किसी लेखक को उसके लेखन में आये संदर्भों-प्रतीकों के माध्यम से जानने का रोमांच अलग ही होता है। लेकिन यह रोमांचक यात्रा कोई अच्छा साहित्य प्रेमी ही कर सकता है। ऐसे ही साहित्य प्रेमी और लेखक हैं अभिषेक कुमार अंबर। आज उन्होंने शिवानी पर ऐसा ही एक लेख लिखा है, जिसमें शिवानी जी की रचनाओं के माध्यम से उनको, उनके लेखन को समझने की कोशिश है। कल शिवानी जी की जयंती थी। आज समय निकालकर इस लेख को पढ़ियेगा- मॉडरेटर
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कहाँ से शुरू करूँ? किस ख़याल की ऊन को कातूँ? उससे कौन सा क़िस्सा रूपी स्वेटर बुनूँ? कितनी बातें याद आती हैं किंतु उनकी कोई तरतीब नहीं।
कभी स्वयं को नैनीताल के पाषाणी देवी मंदिर के प्रांगण में खड़ा पाता हूँ। कभी अल्मोड़ा के मल्ला कसून के खंडहर हो चुके घर के आँगन में। सुदूर चोटी पर अयारपाटा के प्रेयरी लॉज को भी कैसे भुला दूँ?
उनकी स्मृतियों को ताज़ा करने आख़िर में कहाँ कहाँ नहीं गया? लखनऊ गया तो शिवमूर्ति जी से भी मेरा सवाल यही था क्या आप शिवानी से मिले हैं? (शिवानी ने काफ़ी अरसा लखनऊ में बिताया था)
आज जब उन स्मृतियों एवं यात्राओं को कलमबद्ध करने की बारी आई है तो सोचता हूँ जीवन के किसी मोड़ पर टकराए लोगों को अपनी कहानियों के शीशे में उतार देने वाली कलम की जादूगरनी के प्रतिबिम्ब मात्र को भी क्या मैं अपने लेखन में उतार पाऊँगा?
गौरा पंत शिवानी से मेरा प्रथम परिचय स्कूल के दिनों में हो चुका था। मैं यह जानता था कि वह हिन्दी की महान लेखिका हैं और जैसा हमारे यहाँ महान लोगों के साथ होता है वही उनके साथ भी हुआ। मैंने उनकी पुस्तकों को बहुत आदर एवं श्रद्धा के साथ देखा किन्तु पढ़ा नहीं।
सुना था बहुत संस्कृतनिष्ठ हिन्दी लिखती हैं। किताबों को लाइबेरी में खोले बग़ैर ही यह धारणा बना ली कि अपने तो क्या ही समझ में आएगी। सो दूर से ही प्रणाम करके निकल लेता।
कॉलेज के दिनों में जब उनकी कहानियाँ पढ़ीं तो मुझे अपनी नासमझी पर हँसी आई। क्या कहन, क्या चुस्त-दुरुस्त भाषा। भारी भरकम संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग ऐसा जैसे दांतों के नीचे इलायची आ जाए। कहानियाँ एक नहीं, दो नहीं, कई-कई बार पढ़ीं।
फिर जब कुमाऊँ आने जाने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ तो शिवानी की कहानियों के पात्र मानो मेरे पीछे पढ़ गए।
बात शुरू करता हूँ नैनीताल की एक शाम से, जब झील के किनारे हिलोर लेती तरंगों के साथ मन भी बहता जा रहा था। नैनादेवी मंदिर की घंटियों से पूरा नैनीताल गुंजायमान था। नभ में लाल और नीली रेखाएँ किसी चित्रकार के कैनवस का प्रतिबिंब नज़र आ रही थीं। ऐसे में हम दोनों मित्र (मैं और मोहित नेगी) ठंडी सड़क पर चहलकदमी करते हुए सांझ को विदा कर रहे थे।
ठंडी सड़क शोर भरे नैनीताल में हरियाली से भरी शांत सड़क है। जो माल रोड के एकदम विपरीत ताल के दूसरी तरफ़ स्थित है। माल रोड के चकाचौंध से उकता जाने वाले मुसाफ़िर और स्थानीय लोग इसी सड़क पर घूमना पसंद करते हैं।
“वो सामने मंदिर देख रहे हो?” मोहित ने कहा।
“हाँ! नैना देवी मंदिर! कितना सुंदर लग रहा है।”
“मैं नैना देवी की नहीं, ठीक सामने वाले मंदिर की बात कर रहा हूँ।” उंगली के इशारे से मोहित ने मुझे मंदिर दिखाया।
“हाँ देख रहा हूँ।”
“वह नैनीताल का प्राचीनतम मंदिर है पाषाणी देवी मंदिर।”
एक पल को आँखों के सामने कई आकृतियाँ उभरीं, कई दृश्य सजीव हुए और फिर शून्य में विलीन हो गए। भूले-बिसरे कई किरदार याद आने लगे।
क्या सोच रहे हो?
“कुछ नहीं। बस इस मंदिर के नाम से कुछ स्मृतियाँ ताज़ा हो आईं।”
“किन्तु तुम तो यहाँ पहली बार आ रहे हो ना?”
“हाँ ठंडी सड़क पर पहली बार आया हूँ। लेकिन पाषाणी देवी मंदिर में नहीं।”
“ऐसा कैसे हो सकता है कि सड़क पर नहीं आए पर मंदिर आ गए। मैं समझा नहीं।”
“कुछ यात्राएँ शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी होती हैं।”
शिवानी की कहानियों में अक्सर इस मंदिर का ज़िक्र हुआ है। देवी की महिमा का बखान भी। कैसे भूल सकता हूँ शिवानी की कहानी ‘पिटी हुई गोट’?
वो भी तो सर्दियों भरे दिन ही थे जब गुरुदास साह ने इसी मंदिर के किनारे झील में डूब कर आत्म हत्या कर ली थी। शहर भर में सुबह सुबह शोर मच गया।
पाषाणी देवी मंदिर के सामने नैनी झील का कुख्यात भँवर है जिससे आज तक बचकर कोई वापस नहीं आया। कहते हैं मंदिर की तरफ़ झील की गहराई भी सर्वाधिक है। जो एक बार इसमें डूब जाता है वो झील के नहीं दुनिया के पार निकल जाता है। एक दिन गुरदास साह भी निकल गया।
आप सोच रहे होंगे। क्या किया था उसने?
मैं कहूँगा “लालच”।
आज तक जुआ खेल कर कोई रातों रात अमीर हुआ है। हाँ रातों रात इसने सैंकड़ों गृहस्थियाँ ज़रूर बर्बाद कर दीं।
पिछली बार जब मैं नैनीताल आया था और टांकी रोड पर चीना पीक की चढ़ाई के प्रारंभिक बिंदु पर खड़ा था। तब भी आँखों के आगे गुरदास साह और उसके जुआरी साथियों की चीना पीक जाती आकृति मेरी आँखों के सामने उभर आई थीं। महिम भट्ट, मालदार कुंदन सिंह, कुँवर लाल बहादुर, सुंदर जोशी और इन लोगों के बीच फँसा बलि का बकरा गुरुदास साह।
तब भी मैंने उसे रोकना चाहा था। किन्तु ईश्वर की लिखी तक़दीर और लेखक की लिखी कृति में क्या कोई फेर-बदल संभव है? यह जानते हुए भी जैसे हम तक़दीर बदलने के प्रयास करते रहते हैं वैसे ही मैं नादान पाठक कहानी बदलने की नाकाम कोशिश।
दीवाली की शाम को यह लोग जुआ खेलने चीना पीक जा रहे हैं। गुरुदास को क्या ख़बर आज वो जेब में ठुसे दस हज़ार ही नहीं, अपनी मेवों की दुकान और यहाँ तक कि चन्दो को भी हार जाएगा। हाँ! बुड्ढे गुरुदास की नवयौवना बीवी चन्दो।
उसे क्या ख़बर आज नैनीताल हस्तिनापुर बनेगा और द्रौपदी की जगह चन्दो जुए में हारी जाएगी। लेकिन चन्दो का दुख द्रौपदी के दुख से बहुत बड़ा है।
द्रौपदी को तो अपने जुए में हारे जाने की ख़बर बाद में लगी, लेकिन पतिव्रता चन्दो आज रात महिम भट्ट के घर में, महिम भट्ट और अपने पति गुरुदास के बीच बैठकर ताश की रानी बनकर रह जाएगी, जिस पर जीतने वाले का हक़ होगा।
कल की सुबह गुरुदास नहीं देख पाएगा। वह पाषाण देवी के मंदिर के पास ताल में कूद कर ख़ुदकुशी कर लेगा।
छपाक!!!
पानी में विशालकाय मछली के गोते से मेरे ख़यालों का दर्पण टूटा। हम काफ़ी देर से मंदिर के बाहर खड़े थे। अब मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
पाषाणी देवी मंदिर भले नैनीताल का प्राचीनतम मंदिर हो लेकिन यह पर्यटकों के बीच उस तरह प्रसिद्ध या कहें सिद्ध नहीं जैसे नैना देवी मंदिर है। आख़िर वह हिन्दू धर्म की प्रमुख देवी सती से जुड़ा स्थान है जबकि पाषाणी देवी स्थानीय देवी हैं।
मंदिर बाहर से भव्य दिखता है लेकिन अंदर केवल 2-4 लोगों के बैठने का स्थान है। पहाड़ की शिला पर उभर आई पाषाणी देवी की आकृति को पुजारियों द्वारा गेरुए रंग से रंग दिया गया है और उसपर आँख, नाक, मुँह आदि को साफ़ साफ़ उभार दिया है।
देखकर लगता हूँ जैसे पहाड़ में कोई देवी क़ैद हो जो भक्तों की आराधना से प्रसन्न हो बाहर निकल रही हों। रूप भव्य है एवं भयावह भी।
मंदिर के गर्भ गृह में हाथ जोड़े हुए मुँह से कुछ दबे-दबे से बोल फूट रहे हैं।
मेरा कह्या नीकह्या
करिया नीकरिया
मेरी सुणियाँ नीसुणिया
करिए छिमा
छिमा मेरा प्रभु…।
खुली आँखों से मानो रजुला को देख रहा हूँ। पाषाणी देवी से अपने किये कर्मों की छिमा माँगते हुए। नैनीताल जाऊँ या अल्मोड़ा रजुला ने भी मेरा पीछा कब छोड़ा। या यूँ कहूँ मैंने भी रजुला को कब याद नहीं किया।
चंचल, शोख लड़की आख़िर देवी से किस गुनाह की छिमा माँगती हुई बूढ़ी हो गई? क्या उसने कोई गुनाह किया भी। या दूसरे के गुनाह को अपना गुनाह जान जीवन भर प्रभु से छिमा माँगती रही।
हाँ! गुनाह तो किया था ना रजुला ने। प्रेम करने का गुनाह। यह तो दुनिया में गुनाह-ए-अज़ीम है। फिर अपने उस प्रेम की निशानी एकमात्र पुत्र को अपने हाथों से मारने का पाप। उसका था या उसके प्रेमी का? आखिर इस प्रेम को कौन नहीं स्वीकार कर पाया। रजुला या सुदर्शन नायक?
अब सारे प्रश्न बेमानी नज़र आते हैं। लेकिन रजुला की छिमा? वह एक निश्छल मन की पुकार थी जिसने उसे सुना होगा क्या उसमें भी अपने किये-अनकिये की क्षमा का भाव नहीं जागा होगा?
याद आती हैं अल्मोड़ा की अपनी दर्जनों यात्राएँ। लेकिन उनमें से सबसे ख़ास यात्रा वह, जब कसार देवी से लौटते हुए मल्ला कसून में शिवानी के घर के बाहर क़दम ठिठके थे। अपने स्वर्णिम इतिहास की कहानी कहता खंडहर में तब्दील होता भवन। जिसकी चौखट पर कभी रवींद्रनाथ टैगोर सरीखी महान विभूतियों की पग-धूलि पड़ी। जिसके आँगन में दर्जन नौकर चाकरों एवं परिवारजनों के साथ शिवानी का बचपन बीता।
संस्कृत के प्रकांड विद्वान, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के संस्थापक पितामह हरिराम पांडे की देख रेख में पली बढ़ी शिवानी।
अब घर के मुख्य द्वार के बराबर में ‘स्टार टेलर’ नामक दुकान है। मेहराबदार मुख्य द्वार के ऊपर अल्मोड़ा घास उगी है। एक बोर्ड भी लगा है जो आधा धुन्दला पड़ चुका है। सिर्फ इतना पढ़ने में आता है ‘…शिक्षा सदन, मल्ला कसून 1980’। नीले रंग से पुते हैं द्वार और सफ़ेद चूने से दीवारें। सीढ़ियों चढ़कर ऊपर पहुँचा तो देखा घर में अभी भी कोई रहता है। मैंने आवाज़ लगाई।
“घर में कोई है?” अंदर से 60-65 वर्ष के वृद्ध बाहर आए।
यह शिवानी का घर है ना? क्या हम इसको देख सकते हैं?
“जी शिवानी का ही घर है। आप घर को देखिए। अब तो खण्डहर हो चुका है।”
“आप यहाँ कब से रह रहे हैं?”
“आँखें ही इस घर में खोली हैं बेटा।”
उनके जवाब से मैं निरुत्तर सा घर को देखने लगा। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने पर सामने छोटा सा बगीचा पड़ता है जिसका आकर शायद पड़ोसियों द्वारा हड़पने पर छोटा हो गया है। बाईं तरफ़ घर अवस्थित है। घर के जिस भाग में वृद्ध रह रहे थे उसे उन्होंने किसी तरह कामचलाऊ बना रखा था। उसके अलावा बाक़ी का हिस्सा जर्जर अवस्था में था।
बगीचे के बराबर की पगडंडी से मैं आगे के कमरों की तरफ़ बढ़ने लगा। सोचता हूँ इसी बगीचे में कभी वह अखरोट का दरख़्त रहा होगा जिसके नीचे शिवानी पहली बार रजुला से मिली थीं। और रजुला ने कहा था। “क्या सुनोगी लली, ऋतुरैण, परी चांचरी या रमौला..?”
और इस तरह शुरू हुआ गायन का सिलसिला कब संगीत शिक्षिका एवं शिष्या में तब्दील हो गया पता ही नहीं चला। वह अक्सर आती और शिवानी को तरह तरह के लोकगीत सुनाती। जो शिवानी के ज़रिए शांति निकेतन तक पहुँचे।
“ऐसा गला पाकर भी तुम भीख ही माँगती रही रजुला” एक दिन शिवानी उससे पूछ बैठीं। और जवाब में जो रजुला ने कहा क्या ऐसी बात कोई अपराधी कह सकता है। यह बात ही सिद्ध करती है कि रजुला अपराधी नहीं थी। अपराधी तो वह था जो उसे मुश्किल समय मे छोड़ गया।
उसने कहा “पाप किया था लली, घोर पाप, किसी ने सज़ा नहीं दी, भगवान ने भी आँखें बंद कर ली थीं – किसी ने नहीं पकड़ा मुझे।”
लेकिन रजुला ने स्वयं को कब छोड़ा। उसने ज़िन्दगी भर दोषी रजुला को पकड़े रखा। और अल्मोड़ा की गलियों में बाज़ारों में, कभी चिनिया नौला में, कभी मल्ला कसून में या कभी गल्ली में गाती रही।
मेरा कह्या नीकह्या
करिया नीकरिया
मेरी सुणियाँ नीसुणिया
करिए छिमा
छिमा मेरा प्रभु…।
कुछ रोज़ पहले ही नैनीताल में जम कर बारिश हुई थी। गेस्ट हाउस के बाहर खड़े हम बे-मौसम बारिश का मज़ा ले रहे थे। लोगों पर यह बारिश का अचानक किया हमला था जिससे बचने के लिए वह किसी दरख़्त, शेड या घरों के छज्जो की शरण ले रहे थे। ऐसे ही एक 70 की वयस के बुज़ुर्ग गेस्ट हाउस की सीढ़ियाँ चढ़ बारिश से बचने के लिए हमारे पास आकर खड़े हो गए।
बातों बातों में पता चला कि वह नैनीताल के ही हैं। रिटायर होने के बाद मौज की ज़िंदगी काट रहे हैं। रोज़ शाम होते घर से निकलते हैं और दोस्तो यारों के साथ महफ़िल जमाते हैं। अभी भी वहीं से आ रहे थे।
वो पंत थे। इसलिए मैं उनसे पूछने लगा। आप शिवानी को जानते हैं? आप सोच रहे होंगे इस बात का क्या तुक? पंत हैं तो क्या शिवानी को जानते ही होंगे?
आपको एक क़िस्सा सुनाता हूँ। एक बार शिवानी की बेटी इरा पांडे की हिंदी की टीचर सुमित्रानंदन पंत को पढ़ा रही थी। वह इरा से पूछने लगीं इनसे तुम्हारा कुछ संबंध है ना?
अब वह इतना तो जानती थी कि कुमाऊँ के पंत, पांडे और जोशी हमारे रिश्ते में कुछ न कुछ लगते हैं। टीचर के अनायास पूछने पर वह बोल पड़ी ‘”जी मैम, यह हमारी मौसी लगती हैं।” गौरतलब है कि सुमित्रानंदन पंत के लंबे बालों के कारण इरा ने उन्हें स्त्री समझ लिया था।
बहरहाल मैंने उनसे पूछा- आप शिवानी को जानते हैं क्या?
“हाँ जानता हूँ। शिवानी तो हमारी ताई हुईं। बड़ी लेखिका ठहरी।”
जी! वह भी यहीं अयारपाटा में रहती थीं क्या कभी आपकी उनसे मुलाक़ात हुई?
मुलाक़ात तो उसे क्या ही कहेंगे। कभी कभार शादी-ब्याह या किसी कार्यक्रम में उनके दर्शन हो जाते थे। हम तो बहुत छोटे हुए। उनसे क्या ही बात करते।
अगले दिन यूनिवर्सिटी में काम निपटा कर हम वापस आ रहे थे। मुख्य सड़क चलने के बरक्स पहाड़ पर पगडंडियाँ पैदल यात्रियों के लिए बहुत कारगर होती हैं। यूनिवर्सिटी के पीछे से ऐसी ही एक हरी-भरी पगडंडी को पकड़े हम नीचे उतर रहे थे। तभी मुझे ध्यान आया यहाँ से अयारपाटा ज़्यादा दूर नहीं।
वैसे भी कितनी बार नैनीताल की यात्राएँ कीं। लेकिन अयारपाटा जाने का अवकाश न मिल सका। कुछ न कुछ काम आ ही धमकता। आज हमें कोई काम भी नहीं था।
यूनिवर्सिटी से अयारपाटा के लिए ऊपर ही ऊपर छोटी छोटी पगडंडियाँ एवं सड़कें जाती हैं। नीचे शहर में उतरने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पूरे इलाके में बड़े बड़े बंगले तथा कोठियाँ बनी हुई हैं। शहर के सबसे रईस परिवार साह परिवार इधर रहता है। जिन्हें नैनीताल बसाते समय अंग्रेज़ अल्मोड़ा से लाए थे ताकि वह नैनीताल में बाज़ार आदि स्थापित कर सकें। लाला दुर्गा साह उसी परिवार से थे जिनके नाम पर आज माल रोड पर लाइब्रेरी बनी है।
अयार पाटा में हमें प्रेयरी लॉज जाना था। यही था शिवानी के घर का नाम। प्रेयरी लाज अयारपाटा के घने जंगलों में था जहाँ कभी कॉर्बेट रहा करते थे। जिम कॉर्बेट के घर को मैंने गूगल मैप के सहारे ढूँढ़ लिया था लेकिन प्रेयरी लॉज की कोई लोकेशन गूगल मैप से पता करना सम्भव न था।
गूगल मैप पर बड़ी-बड़ी हस्तियों के घरों के पते दर्ज होते हैं। और हिन्दुस्तान में लेखक कितना भी महान हो वह बड़ी हस्ती थोड़ी माना जाता है। यही हाल प्रेयरी लॉज का है।
रास्ते में हमने कई स्थानीय लोगों से पूछा। क्या वह गौरा पंत ‘शिवानी’ का पता जानते हैं। लेकिन सब का जवाब नकारात्मक ही था। बड़ी विडंबना है जिस शहर को साहित्य में कभी शिवानी के नाम से पहचाना जाता था आज उस शहर में कोई उन्हें नहीं जानता।
ख़ैर शिवानी की बेटी इरा पांडे की किताब ‘दिद्दी’ में प्रेयरी लॉज पर एक संस्मरण मिलता है। जिससे यह मालूम हुआ कि प्रेयरी लॉज के ठीक ऊपर फर्न कॉटेज था। जो आज भी शहर में मशहूर है। मैंने लोगों से उसी का पता पूछना शुरू किया और लोगों ने बता भी दिया।
फर्न कॉटेज पहुँचा। शिवानी के बारे में पता करना चाहा। लेकिन कॉटेज का स्टॉफ भी उनके बारे में कुछ नहीं जानता था। उन्होंने मेरी बात अपने मालिक अशोक साह जी से करवाई। शाह जी ने बताया कि शिवानी के बारे में मैं ज़्यादा तो नहीं जानता किन्तु इतना पता है वह हमारे चाचा के बंगले में किराए पर रहती थीं। वह सरकारी दफ़्तर था जिसके एक हिस्से में ऑफ़िस था जहाँ उनके पति अफ़सर थे तथा दूसरे हिस्से में उनका परिवार रहता था।
“आपने कहा वह एक बंगले में रहती थीं किन्तु जितना मुझे मालूम है वह एक लॉज था, प्रेयरी लॉज।”
अभिषेक जी! जहाँ आप बैठे हैं अयारपाटा में इस पूरे इलाके को ही प्रेयरी लॉज कहते हैं। जब भारत आज़ाद हुआ तो अंग्रेज़ नैनीताल छोड़ कर जाने लगे। अयारपाटा को उन्होंने 40 हज़ार रुपए में हमारे परिवार को बेच दिया। तब से पूरा इलाक़ा हमारे ही पास है। अब तो एक परिवार दर्जनों परिवारों में बँट चुका है तथा उसी तरह अयारपाटा भी।
“क्या आपने कभी शिवानी को देखा है?” मैंने उत्सुकतावश जानना चाहा।
“नहीं! उस समय हम बहुत छोटे छोटे थे देखा भी होगा तो अब ध्यान नहीं।”
उन्होंने हमें बताया। उनके कॉटेज की सड़क के बिल्कुल बराबर में नीचे जो सड़क जा रही है उसी पर थोड़ा आगे चलकर प्रियरी लॉज है। हम उस सड़क पर थोड़ा आगे चले। वहाँ प्रेयरी लॉज बोर्ड का लगा था। मन में ख़ुशी की लहरें उठीं। चलो आख़िर पहुँच तो गए। मुख्य द्वार से अंदर गए। वहाँ भव्य अपार्टमेंट बने थे। मैंने लोगों से बात की किंतु वह कुछ नहीं जानते थे बराबर में एक बुज़ुर्ग अपनी छत पर आराम कर रहे थे मैंने उनसे पूछा।
“बेटा किस ज़माने की बात कर रहे हो। अब कहाँ रहा प्रेयरी लॉज। वह तो कब का ख़त्म हो चुका। एक नहीं, दो बार आग लगी उसमें। जलकर ख़ाक हो गया।”
“कुछ भी नहीं बचा। गृहस्वामी ने उसे बेच दिया। अब यहाँ आलीशान अपार्टमेंट बना है। अपार्टमेंट के जिन लोगों से तुम पूछ रहे थे वो क्या जानेंगे शिवानी को, जब यहाँ उम्र बिता देने पर मैं भी उनका नाम आज पहली बार सुन रहा हूँ।”
उनकी बातें उदास कर देने वाली थीं। शायद वह मेरे चेहरे से थोड़ा भाँप भी गए।
‘ऐसा करो बेटा। नीचे वह घर देख रहे हो।’
‘जी’
“वहाँ चले जाओ। वही थे प्रेयरी लॉज के मालिक। शायद वह तुम्हें कुछ बता सकें।”
काफ़ी देर तक मैं उनका दरवाज़ा खटखटाता रहा। लेकिन कोई बाहर नहीं आया। दरवाज़े पर बोर्ड भी लगा था ‘कुत्ता खुला है कृपया सीधे अंदर न आएँ।’ थक हार कर जब मैं लौटने वाला था तो बराबर में काम करते प्लम्बर ने मेरी परेशानी को समझा। और उसने सीधे आकर दरवाज़ा खोल दिया। आप अंदर जाइए अंदर कोई कुत्ता नहीं है। हमने आँगन में प्रवेश किया। बहुत सुंदर एवं प्राचीन बंगला था। प्लम्बर ने आवाज़ लगाई तो अंदर से एक लड़का निकला।
उसे हमने सारी बात बताई। वह अपने पिताजी के पास हमें लेकर गया। परिवार का व्यवहार बहुत अच्छा था। उसके पिताजी से जब मैंने जानना चाहा शिवानी के बारे में। तो उनका जवाब भी वही था जो मैं सुबह से सुन रहा था। शिवानी के बहाने उन्होंने अपने साह परिवार का पूरा इतिहास हमें सुना दिया, जो उन्हें कंठस्थ था। हमने वह इसलिए सुना शायद कहीं तो शिवानी का ज़िक्र मिले। किन्तु कुछ हाथ नहीं आया।
शिवानी 1958 में अपने पति शुकदेव पंत के लखनऊ से ट्रांसफर होने के बाद परिवार सहित नैनीताल आ बसी थीं। यहाँ उन्होंने जीवन का काफ़ी समय बिताया। उनके बच्चे यहीं पले-बढ़े। शिवानी जितनी हँसमुख उनके पति उतने ही धीर-गंभीर व्यक्ति। दोनों की जोड़ी से मुझे हमेशा शिवानी की ‘लाटी’ कहानी की याद आ जाती है। क्या कोई औरत अपनी सौतन पर इतनी मार्मिक कहानी लिख सकती है?
पहले मैं इस कहानी को शिवानी की काल्पनिक कहानी मानता था जिसमें पहाड़ी ग्रामीण स्त्री के जीवन का त्रासदीपूर्ण चित्रण है, भले बाहरी आवरण में चाहे यह प्रेम कहानी नज़र आए। लेकिन जब मेरे सम्मुख यह राज़ खुला कि शिवानी ही कप्तान जोशी की दूसरी पत्नी प्रभा हैं और लाटी उनके पति की पहली पत्नी गंगा, तो कई रोज़ तक मैं यही सोचता रहा आख़िर कोई कैसे अपनी सौतन के प्रति मन में बैर-भाव रखे ऐसी कहानी लिख सकता है। इससे शिवानी का कद मेरी नज़रों में और ऊँचा हो गया।
इरा पांडे की पुस्तक को पढ़ कर मालूम हुआ कि वह शिवानी की मित्र भी थीं। जब कभी शिवानी और उनकी बड़ी बहन जयंती शांति निकेतन से आतीं तो उनसे मिलना होता। किसी के जीवन में दूसरा होना कितना पीड़ादायक होता है यह वही समझ सकता है जिसने भोगा हो।
जब भी मैंने काठगोदाम से नैनीताल का सफ़र किया। गेठिया सेनिटोरियम को देखकर अक्सर लाटी की यादें जीवंत हो आईं। कभी अल्मोड़ा जाते हुए भवाली के चौराहे से गुज़रा तो वैष्णवियों की टोली के साथ लाटी आँखों के सामने आ खड़ी होती। “देवांगना सी सुंदरी लाटी अपनी दाड़िम सी दंतपंक्ति दिखाकर हँस देती।”
टीबी भी कितना क्रूर रोग था जिसके शिकंजे में जो एक बार आ जाता उसका बचना मुश्किल होता। फिर भी कप्तान बिना किसी डर के बानो के साथ सेनिटोरियम में रहता। डॉक्टरों द्वारा कोताही बरतने की हिदायत के बावजूद वह बानो के पास रहता। उसका माथा चूमता। वास्तव में शिवानी के पति शुकदेव पंत भी अपनी पत्नी गंगा के साथ सेनिटोरियम में रहे थे वह उनसे बहुत प्रेम करते थे।
बहरहाल टीबी से क्रूर था उस समय सेनिटोरियम का नियम जो रोगियों की अंतिम अवस्था जानकर उन्हें घर भेज देता था।
कप्तान, बानो (लाटी) को फिर से उस घर में नहीं ले जाना चाहता था जिसने बानो की यह हालत की थी। इसलिए भवाली में कमरा किराए पर लेकर रहना चाहता था किंतु किसे ख़बर थी कि सुबह तक सब बदल जाएगा। लाटी इतनी समझदार होगी कि वह अपने जीवन का त्याग करके कप्तान के जीवन को उन्मुक्त कर देगी।
और फिर??
बकौल शिवानी “मर्द की जवानी जाड़े की भयंकर लंबी रात के समान होती है, जो काटे नहीं कटती।” मर्द एक बरस में ही दोबारा विवाह कर लेते हैं और स्त्रियाँ आजीवन भटकती फिरती हैं। कोई ‘लाटी’ बन जाती है तो कोई ‘माई’।
माई की याद फिर से मुझे अल्मोड़ा के मल्ला कसून के उस घर के आंगन में ले जाती है। जहाँ एक दिन भरी दोपहरी में ‘अलख निरंजन माई’ करती साध्वी ने आकर डेरा डाल लिया था। और शिवानी से कढ़ी भात खाने की माँग की थी। अपनी आत्मकथा में शिवानी कहती है कि “उनको उठाने का वह क्षणिक दिव्य स्पर्श ही शायद मेरे इस तुच्छ हाथ को थोड़ा बहुत लिखने की क्षमता दे गया।”
यही साध्वी शिवानी की कहानी ‘माई’ में हमारे सम्मुख आती है। रजुला की तरह क्या इस साध्वी की भी कोई कहानी थी?… हाँ!!
इसकी भी एक गृहस्थी थी, पति था, सास थी जो ख़ूब अत्याचार करते। एक दिन बुखार में जब सास ने भैंस चराने के लिए ज़बरदस्ती उसे जंगल भेजा तो रोज़-रोज़ अत्याचार सहती साध्वी ने अपनी भैंस, सास एवं पति तीनों को खाई में धक्का देकर मार दिया एवं स्वयं नेपाली गुरु की शरण में जाकर अपने सारे जुल्म क़ुबूल कर लिए। उसी दिन से अपने पापों का प्रयाश्चित करने के लिए वह दर-दर अलख जगाती और भिक्षा माँगती फिरती थी अल्मोड़ा की गलियों में।
घर के आँगन में खड़ा सोचता हूँ। पहाड़ से अगर शिवानी की आवाज़ हिन्दी में न सुनाई देती तो क्या हमें पहाड़ी स्त्रियों की व्यथा का पता चल पाता। क्या हम जान पाते रजुला एवं अलख माई की कहानियों को। शिवानी ने जिस तरह पहाड़ी समाज एवं संस्कृति को हमारे सामने रखा। क्या पहाड़ के समाज ने उन्हें याद रखा?
देखता हूँ मुख्य बाज़ार में होते हुए भी उनका पैतृक आवास जर्जर अवस्था में पहुँच चुका है। आस-पास शिवानी का कोई नामलेवा नहीं। कोई नहीं जानता यहाँ हिन्दी की मूर्धन्य साहित्यकार शिवानी का घर है।
घर के कमरों पर ताले लगे हैं किन्तु छतें गायब हैं। आँगन में जगह जगह बिछी पठालों को तोड़कर जंगली घास उग आई है। दरवाज़ों तक बेडू तथा अल्मोड़ा घास उग आई है। कहीं-कहीं सदाबहार के फूल खिले हैं।
कौन कहेगा जो घर आधी सदी पहले गुलज़ार था आज सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों सरीखा नज़र आता है। कभी जिस घर में आमा (शिवानी की माँ) का एक छत्र राज था। आज वह सूना पड़ा है। जिसमें कभी भृत्य लोहनी जी गृहमंत्री का दायित्व देखते थे। जिनकी देख-रेख में बच्चे पढ़ते-लिखते थे खेलते खाते थे। उस गुलज़ार घर को किसकी नज़र लग गई।
रिज पर स्थित इस घर से अल्मोड़ा के दोनों तरफ़ की दूर दूर की पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। सुबह होती है तो सूरज घर से निकल आसमान में लालिमा फैलाने लगता है। शाम होती है तो थका हारा किसी टूटे-फूटे कमरे में आ बैठता है। घर अब पूरी तरह प्रकृति के हवाले है। हवा आँगन बुहारती है। बादल जल बरसाते है, धूप पौधों को भोजन देती है। इंसान न सही जब तक घर है पेड़-पौधे तो रहने ही चाहिए और ज़िंदा रहनी चाहिए घर के लोगों की स्मृतियाँ। स्मृतियाँ ही तो हैं जिनके सहारे न जाने क्या क्या लिख गया हूँ और अब मन में ग़ालिब का शेर गुनगुना रहा हूँ।
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई



