यह लेख प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते को स्त्रीवाद के नज़रिए से देखती है। इको फेमिनिज्म पर कुमारी रोहिणी का यह लेख पढ़िए। कुमारी रोहिणी पानी के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था इंडिया वाटर पोर्टल के लिए काम करती हैं। आय यह लेख पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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पिछले दिनों दिया मिर्ज़ा एक बार फिर खबरों में थीं। वजह कोई फिल्म नहीं, बल्कि पर्यावरण और पितृसत्ता पर उनकी कही एक बात थी। उन्होंने कहा कि “Patriarchy is the cause for climate change.” बस, फिर क्या था, सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे। कुछ लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया, कुछ ने पूछा कि जलवायु परिवर्तन का पितृसत्ता से आख़िर क्या लेना-देना है और कुछ ने इसे पुरुषों के खिलाफ एक और आरोप की तरह देखा। मामला इतना बढ़ गया कि दिया मिर्ज़ा को अपने कहे की व्याख्या तक करनी पड़ी। उनका आशय पुरुषों को दोषी ठहराना नहीं था, बल्कि उस सत्ता-व्यवस्था की ओर इशारा करना था जो प्रकृति, संसाधनों और कमजोर समुदायों को इस्तेमाल की जाने वाली चीजों की तरह देखती है। लेकिन यहीं से स्त्रियों और प्रकृति पर नियंत्रण के बीच का वह पुराना सवाल फिर सामने आता है।
पहली नजर में दिया मिर्ज़ा की कही यह बात सचमुच थोड़ी बेतुकी लग सकती है। हमें लग सकता है कि क्या पितृसत्ता सचमुच जलवायु परिवर्तन का कारण है? क्योंकि आज तक हम यही जानते-पढ़ते आए हैं कि जलवायु परिवर्तन के पीछे तो औद्योगिकीकरण, जीवाश्म ईंधन, पूंजी, उपभोग की बढ़ती हुई भूख, औपनिवेशिक इतिहास और दुनिया की असमान आर्थिक व्यवस्था जैसे कारक मुख्य हैं। फिर पितृसत्ता बीच में कहां से आ गई? शायद इसका जवाब जलवायु परिवर्तन के कारणों की घिसी-पीटी सूची में नहीं, उस सोच में तलाशना चाहिए जिससे प्रकृति, संसाधनों और श्रम को देखने का हमारा नजरिया बना है। पितृसत्ता इस कहानी का अकेला कारण नहीं है, लेकिन सत्ता, नियंत्रण और संसाधनों के बंटवारे को तय करने वाली व्यवस्था के रूप में वह इस कहानी से बाहर भी नहीं है। शायद इसी रिश्ते को समझना जरूरी है। दिया मिर्ज़ा की उस एक पंक्ति से यह सवाल मन में उठता है कि आख़िर हम प्रकृति को देखते कैसे हैं? और शायद यहीं से ecofeminism की बात शुरू होती है। शब्द भारी है, लेकिन बात सीधी है – स्त्रियों और प्रकृति पर नियंत्रण के पीछे काम करने वाली सत्ता-व्यवस्थाओं के बीच आख़िर कोई रिश्ता है क्या?
इसका एक आसान सा जवाब यह हो सकता है कि महिलाएं प्रकृति के करीब होती हैं और इसलिए उसे अच्छे से बचा सकती हैं। लेकिन यही जवाब उतना ही ख़तरनाक भी हो सकता है। अगर स्त्री को स्वभाव से ही प्रकृति, देखभाल और संरक्षण से जोड़ दिया जाए तो हम फिर से उसी पुराने खांचे में लौट आते हैं जिसमें घर भी महिला को संभालना होता है, दूर जाकर रोज़ पानी भी उसे ही लाना होता है, बच्चे और बूढ़ों की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है, और अब पर्यावरण बचाने जैसा दुरूह काम भी उसी के कंधे पर आ जाए। यह कैसी आज़ादी है? शायद बात सिर्फ इतनी नहीं कि स्त्री को प्रकृति के करीब माना जाता है। इसके पीछे वह नजरिया भी है जो किसी चीज़ को पहले उपयोगी मानता है और फिर उसके इस्तेमाल को स्वाभाविक। स्त्री के श्रम और प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते में भी यह बात अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
यहीं मुझे कैरोलिन मर्चेंट की The Death of Nature याद आती है। वे बताती हैं कि आधुनिक पश्चिमी सोच में प्रकृति को धीरे-धीरे एक जीवित संसार की तरह देखने के बजाय ऐसी चीज माना जाने लगा, जिसे मापा, नियंत्रित और अपने इस्तेमाल में लाया जा सकता है। लेकिन बात सिर्फ जंगलों और नदियों तक नहीं जाती। मारिया मीज़ का ध्यान उस दुनिया की ओर जाता है जो घर के भीतर चलती रहती है – पानी लाने, खाना जुटाने, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल करने वाला वह श्रम, जिसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती, लेकिन जो फिर भी कहीं किसी आंकड़े में दर्ज नहीं होता। काम होता रहता है, बस उसे काम नहीं कहा जाता।
यह बात दूर की लग सकती है, लेकिन इसकी तस्वीर हमारे आसपास की जिंदगी में आसानी से दिखती है। सोचिए, किसी महिला के दिन के पांच घंटे सिर्फ पानी लाने में बीतते हैं। परिवार के लिए यह काम जरूरी है, लेकिन परिवार तो छोड़िए, अर्थव्यवस्था की गिनती में भी इस काम की कहीं कोई कीमत नहीं है। यहीं से पर्यावरण की कहानी घर की कहानी बन जाती है। या शायद उल्टा करके कहें तो घर की कहानी पर्यावरण की कहानी।
पानी के लिए घर से निकलती महिला की कहानी से जंगल तक पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है। पर्यावरण में आया बदलाव सबसे पहले रोज़मर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है, जबकि उसकी खबर अक्सर आंकड़ों में दर्ज होती है। मान लीजिए किसी गांव के आसपास के जंगल काटे जा रहे हैं। खबर बनेगी कि वन क्षेत्र घट रहा है, जैव विविधता पर असर पड़ेगा, कार्बन स्टॉक कम होगा। ये सारी बातें अपनी जगह सही हैं। लेकिन इस खबर में उस गांव की जिंदगी कितनी दिखाई देगी?
किसी खबर में शायद यह दर्ज नहीं होगा कि उसी गांव की किसी महिला के लिए जंगल का कम होना क्या मतलब रखता है। अब लकड़ी और चारा लाने के लिए उसे रोज़ थोड़ा और दूर जाना होगा। पानी के स्रोत सूख गए तो सुबह और जल्दी उठना होगा। फसल खराब हुई तो घर के राशन का हिसाब बदलेगा। और अगर परिवार का पुरुष काम की तलाश में बाहर चला गया, तो पीछे घर की दूसरी जिम्मेदारियां अक्सर उसी स्त्री के कंधे पर आ जाएंगी।
पर्यावरणीय संकट का असर हर घर पर एक जैसा नहीं होता। किसी के लिए वह सूखे का रूप लेकर आता है, किसी के लिए महंगाई, किसी के लिए विस्थापन और किसी के लिए रोज़ थोड़ा लंबा होता रास्ता।
भारत में वंदना शिवा ने इसी रिश्ते को बहुत मजबूती से सामने रखा। Staying Alive: Women, Ecology and Development में उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के जीवन, जंगल और विकास के बीच के संबंध को केंद्र में रखा। चिपको आंदोलन को भी इसी नज़रिए से देखा जा सकता है। जंगल वहां कोई दूर खड़ी “प्रकृति” नहीं था। वह वहाँ के लोगों के लिए ईंधन था, उनका पानी था, खेत था, उनके मवेशियों के लिए चारा था, और घर की रोजमर्रा की जरूरतों का आधार भी। इसलिए इस आंदोलन में पेड़ बचाना केवल पेड़ बचाना नहीं था।
लेकिन यहीं बीना अग्रवाल के काम की याद आती है। वह कहती हैं कि स्त्रियाँ प्रकृति की रक्षक इसलिए नहीं हैं कि वे जन्म से ही इसके करीब होती हैं। प्रकृति से रिश्ता उनके श्रम, उनके अधिकार और उनकी सामाजिक स्थिति से बनता है। जमीन किसके नाम है? जंगल पर किसका अधिकार है? घर में फ़ैसले कौन लेता है? गांव की बैठक में किसकी बात सुनी जाती है? ये सवाल उतने ही अहम हैं जितना जंगल बचाने का सवाल।
और शायद इसी वजह से केवल यह देखना भी काफी नहीं कि किसी समाज में वंश और संपत्ति किस रास्ते से चलती है। श्रीप्रकाश मिश्र का रूप तिल्ली की कथा, जो खासी समाज की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है, इस फर्क को देखने का एक दिलचस्प उदाहरण देता है। यहां मातृप्रधान सामाजिक व्यवस्था के बावजूद स्त्री की स्थिति को बराबरी की स्थिति नहीं माना जा सकता। यानी वंश और संपत्ति का रास्ता मां से होकर जाए, फिर भी निर्णय और सत्ता में स्त्री बराबर हो, यह जरूरी नहीं। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि वंश किसके रास्ते चलता है? सवाल यह भी है कि फैसले कौन लेता है?
यहां से बात थोड़ी और आगे जाती है। अगर स्त्री की स्थिति को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि समाज उसे क्या नाम देता है या वंश किसके नाम से चलता है, तो विकास को भी केवल उत्पादन और आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों से कैसे समझा जा सकता है? दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लोगों का यही सवाल है कि आखिर अच्छा जीवन किसे कहते हैं। क्या ज्यादा उत्पादन, ज्यादा खपत और ज्यादा सुविधा अपने-आप में बेहतर जीवन की निशानी हैं? या फिर यह भी देखा जाना चाहिए कि इस ‘अधिक’ की कीमत कौन चुका रहा है?
एंडीज की स्वदेशी परंपराओं से निकली बुएन विविर (Buen Vivir) की अवधारणा इसी सवाल का एक अलग जवाब देती है। इसका सीधा अर्थ है अच्छा जीवन। लेकिन इसका मतलब केवल ज्यादा कमाना, बड़ा घर बनाना या ज्यादा चीजें जुटा लेना नहीं है। असल सवाल यह है कि हम सब रह किस तरह रहे हैं। अगर विकास के नाम पर किसी की जमीन चली जाए, नदी सूख जाए, जंगल खत्म हो जाए या कोई गाँव पूरा का पूरा उजड़ जाए, तो सिर्फ उत्पादन बढ़ जाने से उसे अच्छा जीवन कैसे कह सकते हैं?
बुएन विविर पर लिखने वाले Alberto Acosta और Eduardo Gudynas इसी सवाल को आगे बढ़ाते हैं, जिसमें प्रकृति को मुख्यतः मनुष्य के इस्तेमाल की चीज माना जाता है। उनके लिए विकास की कसौटी केवल यह नहीं कि कितना उत्पादन हुआ, बल्कि यह भी है कि उस उत्पादन में हमने किन चीजों को खो दिया।
भारत के संदर्भ में भी यह सवाल उतना ही प्रासंगिक है। अगर अच्छा जीवन सिर्फ ज्यादा उत्पादन नहीं है, तो उस जीवन को बचाए रखने वाले श्रम का क्या? अगर पानी घर तक नहीं पहुंचा, तो GDP बढ़ने का अर्थ उस महिला के लिए क्या है जो रोज बाल्टी लेकर कई किलोमीटर चलती है ताकि घर के लिए पानी ला सके? कागज पर विकास के आंकड़े तेज हो सकते हैं, लेकिन अगर किसी की रोज़मर्रा की जिंदगी और मुश्किल होती जा रही है, तो उस विकास का मतलब क्या है?
शायद बुएन विविर की सबसे दिलचस्प बात यही है कि ‘अच्छे जीवन’ की बात करते हुए वह हमें प्रकृति के सवाल तक भी ले आता है। इसी के साथ पचामामा (Pachamama) की अवधारणा सामने आती है। इसका अनुवाद अक्सर ‘धरती माता’ किया जाता है। यह शब्द सुनते ही हमें अपनापन महसूस हो सकता है, क्योंकि हमारे यहां भी धरती और नदियों को मां कहने की परंपरा रही है। लेकिन सिर्फ शब्दों का मिलना काफी नहीं है। पचामामा की अवधारणा में मनुष्य और प्रकृति के बीच वह कठोर दूरी नहीं है, जो आधुनिक विकास की सोच में दिखाई देती है। हमने सुविधा के लिए दो अलग-अलग खांचे बना लिए – प्रकृति और मनुष्य। इस दृष्टि में दोनों को अलग करके देखना ही मुश्किल है
हमारे लिए भी यह सवाल कम परेशानी वाला नहीं। हम नदी को मां तो कहते हैं और उसी नदी को सीवर की नाली बना देते हैं। धरती को माता का नाम देते हैं और लगातार उसी मिट्टी का दोहन करते रहते हैं। नाम देने और व्यवहार करने के बीच यह फर्क हमें रोककर सोचने पर मजबूर करता है। प्रकृति को सम्मान देने की बात करना आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि उसके साथ हमारा बर्ताव क्या है?
अगर अच्छे जीवन के कई रास्ते हो सकते हैं, तो विकास का सिर्फ एक ही रास्ता क्यों हो? Arturo Escobar की ‘pluriverse’ की कल्पना इसी सवाल को आगे ले जाती है। आख़िर गांव का शहर जैसा बन जाना ही विकास क्यों माना जाए? किसी किसान के लिए उसके खेत की मिट्टी की उर्वरता बची रहना भी विकास हो सकता है, किसी महिला के लिए घर तक साफ पानी पहुंचना और किसी समुदाय के लिए जंगल पर अपना अधिकार बचा रहना। फिर विकास की एक ही तय परिभाषा क्यों?
लेकिन अच्छे जीवन के दूसरे रास्तों की तलाश में हमें अपनी परंपराओं को भी बहुत आसानी से आदर्श नहीं बना देना चाहिए। न हर परंपरा अच्छी होती है, न हर आधुनिकता बुरी। हमारे समाजों में प्रकृति के साथ रहने की कई परंपराएं रही हैं, लेकिन उसी समाज में जाति, पितृसत्ता और असमानता भी रही है। इसलिए सिर्फ इसलिए कि कोई बात पुरानी या पारंपरिक है, उसे बेहतर मान लेना भी ठीक नहीं।
यहीं भारतीय नारीवाद के सामने असली सवाल आता है। स्त्री की मुक्ति को सिर्फ नौकरी या अपनी कमाई तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। जमीन किसके नाम है, जंगल के बारे में फैसले कौन लेता है और पर्यावरणीय संकट का सबसे ज्यादा बोझ किस पर पड़ता है, इन सवालों से भी उसकी आज़ादी जुड़ी है। उसी तरह पर्यावरण बचाने का मतलब सिर्फ पेड़ों की संख्या गिनना नहीं है। यह भी देखना होगा कि उन पेड़ों, जंगलों और जमीन से जुड़े लोगों का जीवन कैसा रह गया है।
तो शायद इकोफ़ेमिनिज़्म को सिर्फ ‘महिलाओं और पर्यावरण’ की बहस मानना उसके असली सवाल को छोटा कर देना होगा। बात आखिर इस पर आकर ठहरती है कि हम दुनिया के साथ कैसा रिश्ता रखते हैं। किसकी मेहनत दिखाई देती है, किसकी आवाज सुनी जाती है और किसे सिर्फ इस्तेमाल की चीज समझ लिया जाता है? शायद प्रकृति को बचाने से पहले हमें अपनी उस नजर को देखना होगा, जिससे हम दुनिया को देखते आए हैं।
और शायद इसी वजह से दिया मिर्ज़ा की वह पंक्ति अब मुझे सिर्फ किसी सेलिब्रिटी की कही हुई बात नहीं लगती। वह एक सवाल की तरह लौटती है – हम प्रकृति के साथ रहते हैं, या अपनी जरूरत के हिसाब से सिर्फ उसका इस्तेमाल करते हैं?

