वरिष्ठ लेखिका मृणाल पाण्डे जानकी पुल पर अपनी आत्मकहानी धारावाहिक लिख रही हैं- ‘भाखै अकथ कथा बिरतांत’। आज उसकी तीसरी कड़ी में पढ़िए अल्मोड़ा में उनके नानी घर के क़िस्से और माँ शिवानी के जीवन में लेखन का संघर्ष। मृणाल जी ने बहुत सूक्ष्मता से समाज में स्त्री-पुरुष में किए जाने वाले भेदभाव को भी रेखांकित किया है- मॉडरेटर
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डेरे की कुलवधुएं
लोकेशन नैनीताल।
-‘दीsss?’
बाबू के तबादलों के लंबे दौर के बाद अल्मोड़ा से शाहजहाँपुर, लखनऊ होते हुए हम वापिस नैनीताल आ गये हैं। हमारा नया घर भी सरकारी है, पुराने बंगलों से कहीं सुंदर हरा भरा और काफी बड़ा। अब तक भाई भी जनम गया है सो बीनू और मुझे यकीन है अब हमारा परिवार पूरा हो गया है। जिन जाड़ों में बोर्ड की परीक्षा सर पर होती हम निर्जन नैनीताल में ही बने रहते जहां सनीमा हॉल से लेकर होटल तक दो महीने को सो जाते। घर के बाहर इरू मिकी अपने अड़ोस-पड़ोस के हमउम्र बच्चों के साथ धूप में चकरघिन्नी बने फूल पत्तों के मुकुट बना कर राजा रानी बनते, या डोरी में बँधे पांगर (हॉर्स चेस्टनट) के भूरे गोलों से चेस्सी फाइट यानी चेस्टनट की काल्पनिक लड़ाई में मशगूल रहते। जिन जाड़ों में बोर्ड की परीक्षा सर पर होती हम निर्जन नैनीताल में ही बने रहते जहां सनीमाहॉल से लेकर होटल तक दो महीने को सो जाते। घर के बाहर इरू मिकी अपने अड़ोस पड़ोस के हमउम्र बच्चों के साथ धूप में चकरघिन्नी बने फूल पत्तों के मुकुट बना कर राजा रानी बनते, या डोरी में बँधे पांगर (हॉर्स चेस्टनट) के भूरे गोलों से चेस्सी फाइट यानी चेस्टनट की काल्पनिक लड़ाई में मशगूल रहते।
बीनू और दिद्दी के बीच अब तक एक तरह की भद्र दूरी बनने लगी थी। कभी वह कुछ दंडनीय काम करती, तो भी उसको माँ डाँट भर देती। जबकि मुझे तुरत कुछ कनेटिया झापड़ रसीद हो जाते। इस समय भी बीनू को बीच-बीच में चिंतातुर नज़रों से देखती दिद्दी यानी माँ बस मुझे धर लेती। बीनू का पढाई से खास लेनादेना नहीं बन पाया। मेरे सर पर तेल ठोंकती हुई माँ मुझसे संस्कृत के रूप भी सुनती रहती और कुछ न कुछ बुनती जाती।
‘डेरा तो खानाबदोश चरवाहों के तंबू को कहते हैं ना?’
-मां का स्वर हमेशा की तरह झुंझलाया हुआ है। तीन-तीन फुदकती बेटियों को पकड़ कर हर सप्ताह उनके बालों में तेल ठोंकना। साथ में समय बचाने के लिये इस बीच जितना होमवर्क कराया जा सके कराना और फिर अपनी मालिशवाली के आने से पहले गुदगुदे छोटे बेटे को कटोरी से दूध दलिया खिलाना। ‘पूछ डेरे पर फिर जल्दी जो पूछना है।’
मां के कामों की फेहरिस्त अनंत थी। और उनमें मेरे अलावा कोई उसकी वह सायास अवरुद्ध लेखनी को नहीं गिना करता था जो देर रात हम सबके सोने के बाद खाने की मेज़ पर रखे खाली कागज़ों पर उनकी कालजयी कहानियाँ और उपन्यास उतारती जाती थी।
‘हम पहाड़ी लोग जब भी देस में बसे अपने पहाड़ियों से मिलते हैं तो उनसे क्यों पूछते हैं कि डेरा कहां है? कैसा है? उनके घर को हम डेरा क्यों कहते हैं?’’
‘अब जब तेरा अपना घर होगा तब इस पर सोचना।’
‘पर तू क्या उसको भी डेरा कहेगी? सवाल निगल जाती हूँ। बाप का घर मेरा बीनू का या इरू का नहीं यह बात घर के तमाम बड़े लोग स्वभावानुसार बीनू और मुझे किसी न किसी रूप में बता चुके हैं।
माँ मुझे अलग कर कैस्टर ऑयल की शीशी पर बराये दस्तूर टेढा ढक्कन लगाती है। ’पता नहीं तेरे बाबू को यही तेल क्यों ठीक लगता है। तनिक भी खुशबू नहीं इसमें। पर हुकुम हुआ है कि यूज़ सबको यही करना है।’
माँ का उलाहना सिर्फ तेल पर नहीं टिका है, यह बात मेरा बालमन अपनी तरह से समझ रहा है, पर उसे कह सकने की भाषा अब तक इतनी किताबें निरंतर पढने के बाद भी मेरे पास नहीं है। किताबों में यही संदेश बार बार सर उठाता है – घर नहीं होता लड़की का बाप के यहाँ। उसका घर ससुराल है। और बेटी की ससुराल कैसी होगी यह तो इतने बड़े ज्ञानी ज्योतिषी होते हुए राजा जनक तक नहीं देख सके थे।
बडी मौसी का भीनी सुगंध वाला जवाकुसुम तेल बाबू को ‘वाहियात’ लगता है। खाने में वही पकता है जो बाबू को पसंद है। बाबू पंत हैं, शाकाहारी, पर अंडा खा लेते हैं। नानी पति को कहती है ‘मालिक’। ‘जो मालिक कहे तुझे स्वीकार करने में तकलीफ क्यों?’ नानी कलसती माँ से कहती है। उस जैसा हीरा आदमी खोजे न मिलेगा।’ मां दबे सुर में कहती है जो ‘सेकंड हैंड जैसा सुनाई देता है। फिर दोनो माँ बेटी रोने लगती हैं। बीनू और मुझे ननिहाल जाना अच्छा नहीं लगता। वहां जा कर हमारी खुशदिल माँ अक्सर रोने जो लगती है। वैसे वहाँ खाने की बहार रहती है। मीट मच्छी सब पकता है। बड़े मामा पुलिस अफसर हैं। जिम कार्बेट के मित्र, अपने पिता की तरह अचूक शिकारी। फिर विगत में रजवाड़ों के दीवान रहे हैं जहाँ बिना सामिष के लोग कौर नहीं तोड़ते। नानी और बडी मामी पंतों की शाकाहारी बेटी हैं। पर बिना प्रतिवाद बाहरी चूल्हों पर मीट माट पकाती हैं। मामा लोग ‘मालिक’ हैं। उनका बेटा नन्हा मालिक। घर के पुराने ड्राइवर मायाराम जी उसको कहते है, ‘हिज़ हायनेस’। हम लड़कियाँ पराया धन हैं। सुंदर, पर दाना चुग कर उड़ जायेंगी। सो नवरात्रि में हम पूजी भले जायें बाप का घर हमारा नहीं। भाई मिकी जनमा था एक सितंबर को। बाबू के आह्लादित चचा ने घनी मूंछों के बीच मुस्कुराते हुए कहा था, ‘अब जा के जनमा हम मलारा के पंतों का वारिस। ठिक्क पहली तारीख को अपनी तनखा लेने आया है,’’ नानी की अभिन्न मित्र तारा दीदी ने सुर में सुर मिलाया था। लड़की होती है तो रोती है, चेहाँ चेहाँ, जाऊं हाँ, लड़का रोता है केहां केहां, मेरे लिये क्या है यहां ?’’
मेरे भीतर का अनदेखा यक्ष शब्दों के बिना भीतर भीतर दर्ज करता चलता।
बात आई गई हुई पर वो बात मन से उतरी नहीं।
इरू के बाद मिकी आया तो नानी का सारा घर रोशनी से जगमगा उठा। बाबू जो बकौल माँ कहते थे मुझे बेटे की कोई तलब नहीं, स्वभाव के विपरीत खिले खिले दिख रहे थे। जाने कब जा कर वे माँ के लिये खादी ग्रामोद्योग से खादी सिल्क की पीली साड़ी ले आये जिस पर लाल काले बूटे थे। माँ देर तक उसे उलट पलट कर देख कर स्वभाव के विपरीत बोली बहुत अच्छी है। वह वैसे बाबू की पसंद पर स्वीकृति की मुहर कम ही लगाती थी। उस साड़ी को वह सालों तक संभाल कर पहनती रही।
‘मैंने कहा था न तुझसे, कि कितना ही कहे तेरा मालिक कि मुझे लड़के की कोई तमन्ना नहीं, मन ही मन सब मरद चाहते हैं कि उनका एक वंशधर आ ही जाये।‘
भाई की छठी भी नानी के घर ही मनी जो शहर के बीच था। हमारा घर काफी दूर चढाई चढ कर ही आता था लोगों को आने जाने में तकलीफ होगी सुन कर बाबू भी मान गये। हम बहनें जो उसी लंबी चढाई उतार से रोज़ स्कूल पहुँचती थीं, हमको कैसा लगता है यह किसी ने नहीं पूछा। हमसे सिर्फ रिज़ल्ट के दिन घर आने पर पूछा जाता था, कैसा रहा?
मिकी की छठी पर सारे बिरादरों को बुलावा गया। कड़ाही लेकर हलवाई बैठा। मिकी को पीले कपड़े पहना कर पूजा शूजा की गई । बाहर बाबू के इकलौते परिवार वृद्ध वॉलरस जैसी मूंछों वाले कका पगड़ी पहन कर परम प्रसन्नता से पूरे आयोजनों के मुखिया बने थे। आते जाते सब उनको बधाई दे रहे थे पंतों की वंशबेलि बढ़ जाने की।
मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा, कि ‘सदा सत्य बोलो का ज्ञान देनेवाले और लडकियाँ लक्ष्मी हैं, घर की शोभा हैं’ कह कर हमको टमकारनेवाले बड़े लोग हमेशा असली बात हमें नहीं बताते। पर फिर मैं बीनू इरु और सब बच्चों की पंगत में फसकड़ा मार कर जा बैठीं और पूरी-खीर खाने में व्यस्त हो गई।
फिर जब तक हम हम प्रायरी लॉज में रहने को नैनीताल आये तब तक छोटी इरा और भाई तबीयतन खुशदिल बालक हो चुके थे। मेरी तरह वे बड़ों की बातें सुन कर बाद को बीनू के पास जा कर उन पर चर्चा नहीं करते थे। पर बीनू ने इस बीच सच झूठ का वह धूसर एरिया इरू मिकी की छोटी माँ बन कर मिटा दिया था। मेरी तरह के सवाल उसके मन में देर तक नहीं टिकते थे। जब कभी मैं ढिठाई के लिये तलब होती और डाँट खाती बीनू का सपाट जवाब होता, ‘तो क्या? तू इतना सबके मुँह क्यों लगती है? मान ले कहना या कह दे हाँ। बात खतम।’
पर बात खतम नहीं होती थी। साइलेंट फिल्म की सफेद काली रील की तरह चलती रहती भीतर ही भीतर और अक्सर गलत समय पर गलत शब्दों में पहाड़ी नदी की तरह उफना कर बहने लगती।
इस सब से उकता कर मैंने चुप ही रहना ठान लिया और किताबों की अनंत दुनिया में रमने को चली गई। माँ की कृपा से घर में कई बाल पत्रिकायें आती थीं। जब टाइम्स की बाल पत्रिका पराग में मेरी एक कविता छपी और मुझे दस रुपये का मनीऑर्डर मिला तो मैं तुरत जा कर मॉडर्न बुक डिपो से रवींद्र ठाकुर की आकर्षक नामवाली कृति मृणालिनी खरीद लाई। यह अपने पैसे से मेरी पहली खरीद थी। पहला उपन्यास।
माँ जो हमारी पठन सामग्री की कठोर सेंसर थी, ने भी लेखक का नाम देख कर हाँ कर दी।
‘कुछ अच्छा खरीद लाती। पर नहीं लाई तो किताब किसी बड़ी ने मुंह बिचका कर कहा। पढाकू बन रही है तेरी लडकी गौरा। ससुराल जायेगी तो तेरी ही तरह इसे भी दाल भात राँधना होगा बता देना इसे।’ एक मौसी ने कहा जब हम नानी के घर गये। मुझे अब तक वहाँ से भी विराग होने लगा था। दिन दिन भर बच्चों के साथ ऊल जलूल बकवास करो या बडी औरतों की बात सुनो। उनकी बातें मुझे परनिंदा और आत्मप्रशंसा से भरी लगतीं। घर के बड़े बच्चों को बीनू ने अपनी टीम में शामिल कर लिया था। कई बार मैं कमरे में जाती तो उनकी बातें थम जातीं। क्यों? सुट्टो शब्द भी उनकी ज़ुबान पर जाने कब चढ़ गया था।
छुट्टियाँ कब खतम होंगी। कब हम वापिस नैनीताल जायेंगे? मैं सोचती जब जनाना कंपनी अचानक शांतिनिकेतन के हॉस्टल में पली बढी हमारी माँ की गिरस्ती के फूहडपन, उसके किताबों के प्रति अथाह मोह और लेखकीय सपनों पर तंज़ करने लगती। इसकी रसोई में कई मसाले पुड़िया में ही धरे रहते हैं। हर चीज़ की हड़बड़ी रहती है, पराँठे तक सही नहीं बना सकती। पेटीकोट भी ढंग के नहीं पहनती। बस बच्चों की पढाई पर ध्यान या अपनी ही लिखाई पर! खर्रे के खर्रे लिखती जाती है धर्मयुग के लिये।’
माँ आँसू पी लेती पर उसकी गोरी नाक का अग्रभाग लाल हो ही जाता। फिर अगले ही क्षण वह तकिये पर उढंग कर भाभियों से समाज के रसीले किस्से सुनने सुनाने में रम रहती। क्यों माँ को सुना कर उसकी पढाई लिखाई और मेरी बाबत उसे ये लोग कोंचते रहते हैं, तब मैं समझ कर भी कह नहीं पाती थी। जो भाषा हमको संस्करित कर रही थी उसमें मेरे सवालों को शक्ल या उनके सवालों के वाजिब जवाब देना संभव नहीं था। इसलिये मेरे सवाल सबको अटपटे कभी कभार दंडनीय लगते। बीनू भी कुछ समय तक मुझसे बोलना बंद कर देती।
‘तुम लोग लड़कियों से कम प्यार क्यों करते हो? हर समय तो हमको पराया धन और भाइयों को घर का छोटा मालिक कहते हो, फिर नौर्तों में हम को देवी देवी कह कर पूजते क्यों हो?’ कन्या पूजन के समय मेरा यह अनगढ अटपटा सवाल मुझे घर की मां की हमउम्र औरतों में काफी बदनाम कर गया। नानी की उमर की बडी लोग मेरी बातों को या तो हँस कर टाल जातीं, या फिर हाथ में एकाध चवन्नी अठन्नी च्याप्प कर कुछ नाराज़गी से कहतीं, ‘लो सुनो शुकदेव गौरा की मँझली की बात! खेले ना बाहर जाकर बच्चों के साथ हिल मिल कर रहे। अरी मरी, दिन भर बस किताबें पढ-पढ कर यही सब पूछने से क्या? हम सब करते हैं तुम लड़कियों को भी प्यार। देते नहीं तुमको भाइयों जैसा ही खाना पीना, कपड़े लत्ते, सोने का बिछौना? कल तुम दूसरे के घर चली जाओगी ये सोच कर ही तो इस तरह हर साल घर पर अष्टमी को तिलक लगा कर तुम्हारी आरती उतार कर इज़्ज़त से दक्षिणा देते हैं। अरी गौरा तू समझा इसे नहीं तो मायके का लाड छूटा तो ससुराल जा कर दंड भुगतेगी’। बीनू से सीख कितनी सुशील लडकी है।’
जो औरतें दिन रात बिनब्याही बडी हो रही लड़कियों के ऊपर निगरानी में जुटी रहती हैं, और जिनकी बेटियों को मायके में बंद कमरे में खुसुरपुसुर करते उनका रोना सुन चुकी हूं, ससुरालों को प्रेमहीन कालकोठरी मानती हैं तो जल्द से जल्द उनकी शादी के लिये काहे इतनी व्यग्र हैं?
कुल मिला कर प्यार मेरे लिये पहेली बना रहा।
प्यार के नाम पर परिवारों में ब्याह लायक घर की लड़कियों के ताश की तरह फेंटे जाते पैसे और इज़्ज़त के ब्योरे, रूपसी लड़कियों में तरह-तरह के खोट निकाल कर उनको अच्छे घर-वर की होड़ में खुद से बदतर ठहराने की होड़ भी मुझे संदिग्ध लगने लगी, पर मैने खामोश रहना सीख लिया। और तदुपरांत मैं वृहत्तर परिवार में शांतिनिकेतन से बी ए पास नकचढी गौरा की बिगाड़ी अजीब किसम की सोच वाली मेधावी, चुप्पी और खुद को ‘बहुत’ समझनेवाली मँझली बेटी बन कर बेचारी माँ के लिये छोड़े जाते तरह तरह के उलाहनों के तीरों की ज़द में आ गई।
मेरी मूक तकलीफ बीनू खूब समझती थी। पर उसने अब तक मेरी अधिकतर समवयस्काओं की ही तरह एक खुशदिल आज्ञाकारी लड़की का नकाब पहन लिया था। वह नानी के साथ रसोई में मटर छीलती, मौसियों से कढाई और मामियों से बुनाई सीखती, तारा दिदी के साथ छत पर ‘फूल जैसी हल्की’ बड़ी मुंगौड़ी बनाने के उपक्रम में सोत्साह भाग लेती। विवाह के मार्केट में वैल्यू बढानेवाले इन सब संयुक्त उपक्रमों में मुझे न्योता जाता तो मैं कोई न कोई बहाना बना कर इधर उधर हो लेती।
यों मीनू बदनाम हुई मुई किताबों के लिये!
मुझे पक्का भरोसा था कि सभी बडे लोग सत्यवादी नहीं होते। पिता की नज़रों में ईमानदार न्याय था पर वे बहुत कम बोलते, खोये खोये से रहते। उनसे पढाई से इतर सवाल पूछना बेकार था। खुद उनका बचपन से मुख्तसर सा परिवार था। माँ बचपन में ही गुज़र गईं, पिता ने दोनो बेटों को भरपूर प्यार पर अनुशासन तले पाला।
पढाई में हमेशा अव्वल रहे। पिता को उम्मीद और भरोसा था कि सिविल परीक्षा में बैठेंगे और उनका नाम रोशन करेंगे। पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था।
कम उम्र में प्रेम हो गया बीनू की माँ गंगा से। वह भी उनकी ही तरह मातृहीना और खुशदिल थी यह हमने बड़ों से सुना। उनकी एक सुंदर तस्वीर बीनू के घर में लगी है, शक्ल काफी कुछ मिलती थी। बाबू के पिता कम उम्र में इतनी दुबली पतली लड़की को ब्याह कर लाने के पक्ष में न थे। सल्फा दवाइयों की खोज से पहले पहाड में घर घर में असूर्म्पश्या कुलीन घर की जनानियों में राजरोग ‘छे’ (यक्ष्मा) लाइलाज हो कर पनप रहा था। ‘हर साल हम गर्मियों में अल्मोड़ा जाते तो सुनते हमारी अमुक सखी नहीं रही।’ माँ ने बताया। गंगा भी उनमें से एक थी और बड़ी मासी के अनुसार पिता की मर्ज़ी के खिलाफ जा कर किया बाबू का गंगा से ब्याह उस समय के कट्टर कुलीन पहाड़ी समाज की एक दुर्लभ सुखांत लव स्टोरी थी। मुहल्ले की एक ताई का कहना था उस सुदर्शन जोड़ी को शायद नज़र लग गई।
लव स्टोरी शादी के कुल दो ढाई सालों तक चली। बाबू ने जो कुछ खर्च सकते थे खर्च कर गंगा को सैनिटोरियम में भर्ती कराया पर हालत बिगड़ती गई। बाबू पूरे समय सब कुछ छोड़-छाड़ कर सारे समय गंगा की तीमारदारी सैनीटोरियम में रह कर करते रहे। सद्य:जात बीनू को ननिहाल भेज दिया गया। क्षय रोग से गंगा चल बसी तो बाबू शोक से टूट गये। उनको उम्मीद थी कि किसी तरह वे गंगा को बचा लेंगे। पर न कर पाये। यह आघात उनको जन्म भर के लिये विरक्त और अंतर्मुखी बना गया।
जब वे संन्यासी होने की बात करने लगे तो रूठे दादा जी ने मान त्यागा और दूसरी लड़की की तलाश शुरू हुई। माँ तभी शांतिनिकेतन से ग्रैजुएट हो कर लौटी थीं और शहर के लिये उनकी मेधा और सहज शालीन उपस्थिति विस्मयकारी थीं। पर वे पितृहीन थीं। आगे पढना चाहते हुए भी पढाई जारी न रख सकीं। बडी मामी की मार्फत, जो माँ की विश्वस्त सखी थीं, माँ को मनाने का काम शुरू हुआ। शुरू में हमारी हठीली माँ बकौल नानी के ‘सेकंड हैंड’ वर कतई नहीं चाहती थीं। उनके सपने अपनी प्रतिवेशिनियों के स्तर के थे। अधिकतर की शादी या तो सहपाठी प्रेमी से हो रही थी या फिर किसी बहुत बड़े ओहदे वाले किसी कॉर्पोरेट ज़ार, वैज्ञानिक या आई सी एस अफसर से। पर पाँच और अनब्याही लडकियों की माँ, नानी उनको जल्द से जल्द उन असंभव सपनों से बाहर ला कर तुरत ब्याहने को आतुर थीं। अंतत: माँ ने हथियार डाल दिये। पर तब तक दादा जी के मन में शंका हो रही थी। ‘कोई ज़मींदार का हाथी गर्दिश में बाज़ार में दो टके का बिक भी रहा हो, तो उसको खरीद ही जो क्या लेते हैं? अपनी ड्योढी का दरवाज़ा भी तो देखना होता है’’, उनकी प्रतिक्रिया नानी तक लाई गई थी।
दादा जी बीनू और मेरे बचपन में ही गुज़र गये। पर अपने सन्यस्त होने जा रहे छोटे बेटे के लिये उनकी ममता ने उनको शादी के बाद सदा दिद्दी बाबू के ही साथ रहने को रोक लिया। मरने तक बड़े घर की बेटी गौरा के निष्कलुष व्यवहार ने उनकी अनुभवी आँखों को विश्वास दिला दिया था कि यह ज़िम्मेदार संस्कारी लड़की आगे सँभाल लेगी। ‘तूने मेरी बिन माँ की बाछी को जिला दिया, तेरे बच्चे राजयोग भोगेंगे, तू राजमाता बनेगी,’ वे गदगद्भाव से अंत समय आशीर्वाद दे गये। माँ अंत तक चुपचाप उनकी पाटी से लगी उनकी दिन रात सेवा करती रही। उनकी मृत्यु के बाद पिता की उत्तरोत्तर तरक्की होती गई और साल बाद उनका तबादला अल्मोड़ा हो गया। माँ को जैसे खोया बचपन मिल गया। अब तक बड़े भाई ओरछा महाराज के दीवान बन कर बुंदेलखंड चले गये थे, पर वे और उनका परिवार हर गर्मियों में आता था और जाड़ों में नानी अपनी बेटियों की पल्टन लेकर छोटे प्रिय देवर ‘नान कका’ की अगुााई में ओरछा चली जातीं। नान कका बाद को संन्यासी हो गये थे। ओरछा में महादेव का मंदिर उनका ही बनवाया है। दो छोटी मौसियों ने लंबे समय तक शादी नहीं की वहीं सरकारी स्कूल में पढाती रहीं जिसे वरिष्ठ शिक्षाविद् कृ्ष्णकुमार की माँ ने धो-माँज कर एक आदर्श विद्यालय बना दिया था। कालांतर में यही वाचाल घुमंतू ननिहाल ही हमारा वृहत्तर परिवार बनता गया जहाँ मामाओं-मौसियों के कई हमउम्र बच्चे हमारे साथ बड़े हुए और कतिपय शीघ्र ब्याही जानेवाली मौसियाँ हमको काफी हँसाती और चिढाती थीं। बडे मामा त्रिभुवन जो बाद को आई पी एस सेवा से जुड गये, इस तारामंडल का चाँद और सूरज दोनो थे। मेरी माँ का उन पर और उनकी गंभीर समवयस्का पत्नी पर जैसा अटूट प्रेम था, वह आज देखने को नहीं मिलता।
अल्मोड़ा के अब खंडहर हो चुके पुश्तैनी घर पर जो कभी माँ के दादा के समय तक शहर के सनातनियों का मुख्यालय मल्ला कसून कहलाता था, उनके बाद नानी का हुकुम चलता था। परिवार प्रतिष्ठित था और संपन्न भी। माँ के दादा हरीराम पाण्डे ने मालवीय जी के साथ घूम घूम कर बनारस हिंदू विश्व विद्यालय बनवाया था। नाना तब रामपुर स्टेट में रसूखदार दीवान थे और नवाब साहब ने, जो उनको पिता तुल्य मानते थे, ब्राह्मणद्वय को एक लाख रुपये की राशि दी थी। जब वे गुज़रे तो मालवीय जी ने नानी को लिखा था, आज एक ॠषि चला गया।
नाना भी कम उम्र में डायबिटीज़ से गुज़र गये। यही महारोग माँ को भी ले गया। नाना के बाद जब तक घर के आज्ञाकारी बड़े मामा जीवित रहे, परम उदार नानी का ठाठदार रहन-सहन अल्मोड़ा और उनके सरकारी निवास में बना रहा। जाड़ों में जब वे पहाड़ से ‘देस’ जातीं तो बेटे के घर की बागडोर भी वे सहज थाम लेती थीं। बड़ी मामी एक आज्ञाकारिणी सदय और खामोश उपस्थिति बन कर खामोशी से नानी की हर कामना पर तुरत अमल करवातीं। फिर भी बाबू को माँ का चार-चार बच्चे ले कर हर जाड़ों में लंबे समय के लिये मामा के घर जाना उचित नहीं लगता था। बाबू सही थे, पर माँ की ज़िद उतनी ही अटल कि मुझे मायके जाना ही है। चार दिन सुख से रह लूंगी भाई के घर तो तुमको क्या? यहां कौन सा राजपाट दिया गया है मुझे?
अनेक तरह के तोहफों सहित वापिस आने पर कुछ दिन तक दिद्दी बाबू के बीच गहरा तनाव रहता। हम सहमे सहमे डोलते, फिर स्कूल खुल जाते और हम पंख फैला कर खुद को सुरक्षित महसूस करते। पढाई की दुनिया के मानसरोवर में कलहंस बन कर तैरने लगते।



