
आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस अवसर पर पढ़िए प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह लेख जो पर्यावरण को लेकर चिंताओं पर है- मॉडरेटर
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हम अपने सनातन, वेदों और परंपराओं पर गर्व करते नहीं अघाते आजकल। मगर क्या हम समझते भी हैं कि भारत अरण्यों का देश था और आज भी तमाम हानियों और विकास के बावजूद हमारे पास थोड़ी अरण्य संपदा बची है।
वेदों में पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की पूजा की जाती थी, जो पर्यावरण संतुलन का प्रतीक है। यजुर्वेद में श्लोक है: “मा ककम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिम्” — अर्थात् वृक्षों को अनावश्यक रूप से न हानि न पहुंचे। ऋग्वेद (1.90.6-7) में श्लोक है: “मधु वाताः ऋतायते…” -वायु मधुर हो, नदियां मधुर जल बहाएं, औषधियां मधुर हों। प्राचीन भारत की यह दृष्टि सतत विकास और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित थी। इन्हीं को अपनी थाती बना कर “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” की थीम के साथ भारत ने वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाया है। मगर, घरेलू स्तर पर कोयला आधारित ऊर्जा जरूरतों और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाते हुए कुछ विवादास्पद फैसले भी आए हैं, जिनमें अडानी समूह को वन क्षेत्रों में खनन की अनुमतियां शामिल हैं। भले वे इसे प्रमुख वैश्विक पहल मानें और कहें कि अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) सौर ऊर्जा को बढ़ावा है।
लेकिन सच तो यह है कि हमारे यहां पॉलीथिन जैसी टुच्ची चीज़ का उत्पादन बंद न हुआ। एक पेड़ मां के नाम जैसा नारा मज़ाक बन कर रह गया जब हर दिन लाखों पेड़ों के कटने के समाचारों की बाढ़ हो। कभी नासिक कुंभ के नाम, कभी सौर ऊर्जा के लिए, कोयले, रेल मार्ग की योजना गलत हो जाने पर दो दो बार पेड़ कट जाते हों।
इसके अलावा भी समकालीन सरकार के बड़े दावे और योजनाएं आईं–
COP26 में पंचामृत घोषणा — 500 GW नॉन-फॉसिल, 50% रिन्यूएबल, 2070 नेट-जीरो आदि। मगर इन योजनाओं का भविष्य अंधकारमय है।
Mission LiFE — पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली एक यूटोपिया है, हम भारतीयों से बड़ा उपभोक्ता और कार्बन उत्सर्जक कोई नहीं। क्योंकि हम ईंटों के अवैध भट्टों तक को तो हटवा नहीं पाते, हमारी पॉलिसीज़ ग्रीन इंडिया के लिए नहीं कार कंपनियों को ध्यान में रख बनती हैं।
Green Credit Initiative — स्थानीय पर्यावरणीय कार्यों को प्रोत्साहन, मुझे यह कभी दिखाई नहीं दिया बल्कि पर्यावरणविद और जागरुक संस्थाएं गालियां खाती हैं।
सरकार कहती है – भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा में तेज प्रगति की है (सौर, पवन) और Paris Agreement के तहत NDCs अपडेट किए।
मगर पर्यावरणविद् और विपक्ष, मोदी सरकार पर हसदेव अरण्य (Hasdeo Arand) जैसे घने वनों में कोयला खनन को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं। यह छत्तीसगढ़ का एक बड़ा सतत वन क्षेत्र (लगभग 1,70,000 हेक्टेयर) है, जो जैव विविधता, हाथी कॉरिडोर और आदिवासी समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है।
अडानी समूह राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (RRVUNL) के लिए Mine Developer and Operator (MDO) के रूप में PEKB (Parsa East Kanta Basan), पारसा और अन्य ब्लॉक्स में काम कर रहा है। हाल के वर्षों में (2022-2026) अतिरिक्त वन डायवर्सन (forest clearance) मिले, जिसमें हजारों हेक्टेयर में पेड़ कटने और आदिवासी विस्थापन की समस्या सामने आई।
हसदेव बचाओ आंदोलन कर्ताओं का कहना है कि पर्यावरण मंत्रालय ने “no-go” जोन वाले क्षेत्रों में क्लियरेंस दिए, ग्राम सभाओं की सहमति (FRA/PESA) पर सवाल उठे, और फायदे मुख्य रूप से अडानी जैसे निजी समूह को हुए। 2026 में हालिया FAC अनुमति (Kente Extension) से 4 लाख+ पेड़ प्रभावित होने की बात कही जा रही है।
हांलांकि इस खनन की शुरुआत UPA सरकार (2011, जयराम रमेश के समय) में हो गयी थी, जब FAC की सिफारिशों को दरकिनार कर क्लियरेंस दिए गए थे। मोदी सरकार के समय विस्तार और नए चरण मंजूर हुए।
सरकार का दावा है कि ऊर्जा सुरक्षा ( क्योंकि को यला अभी भी बिजली का बड़ा स्रोत) और रोजगार आपस में जुड़े हैं। भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग को देखते हुए पूर्ण नवीकरणीय संक्रमण चुनौतीपूर्ण है।
वे compensatory afforestation को बढ़ावा देने की बात कहें और
दबाव में कुछ ब्लॉक्स रद्द भी करें लेकिन केंद्रीय स्तर पर्यावरण को प्राथमिकता अब भी नहीं है।
यह नीति “विकास बनाम संरक्षण” की क्लासिक टेंशन दर्शाती है। एक तरफ सौर क्षमता बढ़ रही है, दूसरी तरफ कोयला खनन जारी। और दोनों क्षेत्रों में अडानी जी टॉप पर……अडानी कोयला खनन छोड़ कर सौर ही अपना लें, दोनों हाथों में लड्डू!
मोदी जी ने चाहा था कि उनकी वैश्विक जलवायु नेतृत्व की बने — ISA, LiFE, नेट-जीरो टारगेट। लेकिन घरेलू स्तर पर वन डायवर्सन, आदिवासी अधिकार और अडानी जैसे कारोबारियों को दी गई सुविधाओं पर यह छवि खराब हुई और अनेक सवाल बने हुए हैं। UN और वैश्विक मंचों पर भारत विकासशील देशों की तरफ से “क्लाइमेट फाइनेंस” की मांग करता रहा, जबकि अंदरूनी चुनौतियां (कोयला निर्भरता, वन हानि) बनी हुई हैं।
होना यह चाहिए था कि हमारी जलवायु संरक्षण नीति सकारात्मक वैश्विक पहलों के साथ-साथ पर्यावरण को प्राथमिकता देती। विकास और पूंजीवाद के दबाव में अब यह समझौतों का पर्याय हो गयी है। पर्यावरण प्रेमी इसे “हरित धोखा” कहते हैं, जबकि समर्थक “व्यावहारिक विकास”। सच्चाई बीच में है — भारत को ऊर्जा संक्रमण तेज करना होगा, लेकिन वनों और आदिवासियों की कीमत पर नहीं।
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (12.1.12) में श्लोक है: “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र।
हम भारतीयों और हमारी नीतियों ने इस अरण्य संपदा से समृद्ध भूमि को क्या से क्या कर दिया। नदियां मर चुकी हैं, पहाड़ कट रहे… संरक्षित वन जैसी कोई नीति नहीं बची… विश्व के सबसे गर्म शहर भारत के नाम हुए और हम आंखें मूंदे बैठे हैं।

