
प्रज्ञा विश्नोई स्वयं बहुत सुंदर कहानियाँ लिखती हैं। वह दूसरे लेखकों की कहानियों पर भी बहुत अच्छा लिखती हैं। वह बहुपठित हैं और यह उनके लेखन में दिखाई भी देता है। उनका यह लेख पढ़िए जो उन्होंने वरिष्ठ लेखक जयशंकर की कहानियों पर लिखा है।पल प्रतिपल पत्रिका के एक विशेषांक में प्रकाशित लेख आपके लिये- मॉडरेटर
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“यह शायद पहले प्यार की पहली ईर्ष्या ही थी, जिससे मैं असाधारण रूप से अश्लील और क्रूर होता जा रहा था। ” से “…जबकि हम दोनों ही अपनी-अपनी शैली के असफल जीवन का बोझ उठाये बूढ़े हो रहे थे। ” तक—शोकगीत कहानी से
वर्ष २०२२ में ऑस्कर जीतने वाली जापानी फिल्म ड्राइव माय कार हारुकी मुराकामी के कहानी संग्रह की एक कहानी पर आधारित थी। कहानी की एक धारा के अंतर्गत नायक अपनी पत्नी के प्रेमी से अपनी असली पहचान बताये बिना अपनी पत्नी की बेवफाई की वजह जानने के लिए दोस्ती करता है, परन्तु कहानी के आगे बढ़ते बढ़ते उसके भीतर अपने प्रतिद्वंदी के प्रति मार्मिक आत्मीयता जागृत हो जाती है। यह कहानी २०१७ में संसार के समक्ष आयी थी, और जयशंकर जी प्रेम की एकतरफा प्रतिद्वंदिता से मार्मिक आत्मीयता की यात्रा संसार को वर्षों पूर्व अपनी कहानी शोकगीत के माध्यम से दर्शा चुके थे| भारतीय एवं हिन्दीभाषी समाज अपनी ही भाषा, अपनी ही भूमि पर गढ़े हुए और लिखते हुए लेखकों के प्रति किस प्रकार उदासीन है, इस बात की तस्दीक इसी से की जा सकती है।
पर यह लेख केवल और केवल जयशंकर जी के विषय पर है और नहीं भी। यदि आपने भी जयशंकर जी द्वारा लिखी अधिकतर कहानियाँ पढ़ी हैं, तो आपको उनमें कुछ चीज़ें स्थायी रूप से मिलेंगी– मसलन मध्य प्रदेश का एक कस्बा जो सत्तर से लेकर नब्बे तक किसी भी दशक का परिवेश हो सकता है (हाँ, यह ज़रूर है कि वह कस्बा भोपाल की झीलों और ग्वालियर के महलों से इतर, विदर्भ क्षेत्र से सटे मध्य प्रदेश में स्थित होता है जहां महलों से अधिक जंगल करीब होते हैं।) एक ईसाई परिवार जो बॉलीवुड में दिखाए गए मेरी मेकिंग, हर ख़ुशी और दुःख के मौके पर एक गिलास फेनी और गीत संगीत में डूब जाने वाले कैरीकेचर से कोसों दूर होता है। रामकृष्ण मठ से एक अंतर्मुखी, खुद में कुएं की भांति न जाने क्या-क्या समेटने और छिपाने वाला एक किरदार। देवी माँ की एक प्रतिमा जो कोई पर्सोनिफिकेशन अथवा मेटाफर न होकर एक आदि सत्य है। सरकारी नौकरी की पोस्टिंग में अकेलेपन और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से जूझता और साहित्य एवं संगीत से उसी अकेलेपन को समृद्ध करता एक प्रौढ़ व्यक्ति। एक बीहड़ गिरजा और बीमारी से जूझते हुए भी नायक के पास साहित्य और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत की चिरंतन लौ को लालटेन में समेटकर लाता एक वृद्ध पादरी।
“बूढ़े की गलती हुई देह पर टंगा काला और पुराना कोट, जगह-जगह से फटा हुई मैला मफ़लर, लालटेन की रोशनी से पैसे गिनती आँखें, चश्मे का टूटा फ्रेम, बूढ़े की चिड़चिड़ाहट, उसके पीले दांतों से बाहर आती हँसी और डेरी के सामने से गुज़रती लम्बी सड़क की बूढ़ी ख़ामोशी के किनारे खड़ा दरगाह, उसके सामने बैठे हुए भिखारी, थकी हुई वेश्याएँ, सोते हुए लावारिस कुत्ते। “– लाल दीवारों का मकान
साहित्य खासकर भारतीय साहित्य में सेंस ऑफ़ प्लेस पर बहुत कम बात हुई है। खासकर भारतीय कहानियों में आर के नारायण की मालगुड़ी डेज़ का स्मरण आता है जिन्होंने मालगुड़ी नाम के एक काल्पनिक नगर में काल्पनिक चरित्रों को इतनी सुंदरता और सजीवता से बसाया था कि उनकी कहानियाँ आज तक जीवित हैं। जयशंकर जी का कस्बा भी इतना ही सजीव है कि पाठक के मनो मस्तिष्क का एक अभिन्न अंग बन जाता है। उस कस्बे में बेकरी की दुकान, किसी अँधेरी गली के मोड़ पर हल्की सी पियानो की धुन, लाइब्रेरी के पर्दों से छन कर आती नवंबर की धूप, दमे का मरीज़ बूढ़ा पादरी सब लेखक की स्मृति से हमारी स्वयं की ही स्मृति बन जाते हैं।
“बारिश के बाद की चमकीली धूप में शहर का रविवार खड़ा था। बस स्टॉप पर केरल की दस-बारह लड़कियाँ थीं, जो संडे मास के लिए गिरजे जा रही होंगी। “
नोबेल पुरस्कार विजेता ऐलिस मुनरो की कहानियों के बारे में एक बात कही जाती है कि उनकी कहानियाँ कनाडाई प्रदेश ओंटारियो के देहात और कस्बे में रह रहे उन्हीं चुनिंदा किरदारों पर आधारित होती हैं और उनकी हर कहानी का स्त्रोत और लक्ष्य एक ही कहानी होती है जिस तक वो अलग अलग रास्तों से पहुंचना चाहती हैं। वास्तव में कोई भी ईमानदार साहित्यकार किसी नए संसार, किरदार या कहानी का आविष्कार नहीं करना चाहता, वरन वह एक ऐसे संसार, एक ऐसी अनुभूति को फिर से पाना चाहता है जिसकी झलक या जिसे उसने क्षण भर के लिए ही सही जिया था जैसे एक बच्चा लगातार भागते हुए उस तितली का पीछा करता है जो उस पर तब बैठी थी जब उसका शरीर पूरी तरह से स्थिर था और उसका ध्यान केवल वर्तमान पर था। जयशंकर जी की कहानियाँ भी उनके जीवन के ही बीत चुके जीवन और संसार को समझने और गुनने की प्रौढ़ जिजीविषा का दस्तावेज़ हैं।
जयशंकर जी का लेखन प्रौढ़ है। वर्तमान समय के ‘अभी तो मैं जवान हूँ’, ‘थर्टीस/फोर्टीस/फिफ्टीस इज़ द न्यू ट्वेंटीज’ के जीवन में प्रौढ़ता को मुंह बिचकाकर एक थोपी हुई सामजिक बंदिश के रूप में ही देखा जाता है। परन्तु जयशंकर जी के प्रारंभिक लेखन में भी उनकी वैचारिक एवं भावनात्मक प्रौढ़ता ज़बरदस्त रूप से दिखाई देती है। इनका कहानी संकलन सर्दियों का नीला आकाश ऑटोफिक्शन का बेहतरीन उदाहरण है जिसे पढ़कर मुझे लूसिया बर्लिन का ऑटोफिक्शन कहानी संकलन ‘A Manual for Cleaning Women’ और ऐलिस मुनरो के कहानी संकलनों की स्मृतियां ताज़ा हो गईं। हालांकि इन कहानी संकलनों में जो क्रूर आक्रामकता का पुट बहुधा दिखाई पड़ता है, वह इनकी कहानियों में जीवन के सत्य की शालीन स्वीकृति में परिवर्तित हो जाता है। इस लिहाज से दार्शनिक तौर पर जयशंकर जी की कहानियाँ इसाक बाशेविस सिंगर के लेखन और १९६६ में अमेलिया कार्मेन द्वारा लिखी गई मेरी प्रिय कहानी ‘नीमा सैसून कविता लिखती है’ के निकट प्रतीत होती हैं।
जयशंकर जी की कहानी के किरदारों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे सहज हैं। उनमें कहीं भी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सबसे सही, दूसरे को खलनायक सिद्ध करने की आतुरता नहीं दिखती। इसी कारण कहानियों के किरदार कभी भी थोपे हुए नायक/नायिकाएं और कहानियाँ किसी सदैव सही होने वाले एक्टिविस्ट का माउथपीस नहीं लगतीं। न ही उनमें बिना किसी ठोस कारण के पाठक को विरक्त कर देने वाली आत्मदया का लिजलिज़ा भाव है। इसलिए आपकी कहानियाँ किरदारों के भाव बड़े ही नैसर्गिक और मार्मिक रूप से संग चलते हैं। कहीं कोई मैनिपुलेशन नहीं। साथ ही कहानी के किरदारों में अपनी भूलों को स्वीकार करने की विनम्रता भी होती है, साथ ही दूसरों की मानवीय भूलों को समझने की संवेदनशील बुद्धिमत्ता भी।
भाषा बरतने का संयम वह गुण है जो जयशंकर जी की केवल एक कहानी पढ़कर भी आपको विस्मित कर देगा। जयशंकर जी की कहानियों में कुछ भी अतिरिक्त नहीं होता: उनका एक वाक्य भी एक शहर को आपकी आँखों के सामने जीवित खड़ा कर सकता है। उनके किरदारों के जीवन में प्रेम दबे पाँव आता है और बिना शोर किये चला भी जाता है। अपनी माँ के देहांत पर इनकी कहानियों के किरदार चुपके से रो लेते हैं या फिर कभी कभी तो अस्पताल-नौकरी-ज़िम्मेदारी-मौत-ज़िन्दगी की दौड़ में इतना थक चुके होते हैं कि शायद वो दो आंसू गिराने की शक्ति भी उनमें शेष नहीं रहती| कहानियों में कुछ भी नाटकीय नहीं होता, कथानक का प्रवाह पहाड़ी नदी की भांति निर्मल रूप से बहता रहता है। जयशंकर जी की कहानियों में कभी कलाबाज़ी नहीं होती (न ही भाषिक/ न वैचारिक/ न भावनात्मक) और यही इनकी कला का सबसे सुन्दर प्रमाण है।
जयशंकर जी का कथा साहित्य स्वयं में सम्पूर्ण है और किसी भी लेखक के लिए एक मास्टरक्लास है। परन्तु उनका कथेतर साहित्य जीवन के एक अन्य ही आयाम को उद्घाटित करता है।
यूनानी देवियों में लेडी हेस्टिया के बारे में बहुत ही काम चर्चा की जाती है। और आखिर हो भी क्यों? चाहे पुरुषवादी खेमा हो या स्त्रीवादी: नायिकाओं सदैव एक तय खांचे के भीतर ही स्वीकार की गयी हैं। या तो एफ्रोडाइट और मर्लिन मुनरो जैसी सुंदरता के पैमाने तय करती पिन अप गर्ल नायिका हो सकती है या एंजेला मर्केल, मार्गरेट थैचर या देवी अथीना जैसी बॉस लेडी। सास बहु धारावाहिकों में “मेरा पति सिर्फ़ मेरा है का युद्धोद्घोष करती देवी हेरा भी नायिका हो सकती हैं या टॉमबॉय आर्टेमिस भी जो तीर-कमान चलाती है, बुरे लोगों को पीटती है को भी कहीं कहीं नायिका होने का मौका मिल ही जाता है। परन्तु अंतर्मुखी, अविवाहित हेस्टिया जो अकेली, अविवाहित है, जिसका न कोई प्रेमी है, न ही कोई शत्रु। जो न अथीना जैसी अपने पिता की पुत्री है, न डेमेटर जैसी माँ, न आर्टेमिस जैसी अपने भाई की ‘भाई’, न ही माँ के प्रेम और मृत्यु के देवता हैडिस के अपहरण/प्रेम के बीच बँटी पर्सेफोनी का आत्मचुनाव। एकांतिक, अंतर्मुखी स्त्री न पुरुष लेखकों की ड्रीमगर्ल होती है, न ही स्त्रीवादी लेखकों की रोल मॉडल। परन्तु लोकप्रिय एवं लोकस्वीकृत धरा के विरुद्ध जाकर जयशंकर जी ने प्रेम के बदले रागिनी पटमंजरी और महत्वाकांक्षा के बदले इंगमार बर्गमैन की फिल्म ऑटम सोनाटा चुनने वाली स्त्री को नायिका बनाया। अपनी कहानी में उन स्त्रियों को आवाज़ दी जो पुरुषवादियों के ‘मेरी गृहस्थी, मेरा संसार’ यूटोपिया को त्याग अपने आत्म संसार का चयन करती है, पर हर समय अपने विद्रोही होने की मुनादी भी नहीं करती।
चूंकि मेरा बचपन मध्यप्रदेश के महाकोशल और गोंडवाना क्षेत्र में बीता हुआ है, जयशंकर जी की कहानियाँ और कथेतर गद्य मुझे सदैव होमसिकनेस की अनुभूति कराता रहा है। परन्तु जिनका मध्य भारत और विदर्भ से कोई सम्बन्ध भी न रहा हो, तब भी जयशंकर जी का लेखन उन्हें एक बीत चुके समय, पीछे छूट चुके बचपन और यौवन के लिए होमसिकनेस महसूस करा ही देगा। जयशंकर जी के लेखन की एक प्रमुख उपलब्धि उनके द्वारा रचित पुरुष चरित्र हैं। सपनों का राजकुमार/सपनों की हत्या करने वाला क्रूर षड्यंत्रकारी, रेड फ्लैग/ग्रीन फ्लैग, रक्षक/भक्षक के द्वैत में बांटने वाली प्रचलित विचार संस्कृति में ऐसे पुरुष चरित्र मिलना एक सुखद आश्चर्य है जिनमें खेद, गरिमा, प्रेम, संकोच, अकेलेपन से डर और उसी अकेलेपन के प्रति अनुराग है।
मैक्सिम गोर्की की कहानी ‘एक पाठक’ में एक लेखक की मानव मूल्यों और आत्म के प्रति जो ज़िम्मेदारियाँ हैं, जयशंकर जी अपने लेखन में उन ज़िम्मेदारियों का बखूबी निर्वाहन करते हैं। उनकी पुस्तक ‘गोधूलि की इबारतें’ में ‘प्रेम का पड़ोस एवं परिवेश’ और ‘गुनगुन दीदी की याद’ में जिस तरह शाश्वत मानवीय गुणों और जीवन के सौंदर्य का चित्रण किया, वह न केवल साहित्य के लिए वरन वर्तमान समय के लिए अत्यंत आवश्यक है। जयशंकर जी को पढ़ा जाना न केवल एक पाठक के तौर पर, वरन एक मनुष्य के तौर पर आवश्यक है।

