आगा शाहिद अली भारतीय अंग्रेज़ी कविता के ऐसे नाम थे जिनको अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। कैंसर के कारण उनका निधन असमय हो गया लेकिन उनकी कविताओं की गूंज अभी भी बाक़ी है। आज पढ़िए प्रसिद्ध लेखक अमिताभ घोष द्वारा उनके ऊपर लिखी यह टिप्पणी। बहुत आत्मीयता से अमिताभ घोष ने उनको याद किया है। उनकी कविता को, उनके अंदर के कवि-मन को और बेगम अख़्तर की ग़ज़लों के प्रति उनके प्रेम को। इसको पढ़ते हुए यह समझ में आया कि आगा शाहिद अली अंग्रेज़ी में ग़ज़लें क्यों लिखने लगे थे। इसको पढ़ते हुए यह भी समझ में आता है कि अमिताभ घोष जैसे बड़े क़द के लेखक युवा रचनाशीलता का कितना सम्मान करते थे, कितना प्यार करते थे। अंग्रेज़ी से अनुवाद किया है आशुतोष कुमार ठाकुर ने। अनुवाद करते हुए जिस तरह से उन्होंने अमिताभ घोष की भाषा के टोन को पकड़ा है वह उल्लेखनीय है। आइये पढ़ते हैं- मॉडरेटर
======================
आग़ा शाहिद अली ने पहली बार मुझसे अपनी निकट आती मृत्यु के बारे में 25 अप्रैल, 2001 को बात की थी। बातचीत की शुरुआत बिल्कुल सामान्य ढंग से हुई थी। मैंने उसे फ़ोन करके याद दिलाया था कि हमें दोपहर के भोजन पर एक मित्र के घर जाना है और मैं उसे लेने उसके अपार्टमेंट आऊँगा।
कैंसर का इलाज शुरू हुए उसे लगभग चौदह महीने हो चुके थे। फिर भी वह अपने पैरों पर खड़ा था। कभी-कभी उसकी स्मृति थोड़ी क्षीण पड़ जाती थी, बस इतनी-सी बात थी। फ़ोन पर मैंने उसे अपनी डायरी के पृष्ठ पलटते सुना। फिर अचानक उसने कहा, “ओह डियर, मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा।“
एक क्षण के लिए निस्तब्धता छा गई। फिर वह बोला, “उम्मीद है, इसका अर्थ यह नहीं कि मैं मर रहा हूँ…”
पिछले कुछ हफ्तों में मेरी और शाहिद की बहुत बातें हुई थीं, पर उसने मौत का ज़िक्र पहली बार किया था। मुझे समझ नहीं आया कि क्या कहूँ। उसने जो कहा और जिस लहजे में कहा, दोनों में कोई संगति नहीं थी। उसकी आवाज़ बहुत हल्की थी, जैसे वह मज़ाक कर रहा हो। मैंने बस इतना कहा, “नहीं शाहिद, ऐसा बिल्कुल नहीं है। तुम ठीक हो जाओगे।”
उसने मेरी बात बीच में ही काट दी। उसकी आवाज़ में जिज्ञासा थी और साथ ही एक सीधा और सहज आग्रह भी। उसने कहा, “जब ऐसा हो जाए, तो उम्मीद है तुम मेरे बारे में कुछ लिखोगे।”
मैं एकदम चुप हो गया। बहुत देर बाद ही मैं वे घिसे-पिटे शब्द कह सका, जो ऐसे मौक़ों पर लोग कह दिया करते हैं, “शाहिद, तुम ठीक हो जाओगे। तुम्हें मज़बूत रहना होगा…”
मेरे पढ़ने वाले कमरे की खिड़की से वह इमारत दिखती थी जहाँ शाहिद रहता था। वह यहाँ से कोई आठ ब्लॉक दूर थी। उसे वहाँ आए अभी कुछ ही महीने हुए थे। इससे पहले वह कुछ मील दूर मैनहैटन में रहता था। फरवरी 2000 में अचानक उसे अँधेरे जैसा एक दौरा पड़ा। जाँच में पता चला कि उसके दिमाग में एक जानलेवा ट्यूमर है। तब उसने ब्रुकलिन आने का फैसला किया, ताकि अपनी सबसे छोटी बहन समीता के पास रह सके। समीता प्रैट इंस्टीट्यूट में पढ़ाती थी और मेरे घर से कुछ ही ब्लॉक दूर रहती थी।
शाहिद ने मेरी दिलासा भरी बातों पर ध्यान नहीं दिया। वह हँसने लगा और तभी मैं समझा कि वह पूरी तरह गंभीर है। लगा जैसे वह मेरे कंधे पर एक साफ़ ज़िम्मेदारी रख रहा हो। वह चाहता था कि मैं उसे केवल हमारी बातों और यादों के हवाले न कर दूँ, बल्कि लिखे हुए शब्दों में, काग़ज़ पर, हमेशा के लिए बचा कर रख लूँ।
लोगों को समझने में शाहिद बहुत प्रवीण था। शायद वह यह भी जानता था कि मैं उसकी मौत पर लिखने से बचने के बहाने ढूँढने लगूँगा। मैं खुद से ही कहता कि मैं कवि नहीं हूँ, हमारी दोस्ती अभी बहुत पुरानी नहीं है, ऐसे कई लोग हैं जो उसे मुझसे बेहतर जानते हैं और वही उसके बारे में ज्यादा अच्छी तरह लिख सकते हैं। शाहिद ने पहले से ही इन सभी बहानों के रास्ते बंद कर दिए थे।
“तुम्हें मेरे बारे में लिखना ही होगा।”
यह स्पष्ट था कि इस आग्रह को स्वीकार करना ही होगा, लेकिन मुझे सूझ नहीं रहा था कि क्या कहूँ। आख़िर वे कौन-से शब्द होते हैं जिनमें कोई अपने मित्र को यह वचन देता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात उसके विषय में लिखेगा?
अंत में मैंने कहा, “शाहिद, मैं लिखूँगा। जितना अच्छा लिख सकता हूँ, लिखूँगा।”
बातचीत खत्म होते होते मुझे पता चल गया था कि मुझे क्या करना है। मैंने कलम उठाई, तारीख लिखी और उस बातचीत में जो कुछ याद था, सब लिख डाला। अगले कई महीनों तक मैं यही करता रहा। उसी लिखे हुए रिकॉर्ड की वजह से मैं आज उस दिन किया हुआ अपना वादा पूरा कर पा रहा हूँ।
मैं शाहिद से मिलने से बहुत पहले उसके काम से परिचित हो चुका था। 1997 में प्रकाशित उसका संग्रह The Country Without a Post Office मैंने पढ़ा था और उसकी कविताएँ मेरे भीतर कहीं गहरे उतर गई थीं। उससे मिलना तो बाद में हुआ। उससे पहले मैंने उसे कभी अपनी कविताएँ पढ़ते हुए नहीं सुना था। जब पहली बार उसकी आवाज़ सुनी, तो प्रतीत हुआ कि उसमें दो तत्व एक साथ विद्यमान हैं। एक ओर उस्तादों के कंठ-जैसी कोमलता, जो स्वर को अत्यंत बारीकी से साधती है, और दूसरी ओर एक कठोर, लगभग ज़िद-भरा अनुशासन। उसकी कविता भी मानो एक साथ दो धरातलों पर खड़ी थी। उसका एक पाँव इस संसार की ठोस और खुरदरी सच्चाई पर टिका था, तो दूसरा मनुष्य के भीतर बसे उस एकांत में, जहाँ एक गहरी नीरवता निवास करती है।
उस दौर की अनेक कविताओं में एक प्रकार की कृत्रिम सहजता थी। ऐसी सहजता जो पढ़ने पर गद्यवत प्रतीत होती थी, मानो कविता स्वयं को कविता कहलाने से बचा रही हो। शाहिद का स्वर इससे नितांत भिन्न था। वह कविता की उस उदात्त, औपचारिक, किंचित प्राचीन भाषा से तनिक भी नहीं हिचकता था। खासकर, उस भाषा से जिसमें कवि कई बार कवि नहीं, बल्कि गाथागायक प्रतीत होता है। मैं किसी अन्य कवि की कल्पना नहीं कर सकता जो इतनी सहजता से यह पंक्ति लिख सके:
“पागल दिल, हिम्मत रख।”
(Mad heart, be brave.)
1998 में कश्मीर को लेकर लिखे गए एक लेख में मैंने The Country Without a Post Office की एक पंक्ति उद्धृत की थी। तब मैं शाहिद के बारे में बस इतना जानता था कि वह श्रीनगर का है और उसने दिल्ली में पढ़ाई की है। मैं भी दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ा हूँ। हम लगभग एक ही समय वहाँ रहे होंगे, पर कभी मिले नहीं थे। मेरे कुछ दोस्त उसके भी दोस्त थे। उन्हीं में से किसी ने एक दिन मुझे शाहिद से मिलवाया।
1998 और 1999 में फ़ोन पर हमारी कई बार बात हुई और एक-दो बार मुलाक़ात भी। तब तक हम सिर्फ़ परिचित थे। अगले साल, जब वह ब्रुकलिन आ गया, हमारी दोस्ती धीरे-धीरे आकार लेने लगी। अब हम एक ही मुहल्ले में रहते थे। कभी-कभी साथ खाना खाने लगे। हमें जल्दी ही पता चला कि हम दोनों में बहुत सी बातें मिलती-जुलती हैं। तब तक, ज़ाहिर है, शाहिद की हालत गंभीर हो चुकी थी, लेकिन उसकी बीमारी ने हमारी दोस्ती की गति को धीमा नहीं किया।
फिर पता चला कि हमारे बीच दोस्तों की एक लंबी फेहरिस्त है – यहाँ भारत में भी, अमेरिका में भी, और दुनिया के दूसरे कोनों में भी। हमें रोगन जोश, रोशनआरा बेगम और किशोर कुमार से एक जैसा प्रेम था। क्रिकेट के प्रति हमारी एक जैसी उदासीनता थी और पुरानी बंबई फ़िल्मों के प्रति उतना ही गहरा लगाव। उसकी बीमारी के कारण हर साधारण-सी बातचीत के पीछे भी यह एहसास बना रहता था कि हमारे पास समय कम है। ऐसे व्यक्ति के साथ बैठकर खाना खाना और उन आधी-भूली हस्तियों के बारे में बातें करना, जो दोनों के अतीत का हिस्सा थीं, अपने आप में एक करुणा लिए हुए था। और यह करुणा इसलिए और गहरी हो जाती थी कि वह व्यक्ति एक ऐसा कवि था जो महानता तक पहुँच चुका था। शायद वह पहला, और एकमात्र, महान कवि था जिसे मैं अपने जीवन में मित्र के रूप में जान पाया।
शाहिद में रोज़ की चीज़ों को जादू जैसा बना देने की ताकत थी। एक बार मैं उसके भाई इक़बाल और बहन हेना के साथ अस्पताल गया। हमें उसे घर लाना था। तारीख 21 मई थी। तब तक उसके कई ऑपरेशन कामयाब नहीं हुए थे। वह फिर से अस्पताल में था। इस बार डॉक्टरों को उसके दिमाग पर पड़ रहा दबाव कम करने के लिए एक और ऑपरेशन करना था।
उसका सिर मुँड़ा हुआ था। नंगे सिर पर ट्यूमर का आकार साफ दिख रहा था। सिर के चारों ओर स्टील के टांके लगे थे। जब वार्ड से निकलने का समय आया, तो नीली वर्दी पहने अस्पताल का एक आदमी व्हीलचेयर लेकर आया। शाहिद ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। उसने कहा कि उसे इतना हौसला है कि अपने पैरों पर चलकर अस्पताल से बाहर जा सकता है।
लेकिन वह जितना खुद को समझ रहा था, उससे कहीं अधिक कमज़ोर हो चुका था। कुछ ही कदम चलने के बाद उसके घुटने मुड़ गए। इक़बाल दौड़कर व्हीलचेयर लेने गया और हम बाकी लोग कॉरिडोर में उसे सँभाले खड़े रहे।
उसी क्षण, उस उदास और बेरौनक अस्पताल की दीवार से टिके शाहिद पर जैसे अचानक कोई उल्लास उतर आया। जब अस्पताल का कर्मचारी व्हीलचेयर लेकर वापस आया, तो शाहिद ने मुस्कराते हुए पूछा कि वह कहाँ का रहने वाला है।
“इक्वाडोर,” उसने कहा।
शाहिद ने खुशी से ताली बजाई।
“स्पेनिश!” वह अपनी पूरी ताकत से कहा। “मैं हमेशा स्पेनिश सीखना चाहता था। सिर्फ़ लोर्का को पढ़ने के लिए।”
इतना सुनते ही उस थके-हारे, झुके कंधों वाले कर्मचारी में जैसे अचानक जान आ गई।
“लोर्का? आपने लोर्का कहा?”
उसने लोर्का की कुछ पंक्तियाँ सुनाईं और शाहिद की खुशी का ठिकाना न रहा।
“आह! शाम के पाँच बजे” (La Cinque de la Tarde) शाहिद ने कहा। वह शब्दों को अपनी ज़बान पर बड़ी प्रसन्नता से घुमाते हुए बोला, “मुझे उन शब्दों से कितना प्रेम है। La Cinque de la Tarde!”
और इस तरह हम अस्पताल की भीड़ भरी लॉबी से होकर बाहर निकले। सबसे आगे शाहिद और वह कर्मचारी थे। एक स्पेनिश कविता की छोटी-छोटी पंक्तियाँ सुना रहा था और दूसरा बीच-बीच में उल्लास से कह उठता था:
“शाम के पाँच बजे… शाम के ठीक पाँच बजे…”
“La Cinque de la Tarde, La Cinque de la Tarde…”
शाहिद की मेहमाननवाज़ी की कोई हद नहीं थी।
कोई शाम ऐसी नहीं जाती थी जब उसके बैठकखाने में महफ़िल न सजी हो। एक बार उसने मुझसे कहा था, “मुझे अच्छा लगता है जब घर में इतने सारे लोग होते हैं। लोग आते-जाते रहते हैं, घर में हमेशा खाने को कुछ न कुछ होता है। मुझे यह जश्न-सा माहौल पसंद है। इसमें उदासी के लिए कोई जगह ही नहीं बचती।
उसका अपार्टमेंट सातवीं मंज़िल पर था। नए सिरे से सज्जित उस इमारत में वह एक खुला-सा घर था, दो हिस्सों में बँटा हुआ। सबसे ऊपर उसका अध्ययन-कक्ष था – बड़ा और खाली, और उसके साथ लगी वह चौड़ी छत, जहाँ से ईस्ट रिवर के पार मैनहैटन की रोशनियों से जगमगाती सम्पूर्ण क्षितिज-रेखा का भव्य दृश्य दिखता था।
शाहिद को ब्रुकलिन का यह जल-तट बहुत प्रिय था। वह कहता था, यह घाट जैसा है, धीरे-धीरे ईस्ट रिवर में उतरता हुआ। और सामने, जल के उस पार, मैनहैटन की रोशनियाँ।
इमारत के मुख्य द्वार से उसके दरवाज़े तक की वह छोटी-सी यात्रा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक जाने जैसी लगती थी। ऊपर जाती लिफ्ट के उस उदास, धूसर अँधेरे में धीरे-धीरे रोगन जोश और हाक की गहरी महक भरने लगती। उसके अपार्टमेंट से हमेशा कुछ न कुछ सुनाई देता रहता। किसी गीत की धुन, बातचीत की कोई स्वर। यहाँ तक कि दरवाज़े की घंटी भी उस सबके बीच जैसे संगीत का ही एक हिस्सा लगती थी।
फिर अचानक दरवाज़ा खुलता और सामने शाहिद होता। जैसे ही वह दरवाज़ा खोलता, उसके साथ ही हींग की तीखी महक का एक बड़ा-सा बादल, बाहर न्यूयॉर्क की ठंडी हवा में घुल जाता।
“अरे वाह!” वह ताली बजाते हुए कहता, “कितना अच्छा कि तुम अपने इस तुच्छ मुसलमान को देखने आए हो!”
अंदर लगभग हमेशा आधा दर्जन या उससे अधिक लोग मौजूद होते। कवि, विद्यार्थी, लेखक, रिश्तेदार। रसोई में कोई न कोई खाना बना रहा होता या चाय तैयार कर रहा होता।
आख़िर तक, जब ज़िंदगी धीरे-धीरे उसकी उँगलियों से फिसल रही थी और बीमारी उसकी देह पर अपना हक़ जमाती जा रही थी, तब भी वह वहीं था – उसी जश्न के बीचो-बीच। चारों तरफ बातों का शोर, हँसी के ठहाके, खाने की महक, और इन सबके ऊपर तैरती हुई कविता। एक ऐसा मेला, जो कभी ख़त्म ही नहीं होता था।
घर में चाहे जितने लोग हों, शाहिद कभी भी इतना व्यस्त नहीं होता था कि उसकी नज़र रसोई पर न रहे। बातों के बीच अचानक रुक जाता और रसोई की ओर आवाज़ लगाता, “हाँ, अब दही डालो। अभी।”
जब उसकी आँखों की रोशनी धुंधलाने लगी थी, तब भी वह सिर्फ़ खुशबू से बता देता था कि रोगन जोश कहाँ तक पहुँचा है। और जब सब कुछ ठीक उसके मनमाफ़िक हो जाता, तो वह गहरी साँस लेकर हवा को सूँघता और काफी जोर से कहता, “आह! क्या सुगंध है खाने की!”
रसोई में शाहिद की दक्षता अब किंवदंती बन चुकी थी। वह अक्सर किसी डिनर पार्टी की योजना बनाने और उसकी तैयारी में कई-कई दिन लगा देता था। ऐसी ही एक दावत के दौरान, जब वह एरिज़ोना में था, उसकी मुलाक़ात कवि जेम्स मेरिल से हुई। यह मुलाक़ात आगे चलकर उसकी कविता की दिशा बदलने वाली थी। इसके बाद उसने कठिन छंद-विन्यास और canzone तथा sestina जैसे निश्चित काव्य-रूपों के साथ प्रयोग करना शुरू किया।
शाहिद की कविता पर जेम्स मेरिल का प्रभाव शायद किसी और से अधिक गहरा था। अपने निधन की सबसे स्पष्ट पूर्वछाया जिस कविता में उसने रची थी, I Dream I Am At the Ghat of the Only World, उसमें उसने मेरिल के लिए एक अंतिम संबोधन रखा था:
“शाहिद, चुप रहो। यह मैं हूँ, जेम्स।
प्रिय व्यक्ति हमेशा चला जाता है।”
(“SHAHID, HUSH. THIS IS ME, JAMES. THE LOVED ONE ALWAYS LEAVES.”)
“तुम्हारी मेरिल से मुलाक़ात कैसे हुई?” मैंने एक बार शाहिद से पूछा।
“मुझे पता चला कि वह कविता-पाठ के लिए आ रहा है। मैंने आयोजक से पूछा कि मैं उससे मिलना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, ‘तो फिर उसके लिए खाना क्यों नहीं बनाते?’ और मैंने बना दिया।”
मेरिल को खाना बहुत पसंद आया। जब उसे पता चला कि शाहिद न्यूयॉर्क राज्य के उत्तर में स्थित हैमिल्टन कॉलेज जा रहा है, तो उसने उसे अपना फ़ोन नंबर दिया और फ़ोन करने को कहा।
अमेरिकन अकादमी ऑफ़ पोएट्स में शाहिद के पहले कविता-पाठ के अवसर पर मेरिल भी मौजूद था। यह अपने आप में बहुत बड़ा सम्मान था, क्योंकि वह अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध कवियों में से एक था।
शाहिद को यह किस्सा याद करना बहुत पसंद था। “उसके बाद,” वह हँसकर कहता, “सब भागते हुए मेरे पास आए। कहने लगे, तुम्हें पता है जिम मेरिल आया था? उस एक शाम में न्यूयॉर्क में मेरा भाव हज़ार गुना बढ़ गया।”
खाना पकाने में शाहिद के लिए शुद्धता का महत्त्व सबसे अधिक था। वह मौलिक चीज़ की बहुत क़द्र करता था। पारम्परिक विधियों से ज़रा-सा भी हटना उसे मंज़ूर नहीं था। जो लोग शॉर्टकट अपनाते थे, उनके लिए उसके मन में एक तरह की तरस-भरी हँसी ही होती थी।
उसे अपने इलाके के भोजन से बहुत प्यार था। और उसमें भी एक ख़ास खाने से – “कश्मीरी खाना, पंडितों वाला।”
एक बार मैंने उससे पूछा, “ये तुम्हारे लिए इतना ज़रूरी क्यों है?”
वह थोड़ी देर खामोश रहा। फिर बोला, “एक सपना है जो मुझे बार-बार आता है। देखता हूँ कि घाटी से सारे पंडित चले गए हैं। एक भी नहीं बचा। और उनके साथ उनका खाना भी… हमेशा के लिए कहीं गायब हो गया है।”
यह एक ऐसा दुःस्वप्न था जो उसे लगातार सताता रहता था। बातचीत में भी और अपनी कविताओं में भी वह बार-बार उसकी ओर लौटता था।
एक समय के बाद मुझे याद नहीं रहा कि मैंने तुम्हें कहाँ खो दिया।
तुम्हें मेरी ज़रूरत थी। तुम्हें मुझे संपूर्ण करना था :
तुम्हारी अनुपस्थिति ने मुझे गढ़ कर तुम्हारा ही शत्रु बना दिया।
तुम्हारा इतिहास मेरी स्मृति में बाधा बनता है।
मैं वही हूँ जो तुम खो चुके हो। तुम्हारा पूर्ण शत्रु।
तुम्हारी स्मृति मेरी स्मृति के मार्ग में आ खड़ी होती है…क्षमा के लिए कुछ शेष नहीं है।
तुम मुझे क्षमा नहीं करोगे।
मैंने अपनी पीड़ा स्वयं से भी छिपा ली, अपनी पीड़ा केवल अपने समक्ष प्रकट की।
क्षमा के लिए सब कुछ है। तुम मुझे क्षमा नहीं कर सकते।
काश, किसी भाँति तुम मेरे हो पाते,
तो संसार में ऐसा क्या था जो असंभव रह जाता?
(At a certain point I lost track of you.
You needed me. You needed to perfect me:
In your absence you polished me into the Enemy.
Your history gets in the way of my memory.
I am everything you lost. Your perfect enemy.
Your memory gets in the way of my memory…
There is nothing to forgive. You won’t forgive me.
I hid my pain even from myself’; I revealed my pain only to myself.
There is everything to forgive. You can’t forgive me.
If only somehow you could have been mine,
what would not have been possible in the world?)
एक बार बातों बातों में उसने कहा, मुझे बंगाली खाना भी बहुत पसंद है।
मैंने कहा, पर शाहिद, तुम तो कलकत्ता कभी गए ही नहीं।
नहीं गया, उसने कहा। हमारे कुछ दोस्त थे, वही लाया करते थे। उसे खाते हुए लगता था, कितनी सारी चीज़ें हैं, जिनके बारे में हमें पता ही नहीं। पूरे देश में, हर जगह बिखरी हुईं।
उन दिनों वह ज़्यादातर बिस्तर पर ही रहता था। बीमारी ने उसे बाँध रखा था। वह पीठ के बल लेटा था, उँगलियों से आँखें ढँके हुए।
फिर अचानक उठकर बैठ गया।
“काश, यह सब कभी हुआ ही न होता,” उसने कहा। “देश का यह बँटवारा, लोगों के बीच ये विभाजन। हिंदू, मुसलमान, मुसलमान, हिंदू। तुम सोच भी नहीं सकते कि मुझे इससे कितनी नफ़रत है। इससे मैं बीमार पड़ जाता हूँ।”
वह थोड़ा रुका।
“मैं तो बस इतना कहता हूँ,” वह बोला, “तुम इन चीज़ों के साथ क्यों नहीं रह सकते, खाना, कपड़े, संगीत, इतनी सुंदर चीज़ें हैं।“
फिर बहुत धीरे से कहा, “कम से कम यहाँ, हमने एक ऐसी जगह तो बना ली है, जहाँ इन अच्छी चीज़ों की वजह से हम सब एक साथ आ सकते हैं।“
इन सारी अच्छी चीज़ों में सबसे ऊपर थी बेगम अख़्तर। बेगम अख़्तर की आवाज़।किशोरावस्था में ही, एक दोस्त के ज़रिये, उसकी पहली मुलाकात उनसे हुई थी। और उसके बाद बेगम अख़्तर उसकी ज़िंदगी से गई ही नहीं। एक स्थायी मौजूदगी की तरह, हमेशा के लिए वहीं बनी रहीं।
उसके अपार्टमेंट में जगह जगह छोटे छोटे आले थे, जैसे पूजा की जगहें। उनमें उन लोगों की तस्वीरें रखी थीं, जिन्हें वह मानता था, बेगम अख़्तर, उसके माता पिता, और जेम्स मेरिल।
मैं बेगम अख़्तर से प्रेम करता था, उसने एक बार मुझसे कहा। “किसी अन्य परिस्थितियों में तुम इसे एक तरह का यौन प्रेम भी कह सकते थे। पर मुझे नहीं मालूम, वह क्या था। मुझे उन्हें सुनना अच्छा लगता था, उनके पास रहना अच्छा लगता था। उनसे दूर रहना मेरे लिए असह्य था। सोचो, मैं सोलह साल का था, अपनी किशोरावस्था के बीचो बीच, और मैं उनसे दूर रह ही नहीं सकता था।“
शायद बेग़म अख़्तर के साथ इसी संबंध ने ग़ज़ल के प्रति उसके अगाध प्रेम को जन्म दिया था। फिर भी, ग़ज़ल से इतना प्रेम करने के बावजूद, अपने कुछ अमेरिकी प्रशंसकों के अति उत्साह से वह बहुत सहज नहीं था।
उसने हँसते हुए एक किस्सा सुनाया था। एक लेखक सम्मेलन में एक महिला उससे कहने लगी, ओह मुझे ‘ग़ज़ल्स’ बहुत पसंद हैं। मैं बहुत सारी ‘ग़ज़ल्स’ लिखने वाली हूँ। और मैंने बड़ी तकलीफ के साथ उससे कहा, ओह कृपया ऐसा मत कीजिए।
इन मामलों में हमेशा अनुशासनप्रिय रहने वाले शाहिद का विश्वास था कि यदि ग़ज़ल की संरचना का उचित सम्मान न किया जाए तो यह विधा कभी फल-फूल नहीं सकती।
ग़ज़ल के कुछ कायदे बिलकुल साफ़ हैं, और शास्त्रीय लिहाज़ से बहुत कठिन भी। शुरुआती शेर, जिसे मतला कहते हैं, पूरी ग़ज़ल का नक्शा तय कर देता है। उसमें दो चीज़ें होती हैं – क़ाफ़िया और रदीफ़। क़ाफ़िया यानी तुक, और रदीफ़ यानी वह शब्द या टुकड़ा जो हर शेर में बार-बार लौट कर आता है। क़ाफ़िया हमेशा रदीफ़ से ठीक पहले आता है। एक बार यह नक्शा बन गया, तो फिर हर शेर की दूसरी लाइन में उसी क़ाफ़िया और रदीफ़ को दोहराना पड़ता है। कवि इस नक्शे को बनाने के लिए पूरी तरह आज़ाद होता है, पर मैं ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि बनाते ही वह खुद उस नक्शे का गुलाम बन जाता है। और फिर पूरी ग़ज़ल में जो कुछ होता है, वह इस गुलाम की अपने मालिक पर काबू पाने की कोशिश ही तो है। इसी कोशिश में एक अजीब-सा संघर्ष है, और एक अजीब-सा आकर्षण भी।
कई सालों तक उसने एक ही काम अपने ज़िम्मे ले रखा था, अंग्रेज़ी में लिखने वाले कवियों से ग़ज़लें मँगवाना। उसी से एक किताब बनी, Ravishing DisUnities: Real Ghazals in English, जो वर्ष 2000 में छपी। ग़ज़ल को एक तरह का मानक देने की वजह से इस किताब का प्रभाव पहले से ही दिखने लगा था। हो सकता है कि अंग्रेज़ी कविता में ग़ज़ल के रूप को एक व्यवस्थित शक्ल देना ही आगे चलकर शाहिद का सबसे बड़ा काम माना जाए।
इस पूरे प्रकल्प का अपना सारांश उसने स्वयं कुछ इस तरह दिया था:
“यदि कोई कवि मुक्त छंद में लिखता है, ताकि वह पश्चिमी सभ्यता के बंधनों को तोड़ सके। पर उसे बंधे हुए छंदों में भी लिखना चाहिए, ताकि वह खुद को उसी सभ्यता से बचा सके।
शाहिद के लिए बेगम अख़्तर इसी रूप की जीती जागती मिसाल थीं। सिर्फ अपने संगीत में नहीं, अपने व्यक्तित्व में भी। ग़ज़ल में उसे जो सबसे ज्यादा पसंद था, वह था शब्दों से खेलने की कला, हाज़िरजवाबी, और एक तरह का नखरा। बेगम अख़्तर इन सबमें बेजोड़ थीं। उनके हाज़िरजवाबी के किस्से शाहिद के पास ख़त्म ही नहीं होते थे।
वह स्वयं भी प्रत्युत्तर की इस कला का कम बड़ा उस्ताद नहीं था।
एक बार बार्सिलोना हवाई अड्डे पर, विमान में चढ़ने से ठीक पहले एक महिला सुरक्षा-कर्मी ने उसे रोक लिया। उसने पूछा, “आप क्या करते हैं?”
“मैं कवि हूँ,” शाहिद ने जवाब दिया।
“स्पेन में क्या कर रहे थे?”
“कविता लिख रहा था।”
सवाल चाहे जो हो, शाहिद अपने उत्तर में कविता ले आता।
आख़िरकार झुँझलाई हुई महिला सुरक्षा-कर्मी ने पूछा, “क्या आपके पास ऐसी कोई चीज़ है जो दूसरे यात्रियों के लिए ख़तरनाक हो सकती है?”
शाहिद ने हाथ अपनी छाती पर रखा और कहा:
“सिर्फ़ मेरा दिल।”
यह उसके जीवन के उन क्षणों में से था जो ऑस्कर वाइल्ड की याद दिलाते हैं। बाद में इसी से उसकी कविता बनी, Barcelona Airport।
उसे ऐसे क्षण बहुत प्रिय थे।
एक बार उसने मुझसे कहा था, “मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे सवालों का जवाब देने का मौक़ा दें।”
7 मई को मुझे सौभाग्य से उसके साथ रहने का अवसर मिला, जब ऐसा ही एक मौक़ा उसके सामने आया।
साल 2000 की उस वसंत ऋतु में शाहिद मैनहैटन के बारूख कॉलेज में पढ़ा रहा था। दरअसल, वह उसकी जीवन की भी आख़िरी कक्षा थी। उसके तुरंत बाद उसे अस्पताल जाना था, इसलिए उस दिन की क्लास छोटी रखी गई थी।
मैंने उसके पढ़ाने के बारे में बहुत सुना था, पर उसे क्लास में देखना पहली बार हो रहा था, और आखिरी बार भी।
हम अंदर गए तो पता चला, विद्यार्थी उसे कितना चाहते हैं। उन्होंने एक पत्रिका का अंक उसी को समर्पित किया था।
लेकिन शाहिद पर उस दिन की उदासी का कोई असर नहीं था। शुरू से आखिर तक वह एक दिवा की तरह चमक रहा था। जैसे बेगम अख़्तर उसके भीतर उतर आई हों। हँसी और नखरे से भरा हुआ।
एक भारतीय छात्रा देर से आई तो उसने पुकारा, आह मेरी छोटी सी उपमहाद्वीपीय आ गई। फिर हाथ जोड़कर बेहोश होने का नाटक किया। एक और दक्षिण एशियाई छात्र को देखकर बोला, “मेरे भीतर देशभक्ति की तेज़ लहर उठ रही है।”
कक्षा के अंत की ओर एक छात्र ने कविता में ‘संभाव्यता और अनिवार्यता’ के बीच के अंतर को लेकर एक जटिल प्रश्न पूछा।
शाहिद सुनता रहा। उसकी भौंहें धीरे-धीरे ऊपर उठती गईं।
आख़िर वह अपने को रोक नहीं सका।
“ओह, तुम कितने शरारती लड़के हो,” उसने कहा और उँगलियों से मेज़ थपथपाई। “तुम हर चीज़ को एक अमूर्त विचार में बदल देते हो।”
पर बेगम अख़्तर सिर्फ हाज़िरजवाबी और नखरों का नाम नहीं थीं। मुझे लगता है, शाहिद और उनके बीच सबसे गहरा रिश्ता कहीं और था। इस समझ में कि अपने दुख को छिपाने के लिए सहज होने का अभिनय करना सबसे अच्छा तरीका है।
शाहिद बारहा बेग़म अख़्तर की शादी का एक किस्सा सुनाता था। उनके परिवार की पृष्ठभूमि भले ही संदिग्ध मानी जाती थी, लेकिन उनकी सुंदरता की ख्याति इतनी दूर तक पहुँच चुकी थी कि लखनऊ के एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार के उत्तराधिकारी ने उनके लिए विवाह का प्रस्ताव भेजा।
प्रस्ताव के साथ एक शर्त थी। इस प्रतिभाशाली युवा गायिका को गाना छोड़ना होगा। उस व्यक्ति का परिवार बेहद रूढ़िवादी था। ये उनकी कल्पना से परे था कि परिवार की कोई महिला मंच पर जाकर गाए।
बेग़म अख़्तर, या उस समय की अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी, ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
लेकिन इसके कुछ ही समय बाद उनकी माँ की मृत्यु हो गई।
टूटे हुए हृदय के साथ अख़्तरीबाई दिन-रात अपनी माँ की कब्र पर बैठकर रोती रहतीं। उनकी हालत इतनी बिगड़ गई कि डॉक्टर को बुलाना पड़ा।
डॉक्टर ने कहा कि अगर उन्हें गाने की अनुमति नहीं दी गई तो वह अपना मानसिक संतुलन खो देंगी।
तभी उनके पति के परिवार ने हार मान ली और उन्हें फिर से गाने की अनुमति दे दी।
शाहिद के मन में बेग़म अख़्तर की वह छवि गहरे बसी हुई थी। एक ऐसी बेटी की छवि जिसने अपनी माँ को खो दिया था और जिसकी सांत्वना किसी चीज़ में नहीं थी। वह उनकी कब्र पर बैठकर रो रही थी।
उनकी कविताओं में वह बार-बार इसी शोकाकुल रूप में लौटती हैं।
दुनिया को अपना विदा कहने वाली उसकी कविता
I Dream I Am At the Ghat of the Only World की शुरुआत ही बेग़म अख़्तर की स्मृति से होती है:
ग़ज़लों की एक रात अब समाप्ति पर है। गायिका
अपने ही चुने हुए आईने के पार चली जाती है,
उसका एक ही हीरा उसके अनगिनत गलों पर जड़ा हुआ चमकता है।
मैं, सदा की भाँति, वहीं ठहरा रह जाता हूँ।
(A night of ghazals comes to an end. The singer
departs through her chosen mirror, her one diamond
cut on her countless necks. I, as ever, linger.)
शाहिद का जन्म 1949 में नई दिल्ली में हुआ था। उसके पिता का परिवार कश्मीर के श्रीनगर का रहने वाला था। वे शिया थे, जो कश्मीर के मुसलमानों में अल्पसंख्यक हैं।
उसके परिवार में पढ़ाई लिखाई की एक समृद्ध परंपरा थी। शाहिद की दादी कश्मीर की कुछ पहली पढ़ी लिखी महिलाओं में से थीं। उसके पिता आगा अशरफ अली ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने दिल्ली की जामिया मिलिया में पढ़ाया और बाद में श्रीनगर के टीचर्स कॉलेज के प्रिंसिपल बने।
1961 में वे पीएचडी करने अमेरिका चले गए। इंडियाना के मन्सी में बॉल स्टेट टीचर्स कॉलेज के तुलनात्मक शिक्षा विभाग में।
जब परिवार अमेरिका गया तो शाहिद बारह साल का था। अगले तीन साल उसने मन्सी में स्कूल में पढ़ाई की। फिर परिवार वापस श्रीनगर लौट आया और शाहिद ने वहीं अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की।
मेरा अंदाजा है कि बचपन के वही तीन साल थे जिन्होंने बाद में शाहिद को अमेरिका में सहज बना दिया, जब वह ग्रेजुएट छात्र के रूप में पेनसिल्वेनिया पढ़ने के लिए गया था।
सांस्कृतिक विभाजन या संघर्ष की धारणा उसके मन में कभी बहुत जगह नहीं बना सकी। अमेरिका और भारत – ये उसके जीवन के दो ध्रुव थे। और अजीब बात यह थी कि वह दोनों ही जगहों पर खुद को घर में महसूस करता था। बिलकुल सहज, बिना किसी खिंचाव या दुविधा के।
शाहिद ने श्रीनगर के कश्मीर विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली और आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली गया, जहाँ उसने एम.ए. किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय की उसकी यादें अच्छी और बुरी, दोनों थीं। कैंपस में लोग उसे जानते थे, लेकिन कई बार उसे नज़रअंदाज़ भी किया गया और उसे निराशा भी मिली। शायद इसलिए कि वह मुसलमान था और कश्मीरी भी।
वहाँ उसकी गहरी दोस्तियाँ बनीं, जो उम्र भर साथ रहीं। लेकिन उसे विश्वासघात और दुख भी झेलने पड़े।
इसलिए जब पेन स्टेट यूनिवर्सिटी ने उसे पीएचडी के लिए स्कॉलरशिप दी, तो उसने राहत की साँस ली।
वह पेन स्टेट के दिनों को खुशी से याद करता था। कहता था – “वहीं मैं बड़ा हुआ। एक पाठक की तरह, एक कवि की तरह और एक प्रेमी की तरह।”
वहाँ उसकी मुलाकात स्नातक छात्रों के एक ऐसे समूह से हुई, जिनमें बहुत-से भारतीय थे।
वह अक्सर कहता था, “यह मेरे जीवन का सबसे सुखद समय था।”
बाद में वह क्रिएटिव राइटिंग की डिग्री लेने एरिज़ोना चला गया। इसके बाद अलग-अलग कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ। पहले हैमिल्टन कॉलेज, फिर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसाचुसेट्स, एमहर्स्ट और अंत में साल्ट लेक सिटी की यूनिवर्सिटी ऑफ़ यूटा। 1999 में उसे वहाँ प्रोफ़ेसर नियुक्त किया गया।
फ़रवरी 2000 में जब उसे पहली बार अचानक अँधेरा छा जाने जैसा दौरा पड़ा, तब वह यूटा से छुट्टी लेकर कुछ समय के लिए न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहा था।
1975 में पेनसिल्वेनिया जाने के बाद शाहिद ज़्यादातर समय अमेरिका में ही रहा। उसका भाई पहले से वहाँ था और बाद में उसकी दोनों बहनें भी वहाँ आ गईं।
लेकिन उसके माता-पिता श्रीनगर में ही रहे। हर साल गर्मियों के कुछ महीने उनके साथ बिताना शाहिद का नियम था।
“मैं अपने दिल में हमेशा दुखी देशों के बीच आता-जाता रहता हूँ।”
(I always move in my heart between sad countries.)
इस तरह अमेरिका और भारत के बीच आते जाते हुए वह उस बढ़ती हिंसा का बीच बीच में मौजूद पर सीधा गवाह बना, जिसने अस्सी के दशक के आखिरी सालों से इस पूरे इलाके को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया था।
वह ’89 था, पत्थर बहुत दूर नहीं थे,
बदलाव के संकेत हर जगह थे (कश्मीर जल्द ही
आग की लपटों में घिरने वाला था)…
(It was ’89, the stones were not far, signs of change
everywhere (Kashmir would soon be in literal
flames)…
कश्मीर की राजनीतिक स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। हिंसा और उसके जवाब में हो रही प्रति हिंसा का शाहिद पर गहरा असर पड़ा।
धीरे-धीरे कश्मीर उसके लेखन का एक प्रमुख विषय बन गया। यह कहना गलत नहीं होगा कि कश्मीर के बारे में लिखते हुए ही उसने अपना सबसे बेहतरीन काम किया।
इसमें एक विडंबना भी थी। शाहिद स्वभाव से राजनीतिक कवि नहीं था।
मैंने उसे एक बार कहते सुना था “अगर तुम किसी मुश्किल जगह से आते हो, और तुम्हारे पास लिखने के लिए बस वही एक कहानी है, तो लिखना बंद कर दो। अपनी कला का सम्मान करो। अपने लिखने के अंदाज़ का सम्मान करो। क्या लिखते हो, यह जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है कैसे लिखते हो।”
एक बार मैं उसके अपार्टमेंट में था। उसकी पुरानी मित्र पेट्रीशिया ओ’नील ने उसे एक विक्टोरियाई कवि के लिखे दो सॉनेट दिखाए। ये कविताएँ राजनीतिक थीं और तुर्की में आर्मेनियाई लोगों के नरसंहार को रोकने में ब्रिटिश सरकार की विफलता की तीखी आलोचना करती थीं।
शाहिद ने उन पर एक नज़र डाली और उन्हें एक तरफ़ रख दिया।
“ये बहुत ख़राब कविताएँ हैं।”
पेट्रीशिया ने पूछा, “क्यों?”
उसने कहा, “देखो, आर्मेनियाई नरसंहार के बारे में मेरी राय मुझे पहले से मालूम है। ज़ाहिर है, मैं उसके ख़िलाफ़ हूँ। लेकिन यह कविता मुझे उस नरसंहार के बारे में कुछ बताती ही नहीं। कविता के रूप में भी यह उसके साथ कुछ नहीं करती। मैं उतनी ही आसानी से कोई समाचार-रिपोर्ट पढ़ सकता हूँ।”
कश्मीर के भविष्य को लेकर शाहिद जितना व्यथित था, उतनी ही सख़्ती से उसने खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने से इनकार कर दिया, जबकि वह चाहता तो बड़ी आसानी से वह भूमिका ले सकता था।
अगर वह चाहता, तो टॉक-शो, न्यूज़ चैनलों और अखबारों के संपादकीय पन्नों पर उसकी एक पक्की जगह बन सकती थी।
लेकिन शाहिद को अपने रास्ते को लेकर कभी कोई संदेह नहीं था। वह कवि था, ऐसा कवि जिसने भाषा की कठिन और निर्मम कलाओं का अनुशासन सीखा था।
राजनीतिक टिप्पणीकार बनने में उसकी कोई रुचि नहीं थी।
जहाँ तक उसके राजनीतिक विचारों की बात थी, उनमें से बहुत-से विचार उसे अपने पिता से मिले थे। उसके पिता नेहरू के दौर के उन धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी रुझान वाले मुस्लिम बुद्धिजीवियों में से थे, जो धर्म का सम्मान करते हुए भी धर्म और राजनीति को अलग रखना चाहते थे।
एक बार शाहिद मेरे परिवार के साथ खाना खा रहा था। मैंने उससे सीधा सवाल किया:
“तुम्हारे विचार में कश्मीर का समाधान क्या है?”
उसने कहा, “मेरे ख़याल से सबसे अच्छा हल यही होगा कि कश्मीर को भारतीय संघ के भीतर व्यापक अर्थों में पूरी स्वायत्तता मिले।”
लेकिन इसके तुरंत बाद उसने लंबी-सी शर्तों और आशंकाओं की एक सूची गिनानी शुरू कर दी।
उसने कहा कि हो सकता है भारतीय हुकूमत ने कश्मीर में जो कुछ किया है, उसके बाद अब इस तरह के किसी समाधान की गुंजाइश ही न बची हो। उग्रवादी गुट किसी भी सूरत में ‘स्वायत्तता’ वाला हल मानने को तैयार नहीं होंगे। और इस पूरे मसले में इतनी पेचीदगियाँ आ चुकी हैं कि किसी हल के बारे में सोचना ही लगभग नामुमकिन हो गया है।
सच यह है कि शाहिद की नज़र इतनी राजनीतिक नहीं थी कि उसे नीतियों और समाधानों के खानों में बाँटा जा सके। व्यापक अर्थ में उसकी सोच हमेशा सबको साथ लेकर चलने वाली थी। और इसका श्रेय वह अपनी परवरिश को देता था।
वह अपने बचपन के एक प्रसंग के बारे में बहुधा बताता था। श्रीनगर में एक समय उसके भीतर अपने कमरे में एक छोटा-सा हिंदू मंदिर बनाने की इच्छा जागी थी।
पहले वह अपने माता पिता से कहने में हिचक रहा था। पर जब कहा तो उन्होंने उतने ही उत्साह से उसका साथ दिया जितनी उसकी अपनी इच्छा थी।
उसकी माँ ने उसके लिए मूर्तियाँ और दूसरी आवश्यक चीज़ें खरीदीं। कुछ समय तक वह उस छोटे-से मंदिर में नियमित रूप से पूजा भी करता रहा।
यह उसकी प्रिय स्मृतियों में से एक थी।
एक बार उसने मुझसे कहा था, “जब भी लोग मुझसे मुस्लिम कट्टरता के बारे में बात करते हैं, मैं उन्हें बताता हूँ कि कैसे मेरी माँ ने मेरे कमरे में मंदिर बनाने में मेरी मदद की थी। अब तुम इसका क्या मतलब निकालते हो? मैं उनसे पूछता हूँ।”
इस स्मृति की एक मार्मिक प्रतिध्वनि उसकी कविता Lenox Hill में सुनाई देती है:
और एक उत्सव पर, कश्मीर, तुम्हारे ही हाथों से
मैंने कृष्ण को मुकुट पहनाया,
अपनी ही बाँसुरी सुनते हुए।
( Lenox Hill’: and I, one festival, crowned Krishna by you, Kashmir/ listening to my flute.)
एक बार मैंने शाहिद से कहा कि अगर कश्मीर का कोई राष्ट्रीय कवि है तो वह वही है। उसने तुरंत जवाब दिया: “राष्ट्रीय कवि, शायद। लेकिन राष्ट्रवादी कवि नहीं। प्लीज, ऐसा मत कहना।”
कश्मीर की आज की दुर्दशा उसके लिए उस वादे के टूट जाने का प्रतीक थी, जो कभी उसकी मातृभूमि की मुक्ति के साथ जुड़ा हुआ था।
The Country Without a Post Office की शीर्षक कविता में एक कवि कश्मीर लौटता है और वहाँ एक गिरी हुई मीनार के रखवाले को पाता है:
‘कुछ नहीं बचेगा, सब खत्म हो चुका है,’
मैं फिर उसकी आवाज़ को देखता हूँ: ‘यह शब्दों की एक मज़ार है।
तुम्हें यहाँ मेरे नाम लिखे तुम्हारे ख़त मिलेंगे। और तुम्हारे नाम
लिखे मेरे ख़त। जल्दी आओ और उन गायब हो चुके
लिफ़ाफ़ों को खोल दो…”यह एक अभिलेखागार है। मुझे मिल गए हैं
उसकी आवाज़ के अवशेष, उस आवाज़ का नक्शा
जिसकी आकांक्षाओं की कोई सीमा नहीं थी।‘
(‘Nothing will remain, everything’s finished,’
I see his voice again: ‘This is a shrine
of words. You’ll find your letters to me. And mine
to you. Come soon and tear open these vanished
envelopes.”…
This is an archive. I’ve found the remains of
Of his voice, that map of longings with no limit.)
इन आदर्शों के खो जाने से जो निराशा पैदा हुई, उसने धीरे-धीरे एक ऐसी दृष्टि को जन्म दिया जिसमें कश्मीर एक भँवर बन गया। एक ऐसा भँवर, जिसमें अनगिनत छवियाँ एक ही स्थिर बिंदु के चारों ओर घूमती हैं।
वह बिंदु था मृत्यु।
अपनी मातृभूमि को इस तरह देखते हुए शाहिद खुद भी उन घूमती हुई छवियों में से एक बन गया। साक्षी (Sháhid) भी और शहीद (Shahíd) भी। उसका भाग्य कश्मीर के भाग्य से इस तरह जुड़ गया था कि दोनों को एक-दूसरे से अलग करना संभव नहीं था। जैसे एक की नियति दूसरे की पहले से लिखी हुई छाया हो।
मैं पतझड़ में मरूँगा, कश्मीर में,
और मेरी हर नस की सायेदार दिनचर्या
लगभग एक ख़बर बन जाएगी, ख़ून पर सेंसर लगा होगा
ज़ाफ़रानी आफ़ताब (Saffron Sun) और बाराँ-टाइम्स (Times of Rain) के लिए…
(I will die, in autumn, in Kashmir,
and the shadowed routine of each vein
will almost be news, the blood censored,
for the Saffron Sun and the Times of Rain….)
मेरे नोट्स में 5 मई की एक फ़ोन-बातचीत दर्ज है। उससे एक दिन पहले वह एक ज़रूरी जाँच के लिए अस्पताल गया था। एक स्कैन होना था, जिससे पता चलता कि कीमोथेरेपी का असर हो रहा है या नहीं। रिपोर्ट आने तक उसका बाकी सारा इलाज रोक दिया गया था।
स्कैन ढाई बजे दोपहर को होना था।देर दोपहर से शाम तक मैं उसे कई बार फ़ोन करता रहा, पर कोई जवाब नहीं आया। अगली सुबह फिर मिलाया। इस बार उसने उठा लिया।
उसने कोई भूमिका नहीं बाँधी। सीधे बोला, “सुनो अमिताभ, ख़बर अच्छी नहीं है। सीधी बात यह है कि अब वे मेरी सारी दवाएँ बंद कर रहे हैं। कीमो वगैरह सब। उन्होंने मुझे एक साल या उससे भी कम का वक़्त दिया है। उन्हें पहले से ही शक था। मेरा शरीर देखकर ही लग रहा था कि मैं इलाज पर सही से रिस्पॉन्ड नहीं कर रहा हूँ। कुछ दिन बाद थोड़ी रेडिएशन देंगे। पर उन्होंने कहा है कि उम्मीद बहुत कम है।”
मैं अपनी मेज़ पर निढाल-सा बैठा सामने शून्य में देखता रहा। फिर मैंने पूछा, “अब तुम क्या करोगे, शाहिद?”
“मैं मरने के लिए कश्मीर वापस जाना चाहता हूँ।”
उसकी आवाज़ शांत थी। उसमें कोई बेचैनी नहीं थी।
“अब मुझे पहले पासपोर्ट बनवाना है, वसीयत तैयार करनी है, बाकी सारे काम निपटाने हैं। मैं अपने भाई-बहनों के लिए कोई परेशानी नहीं छोड़ना चाहता।लेकिन उसके बाद मैं कश्मीर जाना चाहता हूँ। वहाँ अब भी सब कुछ बहुत सामंती तरीके से चलता है। पिताजी वहीं हैं, वहाँ मुझे सहारा मिलेगा। और सच कहूँ तो मैं नहीं चाहता कि मेरे बाद मेरे भाई-बहनों को वही सब झेलना पड़े, जो माँ के जाने पर हमें झेलना पड़ा था।”
बाद में, कई व्यावहारिक वजहों से उसने कश्मीर लौटने का अपना इरादा बदल दिया। उसने तय किया कि उसे नॉर्थहैम्प्टन में दफ़नाया जाए, एमहर्स्ट के पास, उस जगह के करीब जो उसकी प्रिय कवयित्री एमिली डिकिन्सन की वजह से उसके लिए इतनी ख़ास थी।
लेकिन मुझे नहीं लगता कि मौत की बात करते हुए उसका मन कश्मीर की ओर मुड़ना महज़ एक संयोग था।
उसकी कविताओं की दुनिया में मृत्यु, कश्मीर और Sháhid/Shahíd पहले ही एक-दूसरे में इस तरह शामिल थे कि अब उन्हें अलग करना संभव नहीं था। वे उन पुरानी तस्वीरों जैसे हो गए थे जो बारिश में भीग कर आपस में चिपक जाती हैं।
हाँ, मुझे वह याद है,
वह दिन जब मैं मरूँगा, मैं उस आकाश की
लाली बिखेर दूँगा,
बहुत पहले से सँजोई हुई उस आकाश की लाली, उसकी फैली हवा,
उसके रंग, और धरती का वह टुकड़ा
जो किनारा छोड़कर
लहू-लहू हो रहा होगा, जिस दिन मैं मरूँगा,
जब हम पहरेदारों से आगे निकल जाएँगे, और वह
दुनिया के आख़िरी केसर का रखवाला
मुझे एक ऐसी नाव में बिठाकर ले जाएगा
जिसका द्वीप एक क़ब्र के आकार का होगा।
वह मुझे दो गज़ तक
सूरज डूबने की दिशा में खेता ले जाएगा,
हर पीड़ा के पार।
सबकी ज़बान पर मेरी मौत की ख़बर होगी,
पर उसके होंठों पर वही प्यारा शेर होगा
“अगर फ़िरदौस बर रू-ए ज़मीं अस्त,
हमीं अस्तो हमीं अस्तो हमीं अस्त।”
(Yes, I remember it,
the day I’ll die, I broadcast the crimson,
so long ago of that sky, its spread air,
its rushing dyes, and a piece of earth
bleeding, apart from the shore, as we went
on the day I’ll die, past the guards, and he,
keeper of the world’s last saffron, rowed me
on an island the size of a grave. On
two yards he rowed me into the sunset,
past all pain. On everyone’s lips was news
of my death but only that beloved couplet,
broken, on his:
“If there is a paradise on earth
It is this, it is this, it is this.”)
शाहिद की माँ, सूफ़िया नोमानी, उत्तर प्रदेश के रुदौली की रहने वाली थीं। वह एक ऐसे परिवार से आती थीं, जिसकी पहचान उसकी सूफ़ी परंपरा से थी। शाहिद मानता था कि इसी विरासत ने उसकी ज़िन्दगी को जाने-अनजाने, कई अनदेखे तरीकों से गढ़ा था।
वह प्रायः कहता, “उनमें एक सूफ़ी की शान थी।”
शाहिद के माता-पिता रहते तो श्रीनगर में थे, पर जाड़े नई दिल्ली वाले फ़्लैट में बिताते थे। दिसंबर 1995 में वहीं, उसी फ़्लैट में, उसकी माँ को पहला दौरा पड़ा। शुरू में बीमारी पकड़ में नहीं आई।
जनवरी 1996 में जब घरवाले उन्हें न्यूयॉर्क के लेनॉक्स हिल अस्पताल ले गए, तब पता चला कि दिमाग में एक जानलेवा ट्यूमर है। उनकी हालत इतनी गंभीर थी कि न्यूयॉर्क पहुँचने के दो दिन बाद ही उनका ऑपरेशन करना पड़ा।
ऑपरेशन कामयाब नहीं रहा। इसके बजाय उनके शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया।
उस समय शाहिद और उसका बड़ा भाई इक़बाल, दोनों यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसाचुसेट्स, एमहर्स्ट में पढ़ा रहे थे। उसकी बहन हेना भी वहीं पीएचडी कर रही थी।
भाई-बहनों ने तय किया कि माँ को एमहर्स्ट ले जाया जाए। वहीं 24 अप्रैल 1997 को उनकी मृत्यु हुई।
माँ की इच्छा के अनुसार परिवार उनके शरीर को दफ़नाने के लिए वापस कश्मीर ले गया।
यह लंबी और आघात से भरी यात्रा बाद में कविताओं की एक पूरी श्रृंखला का विषय बनी, जिसका नाम था From Amherst to Kashmir । बाद में इसे शाहिद के साल 2001 में प्रकाशित संग्रह Rooms Are Never Finished में शामिल किया गया।
माँ की बीमारी के आख़िरी दौर में और उनकी मृत्यु के बाद कई महीनों तक शाहिद लिख नहीं सका।
यह ठहराव 1998 में Lenox Hill के साथ टूटा। संभवतः यह उसकी सबसे महान कविताओं में से एक है।
यह canzone के रूप में लिखी गई थी। एक ऐसा काव्य-रूप जो असाधारण सख़्ती और मशक्कत माँगता है। कवि एंथनी हेख्ट ने एक बार टिप्पणी की थी कि तीन canzone लिखने के कारण शाहिद का नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में होना चाहिए। किसी और कवि ने इतनी canzone नहीं लिखी थीं।
लेनॉक्स हिल में इस काव्य-रूप की स्थापत्य-रचना एक ऊँचा, उठता हुआ ढाँचा रचती है। किसी विशाल गुम्बददार अहाते-सा। इस्फ़हान की जामा मस्जिद-सा, या काहिरा में सैयदा ज़ैनब के मज़ार-सा।
एक ऐसी जगह, जो अपने विन्यास के कारण और भी विराट लगती है।
तुक और अर्ध-तुक उन मधुमक्खी के छत्ते जैसे मेहराब हैं जो गुम्बद को आकाश की ओर उठाते हैं। छंद वह मोज़ेक है जो पूरे ढाँचे को उसकी जगह पर थामे रखता है।
इस सीमित लेकिन विराट जगह के भीतर कविता की हर पंक्ति एक खिड़की खोलती है और हर खिड़की से एक रोशनी महाद्वीपों को पार करती हुई दिखाई देती है। एमहर्स्ट से कश्मीर तक। लेनॉक्स हिल अस्पताल से पीर पंजाल दर्रे तक।
और इस उठते हुए स्थापत्य के ठीक केन्द्र में उसकी माँ दफ़्न हैं:
…माँ,
उन्होंने मुझसे पूछा,
“तो लिखना कैसा चल रहा है?”
मैंने कहा,
“मेरी माँ ही मेरी कविता हैं।”
वे और क्या उम्मीद करते?
कश्मीर के उस धुँधलाते हुए वादे के सिवा
कोई कविता पर्याप्त नहीं थी,
और वे सदा-एँ जो कश्मीर की चट्टानों से
(पंद्रह सदियाँ पार करती हुई)
अस्पताल तक पहुँची थीं।
“कश्मीर,
वह मर रही है!”
उसकी साँसें ब्रह्मांड की सारी आवाज़ों को
डुबो देती हैं,
जब वह एमहर्स्ट में सोती है।
इस कविता में वे सभी काव्य-युक्तियाँ मौजूद हैं, जिन्हें शाहिद ने जीवन भर साधा था। जिन्हें शाहिद ने आजीवन साधा था — अलंकारिक प्रश्न, आज्ञार्थक वाक्य, पंक्ति-क्रम का भंग और विराम-चिह्नों का ऐसा प्रयोग जहाँ अर्थ एक साथ अनेक दिशाओं में खुलता है, किंतु किसी एक अर्थ पर स्थिर नहीं होता।
और कविता का अंत, उसकी अधिकांश कविताओं की तरह, एक ऐसे मोड़ पर होता है जो एक साथ किंचित कृत्रिम और मर्मभेदी लगता है।
क्योंकि कश्मीर के लिए मेरे शोक के सामने
वे शोक क्या हैं,
और ब्रह्मांड के शोक भी क्या हैं
(मैं हिसाब की किताब बंद करता हूँ)
जब मैं तुम्हें याद करता हूँ,
उस सबके पार जिसका कोई हिसाब नहीं,
ओ मेरी माँ?
(For compared to my grief for you, what are those of Kashmir,
and what (I close the ledger) are the griefs of the universe
when I remember you – beyond all accounting – O my mother?)
शाहिद के लिए समय बीतने से माँ को खोने का वह पहला आघात कभी कम नहीं हुआ। वह उसे बार-बार जीता रहा, अपने जीवन के आख़िरी दिन तक। प्रायः बातचीत के बीच अचानक रुककर वह कहता, “मुझे विश्वास नहीं होता कि वह चली गई हैं। मुझे अब भी विश्वास नहीं होता।”
उसकी मृत्यु से एक सप्ताह पहले, एक सुबह उठने पर उसने परिवार से पूछा कि उसकी माँ कहाँ हैं और क्या यह सच है कि उनकी मृत्यु हो चुकी है।
जब उसे बताया गया कि हाँ, वह मर चुकी हैं, तो वह ऐसे रोया जैसे उस घटना को उसी क्षण पहली बार जी रहा हो।
Lenox Hill के अंतिम से एक पहले पद में शाहिद ने एक ऐसा उलटाव रचा है जो हृदय की गति को जैसे एक क्षण के लिए रोक देता है। वह स्वयं को अपनी माँ की माँ के रूप में देखने लगता है:
“जब तुम यहाँ मेरे पास बैठते हो, तुम बिल्कुल मेरी माँ जैसी लगती हो,”
वह मुझसे कहती है। मैं उसकी कल्पना करता हूँ: कश्मीर में
एक दुल्हन,
वह रीगल में बैठी है, पिता के साथ अपनी पहली फ़िल्म देख रही है।
काश मैं तुम्हें अपनी बाँहों में भर पाता, माँ,
मैं तुम्हें बचा लेता,
अब अपनी बेटी की तरह,
ईश्वर से।
ब्रह्मांड अपना बही-खाता खोलता है।
मैं लिखता हूँ:
ईश्वर की माँ कितनी असहाय थी!
(‘As you sit here by me, you’re just like my mother,”
she tells me. I imagine her: a bride in Kashmir,
she’s watching at the Regal, her first film with Father.
If only I could gather you in my arms, Mother,
I’d save you – now my daughter – from God. The universe
opens its ledger. I write: How helpless was God’s mother!)
मुझे वह शाम आज भी साफ़ याद है जब शाहिद ने मेरे घर की बैठक में यह कविता पढ़ी थी।
मुझे इसलिए याद है कि मैं अपने भीतर उठते उस सवाल को रोक नहीं पा रहा था कि क्या यह संभव है कि शाहिद का अपनी माँ के साथ तादात्म्य इतना गहरा हो गया था कि वह आत्मा की सीमा पार करके शरीर तक पहुँच गया हो।
जहाँ तक मुझे मालूम है, मस्तिष्क का कैंसर वंशानुगत बीमारी नहीं है। फिर भी उसका शरीर जैसे अपनी माँ की मृत्यु की परिस्थितियों को दोहराने के लिए स्वयं आगे आया था।
लेकिन ऐसा कैसे संभव हो सकता था?
अरस्तू द्वारा प्रतिपादित मन और शरीर के बीच की उस कठोर विभाजन-रेखा के सम्मुख, और उसी से उपजी कारण-कार्य की धारणाओं के सामने, यह विचार भी असंभव-सा प्रतीत होता है।
फिर भी कुछ परम्पराएँ ऐसी हैं जहाँ कविता अपने भीतर ही कारण और परिणाम की एक पूरी सृष्टि रच लेती है। वहाँ रूपक शब्दों को जोड़ने भर का साधन नहीं रह जाता; वह एक विशिष्ट यथार्थ को एक साथ बाँध देता है और उसे इस प्रकार गूँथता है कि एक वस्तु दूसरी में घटित होने लगती है। इस अर्थ में शाहिद अपनी समस्त काव्य-सत्ता को आधुनिक पाश्चात्य परम्परा के मध्य में स्थित मानता था।
किन्तु उसकी कल्पनाशीलता, उसके स्वप्न, उसके दृश्य-बिम्ब, और जिन लोगों से वह प्रेम करता था उनके साथ उसकी असाधारण तादात्म्य-भावना, उसका जीवन और सम्भवतः उसकी मृत्यु भी — इन सबके पीछे कार्यरत इच्छा आधुनिकतावादियों की अपेक्षा सूफ़ियों और भक्ति-कवियों के अधिक निकट थी।
वह केवल कविता रचने वाला लेखक नहीं था। अपनी काव्य-दृष्टि का साक्षात् रूप बन जाने की उसकी आकांक्षा में मुझे वह एलियट और मेरिल की अपेक्षा रूमी और कबीर का कहीं अधिक बड़ा उत्तराधिकारी दिखाई देता है।
शाहिद को आख़िरी बार मैंने 27 अक्टूबर को एमहर्स्ट में उसके भाई के घर देखा था।
वह बीच-बीच में बातचीत करने की स्थिति में था। कुछ क्षण ऐसे भी आए जब हमने ठीक वैसे ही बातें कीं जैसे पहले किया करते थे। वह अपनी निकट आती मृत्यु से बहुत पहले से परिचित था, और अब उसने उससे समझौता कर लिया था।
मुझे उसमें न कोई पीड़ा दिखी, न कोई अंतर्द्वंद्व। अपने परिवार और मित्रों के प्रेम से घिरा हुआ वह शांत था, संतुष्ट था, जैसे गहन विश्राम में हो।
एक बार उसने मुझसे कहा था, “मुझे यह सोचकर अच्छा लगता है कि यदि कोई दूसरी दुनिया है, तो वहाँ मैं अपनी माँ से मिलूँगा।”
मुझे लगता था कि जैसे-जैसे अंत निकट आ रहा था, यही उसकी सबसे बड़ी सांत्वना बनती जा रही थी।
8 दिसंबर की रात दो बजे उसकी मृत्यु हुई। वह नींद में ही शांति से चला गया।
अब, उसकी अनुपस्थिति में, मुझे आश्चर्य होता है कि इतनी कम अवधि की मित्रता अपने पीछे इतना विराट रिक्त कैसे छोड़ सकती है। प्रायः जब मैं अपने बैठक-कक्ष में प्रवेश करता हूँ तो मुझे वहाँ उसकी उपस्थिति का स्मरण होता है। विशेषकर वह रात, जब उसने हमारे समक्ष संसार को अपनी विदाई सुनाई थी:
I Dream I Am At the Ghat of the Only World.
मुझे याद है कि उसने किस तरह ग़ज़लों से भरी एक शाम की कल्पना की थी, जो धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी। मुझे वह गायिका याद है। जिन्हें वह प्रेम करता था। बेग़म अख़्तर की आवाज़, इक़बाल अहमद की आवाज़, जेम्स मेरिल की आवाज़। वे सभी उसे उसकी माँ की ओर जाते हुए जैसे पुकार रहे थे।
“आख़िर में प्रेम भी किसी को बचा नहीं सकता।”
शाहिद जानता था कि अंत कैसा होगा।
और वह अपनी विदाई कहने में बेहद सावधान था।
जीवन की आख़िरी पंक्तियों के लिए वह एक ऐसा संबोधन गढ़ रहा था, जिसमें उसकी पूरी जीवन-कविता जैसे धीरे-धीरे सिमट आई थी।
अमिताभ घोष
ब्रुकलिन
1 जनवरी, 2002



काफी देर से मैँ यह शोकांतिका पढ़ रही हूँ।अमिताभ घोष ने इसे दिन ब दिन एहसास करते हुए लिखा और आशुतोष कुमार ठाकुर ने उसे उसी भीगे हाल में हम तक पहुंचाया।शोकंजलि की कोई तारीख नही होती।यह तारीख के साथ न शुरू होती है न खत्म।पढ़ते हुए मुझे शाहिद की शायरी के साथ साथ उन कश्मीरी मसालों की खुशबू आने लगी जिनको वे उसी तबीयत से इस्तेमाल करते थे जैसे शब्द।में तो खुद एक दहाई से शोक जी रही हूँ।
आशुतोष बार बार सिर को झटकना पड़ा।नहीं यह में नही लिख रही।यह अमिताभ घोष का संस्मरण है शाइर शाहिद के बारे में और इसे जानकीपुल पर आशुतोष ठाकुर ने बेहतरीन लफ़्ज़ों में तर्जुमा कर हम तक पहुंचाया है।
बिल्कुल रवींद्र कालिया की दास्तां लग रही है।जिंदगी से लबरेज़ एक आर्टिस्ट,बेगम अख्तर की गायकी का दीवाना,लज़ीज़ खाना बनाने का शौकीन!क्या सब आर्टिस्ट एक से होते हैं?कय्या उनकी नियति भ्य एक सी होती है?उलझ गए हैं मेरे मन में बहुत से तार बेतार!