
वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ‘मानुष हौं तो’ कथाकार भगवानदास मोरवाल का तेरहवाँ उपन्यास है। वाणी प्रकाशन से पिछले ही वर्ष (2025) उनका बारहवाँ उपन्यास ‘दण्ड प्रहार’ प्रकाशित हुआ है। उनकी लेखकीय सक्रियता और सृजनात्मकता को ध्यान में रखते हुए, हाल में इलाहाबाद की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संचेतना’ द्वारा, प्रति वर्ष किसी रचनाकार को उसके समग्र साहित्यिक योगदान के लिए दिया जानेवाला वर्ष 2026 का ‘राजमणि देवी स्मृति साहित्य सम्मान’ 2026 उन्हें देने की घोषणा की गई है। ‘मानुष हौं तो’ उपन्यास कृष्णभक्त कवि रसखान के जीवन-सृजन पर आधारित है। रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था और वे कृष्णभक्ति की अपनी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। कहा जाता है कि मानस को सबसे पहले सुनने वाले सौभाग्यशालियों में मिथिला के रूपराण्य स्वामी द्वारा अयोध्या में, तत्पश्चात स्वामी नन्दलाल और दयालदास अर्थात दलालदास के साथ साथ सैयद इब्राहिम यानी रसखान ने भी सुना था। आइये इसका एक अंश पढ़ते हैं। इस अंक में मानस सुनने का प्रसंग है और यह भी कि किस तरह तुलसीदास के रामचरितमानस का प्रभाव रसखान की कविताओं पर भी पड़ा। उसी रसखान पर जिनके बारे में कभी भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने लिखा था- ‘इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए।‘ अब पढ़ते हैं उपन्यास का रोचक अंश- मॉडरेटर
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चैतन्य महाप्रभु जब-जब मिथिला कवि विद्यापति की रचनाओं को गाते, तब वे इतने आनन्द विभोर हो जाते, कि अपनी सुध-बुध खो बैठते। इसलिए एक ओर जहाँ वृन्दावन में बंग और मिथिला गीत-संगीत की धारा प्रवाहित होने लगी, तो दूसरी ओर ध्रुपद की गम्भीर व ख़याल की चपल शैली का चलन भी शुरू हो गया। जबकि अष्टछाप सखाओं में सूरदास जी व परमानन्ददास जी जैसे कवि और गायक, नन्ददास जी जैसे उत्कृष्ट कवि, तथा गोविन्दस्वामी जी जैसे संगीत के आचार्यों की रचनाओं में काव्य और संगीत का अद्भुत सौन्दर्य दिखाई देता। एक तरह से वृन्दावन, गोकुल और गोवर्धन ब्रज में संगीत के बड़े केन्द्र बन गयेl इसका एक कारण स्वयं मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा इन्हें संरक्षण देना भी रहा है।
गुसाँई विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ग्रहण करने के बाद, रसखान ने गोकुल में रमणरेती के किनारे कुटिया बनायी और स्थायी रूप से वहीं रहने लगा। यहाँ से आठों सखाओं के निवास भी अधिक दूर नहीं हैंl बल्कि यहाँ से वृन्दावन और गोवर्धन की तो दूरी भी समान है।
इस तरह दीक्षा लेने के बाद कवि रसखान कृष्णभक्ति में लीन होकर कृष्ण-चरित्र का कवित्त-सवैयों में गान करने लगा। गुसाँई विट्ठलनाथ जी का शिष्य होने के नाते कृष्ण की गोचारण, वेणुवादन, दधिदान, रास आदि विविध लीलाओं का जिस रूप में वह दर्शन करता, उसी रूप में उन्हें अंकित करता चलता। सैयद इब्राहिम यानी रसखान पूरी तरह ब्रज के ज़र्रे-ज़र्रे से परिचित हो गयाl ऐसा कोई तीज-त्यौहार अथवा उत्सव नहीं होता, जिसे वह जी भरकर नहीं जीता और उसका आनन्द नहीं लेता। इसीलिए जब भी वह किसी करील के कुञ्ज के नीचे सुसताता, तो उसकी अदखुली आँखों में ब्रज और उसके पालक कृष्ण की लीलाएँ जीवित हो उठतीं।
रसखान अक्सर रमणरेती पर दूर तक फ़ैली रेत, और उसमें मिश्रित अभ्रक के चमकते कणों को निहारता, तो उसे उनमें कृष्ण की छवियाँ ही दिखायी देती। वह कई बार बच्चों की तरह यमुना के तट पर बिखरी रेत पर खेलते हुए कृष्ण के बाल्यकाल में लौट जाता।
रसखान का यश दीक्षा ग्रहण करने के दौरान ही इस तरह फ़ैल गयी, कि वल्लभ सम्प्रदाय के भक्तों और सेवकों को उसमें अष्ट सखाओं की छवि दिखाई देने लगी।
एक दिन उसने गुसाँईजी के एक सेवक के साथ किसी अपरिचित को अपनी कुटिया की ओर आता हुआ देखाl जब वे दोनों उसके एकदम पास आ गये, तो गुसाँईजी के सेवक ने उसकी तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “जेई हैं रसखान जी।”
रसखान को अपने सामने देख अपरिचित रसखान के पैरों में गिर गया, और अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, “जय श्रीकृष्ण…जय वल्लभ।”
रसखान ने उसका अभिवादन स्वीकारते हुए कहा, “आइए!” इतना कह रसखान ने कुटिया के बाहर उस अपरिचित के लिये आसन बिछा दिया।
“प्रभु, मेरौ नाम दयालदास है और सण्डीला ते आयो हूँ।”
सण्डीला का नाम सुन एक पल के लिये पहले रसखान अतीत की किसी गहरी खाई में उतर गया। फिर उसमें से धीरे-से वर्तमान में लौटते हुए बोला, “सण्डीला! वोई जो हरदोई के कनै है?”
“आपने सही पहचानौ है…हरदोई वारौ सण्डीला हैl वाई सण्डीला के स्वामी नन्दलाल जी कौ सिस्य हूँ…वैसे मोहे दलालदास भी कहके बुलावै हैं।” अपने कन्धे से एक छोटी-सी गठरी को उतार, उसे नीचे रखते हुए अपरिचित ने अपना बेहद संक्षिप्त परिचय दिया।
“हुकम करौ महाराज, मेरे लायक कहा सेबा है?” रसखान ने किसी तरह की औपचारिकता का निर्वाह न करते हुए सीधे ही पूछ लिया।
“मोहे आपके कनै हमारे गुरु स्वामी नन्दलालजी ने भेजो है। आपने गोस्वामी तुलसीदासजी कौ नाम तौ सुनौ ही होएगौ?”
“हाँ सुनौ है, पर कभई मिलने को सौभाग्य ना मिलो…और जे भी सुनौ है कि बे कभई अजोध्या, कभई कासी और कभई चित्रकूट में रहबै हैंl मोहे बाबा सूरदासजी ने एक बेर बतायी ही कि आजकल मानसी गंगा में रहबै वारे आठ सखान में ते एक भोज सखा…मेरौ मतलब है, नन्ददासजी गोस्वामी तुलसीदासजी के चचेरे भइया हैं?”
“बाबा ने सही बतायौ है। नन्ददासजी गोस्वामीजी के चचेरे भइया ही हैं।” दयालदास ने मुस्कराते हुए रसखान के कहे की पुष्टि कर दी।
रसखान के कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि दयालदास क्यों उसके पास आया है?
“ऐसो है प्रभु, गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस नाम ते अपनौ एक ग्रन्थ पूरो करौ है।”
“जे तौ बड़ी खुसी की बात है भिया।”
“वाही ग्रन्थ की नकल ए लेके आपके कनै आयो हूँ।” इतना कह दयालदास ने अपनी गठरी खोली, और लाल कपड़े में बँधी प्रतिलिपि को खोल, उसे रसखान के सामने रख दिया।
रसखान ने रामचरितमानस की प्रतिलिपि को पहले अपने मस्तक से छुआया, और फिर बड़ी सावधानी के साथ उसके पृष्ठों को खोलकर देखने लगा।कुछ क्षणों के बाद रसखान ने पूछा, “तो भिया, अब जे बताओ आप मेरे कनै या मानस ए कैसे लेके आये हो?”
“ऐसो है कि हमारे गुरु स्वामी नन्दलालजी ने कही है कि एक बेर या मानस ए आप सुन लेएँ, तो आपकी बड़ी कृपा होएगी।”
“दयालदास जी, याहे आप अपने गुरुजी या फिर गोस्वामी तुलसीदासजी के चचेरे भइया भोज सखा, मेरौ मतलब है नन्ददासजी ए जाकै सुनाओ!” रसखान ने विनम्रता के साथ कहा।
“मैं आपते पहले नन्ददासजी के कनै भी गयौ हो, पर वे बोले कि रसखान ते बड़ौ सुपात्र कोई ना है।”
रसखान ने इसके बाद पहले एक लम्बी साँस ली, और उसे बाहर छोड़ने के बाद बोला,“ठीक है भिया, जब गोस्वामीजी की मानस मेरी कुटिया तलक चलकै आ ही गयी है, तौ मेरे ताईं यातै बड़े भाग की बात और कहा होएगी।” इसके बाद रसखान एक बार फिर किसी सोच में डूब गया। फिर कुछ पल बाद बड़े संकोच के साथ बोला, “पर दयालदास जी, या मानस ए सुनने में तौ घनैई दिन लग जाएँगे?”
“प्रभु, याकी चिन्ता ना है। जे देखो, मैं तौ गोकुल में रहबै की पूरी ब्यबस्था करके आयो हूँl मेरे गुरुजी को आदेस है कि जब तलक रसखान जी, मानस ए पूरौ ना सुन लें; तब तलक तू गोकुल में ही रहियौl” दयालदास ने अपने गुरु का आदेश सुनाते हुए कहा।
“एक बात बताओ दयालदास जी, मोते पहले जे मानस काई और ने भी सुनी है?”
“हाँ सुनी है। एक तो मिथिलाबासी रूपारण्य स्वामी जी हैं, जाने ई अजुध्या में जाकै सुनी ही। दूसरे मेरे गुरु स्वामी नन्दलाल जी हैंl अपने गुरु को मैंने ई जभई सुनाई ही, मैं जब गोस्वामी जी के कनै ते कासी जाके याकी नकल उतारके लायो हो।”
“याको मतलब ई भयो कि मैं तीसरौ आदमी हूँ, जाहे मानस सुनबै को सौभाग्य मिलेगौ!”
“चौथौ मैं भी तो हूँ प्रभु!” दयालदास ने मुस्कराते हुए कहा।
“ले, असली आदमी ए तौ भूल ही गयौ !” रसखान हँसते हुए बोला।
इसके बाद रसखान ने कुछ नहीं कहा और अपनी कुटिया में ही स्वामी नन्दलाल जी के शिष्य दयालदास के रहने की व्यवस्था कर दी।
इसके बाद रसखान कभी यमुना के पूर्वी तट पर दूर तक फैले महावन में बसे गोकुल के निकट रमणरेती के किनारे बने ब्रह्माण्ड घाट की सीढ़ियों पर, तो कभी अपनी कुटिया में दयालदास के श्रीमुख से रामचरितमानस सुनता। इस बीच पता ही नहीं चला कि दिन कब महीनों में, और महीने कब सालों में बदलने लगे। इसी दौरान जब कभी रसखान को अष्ट सखाओं में से किसी से मिलने जाना होता, तो वह अपने साथ दयालदास को भी ले जाताl इस तरह दयालदास का भी आठों सखाओं के निवास यमुना वती, परसौली, सुरभि कुण्ड, बिछुआ कुण्ड, कदम्ब खण्डीs, पूछड़ी और मानसी गंगा का भ्रमण हो जाता।
जब-जब दयालदास चौपाई, दोहा, सोरठा, श्लोक, हरिगीतिका और त्रिभङ्गी जैसे छन्दों में पगे रामचरितमानस को सुनाता, रसखान भाव-विभोर हो उन्हें सुनता। सुनते हुए कई बार उसकी आँखें भर आतींl विशेषकर तब जब वह श्रीरामचन्द्र के बचपन से जुड़े प्रसंगों को सुनताl तब लगता मानो श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ उसके सामने सजीव हो जातीं।
दयालदास ने एक दिन रसखान को मानस का यह पद सुनाया-
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। सम्भ्रम चलि आयीं सब रानी॥
हरषित जहँ तहँ धायीं दासी। आनन्द मगन सकल पुरबासी॥
सुनते हुए रसखान हतप्रभ कि यही स्थिति कृष्ण के जन्म के बाद थी। रसखान उन्हीं दिनों रचे गये अपने इस सवैये को सुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया, और दयालदास से बोला, “दयालदासजी, कछु ऐसौ ही बर्नन मैंने नन्द लला के पैदा होने पै रचौ हैl तनिक ध्यान ते सुनियो-
लाल की आज छठी ब्रज लोग अनन्दित नन्द बड्यौ अन्हबावत,
चाइन चारु बधाइन लै चहुँ ओर कुटुम्ब अघात न गावत।
नाचत बाल बड़े रसखान छके हित काहु के लाज न आवत,
तैसोइ मात पिताउ लह्यौ उलह्यो कुलही कुलही पहिरावत।।
दयालदास जब-जब मानस को सुनाता, बीच-बीच में रसखान भी अपने आपको सुनाने से नहीं रोक पाता। एक दिन दयालदास ने जब यह पद सुनाया कि-
धूसर धूरि भरें तनु आए । भूपति बिहसि गोद बैठाए॥
रसखान ने अपना यह सवैया सुना दिया-
धूरि भरे अति सोभित श्यामजू तैसी बनी सर सुन्दर चोटी,
खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी।
वा छवि को रसखान बिलोकत वारत काम कला निधि कोटी,
काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी॥
इधर दयालदास ने यह पद सुनाया-
सुन्दर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥
उधर रसखान ने तुरन्त अपना यह सवैया सुना दिया-
श्रीमुख यौं न बखान सके वृषभानु-सुता जू कौ रूप उजारौ,
हे रसखान तू ज्ञान सँभारत नैन निहार जु रीझनहारौ।
चारु सिन्दूर को लाल रसाल, लसै ब्रजबाल कौ भाल टीकारौ,
गोद में मानौ विराजत है घनश्याम के सारे कौ सारे कौ सारौ ॥
लेकिन मानस की इस चौपाई के बाद कि-
सुन्दर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥
बदले में रसखान ने जब अपना यह सवैया सुनाया, तो सुनकर दयालदास तो दयालदास पूरा महावन, उसके पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और यमुना इस दृश्य को देख जैसे निहाल हो उठे, कि-
आजु गई हुती भोरही हौं रसखानि रई कहि नन्द के भौंनहिं,
बाको जियौ जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यौ नहिं।
तेल लगाइ लगाइ कै अंजन भौंह बनाइ बनाइ डिठौनहिं,
डालि हमेलनि हार निहारत बारत ज्यौं चुचकारत छौंनहिं॥
दयालदास की आँखें मुँधती चली गयीं। रसखान ने अपने इस सवैये में जो दृश्य निर्मित किया, उसे सुनते हुए लगा मानो वह ग्वालिन के बजाय स्वयं जसोदा द्वारा कृष्ण को सँवारते हुए देख रहा है। कुछ पलों के लिये उसकी कल्पना में जैसे अयोध्या की सरयू नदी और गोकुल की यमुना का जल आपस में मिल गये हैंl आमने-सामने बैठीं कौशल्या और जसोदा अपने-अपने लाल राम और कृष्ण को अपलक निहार रही हैं।
इसी बीच एक दिन नन्ददास जी से यह दु:खद समाचार मिला, कि महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के शिष्य, और अष्टछाप के चौथे सखा कृष्णदास जी की एक आकस्मिक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी है। हुआ यह कि उस दिन वे पूछड़ी के निकट अपने एक निर्माणाधीन कुएँ को देखने गये। कुएँ के किनारे अपनी छड़ी के सहारे खड़े वे उसके भीतर झाँक रहे थे, कि तभी उनकी छड़ी फ़िसली और असन्तुलन के चलते वे उसमें गिर गये। जब तक उनको बाहर निकाला जाता, उनके प्राण जा चुके थेl इस समाचार को सुनते ही नन्ददास, रसखान और दयालदास तीनों बिछुआ कुण्ड गये।
इस तरह लगभग तीन वर्षों तक दयालदास द्वारा सुनाए गये रामचरितमानस के चौपाई, दोहा, सोरठा, श्लोक, हरिगीतिका और रसखान के सवैयों, दोहा, सोरठा, कवित्त के बीच जैसे प्रतियोगिता चलती रही। अर्थात गोकुल स्थित यमुना का जल तीन सालों तक इस बात का गवाह रहा, कि उसकी उपस्थिति में रसखान ने दयालदास के श्रीमुख से गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस को रसखान ने सुना है। मानस को सबसे पहले सुनने वाले सौभाग्यशालियों में मिथिला के रूपराण्य स्वामी द्वारा अयोध्या में, तत्पश्चात स्वामी नन्दलाल और दयालदास अर्थात दलालदास के बाद अब सैयद इब्राहिम यानी रसखान का नाम भी शामिल हो गया।
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