित में पारंगत अर्थशास्त्री की नहीं, किसी कलाकार, लेखक या चित्रकार की ज्यादा लगती थी। वैसे कला-साहित्य का उनका शौक मामूली था भी कहाँ! अमर्त्य सेन ने लिखा भी है कि स्कूल के दिनों में सुखमय चक्रवर्ती कलकते से शांतिनिकेतन सिर्फ चित्रकार मुकुल डे की पेंटिंग्स देखने आया करते थे। यूनिवर्सिटी रोड (दिल्ली) पर उनके घर के लिविंग रूम की मेज और फ़र्श पर भी किताबें बिखरी रहतीं – साहित्य, फ़िलॉसफी, गणित, भौतिकी और पता नहीं किस-किस विषय की नई-पुरानी किताबें। वे उन्हें रुचि से पढ़ते और उनके बारीक संदर्भ उनकी अर्थ-विषयक स्थापनाओं में साफ महसूस होते। उनकी याददाश्त भी कमाल की थी जिसे उनके लिखे और बातचीत में सहज देखा जा सकता था।

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    मनमोहन सिंह जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे तब आजादी के बाद भारत की मौद्रिक व्यवस्था की समीक्षा और उसमें समुचित सुधारों की ज़रूरत के मद्देनजर उन्होंने बैंक की एक समिति का गठन किया। उसकी बागडोर भी उन्होंने के.एन.राज या सूरजभान गुप्ता जैसे डी-स्कूल में मौद्रिक अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के बजाय प्रो. चक्रवर्ती को सौंपी। शायद इसलिए कि उन्हें यकीन था कि प्रो. चक्रवर्ती को आर्थिकी के नीतिगत और सैद्धांतिक पक्षों- और दोनों की व्यावहारिक सीमाओं— से ऐसा गहरा परिचय है कि जिस परिवेश में मौद्रिक व्यवस्था कार्य करती है, उसमें ज़रूरी दीर्घकालीन बदलावों के बारे में सबसे बेहतर वे ही सुझा सकेंगे। बाद में ‘चक्रवर्ती कमेटी’ के नाम से जारी रिजर्व बैंक की वह रपट, मोटे तौर पर आज भी भारत की मौद्रिक नीति का मूलाधार बनी हुई है। अपने जीवन के आखिरी बीस बरसों में उन्होंने भारत की अर्थ-नीतियों को कई स्तरों पर अपनी गहरी, असाधारण आर्थिक दृष्टि से यथा-संभव और निरंतर संवारा। उनके रखे हुए नक्शे-कदम आज भी मील के पत्थर की हैसियत रखते हैं।

    प्रो. सुखमय चक्रवर्ती उम्र के छप्पनवे वर्ष में थे जब सन 1990 में दिल की तकलीफ के कारण वे दुनिया से चले गए। पॉल सेमुएलसन ने अपनी विस्तृत श्रद्धांजलि में उन सरीखे ‘जायंट’ (दिग्गज) को लेकर गहरे अफसोस दर्ज किए। पहला अफसोस तो उनकी इतनी कम उम्र में दुनिया से जाने का था जिसके कारण दुनिया कुछ बहुत शानदार और दूरंदेश चीजों की संभावना से वंचित रह गईं। दूसरा मलाल यह था कि उन जैसा जन्मजात थियरिस्ट– जो तीस बरस की उम्र से पहले ही अर्थशास्त्र के कुछ बुनियादी सिद्धांतों में कुछ अलग और अपना जोड़ चुका था—आर्थिक नीति-निर्धारण की दुनिया में चला गया। सेमुएलसन का मानना था कि एक जीनियस-थियरिस्ट को नीति-निर्धारण की दुनिया में जाने से बचना चाहिए क्योंकि वहाँ जाना अपनी अर्जित पूँजी को खर्च करने जैसा है जबकि एक थियरिस्ट दरअसल उसकी वैश्विक पूँजी में इजाफ़ा करने के लिए पैदा होता है।

    मगर सुखमय चक्रवर्ती का मानस एक अलग ही धातु से ढला था। फ़िलॉसफी या भौतिकशास्त्र के बजाय उन्होंने अर्थशास्त्र को अपने उच्च अध्ययन के लिए चुना ही इसलिए था क्योंकि वह ‘मानविकी’ के दायरे में आता था। उन्हें यह बात आकर्षित करती थी कि इसके मूल प्रश्न हमेशा, एडम स्मिथ के समय से ही,  मनुष्य की तरक्की और बेहतरी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। उपलब्ध संसाधनों के आवंटन, विकास और वितरण के प्रश्नों को उस व्यवस्था के सापेक्ष देखना जिसमें समाज के भीतर रहते मनुष्य संघर्ष करते हैं, खासकर ऐसे देश में जो अभी-अभी आज़ाद हुआ हो और जिसने लोकतंत्र के रास्ते योजनागत विकास का रास्ता चुना हो – यह उनके लिए बुनियादी महत्व रखता था। विकास-अर्थशास्त्र (Development Economics) जैसे नव-विकसित क्षेत्र में एलन यंग और निकोलस कालडोर के योगदानों के साथ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की जमीन पर खड़े रेगनार नरक्स और माइकल कालेस्की के सैद्धांतिक योगदान उन्हें अपनी नीतिगत समझ के लिए  अनुषंगी महत्त्व के लगे। इसलिए कि विकास के प्रश्नों के संदर्भ में पूंजीगत संसाधनों के साथ परिवेशगत और सामाजिक हालात भी मायने रखते हैं। उनके लिए तमाम सैद्धांतिकी और जटिल समीकरण (‘बरोक कन्स्ट्रक्शंस’) अपने आप में कुछ नहीं यदि हम उनसे मनुष्य की उन्नति और बेहतरी के लिए कुछ हासिल न कर सकें। सेमुएलसन ने उनके बारे में कहा था कि यह वह शख्स है जिसे टॉल्स्टोय के द्वैत  और ‘लीनियर प्रोग्रामिंग’ में समान दिलचस्पी रहती है। उनके लिए असल अर्थशास्त्र इतिहास और थियरी की दहलीज पर कहीं अवस्थित था। “जीव विज्ञान जैसे विषय में आणविक स्तर पर जितनी रिसर्च हो रही है, उतनी ही समग्र जनसंख्या के स्तर पर भी हो रहे हैं” उन्होंने लिखा था जिससे पता चलता है कि विज्ञानों के केन्द्र में भी अंततः वृहत्तर मनुष्य ही है। इसलिए समीकरणों की जटिलताओं में उलझकर हमें अर्थशास्त्र के मूल मानविकी चरित्र को नहीं भूलना चाहिए।“ एक घोर गणितीय अर्थशास्त्री के ऐसे उसूल – जिन्हें उन्होंने अपनी दीगर भूमिकाओं में प्रशांत ढंग से निभाया— आज भी उज्ज्वल प्रेरणाओं के बाइस हैं। यहीं से सैद्धांतिक अन्तर्दृष्टियों के साथ अर्थशास्त्र की आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में नीतिगत क्षमता और जरूरत अहम हो जाते हैं।

    *

    “एक गुरु अपने शिष्य को दे भी क्या सकता है- सिवाय अपने स्वभाव के”

    टैगोर के नाम से मशहूर यह जुमला जब भी पढ़ता हूँ तो डी-स्कूल के अनेक अध्यापक याद हो आते हैं।

    क्या कोई अपना ‘स्वभाव’ दूसरों को दे सकता है? इसे कोई स्कूल बाकायदा तो नहीं सिखा सकता। मगर वह शायद खामोशी से, गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह, अनजाने ही एक पात्र (अक्षय) से दूसरे में जाता हो।

    कक्षा के भीतर लेबर थियरी ऑफ वेल्यू’ के क्रमिक विकास को समझाते प्रो. सुखमय चक्रवर्ती को कक्षा से बाहर हमने ‘लेबर थियरी ऑफ लाइफ’ को अमल में लाते देखा: लाइब्रेरी से इशू कराई किताबों का बोझ काँख में दबाकर वे स्वयं डी-स्कूल के गेट के बाहर ढोकर ले जाते जहां पी.एम ऑफिस द्वारा प्रदान की गई गाड़ी उनका इंतजार करती। ड्राइवर से कुछ निजी काम कराना तो वे सोच भी नहीं सकते थे हालांकि हर शख्स उनके लिए खुशी से हाजिर रहता। ऐसे ही, एम.ए के बाद जब मैं दिल्ली वि.वि के एक कॉलिज में साक्षात्कार के लिए गया, वहाँ बतौर विभागाध्यक्ष प्रो. के.एल कृष्णा ने मुझसे कोई सवाल पूछने से सरेआम इनकार कर दिया क्योंकि वे मुझसे परिचित थे! भारतीय अर्थव्यवस्था पर लिखी प्रो.चक्रवर्ती की अद्भुत दृष्टिसंपन्न पुस्तक- डेवलपमेंट प्लानिंग: इंडियन एक्सपीरिएंस– में दूसरी योजनाओं के साथ तीसरी और पाँचवीं पंचवर्षीय योजनाओं का विस्तार से जिक्र है मगर कहीं यह भनक नहीं आती कि दरअसल ये दोनों योजनाएं उनके ही सृजित  मॉडल्स का परिणाम थीं, न ही यह कि पाँचवीं योजना में उनकी भूमिका कितनी केन्द्रीय थी। अपने विवेचन में वे किसी प्रधानमंत्री का नाम नहीं लेते क्योंकि उनके लिए ‘भारत’ या ‘भारत सरकार’ के नीतिगत फैसलों, उपलब्धियों और कमजोरियों  (खासकर योजनाओं के क्रियान्वयन में) के संदर्भ अहम थे, कोई व्यक्ति-विशेष या पद नहीं। तीसरी पंचवर्षीय योजना के एक अध्याय – योजना के उद्देश्य- के कुछ हिस्से नेहरू जी ने खुद लिखे थे। पुस्तक में आया यह रहस्योद्घाटन उस विरल व्यक्तित्व के योजनाबद्ध विकास के सरोकारों की पुष्टि मात्र है जिसके भरोसे साल 1937 में तत्कालीन कॉंग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें उस योजना समिति का अध्यक्ष बनाना चाहा था जो भविष्य में आजादी के बाद देश को नई राह दिखाये, उन लोगों के संघर्ष और स्वप्न को साकार करे जिनके लिए आजादी हासिल की जा रही थी। इसी सिलसिले में वे सन 1941 में टैगोर के जीवन काल में उनके निजी सहायक बने(जबकि वे प्रेसिडेंसी कॉलिज में भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर थे!) प्रो. महलोनोबिस के घर चले गए थे- उन्हें उस योजना समिति में शामिल करने की नीयत से, क्योंकि उनकी सांख्यिकी की असाधारण प्रतिभा का नेहरू को एहसास हो चुका था।

    *

    अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सैद्धांतिकी में यह बात प्रमुखता से निकलकर आती है कि व्यापार के स्तर पर फ्री-ट्रेड यानी मुक्त व्यापार आर्थिक रूप से सर्वोत्तम है। ‘हेक्चर-ऑहलिन थ्योरम’ के जरिये इसे पाठ्यक्रमों में चित्रों और समीकरणों के जरिए बाकायदा सिद्ध किया जाता रहा है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो एक हल्की सी गुदगुदी होती है – कि किस तरह बौद्धिकता के आगोश में पले-बढ़े तमाम तरह के आर्थिक मॉडल और समीकरण, अपनी सख्ती के बावजूद, दूसरे स्तर पर स्वच्छंद-स्वतंत्र सोच को जन्म देते थे। इस अनुशासन की बुनियाद में एडम स्मिथ का चिंतन था जिसमें ‘लेज़े-फेयर’ (राजकीय-गैरहस्तक्षेपीय नीति) को केंद्रीय महत्व हासिल था। डी-स्कूल का वह समय जैसे उसी सुदीर्घ और संपन्न परंपरा का वाहक बना हुआ था। इसी सिलसिले में कभी अमर्त्य सेन यहाँ से निकले थे, कभी के.एन. राज या दूसरे दर्जनों दिग्गज जो जब-तब किसी व्याख्यान-गोष्ठी में शामिल होने आ जाया करते। राज कृष्णा तो वहाँ थे ही। कौशिक बसु शानदार तरह से उभर रहे थे। ये लोग– या इनके जैसे दूसरे– किसी खेमे में नहीं बंधे थे । वे मनुष्य के स्वच्छंद मस्तिष्क और मेधा के प्रतीक थे। किसी सरकारी-नीति से सहमति-असहमति उनके अस्तित्व की पहचान नहीं थी। आपसी विद्वता के सम्मान के साथ वे आपस में ही और खूब असहमत होते। क्या आने वाले समय में हमारा बैच कभी इसी तरह ‘दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ की इस परंपरा को समृद्ध करेगा? शायद हमने इस पर विचार न किया हो लेकिन इसमें कोई शंका नहीं थी। स्कूल- कॉलेज का समय जिन  मासूम अनिश्चितताओं से लकदक रहता है वे अपने आप में पवित्र और निर्मल होती हैं। उन्हीं की ताजगी से तो उम्मीदों का दीपक प्रज्वलित रहता है।

    पिछली सदी के नवे दशक में जब दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से परा-स्नातक की पढ़ाई पूरी करके हम लोग जीवन में उतरे तो दिल तमाम तरह की चीज़ों से भरा रहता था… अहा! कैसे-कैसे अध्यापक जो गहन शोधकर्ता और निर्देशक भी थे और उतने ही सरल और शानदार इंसान भी। कितनी समृद्ध लाइब्रेरी। और वह कैंटीन —जहाँ बेस्वाद सी कॉफ़ी भी अजीब-सी दिलकश ताक़त बनकर दिन-भर विचारों और संवाद को महकाए रखती थी। कैसे उदार और मेधावी संगी-साथी जिनमें कोई भारतीय विदेश सेवा में जाकर किसी देश का राजदूत बना तो कोई प्रशासनिक सेवा के रास्ते किसी मंत्रालय का सचिव, किसी ने निजी क्षेत्र में कंपनियां कायम कीं और चलाईं। बहुत सारे आगे पढ़ाई यानी पीएचडी करने परदेश माने अमेरिका चले गए और वहीं बस गए। लेकिन सभी की उपलब्धियां निजी रहती थीं। मेल-जोल के समय वही पुरानी मित्रता और आत्मीयता संचरित होती। और यही  हाल– जैसा प्रो. धर्मा कुमार के संपादन में बाद में डी-स्कूल पर संपादित किताब के निबंधों से जाहिर होता है– सभी बैचेज का था: सभी अपने तत्कालीन शिक्षकों पर मोहित और गर्वित, सभी अपने सहपाठियों के प्रति स्नेहपूर्ण और आपसी ऊष्मा से भरे हुए। क्योंकि सभी ने जीवन में कमोबेश ऐसा मुकाम हासिल कर लिया था जहां एक सामूहिक संतोष और साझा सुकून भरा रहता।

    *

    डी-स्कूल से जुदा होने के बाद, जैसा जीवन के हर यादगार और निर्णायक दौर के साथ होता है, बहुत कम मित्रों के साथ ही संवाद बचा रहा क्योंकि सब अपनी तरह से जीवन में मस्त और व्यस्त हो गए। लेकिन वहां से निकलने के करीब ढाई दशक बाद- जब व्हाट्स-एप/सोशल मीडिया ने दस्तक दी – तो किसी ने  ढूंढ-ढूंढकर पुराने सहपाठियों का एक मंच बना लिया। वहाँ फिर वही पुरानी गर्मजोशी और रौनक सर उठाने लगी। हर री-यूनियन उसी पुराने सौहार्द की पूँजी पर चहक उठती। मेल-मिलाप का नया दौर गालिबन पहले से भी बेहतर लगता क्योंकि एक सुखद सामूहिक स्मृति सभी को बांधे हुए थी और हर शख्स अपनी जिंदगी में सैटल हो चुका था। ज़रा-सी दिल्लगी और मासूम मसख़री उस महफ़िल को और दिलकश बना देती—क्योंकि जवानी के दिनों की कुछ अदृश्य दीवारें अब ख़ामोशी से ढह चुकी थीं।

    यह सिलसिला कई बरस चलता रहा। सन 2014 में भी कोई बुनियादी बदलाव महसूस नहीं हुआ, हांलाकि उसी साल ‘योजना आयोग’ को खत्म कर ‘नीति आयोग’ बनाने की घोषणा ने हमें चौंकाया जरूर। अन्यमनस्क सा ख्याल आया – “लोकतंत्र में हर व्यवस्था को गुंजाइश रहनी चाहिए” । ज्ञान की परंपरा में रमे नादानों का दिल कलुषित नीयतों की आहट पर यकीन करने को तैयार न था।

    “तो क्या ‘परस्पेक्टिव प्लानिंग डिवीजन’ भी चला जाएगा?” – हम किसी मासूम अंदेशे से कांप उठते। वहीं बैठकर तो कभी प्रो. सुखमय चक्रवर्ती ने अर्थव्यवस्था के बीसियों सेक्टरों के मेट्रिक्स से दीर्घकालीन योजनागत विकास की सैद्धांतिकी का वह, योजना दस्तावेज़ में नत्थी ऐतिहासिक ‘टेक्निकल नोट’ रचा  था जिसे इस विषय के जानकार आज भी हसरतों से सराहते हैं। इमारत या संस्थान का नाम बदल दो, हासिल थोड़े मिटेंगे।

    उसमें हमें सन 1923 में म्यूनिख के हिटलर के ‘बीयर हॉल पुश’ की बू क्योंकर आती?

    लेकिन नवंबर 2016 की एक शाम जब ‘डिमॉनीटाइजेशन’ का फरमान जारी हुआ तो हमारे कान खड़े हुए। उसमें कोई आर्थिक तर्क दूर-दूर तक नज़र न आता था। रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर की सहमति भी सामने नहीं आई तो अहसास हुआ कि यह सोचा-समझा निर्णय न होकर एक अविचारित, बेमानी हौंस है जो अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित होगी। और वास्तव में हुआ भी। उधर राष्ट्रीय आय (जीडीपी) को मापने की पद्धति संदिग्ध तरह से बदल डाली गई। आंकड़े एकत्रित करने की ‘नेशनल सेम्पल सर्वे’ पद्धति – जिसे महलोनोबिस की मेहनत-मशक्कत ने मजबूत बुनियाद दी थी, जिसकी सराहना संयुक्त राष्ट्र तक करता रहा और  यूरोप समेत दुनिया के तीन दर्जन से ज़्यादा मुल्कों ने अपनाया था, उसे बहुत जल्द ही फिजूल कर दिया गया।

    अर्जित सादगी और तटस्थता की जगह, अधिकृत आँकड़े अब फ़रमानों की तामील में ज़्यादा मुस्तैद दिखने लगे। रोज़गार, जो कभी आर्थिक गतिविधियों का सुनियोजित और सहज प्रतिफल हुआ करता था, अब एक ‘शासक’ की मेहरबानी का ‘उत्सव’ हो गया। विकास के कान-फोड़ू प्रोपेगंडे में ग़रीबी जैसे ग़ायब बता दी  गई। सामाजिक और राजनैतिक स्तरों पर की जाने वाली अभूतपूर्व, अनैतिक और कुटिल कार्रवाइयों का जिक्र करने का यहाँ अवकाश ही नहीं है।

    सन 2019 के आख़िर तक आते-आते मंज़र बदलने लगा। आपसी संबंध और संवाद में बेअदबी उतरने लगी। हमें हैरत होने लगी कि ऐसा कैसे हुआ? हम तो डी-स्कूली थे: आज़ाद-ख़याल, बौद्धिक और विवेक से चलने वाले। एकोनोमेट्रिक्स और ‘लेज़े-फेयर’ (Laissez-faire) में पढ़े-गुने हुए लोग किसी संदिग्ध, अल्पज्ञ और रक्त-रंजित हाथों वाले अहंकारी को आँख मूंदकर मसीहा कैसे मान सकते थे?

    मगर हालात ये थे कि किसी भी मसले पर जरा सी आलोचना भी साथियों  को नागवार गुजरने लगी। जवाब मिलता – “हां, तो? कांग्रेस भी तो यही करती थी… तुम जो अब तक कांग्रेस का पिछवाड़ा साफ करते रहे अब जाकर तुम्हें पता लग रहा है…” जुबान में भी जैसे नाज़ी गुर्गों सी सख़्ती और तल्ख़ी उतरने लगी। असहमति अपराध हो गई। तथ्य बेमानी हो गए। हम डी-स्कूलियों के लिए यह जुबान एकदम अजनबी थी। हमें यह अवसर भी मुहैया नहीं कि कहें… कॉंग्रेस? कौन, कब ?

    अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय जा चुके हमारे अध्यापक प्रो. कौशिक बसु के लिए दिल्ली में बैच की एक छोटी सी मुलाकात रखी थी। बातों के क्रम में उन्होंने यूँ ही एक साथी से पूछा—’व्हेयर आर यू?’ जवाब आया—’सर, आई एम इन कॉमर्स’। वह (अनूप वधावन) उस वक़्त भारत सरकार का वाणिज्य सचिव था । बात भले सही ठहरती मगर अपने पूर्व-अध्यापक को अपने ओहदे का इशारा भी करना अशोभनीय होता!

    अमर्त्य सेन या कौशिक बसु लोकतंत्र के सिमटते स्पेस पर कुछ ट्वीट करते तो वे उन्हें भी लपेट लेते। पचास के ग्रुप में पाँच–सात ही वाचाल रहते हैं लेकिन वे जैसे अब ग्रुप का नरेटिव निर्धारित करते हैं – किसी भी बात पर उलझने और भिड़ने को तैयार। इस तथाकथित देशभक्ति की लहरें अमरीका या अन्य देशों में बसे कुछ प्रवासियों के दिल में कुछ अधिक ऊँची उठतीं हैं —उन्हें अपने दूर बैठे ‘त्राता’ द्वारा किसी एक समुदाय को ‘काबू’ में कर लेने की अपार तसल्ली जिलाए रखती है। बाक़ी कुछ देखना-समझना उनके लिए ग़ैर-ज़रूरी हो जाता है। मसलन 2014 के बाद आय और संपत्ति की विषमता हौलनाक ढंग से बढ़ी है, भुखमरी के पैमानों पर मुल्क और नीचे गया है, लोकतन्त्र और प्रेस की आज़ादी के पैमाने पर देश ‘निर्वाचित तानाशाही’ की क़तार में गिना जा रहा है…कि पिछले दस बरसों में एक लाख से ज़्यादा सरकारी प्राइमरी स्कूल बंद हुए हैं… डी-स्कूल समेत आला तालीम के इदारे लड़खड़ाती हालत में जा गिरे हैं… ये सब उन्हें मुद्दे ही नहीं लगते। देश नख-शिख हिन्दुत्व के गर्व से रंगा हो… भले अभी तक के हासिल और संविधान के परखच्चे उड़ जाएँ!

    कहना होगा कि ग्रुप में बड़ी संख्या चुप्पी बरतने वाले उन ‘समझदार’ सम्मानितों की है जो हर तानाशाह की बड़ी शक्ति होते हैं। उनकी जमात के लिए ही तो जर्मन कवि मार्टिन निमोलर (Martin Niemoller) ने वह मशहूर कविता “पहले वे आए ..” लिखी थी जिसे यहाँ उद्धृत करना अनावश्यक है। अर्थशास्त्र में ‘तटस्थता वक्र’ पढे हुए इतने लोग कब और कैसे अपने समय और समाज के प्रति ‘उदासीन’ होना सीख गए, समझ को छकाता है। हाँ, इतना जरूर है कि ये लक्षण सिर्फ डी-स्कूल तक सीमित नहीं हैं।

    ऐसा कैसे हुआ?

    यहाँ उन कारणों की शिनाख्त अनावश्यक है लेकिन यह मेरे समय को गढ़ने वाले डी-स्कूल का ऐसा विस्तार है जो मेरे वर्तमान तक खिंच आया है।

    *

    अपनी आत्मकथा होम इन द वर्ल्ड के अंत में अमर्त्य सेन सत्तर बरस के अपने यूरोप-प्रवास के अनुभवों की चर्चा करते हैं। एक वक्त यूरोप के एकीकरण की बात भी चली थी। यह एकीकरण भले ही संभव न हुआ हो, लेकिन प्रो. सेन तीन बुनियादी नियमों-उसूलों को यूरोपीय संस्कृति की खास देन के तौर पर रेखांकित करते हैं:

    पहला—रुल ऑफ ला, क़ानून की नज़र में सभी नागरिक बराबर।

    दूसरा—मानवाधिकार (Human Rights)।

    तीसरा—लोकतन्त्र में आम जनों की सक्रिय भागीदारी।

    ये तीनों मूल्य एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। लेकिन सन 2014 के बाद हमारे यहाँ जो सूरत उभरी, वह जैसे पूरी सभ्यता-संस्कृति को कई सदियों पीछे धकेलती चली गई है। अब यह विश्वास खंडित हो चुका है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। भले ही कानून की किताबों में बराबरी दर्ज़ हो लेकिन राज्य की नजर में जो सोचा-समझा भेदभाव, एक-वक्र दृष्टि सनी  है, असलियत में वही कारगर साबित होती है। कानून जब राज्य-सत्ता की बेजा धौंस-दबिश द्वारा ही नियंत्रित-संचालित हो तो इस भेदभाव का असर वहाँ भी झलकने लगता है।

    इसी का एक पहलू यह है कि सरकार या उसकी नीतियों-निर्णयों से असहमति या अलग विचार रखने वालों को सच्चे-झूठे आरोपों में मुकदमों में उलझाया जाए और कानूनी प्रक्रिया के नाम पर उन्हें त्रस्त किया जाए, हिरासत में रखा जाये। जमानत मुश्किल कर दी जाए और न्याय व्यवस्था को वस्तुतः  ऐसा कर दिया जाए कि आरोपियों को न्याय मिलना दुश्वार हो। भीमा कोरेगांव मामला इसका एक चर्चित उदाहरण है। यह भी एक तरह का ‘डिमॉनस्ट्रेशन इफेक्ट’ है – कि एक मिसाल कायम कर दी जाये जिससे असहमत या विरोधी खुद-ब-खुद खामोश रहें। उन चंद सिरफिरों को छोड़कर जो निजी कीमत देकर भी डटे रहते हैं।

    जिस तरह राज्य प्रवर्तन संस्थाएं अपने अधिकारों और औजारों के साथ जब-तब नुक्कड़ के गुंडों सी धौंस-धमक दिखाती सक्रीयता लिए रहती हैं या  आतताइयों के राजनैतिक मंसूबों पर नाचती हैं- सोशल मीडिया के दौर में यह सब-कुछ छिपा भी नहीं रहता – वह बेहद चिंताजनक है। कई बार ‘काम पूरा होने’ यानी विरोधी के घुटने टेक देने के बाद मुकदमे खामोशी से वापस ले लिए जाते हैं और अदालत में ‘क्लोजर’ रिपोर्ट दाखिल कर दी जाती है। मगर इतनी तादाद में फर्जी और अन्यायपूर्ण मामलों की जवाबदेही की कोई व्यवस्था नज़र नहीं आती।

    पारंपरिक रूप से राज्य का प्रमुख दायित्व कानून और व्यवस्था के जरिए न्याय प्रदान करना ही होता है लेकिन हमारे दौर में सत्ता जिस तरह तंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की मार्फत सरासर असंवैधानिक तरीके से कानून का बेजा इस्तेमाल कर रही है, वह उस लोकतांत्रिक गणराज्य और न्याय की उम्मीद को उलट देने जैसा है जिसने एक योजनाबद्ध विकास के स्वप्न को साकार करने की एक बेमिसाल और, कहना चाहिए, काफ़ी हद तक कामयाब कोशिश की थी, जिसमें प्रो. महलोनोबिस और प्रो. सुखमय चक्रवर्ती जैसी शानदार मेधाओं ने उसके मानी रचे और अपने जीवन की समिधा दी।

    यकीनन यह समय जिसमें मैं सांस लेता हूँ, प्रो. सुखमय चक्रवर्ती का नहीं हो सकता। लेकिन फिर भी उनकी एक वक्त देखे-जाने जीवन में मौजूदगी की स्मृति  एक जैविक संबल के रूप में मुझे करिश्माई ढंग से थामे रहती है।

    इस मायने में मैं शायद दो, गालिबन एक-दूसरे से उलट, समयों की सवारी कर रहा हूँ— “रौ में है रक्श-ए-उम्र, कहाँ देखिए थमे!”

    **                             **

    पुनश्च: प्रो. सुखमय चक्रवर्ती की इकलौती संतान, चारुषिता एक रसायन विज्ञानी थीं । सन 2016 में बावन वर्ष की उम्र में केन्सर से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी, ललिताजी, दिल्ली विश्वविद्यालय में ही अर्थशास्त्र पढ़ाती रहीं। इस आलेख को लिखे जाने के दौरान, प्रो. सुखमय चक्रवर्ती की धरोहर के बारे में जानने की जिज्ञासा ने मुझे काफी बेचैन किए रखा। अर्थशास्त्र की अकादमिक दुनिया को ललिताजी के बारे में कुछ मालूम न था। बड़ी कोशिशों के बाद मेरा संपर्क जनेविवि में अर्थशास्त्र के प्रो. सुजॉय चक्रवर्ती- जो प्रो. सुखमय के भतीजे हैं– से हुआ तो पता चला कि तकरीबन तीन साल पहले, सन 2023 में ललिताजी भी दुनिया छोड़कर चली गईं। अकेले और चुपचाप।

    “तो उनकी वह विशाल लाइब्रेरी, उनकी पांडुलिपियाँ, पत्राचार, अधूरे छूटे कार्य… किसकी सुपुर्दगी में होंगे?” मैंने जिज्ञासा रखी।

    “मुझे मालूम नहीं … देखना पड़ेगा”  प्रो. सुजॉय ने असमर्थता जताई।

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