
युवा लेखिका प्रियंका नारायण नदियों पर, ऐतिहासिक स्थलों पर बहुत डूबकर लिखती हैं। उनका यह लेख माहेश्वर और नर्मदा पर है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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और आज नर्मदा सामने थी, जिसके लिए मैं चाहे-अनचाहे दो साल से इंतज़ार कर रही थी। कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसा भी होता है कि कोई चीज़ आपके पास होती है, बिलकुल पास… आप उसे छूते हैं, महसूस करते हैं, जीते हैं लेकिन आप जानते हुए भी जान नहीं पाते हैं कि आप इसी के लिए इतने बेचैन हैं। कह सकते हैं कि सेल मेम्ब्रेन का रिसेप्टर उन्हें ग्रहण तो कर रहा होता है लेकिन दिमाग विश्लेषण न करके ऐसे ही लौटा देता है।
ऐसा ही एक वाकया था, जब दो वर्ष निकलने के बाद सामने पड़ी थी नर्मदा… आँखें खुशी से नम होती जा रही थी। गला भर्रा रहा था, मन खुशी में डूब जा रहा था। मैं मौन खड़ी बस देखे जा रही थी। अजीब संयोग था कि लौटने के बाद पता लगा कि मैं दो साल पहले कहीं और किसी और रूप में मिल चुकी थी, बस पहचान नहीं पाई थी।
अमरकंटक के जिस कपिलधारा और दुग्धधारा के नीचे मैं खड़ी थी, वो नर्मदा के ही प्रपात हैं। यह मैंने तब जाना भी था लेकिन शायद अप्रैल के अंतिम महीने में कुंड को छोड़ दें तो उद्गम पर सूखी और लुप्त हो चुकी नर्मदा ने मेरे अंदर बेचैनी भर दी थी। प्रपात भी सूखे थें। ऐसे में नदी का कोई चित्र मेरे मस्तिष्क में अंकित नहीं हो पाया था। अमरकंटक भले ही अपनी हरियाली और एकांत के कारण मेरे अंदर अटक गया हो लेकिन नर्मदा बेरुखी ही रही। दूसरी बार मैं फ़रवरी में नर्मदा महोत्सव के ठीक एक दिन पहले अमरकंटक पहुंची थी। उस समय कुंड और दोनों प्रपात (कपिल धारा, दुग्ध धारा) नर्मदा जल से परिचय करा चुके थें लेकिन अभी भी मेरे मानस में नर्मदा को दो पाटों के बीच देखने की कशमकश भरी चाह बनी हुई थी। शायद मैं उसे नदी के आकार-प्रकार में देखना चाह रही थी लेकिन उद्गम के पाट थे कि सूखे हुए। मेरा मन ही सूख गया था उस समय। रुआंसी, उदास, निराश और कहीं कोने में गहरी खीझ। छतरू भैया (छत्रपाल रघुवंशी, स्थानीय घूमा रहे जनजाति समूह से) ने कहा था कि गर्मी है इसलिए नर्मदा सूखी हुई है लेकिन अभी तो जाड़ा था अमरकंटक में फिर भी… शाम को एक दीपक की आरती हो रही थी और मैं रेलिंग पर लटकी हुई मन मसोस कर देख रही थी- सूखी नर्मदा के आगे शंख-घड़ियाल, करताल बजते।
असल में प्यार केवल इंसान से हो, ज़रूरी तो नहीं, कुदरत और इसकी प्यारी दुनिया से भी हो सकता है या यही मजबूरी हो। लोग प्रेम की बात करते हैं, कई बार हँसते हुए और कई बार क्रोध में टाल जाती हूँ। सोचती हूँ कि ये दुनिया कम बड़ी त्रासदी है जो एक और त्रासदी को न्योता दिया जाए। असल में हम सब बहुत गहरे में ‘शाश्वत’ को तलाश रहे हैं। पूर्णता हमारी चाह है… और लगता है देखो न! यह भी सच नहीं है, यह भी नहीं, यह भी नहीं, यह भी हमारी आकांक्षाओं की तरह सुंदर नहीं है, अरे! यह कल तो बहुत सुंदर था, आज ऐसा क्यों हो गया… यही तो क्षणिकता का मोह है और ज़िंदगी बस निकली जाती है, उसी प्राचीन ऋषि के शाश्वत मंत्रोच्चार की तरह – नेति-नेति- यह भी नहीं, यह भी नहीं।
खूबसूरत जानलेवा त्रासदी यह नहीं तो कोई और भी आएगी भला… एक ठंढी उच्छवास।
हाँ! तो मांडू से निकलने के बाद हमें ओंकारेश्वर के लिए निकलना था लेकिन वही गाड़ी वाले भैया ने महेश्वर ले जाने का प्रस्ताव रखा था। उन्हें तो हम पहले ही मना कर चुके थे लेकिन अब यहाँ से और लोगों का काम भी समाप्त हो रहा था। अब या तो मैं आगे अकेले जाऊँ या किसी को बोलूं कि तुम साथ चलो। अकेले निकल भी जाती (तकनीक से परिचय हो तो बड़ी बात न थी) लेकिन मांडू में ड्राइवर के साथ जो बक-झक हो गई थी, वो मेरे बहुत कड़े रुख के बाद भी मेरे अंतस में बैठा हुआ था। एक तो इंदौर से दूरी बढ़ती जा रही थी, बसावट विरल होते जा रहे थे, दूसरी मजबूरी यह कि प्राइवेट गाड़ी क्षेत्र की शुरुआती समझ विकसित करने के लिए किसी भी तरह ठीक नहीं था और सबसे बड़ा कारण था कि अपनी गाड़ी न हो तो भारत के दूर-दराज़, रिमोट क्षेत्र में किसी लड़की का अकेले सफर करना कही से ठीक नहीं है।
मैंने ग्रुप से बात की और किसी एक को साथ चलने के लिए कहा। सप्ताह भर और लगना था, खर्च उठाना मैंने स्वीकार कर लिया, लेकिन सबकी अपनी जरूरतें थीं। लगा कि क्या करूँ फिर याद आया कि साकेत और उनका ग्रुप भी मध्य प्रदेश में ही पैदल यात्रा पर है। फिर क्या था, फोन घुमाया, आने को कहा। मुझे पता था कि न नहीं कहेंगे, कुछ तो नजदीकियों के कारण और कुछ उन्हें खुद भी मुफ़्त में घूमने का शौक है, बस घूमाने वाला हो। सुबह और सारे लोग इंदौर की ओर निकल गए और मैं मांडू में ही इंतज़ार करने लगी। दोपहर ढलते-ढलते वो आ भी गए। शाम तक हमलोग साथ घूमते रहे फिर अगली सुबह महेश्वर की ओर।
महेश्वर के लिए हमें मांडू के चौराहे से ही बस मिल गई। हालांकि बस ने लगभग 14 किमी बाद स्टेट हाईवे पर हमें उतार दिया। अब यहाँ से अगली बस महेश्वर लेकर जाने वाली थी।
… मालवा का सौंदर्य अब काली मिट्टी वाले खेतों में लहक रहा था। महेश्वर हमें जाना नहीं था लेकिन अब सूची में था। असल में मैंने या तो रूट ठीक से चेक नहीं किया था या ज्यादा दूरी के कारण निपटा देने वाला भाव था लेकिन अब हम बस में थे। हमें अगली सीट दी गई थी, ड्राइवर के पास की। ड्राइवर का केबिन रंगीन गुलाबी झालरों, गुड़िया से सजा हुआ था। तेजी से रेंगते हुए एनाकोंडा के घुमावदार, गांठ गूँथे विशालकाय शरीर की भांति ही सड़कें लगातार तेजी से घूम रही थीं। यात्रियों के साथ-साथ झालर भी उतनी ही तेजी से घूमता। राजस्थान के रास्ते में मैंने यह ट्रक के पीछे भी देखा था। लोकल बसों, ट्रकों में यह हमेशा देखने को मिलता है लेकिन जगह के अनुसार झालर(सजावटी सामान) बनाने की कला में भी भिन्नताएं होती हैं।
रास्ते से हमने होटल की बुकिंग शुरू कर दी थी। पता चला बुकिंग महल के अंदर ही मिल गई थी। लेकिन दिलचस्प ये रहा कि बिना जांच-पड़ताल के जब हम उस शहर के बस स्टैंड पर उतरे तो समझ में न आए कि यहाँ से जाए कैसे? इन बेहद छोटे-छोटे कस्बाई शहरों में कैब की सुविधा नहीं होती है। कोई ऑटो या रिक्शा भी नहीं था। जिस होटल की बुकिंग थी, वह दो- ढाई कि.मी. की दूरी पर था। ऊपर से तीन महीने से बाहर थी तो लगेज़ भी उसी हिसाब से था और साथ में माप के कई उपकरण भी। अंत में हमने पैदल चलना शुरू किया। यूं तो रोज पंद्रह से बीस कि.मी. पैदल चलना बड़ी बात नहीं थी, लेकिन तब सामान हमारे साथ नहीं होता था। जैसे-तैसे ट्रॉली घसीटते, सामान लादते, ढालनुमा चढ़ाई चढ़ते हम वहाँ पहुँच गए… सड़कें इतनी टूटी हुई थीं कि ट्रॉली का चक्का बार-बार घूम जाए और समान भरभराकर गिर पड़ते। लगातार सफर, थकान, चिड़चिड़ाहट, मुंह बनाकर सब ठीक करती और आगे घिसटती हुई चल पड़ती। उस दिन सुबह से अन्न एक दाना भी पेट में नहीं गया था और अब दोपहर हो आया था।
खैर! होटल पहुंचकर सबसे पहले चाय के लिए ऑर्डर किया और कमरे में चली गई। खिड़की खोला और सन्न- उल्टे पाँव भागती हुई काउन्टर पर पहुंची और पूछने लगी – सामने जो नदी दिख रही है, वो नर्मदा है न? उस समय एक अजीब पागलपन से भर गई थी। लग रहा था, बस कोई और न हो। मुझे न इंटरनेट पर विश्वास हो रहा था और न मैप पर। मुझे पता था कि सारे काम के बाद भी मैं सिर्फ और सिर्फ नर्मदा को देखने के लिए निकली थी और इसी के लिए अकेले ओंकारेश्वर जा रही थी लेकिन यहाँ और अचानक… काउन्टर से जवाब मिला– हाँ, नर्मदा ही है और लगा वक्त थम-सा गया हो। मैं वापस अपने कमरे में तेजी से भाग गई और खिड़की के सामने धम्म से बैठ गई। मन भीग गया। नर्मदा से कहा- मैंने सिर्फ़ आपके लिए अपना सारा काम छोड़ रखा है। न मैं नौकरी के लिए मन को तैयार कर पा रही हूँ और न किसी रिसर्च का काम पूरे मन से कर पा रही हूँ। मुझे तो अमरकंटक पसंद था लेकिन आप कब मेरे मन में बसती चली गईं, मुझे पता ही न चला। बचपन में नदी में, नाव पर घूमना सपना होता था, पहली बार पापा के साथ पहली जनवरी की पिकनिक में घूमा था। बहुत खुश हुई थी तब…बनारस में तो गंगा से रोज का मिलना-जुलना रहा लेकिन लगाव जैसी स्थिति कभी बनी ही नहीं। छोटी-बड़ी दूसरी नदियों को जाने दूँ तो बीच बेतवा में खड़ी होकर चाँद देख चुकी थी
लेकिन नर्मदा…एक ही साथ सिंदूरी, एक ही साथ गुलाबी और एक ही साथ रहस्यमयी बैंगनी-हरी…कभी धुंध के आगोश में तो कभी मयूख मरीचि के आलिंगन में।
चाय पीते सारी थकान हवा हो गई। लगा ही नहीं कि मैं इतनी उठापठक और महीनों के थकान के बाद यहाँ हूँ और थोड़ी देर पहले रोने-रोने हो रही थी। हाथ-पैर धोया, साकेत को आवाज दी और चम्पत। होटल के दूसरे दरवाजे से बस ‘दुआर’ पार करने वाली स्थिति थी। वहाँ से गुजरते हुए काशी विश्वनाथ मंदिर का बोर्ड लगा हुआ था। मैं चौंक गई लेकिन नर्मदा को देखने की इतनी बेचैनी थी कि मैं वहाँ जाना नहीं चाहती थी, साकेत के कहने पर गई। अंदर जाकर पता चला यह मंदिर गोल चबूतरानुमा मंडप की तरह का है और मंडप से गर्भगृह लगा हुआ है। इसकी छत सफेद थी। गुंबद और बाहरी रंग रहस्यमयी नीलिमा का आभास देता हुआ ग्रे और ब्लू के बीच का रंग था। अभी पुताई चल ही रही थी। खम्बे सुनहले थे और फर्श संगमरमरी। मजे की बात यह थी कि मंदिर और नर्मदा तट दोनों एक हो चले थे। सीढी से उतरो और नर्मदा… नवम्बर का महीना, दोपहर की मखमली धूप…मंडप में खड़े होने पर एकबारगी लगा कि प्राचीनकालीन दिव्य और शांत वातावरण आपके अंदर उतरता जा रहा हो। हल्की ठंढी और गुनगुनी हवाएं आपके कानों में कुछ फुसफुसा रही हों- कहाँ देख रही हो, इधर देखो न… पलकें गिरना नहीं चाहती थीं और पुतलियाँ जहाँ तक देख सकती थीं- केवल और केवल नर्मदा… दो पाटों के बीच नर्मदा, उत्तर नर्मदा, दक्षिण नर्मदा, सोने की तरह चमकती नर्मदा…बहती नर्मदा। भरी दोपहरी सुंदरता ऐसी कि मानों एक-एक अंग सोने के तारों से बुना हो…स्याह लेकिन धूप से चांदी रंग हुईं मछलियाँ जब डुबुक- डुबुक करतीं तो नर्मदा हल्की कोहनी मारती हुई उछल पड़ती। उस पल सातों रंग झिलमिला उठते, लगता किसी सुनहली नायिका की गोरी कलाइयों के पन्ना-माणिक झलमला उठे हों। इतना रूप…छूने की ललक जग उठी।
अभी यह सब चल ही रहा था कि साकेत शताब्दी की रफ़्तार के साथ- चलिए, चलिए, हो गया, हो गया???… अरे यार! तुम साहित्य में हो? हाँ… ऐसे दौड़ने से लिखोगे?…लेकिन उसे कुछ नहीं सुनना था…लिखता वो शानदार है लेकिन बैठना उसे आता नहीं। वह तेजी से भाग गया और मैं हँसती हुई कल्पनालोक से धीमे-धीमे निकलती हुई घाट की सीढ़ियाँ उतरने लगी।
तट पर पहुंचकर मैंने कैमरा साकेत को थमाते हुए कहा- अब जहाँ जाना है जाओ, जिससे फोटो खिंचवानी है खिंचवाओ, जहाँ घूमना है घूमो, मुझे शांति से रहने दो। तट से लगा हुआ ही अहिल्याबाई होल्कर का किला था। वह तरह-तरह के पोज़ देकर फोटो खिंचवाने में व्यस्त हो गया और मैं नर्मदा को महसूसने में।
नर्मदा तट
नर्मदा यहाँ लबालब भरी-भरी-सी है और भरी हैं उसमें लबालब मछलियाँ। नर्मदा में स्थिर होकर खड़े रहेंगे तो सब आपके चारों तरफ गोल-गोल चक्कर लगातीं हैं। उनके मांसल थूथन जब आपके पैरों से टकरा जाएंगी, मछलियाँ घबराकर भाग जाती हैं।
नर्मदा जिन-जिन राज्यों से गुजरती हैं, उन राज्यों में नर्मदा परिक्रमा का विशेष महत्व है। माँ मानकर उनकी पूजा होती है। वैसे तो यह कमोबेश सभी नदियों के साथ है लेकिन नर्मदा विश्व की इकलौती नदी है, जिनका संकल्प और विधि-विधान के साथ ‘परिक्रमा’ की जाती है। साहित्यकारों में अमृतलाल बेगड़ ने पूरी की थी यह परिक्रमा कर पाएं तभी तो नर्मदा ने उन्हें अपना अधिकार भी सौंप दिया, स्वयं पर लेखन का। इन क्षेत्रों के स्थानीय लोगों से बातचीत में भी अश्रुपूरित श्रद्धा झलकती है इसलिए पहले तो उन्हें पूरी श्रद्धा से प्रणाम किया, अंजलि प्रदान की और तब माफी के साथ नर्मदा में पैर डालकर बैठ गई।
मेरे अंदर न किला देखने की चाह थी, न कहीं जाने की, बस बैठी देखती रही। क्या देख रही थी, वो भी नहीं पता, क्या सोच रही थी, वो भी नहीं याद… बस मौन को मौन से राह थी, दिल को दिल से, शून्य को शून्य से… हमारा स्पंदन एक चुका था।
देर रात तक तट के आस-पास घूमती रही। जीवन में कला और सौंदर्य की मैंने पूजा की थी लेकिन इतना सौंदर्य!!! मैंने कभी देखा न था। घड़ी-घड़ी बदलता रूप सौंदर्य की नई परिभाषा गढ रहा था। उस समय आश्चर्य में डूब गई जब ढलती शाम में अहिल्याबाई होल्कर के किले की सीढ़ियों से नर्मदा को निहार रही थी। सौंदर्य जैसे स्वयं मूर्तिमान हो उठा हो…आश्चर्य से आँखें चौड़ी होती चली गईं, जब एक ही समय में नदी सिंदूरी, गुलाबी, हरापन, नीलिमा और स्याह रंग की दिख रही रही थी। लगा कि जैसे किसी रूपवती ने एक के बाद एक ऊपर से नीचे होते हुए अलग-अलग रंगों से बुना झालरनुमा लहंगा पहन रखा हो। धीमे-धीमे ये रंग गाढे होते-होते स्याह में डूबते चले गए और सब एकरूप हो गया।
मेरा ध्यान सीढ़ियों से नीचे की ओर गया। छोटे से कस्बाई मेले-सा दृश्य सजा पड़ा था। बनारस के घाटों पर यह दृश्य रोज का था लेकिन बनारस का विस्तार और वैभव यहाँ न था। यह किसी एकांतिक वैरागी का सुर था- बित्ते भर का मेला। पुपही, सीटियाँ, फुलौने(बैलून), प्लास्टिक की गुड़िया, खिलौनों, गुड़…(खाना, स्नैक्स) सजे थे। उतरकर मैं तट पर टहलने लगी।
महेश्वर का लोक रंग मेरे सामने था। कहीं कोई बेसन के नमकीन भूने चने खाने मे लगा था तो कोई घाट पर लोट रहा था। छोटे-छोटे मंदिरों के समीप कुछ लोग लगकर सोए हुए थे तो कुछ यूं ही शाम की हवा खा रहे थे। कुछ नर्मदा के आगे शीश झुकाने में लगे थे। मैं फिर से नदी के समीप चली गई। देखा- मछलियाँ अभी भी गोल-गोल झुण्ड के झुण्ड अपने में मगन चक्कर लगा रही थीं। हल्की मुस्कुराहट के साथ मुझे छेड़खानी सूझ गई। मैंने जानबूझकर नर्मदा में पैर डाल दिया। कुछ तो उन्हें छूने की चाह थी, कुछ ठिठोली…सब यूं हड़बड़ाकर भाग गईं जैसे यौवन के रहस्यों से अनभिज्ञ अनछुई, शर्मीली, नवेलियों के नृत्य में सहसा कोई युवक प्रवेश कर उनके लाज का बांध तोड़ने पर तूल जाए।
टहलते हुए मुझे अचानक से नर्मदा परिक्रमा वाले लोग दिख पड़े। दिखने को तो मांडू में भी दिखे थे लेकिन तब वो लोग बस से थे और हम पैदल या गाड़ी से। आमना-सामना की कोई स्थिति बनी नहीं। रेवा-कुंड पर कुछ पलों के लिए जल चढ़ाते देखा था। यहाँ आठ-दस की संख्या थी, जो इस समय माँ नर्मदा की भजन-आरती (संध्या-पूजन) में लीन थे। मुझे पता था कि ये अमरकंटक से आ रहे हैं। मैं लगभग दौड़ती हुई पास गई। उन्हें देखकर न जाने क्यों बच्चों की किलक मेरे अंदर उमड़ आई और इस किलक को बांटने के लिए जितनी तेजी से मैं वहाँ गई थी, अब उतनी ही तेजी से साकेत को खोजने लगी थी। कस्बाई क्षेत्र होने के कारण दोपहर शाम में और शाम बहुत जल्द रात की ओर बढ चली थी। वो कहा गुम था, मुझे इसका कोई अंदाजा नहीं था। लेकिन कुछ ही आगे बढ़ने पर, वह लौटता दिखा। मैंने इशारे से उसे बुलाया और जल्दी-जल्दी परकम्मावासियों की तरफ़ चल पड़ी।
लोकगीत आस्था के निश्छल स्वर में डूब नर्मदा से राग साध रहा था-
“मैया चार बुजाधारी, तुम हो भोली-भाली,
तेरे गुण गाते हैं साधू बजा बजा के ताली,
मैया अमरकंटक वाली तुम हो भोली भाली,
भूरे मगर किन्ही सवारी हाथ कमल का फूल,
सबको देती रिद्धि सीधी हमें गई क्यों भूल?
मैया अमरकंटक वाली तुम हो भोली-भाली
रेवा चार बुजाधारी, तुम हो भोली-भाली
लाखों पापी तुमने तारे, लगी न पल की देर,
अब तो मैया मेरी बारी, कहाँ लगा गई देर,
मैया अमरकंटक वाली तुम हो भोली भाली,
रेवा अमरकंटक वाली तुम हो भोली भाली।”
असल में अमरकंटक से चला यह जत्था इस चालू और चालबाज दुनिया में खुद अपने भोलेपन का परिचय दे रहे थे। इस लोकगीत को सुन पाना मेरे लिए अप्रतिम था। कितना विश्वास, कितनी श्रद्धा। साकेत को मैंने फोटो लेने के लिए बोला और खुद बैठकर गीत की रिकॉर्डिंग करने लगी। असल में नर्मदा और इसके ऊपर निर्भर जनजातियाँ मेरे शोध का विषय भी थीं। ऐसे में शोध के दृष्टिकोण से मेरे लिए यह जरूरी भी था। देर तक हम घाट पर बैठे रहें।
महेश्वर के घाट पर अन्य जगह की घाटों की तरह सजावट, बत्तियाँ नहीं थीं। बिजली के खंबों पर लगीं बतियाँ जितनी रोशनी फैला सकती थीं, फैला रही थीं। इस समय मुझे पूरी तरह किसी गाँव में होने का अहसास हो रहा था जहां पोखर पर गीत हो रहा हो और पोल से लटकती रोशनियाँ अंधेरे को दूर करने में नाकामयाब हो।
धीमे-धीमे घाट और नर्मदा दोनों ही अंधेरे में डूबते चले गए। अब हमें भूख भी लग आई थी। नतीजतन हमने होटल खोजना शुरू किया लेकिन जैसा कि मैंने लिखा भी है कि महेश्वर मुझे गाँव का अहसास दिला रहा था तो मतलब कस्बाई शहरों में भी बहुत विकसित कस्बा नहीं था। इसलिए खाने के होटल भी लगभग न के बराबर थे। लेकिन ट्रस्ट का बेहद अच्छा भोजनालय मिल गया जो घाट के पास ही था। वहाँ दरी- कालीन पर बैठने की व्यवस्था थी और एक-एक व्यक्ति के सामने मेजनुमा पीढ़ा लगा हुआ था, जिस पर खाने की थाली परोसी जा रही थी। घी लगी रोटियाँ, सादी सब्जी, पापड़ और मिठाईयाँ। 100 या 150 रुपये की एक थाली परोसी जा रही थी। खाना खाकर मन सत्विकता से भर गया।
अहिल्याबाई होल्कर का किला
महेश्वर में घाट से लगा हुआ ही अहिल्याबाई होल्कर का किला है जिसके प्रांगण में उनकी मूर्ति भी लगवाई गई है। अहिल्याबाई होल्कर का जन्म मई 1725 ई. में मराठा परिवार में महाराष्ट्र के चौंडी नामक गाँव में हुआ था। वर्तमान में यह महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में आता है। अहिल्याबाई होल्कर का विवाह 10 से 12 वर्ष की आयु में खांडेराव होल्कर के साथ हुआ था। मात्र 29 वर्ष की अवस्था में वो विधवा हो गईं।दिसम्बर 1767 ई. से उन्होंने शासन सत्ता को संभाला और अपने शासन के दौरान प्राय: प्रसिद्ध तीर्थों पर मंदिर, महल, कुआं, तालाबों, लोकोपकारक कार्यों को संचालित करवाया। उनके इसी व्यक्तित्व का परिचय महेश्वर के शाही महल को देखकर मिलता है तो दूसरी तरफ वाराणसी में भी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित घाट इसका प्रमाण है। वर्तमान में महेश्वर का महल अहिल्याबाई के यादों के संग्रहालय की तरह लोगों के दर्शनार्थ खोल दिया गया है। यह महल लकड़ी और ईंटों से मराठा शैली में निर्मित है। घाट का निर्माण करता हुआ यह महल अपने सुंदर शिल्प के लिए प्रसिद्ध है।
सहस्त्र धारा
अगले दिन हमलोग भोर में जगे। हमें सहस्त्र धारा जाना था। पुराणों में ऐसा कहा गया है सहस्त्रधारा वही स्थान है जहां हैहय वंश के सर्वश्रेष्ठ योद्धा कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्हें सहस्त्रबाहु भी कहा गया है, उन्होंने इसी स्थान पर रावण और नाग वंशीय राजा कार्कोट को बंदी बनाया था। सहस्त्रार्जुन विषम योद्धा थे जिनकी याद में एक छोटा –सा मंदिर भी यहाँ पर है। माना जाता हैं एक बार सहस्त्रार्जुन नदी में रानियों सहित स्नान कर रहे थे, तभी नदी का जलस्तर बढ़ने लगा। उस समय सहस्त्रार्जुन ने अपनी हजार बाहों से नर्मदा का प्रवाह रोक दिया था। फिर लोक की प्रार्थना पर उन्होंने नर्मदा को आगे जाने के लिए रास्ता दिया। इसलिए भी उनकी पूजा की जाती है।
सहस्त्रधारा महेश्वर के किले से लगभग 6 से 7 कि.मी. की दूरी पर है। सूर्योदय से पहले ही हम चाय पीकर वहाँ के लिए निकल गए। पैदल चलते हुए हम वहाँ पहुंचे। रास्ते भर हमें काली मिट्टी में कपास के पौधे और खेत मिलते गए। असल में महेश्वर कपास बहुल इलाका है। इनके धागे से बनी माहेश्वरी साड़ियाँ औद्योगिक क्षेत्र में महेश्वर की पहचान हैं। महेश्वर की रेशम काफी प्रसिद्ध है, जिससे सुंदर साड़ियाँ, स्टोल, दुपट्टा आदि बनाए जाते हैं। पहनने में हल्की ये साड़ियाँ सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। कई जगह खेतों को खेत के आकार में ही साड़ियों से घेरा भी गया था। देखते हुए हम सहस्त्र धारा की ओर बढ़ते रहे।
अभी हम सहस्त्रधारा से कुछ दूर ही थे जब नर्मदा की कल- कल ध्वनि हमें सुनाई देने लगी- लयबद्ध। जैसे-जैसे हम नजदीक बढ़ते गए यह आवाज तेज होती चली गई और फिर सामने नर्मदा। जैसी कल्पना भी नहीं कि थी, वैसा विशाल प्रवाह नर्मदा का था। हमारे रोमांच का ठीकाना न था। दूर जहां तक नज़र जाती केवल नर्मदा फैली हुई थी या गीले-सूखे चट्टान। बहुत दूर तट से लगे पेड़-पौधों को रहने दें तो वहाँ किसी चौथी चीज़ का नामों-निशान नहीं था। न आबादी, न बस्तियां… केवल नर्मदा और कहीं सहस्त्र धार की ताल ठोंकती हुंकार तो कहीं उसका निर्मल संगीत। निर्भर करता कि हम किस तरफ़ के चट्टान पर खड़े हैं। छोटे- छोटे चट्टानों से हल्की ऊंची- नीची होकर गिरती नर्मदा। वह नर्मदा थी या साक्षात सौंदर्य – कहा नहीं जा सकता। देर तक मैं और साकेत वहाँ बैठे रहे। 20-25 लोगों का पिकनिक मनाता हुआ एक ग्रुप भी वहाँ था। जो वहाँ थोड़ी चहल- पहल पैदा कर रहे थे।
रामायण और महाभारत काल में ‘माहिष्मती’ के नाम से प्रसिद्ध इंदौर से 80 किमी. की दूरी पर अवस्थित मध्य प्रदेश के खरगौन जिले के इस प्रदेश से आज हमें विदा लेना था।

