होमर द्वारा लिखी प्राचीन ग्रीक महाकाव्य ओडिसी पर हाल में ही क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म आई है- द ओडिसी। इस फ़िल्म पर और मूल कथा से इसकी तुलना करते हुए यह विस्तृत लेख लिखा है जानी-मानी लेखिका सुषमा गुप्ता ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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क्रिस्टोफर नोलन की द ओडिसी कई मायनों में होमर के महाकाव्य का रूपांतरण कम और उसकी नई व्याख्या ज़्यादा है।
मूल ओडिसी पढ़ने के बाद फिल्म देखते हुए कई बदलाव लगभग तुरंत नज़र आने लगते हैं। ये बदलाव इसलिए नहीं चौंकाते कि वे खराब हैं, बल्कि इसलिए कि वे ओडिसियस के चरित्र और उसकी पूरी यात्रा के अर्थ को बदल देते हैं।
सबसे बड़ा बदलाव कहानी के पहले महत्वपूर्ण प्रसंग में दिखाई देता है। पॉलीफेमस, एक-नेत्री राक्षस (Cyclops) और समुद्र के देवता पोसाइडन का पुत्र।
होमर की ओडिसी में यही वह क्षण है जो ओडिसियस की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों को सामने लाता है। पॉलीफेमस की गुफा में कैद होने के बाद वह पहले उसे शराब पिलाकर नशे में कर देता है। फिर अपना नाम बताता है, “कोई नहीं” (Outis)। इसके बाद जैतून की लकड़ी के नुकीले दाँव से उसकी आँख फोड़ देता है। दर्द से तड़पता पॉलीफेमस जब दूसरे साइक्लोप्स को मदद के लिए बुलाता है और वे पूछते हैं कि हमला किसने किया, तो वह केवल इतना ही कह पाता है, “कोई नहीं।” बाकी सब उसे उसी हालत में छोड़कर चले जाते हैं। अंत में ओडिसियस और उसके साथी भेड़ों के नीचे छिपकर गुफा से बाहर निकल भागते हैं।
यह प्रसंग सिर्फ रोमांच नहीं है, यह बुद्धिमत्ता, छल और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता का अद्भुत उदाहरण है।
लेकिन होमर यहीं नहीं रुकते।
जब ओडिसियस सुरक्षित समुद्र में पहुँच जाता है, तो उसका अहंकार उस पर हावी हो जाता है। वह अपनी जीत का श्रेय खुद लेने से खुद को रोक नहीं पाता और पीछे मुड़कर पॉलीफेमस को अपना असली नाम बता देता है। अपमानित पॉलीफेमस अपने पिता पोसाइडन से प्रार्थना करता है कि वह ओडिसियस की घर वापसी को अभिशाप दे। यही एक क्षण आगे आने वाली लगभग हर विपत्ति का कारण बन जाता है।
नोलन की फिल्म इस पूरे प्रसंग के केवल कुछ हिस्से ही रखती है। भेड़ों के नीचे छिपकर भागने वाला दृश्य तो है, लेकिन शराब वाली युक्ति, “कोई नहीं” वाली चाल और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी पहचान बताने वाला घातक अहंकार,तीनों गायब हैं। इसलिए फिल्म में पोसाइडन का क्रोध ओडिसियस की अपनी भूल का परिणाम कम और एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति ज़्यादा लगता है। इस एक बदलाव के साथ नोलन, होमर के नायक की सबसे महत्वपूर्ण मानवीय कमज़ोरी भी हटा देते हैं।
यही बदलाव ओडिसियस के पूरे चरित्र की नई व्याख्या की ओर भी इशारा करता है।
होमर के महाकाव्य में ओडिसियस की सबसे बड़ी पहचान उसकी मेटिस (Metis) है, उसकी असाधारण चतुराई। वह सहजता से झूठ बोलता है, पल भर में नई पहचान गढ़ लेता है, हर परिस्थिति को अपने पक्ष में मोड़ देता है और अपनी बुद्धि के बल पर हर संकट से निकल आता है।
नोलन का ओडिसियस इससे बिल्कुल अलग है। वह एक चालाक और रणनीतिक राजा से ज़्यादा ट्रोजन युद्ध से टूटा हुआ एक सैनिक है। युद्ध की यादें, बार-बार लौटते फ्लैशबैक, अपराधबोध और मानसिक घाव उसकी पूरी यात्रा को उसकी चतुराई से कहीं अधिक परिभाषित करते हैं। फिल्म खत्म होने तक आप किसी महान रणनीतिकार से ज़्यादा एक ऐसे इंसान को याद रखते हैं जो युद्ध के परिणामों के साथ जीने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन मेरे लिए नोलन की ओडिसी में एक और परत भी थी, जो होमर की ओडिसी से इसे अलग करती है।
कई जगह यह सिर्फ एक वीर-यात्रा नहीं, बल्कि एक गहरी प्रेम कहानी भी लगती है। ऐसा महसूस होता है जैसे पूरी यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य सिर्फ अपने प्रेम तक पहुँचना हो। उसकी धुँधली पड़ चुकी स्मृतियाँ भी बार-बार उसी स्त्री, उसी प्रेम और उसी घर की ओर लौटती रहती हैं। वह समुद्र पार करता है, युद्ध झेलता है, देवताओं से संघर्ष करता है, लेकिन उसके भीतर सबसे गहरी इच्छा अपने प्रेम तक पहुँचने की ही बनी रहती है। अंत में जब वह पेनेलोप से मिलता है, तो वह केवल एक राजा की घर-वापसी नहीं रह जाती, बल्कि दो प्रेमियों का दशकों बाद हुआ मिलन बन जाती है। मेरे लिए यही होमर और नोलन की ओडिसी के बीच सबसे बड़ा भावनात्मक अंतर था।
फ़िल्म में देवताओं की भूमिका भी उतनी ही बदल जाती है।
होमर की ओडिसी में एथेना शायद ओडिसियस के बाद सबसे महत्वपूर्ण पात्र है। वही ज़्यूस को ओडिसियस की सहायता करने के लिए मनाती है, टेलीमेकस का मार्गदर्शन करती है, कई बार वेश बदलकर ओडिसियस की रक्षा करती है, उसके इथाका लौटने की योजना बनाती है, महल में जमा अराजक Suitors को हराने में उसकी सहायता करती है और अंततः इथाका में शांति स्थापित कराती है। वह केवल एक देवी नहीं, पूरी कहानी को आगे बढ़ाने वाली सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक है।
नोलन की फिल्म में एथेना मौजूद तो है, लेकिन उसकी भूमिका बस प्रतीकात्मक लगती है। वह घटनाओं को वैसे प्रभावित नहीं करती जैसी मूल महाकाव्य में करती है। इसलिए होमर की ओडिसी में उसकी महत्ता को देखते हुए फिल्म में उसकी उपस्थिति कुछ फीकी महसूस होती है।
हर्मीस के साथ तो इससे भी ज़्यादा अन्याय हुआ है। होमर की ओडिसी में हर्मीस दो बेहद महत्वपूर्ण घटनाओं का कारण बनता है। वही ज़्यूस का संदेश लेकर कैलिप्सो के द्वीप पर जाता है और उसे ओडिसियस को मुक्त करने का आदेश देता है। बाद में वही जादुई जड़ी देकर ओडिसियस को सर्सी के जादू से बचाता है और उसके साथियों को भी बचाने में मदद करता है। फिल्म में उसकी लगभग पूरी अनुपस्थिति इन दोनों घटनाओं का स्वरूप बदल देती है।
फिल्म कई अलग-अलग साहसिक प्रसंगों को भी एक साथ मिला देती है। सबसे स्पष्ट उदाहरण लोटस ईटर्स और कैलिप्सो के द्वीप का है।
होमर के यहाँ लोटस ईटर्स एक अलग प्रसंग है। कमल खाने के बाद नाविक अपने घर लौटने की इच्छा ही भूल जाते हैं। ओडिसियस उन्हें ज़बरदस्ती जहाज़ तक वापस लाता है। यहाँ कमल भूल जाने और अपने कर्तव्यों को छोड़ देने के प्रलोभन का प्रतीक है।
नोलन इस पूरे विचार को कैलिप्सो की कहानी में समाहित कर देते हैं।
पाताल लोक का प्रसंग भी फिल्म में बहुत सीमित कर दिया गया है। महाकाव्य के सबसे समृद्ध हिस्सों में से एक वह है जहाँ ओडिसियस मृतकों की दुनिया में उतरता है। वहाँ उसकी मुलाकात टायरेसियस, अपनी माँ एंटीक्लिया, एकिलीस, अगामेम्नॉन, एजैक्स और कई अन्य महान पात्रों से होती है।
ये संवाद पूरी कथा को एक साधारण साहसिक यात्रा से उठाकर जीवन, मृत्यु, यश और स्मृति पर गहरे चिंतन में बदल देते हैं। फिल्म में इन प्रसंगों की अनुपस्थिति उसकी दार्शनिक गहराई को कुछ कम कर देती है।
एक और महत्वपूर्ण प्रसंग जो फिल्म से गायब है, वह है एयोलस और हवाओं की थैली।
होमर की ओडिसी में पवन देव एयोलस ओडिसियस को एक चमड़े की थैली देते हैं, जिसमें सभी प्रतिकूल हवाएँ बंद होती हैं। केवल अनुकूल हवा खुली रहती है, ताकि जहाज़ सुरक्षित इथाका पहुँच सके। कई दिनों की यात्रा के बाद इथाका दिखाई भी देने लगता है। लेकिन ओडिसियस के साथी यह सोचकर कि थैली में सोना छिपा है, उसे खोल देते हैं। सारी हवाएँ बाहर निकलती हैं और एक भीषण तूफ़ान पूरे बेड़े को फिर से एयोलस के द्वीप तक पहुँचा देता है। यह महाकाव्य के सबसे मार्मिक प्रसंगों में से एक है, क्योंकि घर सामने दिखाई दे रहा होता है, फिर भी इंसानी लालच और अविश्वास सब कुछ छीन लेते हैं।
इसी तरह शेरिया (Scheria) का प्रसंग भी फिल्म में नहीं के बराबर है। वहीं राजकुमारी नॉसिका ओडिसियस को पाती है, राजा एल्सिनस उसका स्वागत करता है और फैयेशियनों के दरबार में पहली बार ओडिसियस स्वयं अपनी पूरी यात्रा का वृत्तांत सुनाता है।
इन सब बदलावों के बावजूद एक बात पूरे विश्वास से कही जा सकती है, क्रिस्टोफर नोलन ने इस फिल्म को जिस दृश्यात्मक भव्यता के साथ रचा है, वह सचमुच अद्भुत है। इसकी सिनेमैटोग्राफी कई जगह साँस रोक देती है। विशाल समुद्र, ऊँची लहरें, तूफ़ान, जहाज़ और युद्ध, हर दृश्य इतना बड़ा और प्रभावशाली है कि कई बार लगता है जैसे किसी जीवित पेंटिंग के भीतर खड़े हों। कई दृश्य अचानक ऐसे आते हैं कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कहीं डर लगता है, कहीं विस्मय होता है और कहीं सिर्फ एक गहरी खामोशी रह जाती है। नोलन बार-बार ऐसे दृश्य रचते हैं जिनका असर फिल्म खत्म होने के बाद भी देर तक बना रहता है।
फिल्म की सबसे खूबसूरत बात है कि इसमें समुद्र सिर्फ एक लोकेशन नहीं है।
समुद्र अपने आप में एक किरदार बन जाता है। कभी वह रास्ता है, कभी दुश्मन, कभी याद है और कभी उम्मीद। पूरी कहानी उसी की लहरों पर बहती है। कई बार लगता है जैसे नोलन ने एक बहुत बड़ी पेंटिंग बनाई हो और उसका कैनवस समुद्र हो। हर जहाज़, हर संघर्ष, हर बिछड़न और हर मिलन उसी विशाल कैनवस पर उभरता चला जाता है।
होमर की ओडिसी में ओडिसियस की पहचान साबित करने का तरीका भी अपने आप में अविस्मरणीय है। वर्षों बाद लौटे इस आदमी पर पेनेलोप भी तुरंत विश्वास नहीं करती। तब वह उनकी अचल शय्या (Immovable Bed) का प्रसंग सामने लाती है। वह शय्या एक जीवित जैतून के वृक्ष के तने पर बनाई गई थी, इसलिए उसे हिलाया ही नहीं जा सकता था। इस रहस्य को केवल ओडिसियस और पेनेलोप जानते थे। जब ओडिसियस उस शय्या का भेद बताता है, तभी पेनेलोप को यक़ीन होता है कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति वास्तव में उसका पति है। यह केवल पहचान का क्षण नहीं है, यह उनके विश्वास और प्रेम की सबसे गहरी स्मृति का उद्घाटन है। शायद विश्व साहित्य में पति-पत्नी की पहचान का इससे अधिक मार्मिक और प्रतीकात्मक दृश्य बहुत कम मिलेगा।
नोलन इस पूरे प्रसंग को बिल्कुल अलग ढंग से देखते हैं। उनकी ओडिसी में ओडिसियस हमेशा पेनेलोप के वस्त्र का एक छोटा-सा पिन अपने पास सँभालकर रखता है और अंततः उसी के माध्यम से उसकी पहचान स्थापित होती है। यह दृश्य अपने आप में भावुक है, लेकिन उसका अर्थ मूल महाकाव्य से बिल्कुल अलग है। होमर के यहाँ पहचान दो लोगों के बीच साझा किए गए एक ऐसे रहस्य से जन्म लेती है जिसे दुनिया का कोई तीसरा व्यक्ति नहीं जान सकता। नोलन के यहाँ वही पहचान एक स्मृति-चिह्न के सहारे सामने आती है। मेरे लिए अचल शय्या वाला प्रसंग कहीं अधिक प्रभावशाली, गहरा और प्रतीकात्मक था। उसका हट जाना सिर्फ एक दृश्य का बदलना नहीं है, उससे होमर के मूल महाकाव्य का एक अत्यंत मार्मिक और याद रह जाने वाला क्षण भी फिल्म से गायब हो जाता है।
सबसे बड़ा अंतर यह है कि दोनों कहानियाँ अपने पीछे कैसा एहसास छोड़ती हैं।
होमर की ओडिसी पुनर्स्थापना की कहानी है। ओडिसियस अपनी अचल शय्या की प्रसिद्ध परीक्षा के माध्यम से पेनेलोप को अपनी पहचान सिद्ध करता है, अपना राज्य वापस प्राप्त करता है, अपने पिता से मिलता है और अंततः एथेना की सहायता से इथाका में शांति लौट आती है। यह एक राजा की विजयी घर-वापसी की कहानी है।
नोलन का अंत कहीं अधिक आत्ममंथन से भरा हुआ है। यहाँ घर केवल एक जगह नहीं, बल्कि एक मानसिक और भावनात्मक बोझ है। विजय भी है, लेकिन वह शोर के साथ नहीं आती। वह शांत है, थोड़ी कड़वी है, थोड़ी मीठी है। उसका केंद्र राज्य की पुनर्प्राप्ति नहीं, बल्कि अपराधबोध, मानसिक आघात, प्रेम और अंततः उपचार है।
यही वजह है कि मेरे लिए क्रिस्टोफर नोलन की द ओडिसी, होमर की ओडिसी का विकल्प नहीं है। दोनों एक ही कथा को दो अलग-अलग दृष्टियों से देखती हैं।
होमर का महाकाव्य बुद्धि, अहंकार, नियति और घर-वापसी का महाकाव्य है, जबकि नोलन उसी कथा को युद्ध, स्मृतियों, प्रेम और मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की कहानी बना देते हैं।

