Meritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor Bahisleri, Mavibet Casino Ve Slot OyunlarıMeritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Mobilden Giriş 2026Meritking Giriş: Meritking Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Giriş Adresi, Mavibet Güvenilir MiMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir MiMeritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot Oyunları, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve Kampanyalar, Mavibet Giriş AdresiMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor BahisleriMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Mobilden Giriş 2026Marsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Bonus Ve KampanyalarMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Spor Bahisleri, Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Giriş Adresi, Mavibet Mobilden Giriş 2026Meritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir MiMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Bonus Ve KampanyalarMavibet Giriş: Mavibet Spor Bahisleri, Mavibet Casino Ve Slot OyunlarıMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor BahislerikalitebetgrandpashabetholiganbetjojobetholiganbetholiganbetextrabetAntalya EscortAntalya Escort BayanAntalya Escort BayanMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarAntalya Escort BayanAntalya EscortAntalya EscortlarAntalya EscortSüratbetSüratbet girişSüratbetCasinoroyalCasinoroyal girişCasinoroyalHarbiwinHarbiwin girişHarbiwinAresbetAresbet girişAresbetPolobetPolobet girişPolobetBetwildBetwild girişBetwildMavibetMavibet girişMavibetGalabetGalabet girişGalabetBahislionBahislion girişBahislionBetcioBetcio girişBetcioBetsilinBetsilin girişBetsilinEgebetEgebet girişEgebetKavbetKavbet girişKavbetRoketbetRoketbet girişRoketbetMarsbahisMarsbahis girişMarsbahisMeritkingMeritking girişMeritkingHoliganbetHoliganbet girişHoliganbetElitbahisElitbahis girişElitbahisHarbiwinHarbiwin girişHarbiwinCasinoroyalCasinoroyal girişCasinoroyalKalebetKalebet girişKalebetMisliwinMisliwin girişMisliwinRekorbetRekorbet girişRekorbetSetrabetSetrabet girişSetrabetSüratbetSüratbet girişSüratbetTimebetTimebet girişTimebetKralbetKralbet girişKralbetWinxbetWinxbet girişWinxbetHoliganbetHoliganbet girişHoliganbetSüratbetSüratbet girişSüratbetaresbetaresbet girişaresbetrobinbetrobinbet girişrobinbetxslotxslot girişxslotcasinoroyalcasinoroyal girişcasinoroyalatlasbetatlasbet girişatlasbetenbetenbet girişenbetpolobetpolobet girişpolobetbetciobetcio girişbetciomavibetmavibet girişmavibetbetasusbetasus girişbetasusgalabetgalabet girişgalabetroketbetroketbet girişroketbetromabetromabet girişromabetbetsilinbetsilin girişbetsilinkulisbetkulisbet girişkulisbetmasterbettingmasterbetting girişmasterbettingjokerbetjokerbet girişjokerbetultrabetultrabet girişultrabetbetkolikbetkolik girişbetkolikceltabetceltabet girişceltabetbetbigobetbigo girişbetbigomaxwinmaxwin girişmaxwinbetrabetra girişbetrabetnisbetnis girişbetniseditörbeteditörbet girişeditörbetenjoybetenjoybet girişenjoybet
  • लेख
  • नेहरू, गुरु दत्त और संवेदनशील भारत का अवसान

    मनोज कुमार झा जी सार्वजनिक जीवन के उन गिने-चुने लोगों में हैं जो कमाल के वक्ता होने के साथ-साथ बेजोड़ लेखक भी हैं। जैसे यह लेख। इस महीने गुरु दत्त पर महमूद फ़ारूक़ी की किताब आई, यह महीना देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि का महीना भी है। मनोज जी ने गुरु दत्त और नेहरू के विजन को लेकर यह लेख लिखा। अंग्रेज़ी में यह लेख फ़्रंटलाइन में प्रकाशित हुआ। वहाँ से साभार उसका हिन्दी अनुवाद आपके लिये- मॉडरेटर 

    =================

    वे ऐसे समय में एक मानवीय और संवेदनशील भारत की कल्पना का बोझ उठाए हुए थे, जब दुनिया धीरे-धीरे सहानुभूति और नैतिक संवेदनशीलता से दूर होती जा रही थी। उनका यह साझा दर्द आज भी इस गणराज्य को परेशान कर रहा है, जो अब अक्सर संवेदनहीनता को ही परिपक्वता समझने लगा है।

    सार्वजनिक जीवन में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें केवल उनकी जीवनी के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनका जीवन कालक्रम की सीमाओं से बाहर निकलकर सामूहिक स्मृति और लोगों की साझा भावनाओं के क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है। वे केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व या सांस्कृतिक प्रतीक भर नहीं रह जाते, बल्कि ऐसे भावनात्मक परिदृश्य बन जाते हैं जिनके माध्यम से अलग  अलग पीढ़ियाँ स्वयं को समझने का प्रयास करती हैं।

    हाल के दिनों में मेरे मन में ऐसा ही एक अप्रत्याशित साहचर्य गुरु दत्त और जवाहरलाल नेहरू के बीच उमड़ता रहा है। एक सिनेमा की नाज़ुक दुनिया से जुड़े थे, तो दूसरा राजनीति और राष्ट्र संचालन के बेहद अपेक्षा भरे रंगमंच से। फिर भी स्मृतियों के शांत गलियारों में कहीं वे एक-दूसरे से संवाद करते प्रतीत होते हैं, शायद इसलिए कि दोनों अपने भीतर बहुत अधिक देख लेने का बोझ लिए हुए थे।

    हमें बचपन में न जाने ऐसी कितनी कहानियाँ सुनाई गईं कि कुछ लोग अपने समय के स्वभाव के अनुसार स्वयं को ढालकर जीवन में सफल हो जाते हैं। वे बहुत जल्दी प्रशंसा की भाषा सीख लेते हैं। वे इस बात को भली-भाँति समझ लेते हैं कि समाज क्या सुनना चाहता है, और धीरे-धीरे परंपरागत सोच की भाषा में निपुण हो जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो अपने समय से थोड़ा अलग-थलग बने रहते हैं। इसलिए उनकी सफलता चाहे जितनी दिखाई दे, उसके भीतर एक गहरा अकेलापन छिपा रहता है। गुरु दत्त और नेहरू निस्संदेह इसी दूसरी श्रेणी के लोग थे। वे केवल सार्वजनिक भूमिकाएँ निभाने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि गहरे आत्मचिंतन से भरे ऐसे संवेदनशील मानस वाले थे, जो आधुनिक भारत के अकेलेपन से जूझ रहे थे।

    पीड़ा और उसकी पहचान

    दोनों के भीतर संवेदनशीलता कुछ अधिक ही थी, और इतिहास ऐसे अत्यधिक संवेदनशील लोगों के प्रति शायद ही कभी उदार रहा है। आज हम जब फ़िल्म ‘प्यासा’ को देखते हैं, तो वह केवल एक फिल्म नहीं लगती, बल्कि गहरी साभ्यतिक कराह की तरह सुनाई देती है। इज्जत, लाभ और दिखावटी नैतिकता में डूबे समाज के बीच भटकता कवि विजय केवल गुरु दत्त का किरदार नहीं है; वह हर उस विचारशील मनुष्य का प्रतीक बन जाता है, जिसे आत्मचिंतन की क्षमता गँवाते जा रहे समाज ने अप्रासंगिक बना दिया है। फिल्म की त्रासदी केवल यह नहीं है कि समाज उस कवि को पहचान नहीं पाता, बल्कि इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि समाज के पास अब वह संवेदनात्मक भाषा ही नहीं बची है जो पीड़ा को पहचान सके।

    गुरु दत्त के सिनेमा की पीड़ा चीखती नहीं, बल्कि भीतर कहीं ठहर जाती है-  लगभग उस गहरे सन्नाटे की तरह, जो किसी विश्वासघात के बाद लंबे समय तक कमरे में बना रह जाता है। जैसे कोई कमरा उन आवाज़ों के खत्म हो जाने के बाद भी बहस की स्मृति को अपने भीतर सँजोए रह जाता हो। शायद यही कारण है कि उनका सिनेमा आज भी हमें बेचैन करता है और हमारे सामने वह प्रश्न रखता है, जिससे आधुनिक समाज असहज महसूस करता है: तमाशे और लेन-देन से संचालित इस समय में संवेदनशील मनों का क्या होता है?

    जब नेहरू के पत्रों को पढ़ते हैं या भारत एक खोज को फिर से देखते हैं, तो वहाँ भी एक वैसा ही गहरा अकेलापन दिखाई देता है। यह एक ऐसे व्यक्ति का अकेलापन था, जिसे करोड़ों लोग प्रेम करते थे, जो अपने समय के सबसे जाने-पहचाने चेहरों में एक था, फिर भी भीतर से वह अजीब तरह से अकेला था। वह इसलिए अकेला नहीं था कि उसको साहचर्य की कमी थी; वह इसलिए अकेला था क्योंकि उसके सपने अपने समय की संवेदनात्मक क्षमता से कहीं आगे थे, और कई बार अपने साथियों की कल्पना से भी बहुत आगे।

    लेकिन एक अंतर था। नेहरू की उदासी केवल निजी निराशा से पैदा नहीं हुई थी, बल्कि वह ओछी मानसिकताओं, सांप्रदायिक चिंताओं और बौद्धिक अधैर्य के बीच उम्मीद को जीवित रखने की कठिन थकान से उपजी थी। वे उस पीढ़ी से थे, जिसे भारत बने-बनाये राष्ट्र-राज्य के रूप में विरासत में नहीं मिला था; उन्हें पहले उसकी कल्पना करनी पड़ी थी। और कल्पना, विशेषकर राजनीतिक कल्पना, मनुष्य के सबसे थकाने वाले कार्यों में से एक है, खासकर तब जब उसे उस समय के सामूहिक निराशा-बोध के भीतर से देखा जाए।

    हम अक्सर भूल जाते हैं कि उन आरंभिक वर्षों में भारत को अपने भीतर लेकर चलना भावनात्मक रूप से कितनी अधिक अपेक्षा रखने वाला रहा होगा। एक ऐसा भारत, जो विभाजन से घायल था, गरीबी से निढाल था, जातिगत असमानताओं से बँटा हुआ था, सांप्रदायिक आवेगों के प्रति संवेदनशील था, मगर फिर भी जिससे यह अपेक्षा की जा रही थी कि वह दुनिया के सामने लोकतंत्र के एक नैतिक प्रयोग के रूप में खड़ा हो। नेहरू केवल एक देश का प्रशासन नहीं चला रहे थे; वे विभाजन के बाद भड़की सांप्रदायिक उन्माद के बीच संवेदनशीलता की एक सभ्यता को विकसित करने का प्रयास कर रहे थे।

    शायद यही कारण है कि उनके गद्य में अक्सर उस व्यक्ति की थकान महसूस होती है, जो एक साथ वर्तमान और भविष्य दोनों से संवाद कर रहा हो। नेहरू जानते थे कि कल्पना के बिना राजनीति केवल जड़ प्रशासन बन जाती है, और करुणा के बिना प्रशासन कभी प्रेरणा नहीं दे सकता। यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि गुरु दत्त और नेहरू दोनों सौंदर्य में आस्था करते थे। सौन्दर्य केवल सजावटी या कलात्मक विलास नहीं था, बल्कि उनके लिए वह एक नैतिक मूल्य था। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है, क्योंकि दोनों के लिए सौन्दर्य गरिमा और भाईचारे से अलग नहीं था।

    गुरु दत्त ने मानवीय दुर्बलताओं को इतनी कोमलता से चित्रित किया, क्योंकि वे मानते थे कि दुःख भी गरिमा का अधिकारी है। नेहरू ने कला, विज्ञान, साहित्य, स्थापत्य और सार्वजनिक संस्कृति की संस्थाओं में गहरा निवेश किया, क्योंकि उनका विश्वास था कि सौन्दर्यबोध से रहित गणराज्य अंततः भावनात्मक रूप से कठोर और संवेदनहीन हो जाता है। इसलिए सौन्दर्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बहुत गहरे राजनीतिक भी थी, और यह उनकी अभिव्यक्ति के रूपों में स्पष्ट दिखाई देती है।

    लेकिन आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ गलती से शोर को ही दृढ़ विश्वास समझ लिया गया है और क्रूरता अक्सर शक्ति का रूप धारण कर लेती है। सबसे ऊँची आवाज़ को ही सबसे प्रामाणिक माना जाने लगा है, और हल्का-सा आत्मचिंतन भी संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। यह ऐसा समय है, जहाँ बाज़ार विचारशीलता की तुलना में आक्रामकता को कहीं अधिक आसानी और अधिक मूल्य के साथ पुरस्कृत करता है। ऐसे समय में गुरु दत्त और नेहरू की ओर लौटना लगभग भावनात्मक प्रतिरोध का एक कार्य बन जाता है, साथ ही एक आवश्यक आत्मशुद्धि भी।

    वे दोनों हमें याद दिलाते हैं कि संवेदनशीलता कमजोरी नहीं होती, तथा आँसू, कविता, ठहराव एवं आत्म-संदेह महानता की राह में बाधाएँ नहीं, बल्कि कई बार उसकी सबसे गहरी नींव होते हैं। वे यह भी याद दिलाते हैं कि विचारशीलता का अपना राजनीतिक महत्व होता है, तथा कोई सभ्यता केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक विकास से जीवित नहीं रहती; वह सार्वजनिक जीवन में संवेदना को बचाए रखने की अपनी क्षमता से भी जीवित रहती है।

    फिर भी दोनों ने, शायद बहुत पीड़ा के साथ, यह समझ लिया था कि समाज आदर्शवाद की प्रशंसा तो शब्दों में करता है, लेकिन व्यवहार में उसे अनेक प्रकार से दंडित भी करता है। यही विरोधाभास आधुनिक भारत की बड़ी सच्चाइयों में से एक है। हम कवियों का स्मरण करते हैं, लेकिन पुरस्कार निष्ठुरता और संशयवाद को देते हैं। हम सभ्यता की बातें बहुत करते हैं, पर विविधता के प्रति लगातार असहिष्णु होते जा रहे हैं। हम सार्वजनिक रूप से करुणा की पूजा करते हैं, लेकिन निजी तौर पर प्रभुत्व और वर्चस्व की संस्कृति से प्रभावित रहते हैं। कहीं न कहीं इस यात्रा में हमने भावनात्मक संवेदनहीनता को ही परिपक्वता समझना शुरू कर दिया है।

    गुरु दत्त का विरोधाभास

    गुरु दत्त इस विरोधाभास को सह नहीं सके। उनका भीतरी संसार अंततः इसी बोझ के नीचे ढह गया। नेहरू अधिक उम्र तक जीवित रहे, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उनके भीतर गहरी थकान महसूस की जा सकती है। 1962 का युद्ध, सांप्रदायिक चिंताओं का उभार, और कुछ लोकतांत्रिक आदर्शों का क्षरण, यह सब टूटन उन्हें व्यक्तिगत रूप से गहरे अंदर तक प्रभावित करती रहीं। जब 1964 में जब उनका निधन हुआ, तो वह केवल एक प्रधानमंत्री की मृत्यु नहीं थी। कई मायनों में वह उस पूरी पीढ़ी की थकान का अंत था, जिसने राजनीति को मानवीय बनाने का प्रयास किया था।

    फिर भी, वे कभी सचमुच विलुप्त नहीं हुए। जब इस अति-प्रतिस्पर्धी दुनिया में कोई संवेदनशील युवा स्वयं को अकेला और असंगत महसूस करता है, गुरु दत्त हर बार जीवित हो उठते हैं। जब कोई यह कहता है कि करुणा के बिना लोकतंत्र अधूरा है, नेहरू हर बार लौट आते हैं। उनकी उदासी और उनकी करुणा अमर हो गई, क्योंकि उनमें नैतिक कल्पना का गहरा स्पर्श था।

    शायद यही कारण है कि वे बार-बार हमारी स्मृतियों में लौट आते हैं और हमें बेचैन करते रहते हैं। और शायद इसी कारण वर्ष 2026 में यह विचार मेरे भीतर अधिक तीव्रता के साथ लौटता है। इसमें कुछ विचित्र, लगभग काव्यमय है कि गुरु दत्त और जवाहरलाल नेहरू दोनों ने इसी दुनिया को एक ही वर्ष, 1964 में, अलविदा कहा था।

    इतिहास ऐसे संयोगों को केवल कालक्रम के रूप में दर्ज करता है, लेकिन स्मृति उन्हें एक अलग तरह से पढ़ती है। कई बार कोई युग तिथियों और घटनाओं से नहीं, बल्कि उन लोगों के पीछे छूट गए सन्नाटों से स्वयं को प्रकट करता है, जिन्होंने उसकी चिंताओं और आकांक्षाओं को अपने भीतर जिया था। स्मारक और वर्षगाँठें अक्सर मनुष्यों को सरल प्रतीकों में बदल देती हैं, क्योंकि नारों के सामने जटिलताएँ दब जाती हैं। लेकिन स्मृति कभी इतनी आज्ञाकारी नहीं होती। वह अचानक लौट आती है- किसी पुराने फिल्मी दृश्य की उदासी में काँपती हुई, थकान में लिखे गए किसी धुँधले पड़ते अनुच्छेद में, किसी अधूरे वाक्य में, या किसी नेता अथवा कलाकार की उन थकी हुई लेकिन खोजती आँखों में, जिसने स्वयं से कहीं बड़े भारत की कल्पना का बोझ उठाया था।

    शायद यही कारण है कि मेरे मन में गुरु दत्त और नेहरू समय की सीमाओं को पार कर एक-दूसरे से संवाद करते प्रतीत होते हैं। एक ने प्रकाश और छायाओं के माध्यम से काम किया, दूसरे ने संस्थाओं और विचारों के माध्यम से। फिर भी दोनों के भीतर उस एकाकीपन का वास था, जो उन लोगों के हिस्से आता है, जो अपने समय की भाषा और कल्पना से आगे के सपने देखते हैं। गुरु दत्त का सिनेमा ऐसे घायल आदर्शवादियों से भरा हुआ था, जो एक विद्रूप और संवेदनहीन होते समाज के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाते थे। दूसरी ओर, नेहरू का गद्य और उनकी राजनीति धीरे-धीरे उस व्यक्ति की थकान से भरती गई, जो स्वतंत्रता के वादों को वास्तविकता की क्रूरताओं से टकराते हुए देख रहा था। एक ने हमें प्यासा और कागज़ के फूल दिए, तो दूसरे ने विश्व इतिहास की झलक और एक गणराज्य की संरचना।

    लेकिन इन अलग-अलग माध्यमों के नीचे एक साझा पीड़ा थी; मनुष्य की संभावनाओं में गहरा विश्वास रखने की पीड़ा, और साथ ही दुनिया को उन संभावनाओं से पीछे हटते देखने का दुःख। और इसलिए मुझे बहुत गहराई से महसूस होता है कि कहीं गुरु दत्त की धुँधलाती छायाओं और नेहरू के थके हुए गद्य के बीच ही भारत की कहानी छिपी हुई है: ऐसे भारत की, जो प्रतिभाशाली है, घायल है, आशान्वित है, लेकिन भीतर से असहनीय रूप से एकाकी भी।

    2 thoughts on “नेहरू, गुरु दत्त और संवेदनशील भारत का अवसान

    1. नेहरू जी का थका हुआ गद्य अलग से कुछ विस्तार की अपेक्षा रखता है.

    2. संवेदनशील व्यक्ति ही क्रांतिकारी होता है।
      नेहरू जी की संवेदनशीलता सिर्फ मुस्लिमो के प्रति थी।
      चाहे वह सुहरावर्दी हो या लियाकत

      गांधीजी के मुस्लिम तुष्टिकरण से देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान बनाने वाले नेता भारत में रह गये और नेहरू जी उन सब पाकिस्तानी समर्थकों के प्रति संवेदनशील रहे।
      आज किसी भी इस्लामिक देश में न तो पंथनिरपेक्षता है, न समाजवाद और न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था फिर भी नेहरू उसी नीति को चलाते रहे।
      नेहरू के बारे में प्रख्यात लेखक स्व धर्मवीर भारती जी कथन सही है कि नेहरू भारत की खोज करते रहे और डा लोहिया भारत से एकाकार रहे।

      संवेदनशील व्यक्ति अगर पद में है तो वह तो क्रांति करेगा लेकिन नेहरू जी समझौते करते रहे

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins
    WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Bookly Advanced Google Calendar (Add-on) Logo Showcase for Cornerstone SUMO WooCommerce Waitlist Khara – Ultimate Coming Soon & Maintenance Plugin Woocommerce SEO Toolkit Flutter Travel App with Admin Panel – Travel Hour Crypto Price Alerts | WordPress Plugin Create Add On For Elementor On-Scroll Video Effects for Elementor Woocommerce Plugin Customization