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  • राजीव कुमार की कहानी ‘दिल्ली की एक शाम’

     

    आज पढ़िए राजीव कुमार की कहानी। राजीव कुमार की कहानियाँ, कविताएँ, साहित्यिक टिप्पणियाँ हम पढ़ते रहे हैं। यह उनकी नई कहानी है-

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    दिल्ली की एक शाम

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    आज शाम हम फिर मिल ही गए।  हमारी बैठकें इन दिनों ज़्यादा होने लगी थीं। मैं, देव साहब और  किरण माकन तो बहाना ढूंढते रहते हैं मिलने का। बहुत कम समय था, लेकिन तैयारी तो करनी थी।  सोफा और टेबल के कवर आनन – फानन में बदले गए। कटलरी को व्यवस्थित करने में साइमन तो पूरे दिन लगा रहा, फिर मैने रिअरेंज किया थोड़ा उनकी जगह बदलकर। गेस्ट के हिसाब से हॉल को दिखने के लिए ठीक भी करना था। किरण बहुत संजीदा रहती हैं साज सज्जा को लेकर । फूलों का गुच्छा भी अपनी ही जगह करीने से और ताजा हो, वह हॉल में हर जगह से दिखाई दे । फूलों के लिए भी क्रिस्टल का लंबा खास किस्म का गुलदान। अर्चना और उनके दोस्त राकेश भी आए थे। सब को ध्यान में रखकर मैने तैयारी की थी । चिकन और दूसरे स्नैक्स लाने की जिम्मेदारी मेरी ही रहती है। हर बार हम सब कहते हैं आज खाने का मन नहीं और अंत में देर रात जोमेटो से खाना हर बार आता है। रोटियां मेरा कूक साइमन सेंक लेता है। अर्चना और राकेश भी शामिल थे। देव साहब और किरण जल्दी आ गईं तो तुरंत देव साहब शुरू भी हो गए। वो रुकते नहीं थे। खुद ही ड्रिंक्स लगाकर, आईस लेने के लिए तीन बार इधर से उधर करते हुए शुरू हो जाते हैं।

    देव दो पेग अंदर डालते ही सर झटकने लगते हैं, एक अलग रुख ले लेते हैं और कई रिश्तों और मुद्दों में तेजी से एक साथ  घुस जाते हैं। रिश्ते भी चुनते हैं प्रकाश डालने को तो बिल्कुल अलहदे। कुछ मायावी, कुछ हकीकत, कुछ फसाने। कहीं – कहीं इन रिश्तों की बनावट में महीन बुना हुआ किरदार उनका अपना  भी होता है, जिसे वे अक्सर डाउन प्ले करते हैं। उनके द्वारा बयान किया गया कोई – कोई रिश्ता बिल्कुल विश्वसनीय नहीं होता है, उनकी जुबान से ही निकली कहानी से ताल मेल नहीं होता उसका। पर वो ऐसी कहानी बुनते हैं, उनमें रिश्ते गढ़ते हैं और अपने को बचाकर चलने की प्रारंभिक ज़िद भी रखते हैं। अपने ही किरदार को बचाने में चौथे पेग तक आते – आते  उनका खुद का ही डैमेज हो जाता है।

    कोई थोड़ा अलहदा हो जाय परिवेश से और होशमंद का इशारा भी न माने तो थोड़ी ही देर में महफिल अख्तियार में नहीं रहती।  देव ने हद ही कर दी। अर्चना के बारे में पहले भी कई बार बोल चुके थे, मैं उसका फैन हूं। आज अर्चना पर अचानक शुरू हो गए: “देखो अर्चना मेरी अच्छी दोस्त है बस, चूंकि हम एक ही इलाके में रहते हैं, इसलिए कभी – कभी मिलना भर हो जाता है। नहीं, तो मैं भी बहुत बिजी रहता हूं आज कल। वैसे  मैं उसकी बात करने के तरीकों का कायल हूं।” किसी ने भी उनसे कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा था। अर्चना और उनके बारे में किसी ने कोई चर्चा नहीं की।  देव अपना गिल्ट खुद ही चालाक तरीकों से समेटकर एक तरफ कर लेते हैं और थोड़ी देर बाद  कहते हैं गिल्ट का ढेर इधर है। और जब अर्चना पर बात आ ही गई तो वो भी कहने लगी :  “पता नहीं  देव साहब, मुझमें क्या ढूंढते रहते हैं, थोड़े मेंटली कहीं – कहीं चिपक से जाते हैं। बहाने बनाकर मिलते हैं हम से। इस तरह मेरे पीछे पड़े रहेंगे तो इनको इनकी गर्ल फ्रेंड छोड़ देगी। ” अर्चना भी चालाक हैं । और आज तो राकेश भी सामने बैठे थे।  बिना वजह एक अलग रिएक्शन देने लगीं, जिसमें बात बिगाड़ने का दायित्व देव साहब पर चला जाय।  अपने को बचाने की  कोशिश रहती है उनकी। इस बचाव में कभी – कभी वो थोड़ा खुद ही फंसती भी हैं।

     मैं भी कहां रोक पाता हूं अपने को ऐसे मौकों पर। मैने कहा : “और आपके फ्रेंड राकेश को बुरा नहीं लगेगा क्या। देव साहब नियमित रूप से  जिम जाते हैं। बार – बार  कैलोरी और वजन नापते हैं। ड्रेस सेंस पर बोलते हुए दूर तक जाने की प्रवृत्ति होती है। नेट फ्लिक्स पर सब कुछ पहले ही देख लेने का दावा करते हैं । उनकी इस तरह की दिलकश कहानियां कई फॉर्मेट में अवेलेबल हैं हमारे आसपास।  यह सब उन्हें बहुत निर्दोष नहीं बनाता। अर्चना जी देखिएगा राकेश एक दिन आपसे पूछ बैठेंगे। भाई क्या हैं देव साहब।”  मैं  तपाक से एक सांस में कह गया था उस दिन। मुझे भी लगता रहा है ऐसे मौकों पर मैने बाजी मार ली है। पर कोई चौपड़ ऐसा होता ही नहीं जिसमें मुझे कभी विजय मिली हो। खुद के ही बोलने पर बहुत देर तक मुझे थोड़ा अफसोस भी होता रहा।  मैं थोड़ा डर रहा था कि कम से कम आज  कोई बात न हो जाय।

    अर्चना विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाती थीं। आकर्षक व्यक्तित्व था। वो बहुत ज्यादा बाहर घूमने फिरने वालों में शामिल थीं। कई दोस्त थे और इनके घर की पार्टी बहुत ही उम्दा होती थी। जब भी इनके घर गया अलग ही बात थी इनमें।बहुत अच्छी इंग्लिश भी थी उनकी। अच्छी इंग्लिश बोलने वाले लोग  समाज में दूसरों के बनिस्पत थोड़े सराहे भी जाते  हैं,  जिसका लाभ हमेशा उनको हमेशा मिलता था।  कुछ आदतें अंग्रेजों वाली थी भी उनकी जैसे कम  और बेहद सलीके से बोलना। लेकिन अपने अनुकूल परिस्थिति न देखकर बात टाल भी जाती थीं।  हंसके मेरी बातों को तो जरूर , जब मैं सीधा उनकी तरफ इस कदर मुखातिब होता था। उनका टाल जाना हर बार कई और सवाल पैदा कर देता। लेकिन आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती। मैं अंदर ही अंदर थोड़ा डरता भी हूं उनसे, आदर भी करता हूं।

    आहिस्ता से एक बात कह दूं देव साहब जिन रिश्तों का ज़िक्र आफियत से करने लगते हैं, अघोषित रूप से उनके अपने ही व्यक्तित्व का एक छोटा टुकड़ा किसी किरदार में घुसकर उनके अब तक न पाए जा सके अलग फलसफे पर चलने का जुगाड़ करता रहता है। उनके इर्द – गिर्द करीब – करीब वही व्यक्ति थे, जो हमारे भी किसी न किसी दौर में करीबी रहे। कोई ऐसा नहीं था हमारे आस – पास जिसके किरदार की बारीकियों के रेशे कभी उघेड़े न गए हों। और कई बार हुआ जिसका वे ज़िक्र करते, कोई दूसरा उस शख्स के बारे में बोलने लगता।  हममें से ही कोई न कोई उन्हें जानता था जिसके कारण देव साहब की किस्सागोई में खलल पड़ जाता।

    किरण माकन अपने अतीत को लेकर गौरव के भाव में रहती थीं। वो एक रईस और अमीर परिवार से थीं, डर से उन्हें कभी किसी ने कहा नहीं  कि कोई भी फैमिली लिगेसी वो संभाल नहीं सकीं। पति विदेश गया, लौटा नहीं , सौ मुंह सौ किस्से, इनकी कहानियों का वो खलनायक है अब। उनकी कहानियों में कई और अहम और मामूली किरदार हैं, लेकिन किरण ने अपनी स्क्रिप्ट में उन सबों को कमज़ोर कर रखा है। बहुत सारा वक्त उनका भी विदेशों में कटता था और आभिजात्य अंदाज़ में आहिस्ता से ग्लास खाली करते हुए, दूसरे पेग में बर्फ के ज़्यादा टुकड़े डालने के इशारे के साथ भविष्य की भी कई सुनहरी योजनाएं परोस देती थीं। वैसे उनके आभिजात्य होने की ठसक हम लोगों पर हमेशा तारी रहता था।  हम उनके अंदाजों के कायल थे। मैं तो उनका मन ही मन प्रशंसक रहा हूं।  किरण का मैं व्यक्तिगत तौर पर अहसानमंद भी रहा हूं।  मेरे हर गाढ़े और टेढ़े वक्त में वो मुझ पर रहम दिल रही हैं। उन्होंने साथ दिया है मेरा ।

    देव साहब की ठन जाती है अगर किसी से तो वो किरण माकन ही हैं। देव साहब एक प्रतिष्ठित पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में ऊंचे पद पर हैं, और किरण माकन सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अद्वितीय प्रतिभा शाली। देव डायरेक्टर फाइनेंस  हैं और कहे जाते हैं कि रसूख वाले आदमी हैं और किरण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल मार्केटिंग की मास्टर।  किरण डिजिटल मार्केटिंग को दुनिया के बड़े बदलाव के रूप में तुरंत साबित कर देती हैं। किरण माकन का नेटवर्क बहुत ही बड़ा है। आईटी के कई स्मार्ट लड़के लड़कियां उनके इशारे पर मौजूद रहती हैं। वे सबकी जरूरतों में काम भी आती हैं। अपने – अपने पेशों की बारीकियां और सफलताएं दोनों के पास बहुत ज्यादा थीं। अपनी – अपनी जगह दोनों की बहुत इज्जत भी थी। इन दोनों के बीच की तल्खियों में  मैं बीच बचाव की मुद्रा में हमेशा रहता लेकिन देव साहब का इल्जाम मुझ पर होता कि तुम किरण का पक्ष ले लेते हो।

    इधर मैं था ज़िन्दगी ने जिसे बुरी तरह ठगा था। हर दाम पर शिकस्त, हर मोड़ पर घबड़ाहट, मैं बेतरतीब होता गया था धीरे – धीरे। खुद की ही स्टोरी में दरकिनार किरदार, हालात ओवरटेक कर लेते थे मुझे। बाद में चालाकियां करके खेल में लौटता, लेकिन दूसरे बुलंद किरदार हाशिए पर मुझे फिर से धकेल देते। अब मुझमें मेरा हिस्सा ही कम होता जा रहा था।  लेकिन मैं भी अपनी  शामों में अपनों की दखल अनिवार्य रूप से चाहता था। अपनी बोझिल शामों में हंसने की वजहों और खुशनुमा पल बेहद ही जो कम थे, उन लम्हों की गणना करने लगा था मैं। मेरी यादाश्त अच्छी थी तो मैं फर्क के  साथ कह सकता था बहुत दिनों बाद भी कि हमारी उस  चर्चित शाम में हमारे अतिरिक्त और कौन – कौन शामिल था। किसने उस दिन क्या और क्यों कहा था।  किस बात पर हम हंस सके थे। कैसे मैंने दूर अन्य रातों की तरह ढलती हुई उस  रात को भी बहुत देर तक नींद नहीं आने के कारण देखता रह गया था।

    अरुणा, मेरी पत्नी देहरादून रहती थी बल्कि उसने वहां होना चुना था ताकि वो दिल्ली में रह रहे नजदीकियों से और मुझसे दूर हो सके। कुछ सवालों से और कुछ हालात से बचती थी वो। दिल्ली में कई बार एक्सपोज्ड हो जाने के कारण, अरुणा गुमनाम रखना चाहती थी अपने दिन, अपनी शामें। अपने किसी भी सवालों से घिरे लम्हे पर कोई जिरह नहीं चाहती है कभी । पर उसकी सहेलियां जब उदास और उससे नाराज होतीं तो अरुणा के सहेजे और छुपाए हुए उसके ऐसे लम्हे सरककर मेरे वक्त में आ गिरते, मुझे विस्तार से सारी जानकारी मिल जाती। उसने अपनी छवि को जीवन की कड़ी धूप में आने से बचाया था। नाहक थोड़ी भी गर्मी में झुलसने का खतरा महसूस करती थी वो। मैं दिल्ली में बेटी को लेकर रहता था, बेटी की हर जरूरत पूरी करता, उसकी पढ़ाई पर ध्यान रखता, उसकी मुस्कान में अपनी खुशी तलाशता, अपने कुटुंब और सामाजिक रिश्तों की हिफाजत करते हुए और अरुणा के रोज़ के जासूसी प्रश्नों का सही – सही जवाब देते हुए।

    किरण माकन ने जब जोर डालकर मुझसे बहुत संजीदगी से पूछा , “तुमने तलाक़ लेने के बारे में क्या सोचा है। जिस तरह तुम वक्त टाल रहे हो, एक दिन हाशिए पर ही न चले जाओ कहीं।” मैं थोड़ी देर चुप रहा लेकिन दोबारा पूछे जाने पर मैंने कहा: “अरुणा गेम खेल रही है, मुझे कमजोर खिलाड़ी समझकर। मैं उसके खेल का हिस्सा नहीं हूं  उसे बरबस यह भान कराता रहता हूं । लेकिन उसे यह अहसास कराने का एक छोटा खेल मेरा भी है। इस तरह हम दोनों एक दूसरे की ज़िन्दगी को खराब कर रहे हैं। जल्दी उसे भी नहीं है, और देर तक और दूर तक मैं भी यूं ही चलना चाहता हूं। हर शाम वह बेटी के बारे में जानने के लिए, उससे बात करने के लिए फोन करती रहती है लेकिन मेरे नंबर पर। थोड़ी देर ठहरकर समझने का आदतन प्रयास करती कि आज भी किरण, देव या कोई और साथ है या नहीं। मैं कभी फोन करके नहीं जानना चाहता कि इस वक्त वो कहां है, मुझे उसकी जिंदगी का अहसास तो है, उसमें दिलचस्पी नहीं रही। मैं जान बूझकर अपने को गलत दिखाना चाहता हूं ताकि वो अलग होने में दर्द न महसूस करे। उसका मुझसे दूर हो जाना आसान हो जाए। जब बात इतनी बिगड़ ही गई तो किसी किस्म का साथ क्यों जरूरी है।”

    मेरी ये बातें जो मुझे बुलंद किरदार बना रही थीं,  देव और किरण दोनों ध्यान से सुन रहे थे। अर्चना और राकेश भी  असहज  थे। वे हतप्रभ थे , मैं क्या बोल रहा हूं। अर्चना जादुई थीं। मुद्दे सीधे – सीधे सामने आ जाएं तो असहज दिखने लग जातीं, लेकिन ऐसे मौकों पर सारी बातें उनके नियंत्रण में होतीं। पति कैंसर की भेंट चढ़ गए थे, बहुत कोशिशों के बाद भी बचाए नहीं जा सके। अर्चना अपने उन दिनों को सहेजकर रख आई थी कहीं।  राकेश दबे पांव प्रवेश कर गए और अर्चना के जीवन का निर्वात बहुत ही नर्म अहसासों से भर गए थे। इन दोनों की समझदारी और आत्मीयता  को देखकर कोई नहीं कह सकता कि इनका संबंध बस एक डेढ़ साल पुराना है। अभी इन्होंने शादी नहीं की है, लेकिन कुछ निर्णय दोनों कर चुके हैं, ऐसा लगता है। अर्चना का यह ट्रांजिशन बहुत स्मूथ था और यही उसके दृढ़ व्यक्तित्व का सबूत भी। दोनों एक साथ किसी भी महफिल के, ऐसी किसी भी शाम का अनमोल जोड़ा थे।

    किरण माकन मेरी पत्नी अरुणा की सीनियर थीं, अरुणा की नजर में मैं उनके बेहद करीब था। अरुणा कई बार किरण को लेकर ताने मार चुकी थी। अरुणा के अपने तरीके थे खुद के पहले ही बना लिए गए निष्कर्षों पर एक सघन यात्रा के बाद पहुंचने के। जिसमें प्रश्नों के जवाब मुझे देने थे। यह इम्तहान मुझे रोज़ ही देना पड़ता था। परिणाम मेरे विरुद्ध ही होना था। किरण अपने वक्त में बहुत ज़्यादा लिपटे होने के बावजूद भी मुझे अन्दर तक समझने लगी थीं। उनका काम अब उनका बहुत ज्यादा वक्त लेने लगा था।  एक बेईमानी हम दोनों में थी। हम अपना भाव इतना करीब होते हुए भी जाहिर नहीं करते थे। एक अजीब किस्म के स्नेह का भाव सा था  मेरे लिए अंदर से उन्हें , जो वो कभी जाहिर नहीं करती थीं। किरण माकन न ही मुझे, न ही  किसी और को यह समझने  देना चाहती थीं कि मैं उनकी सोच का एक हिस्सा भी हूं । और इधर मैं कुछ सोच भी सकूं, किरण को सीधा कह भी सकूं , मैं धीरे – धीरे इस हैसियत से बेदखल हो रहा था। मेरी ऐसी कई उलझनें मुझे बहुत सारे रास्तों पर कदम बढ़ाने से रोकती थीं।

    किरण को हम दोनों,  मैं और देव समझते  थे। किरण हम दोनों को नहीं। किरण का आदमी परखने का हुनर अच्छा था। लेकिन वो देव के मामले में धोखा खा गईं । उन्होंने देव को बहुत ही चालाक आदमी समझ लिया था। देव के लिए किरण उतना महत्त्वपूर्ण नहीं थीं। देव उन्हें भी नहीं समझते थे, जिनके रिश्तों और जिनकी  कहानियों में वो नए नियामक और किरदार लेकर आ जाते ।  लेकिन देव का दूसरा पहलू भी था। देव एक लंबे समय के आजमाए हुए व्यक्ति थे, एक आवाज पर कभी भी पहुंचने वाले, यारों के यार। अपनी कमजोरियों के बावजूद देव एक बेहतर इंसान थे, हमारी मानसिक और भौतिक दुनिया का अनिवार्य हिस्सा।  किसी भी कीमत पर जिनकी दोस्ती पर नाज़ किया जा सकता था।

    कभी-कभी अच्छी स्क्रिप्टेड गुजरती हुई शाम फिसल जाती है। पट कथा के अहम किरदार ऐसी शामों का फिसलना संभाल नहीं पाते। ये भी एक ऐसी ही शाम थी जो देखते – देखते हाथों से छूट गई। बात – बात में देव ने किरण को बहुत मेच्योर्ड कह दिया। देव साहब के बहकने का समय आ चुका था ।  यह कहना बहुत नेगेटिव अर्थ में था। वे पर्सनल हो चुके थे। किरण ने इस शब्द को अपने दिल पर ले लिया। कहने लगीं : “ये जो कुछ नायक थे न आपकी कहानियों में, जिन कहानियों के आधार पर आप महफिलें लूटते रहे उनमें आपके नायकों की  ट्रैजेडी पूरी नहीं आ पाई। इसलिए मैच्योरिटी और रिजिलिएंस आप समझ नहीं पाए। जीवन में ट्रेजेडी मेच्योर्ड करती है देव साहब। आप जब पूरे पर्सपेक्टिव में इन चीजों का विश्लेषण करते तो आप बताते कि इन्हें वह सब कुछ हासिल था, जो आम किरदार पाने को तरसते रहते हैं ।  आप हमें देखें कि हमने पूरी ज़िन्दगी लगा दी दिल्ली में  स्थापित होने में, तब जाकर कहीं मिला ये मकाम । जबकि आपके इर्द गिर्द के अदना नायकों के पास दौलत थी, घर था, दोस्त थी, एक अच्छी कार और पब में गुजरती हुई रंगीन शामें ।  तस्वीर का दूसरा रुख भी पलटकर देखना होता है। इन पात्रों के  पास भरोसे का अपना कोई नहीं था, उन्होंने हर अपनों का भरोसा तोड़ा था। जो उनकी सहेलियां थीं, उन सहेलियों की नजरों में भी वो रहबर नहीं थे। और आप अपने ऐसे दोस्तों का उत्साही तिलिस्म रचते रहे ।”  किरण माकन  देव साहब  पर इससे पहले भी आक्रामक हुई थीं , पर आज बात बिगड़ जाने को आमादा थी।

    किरण ने सांस भी नहीं लिया, बोलती रहीं। “साहिल जैसा किरदार कहां होता है , हर बार किसी को धोखा देता है और  फिर एक नई दोस्त मिल जाती है।  साहिल के बुलंद किरदार में तो आपका दोस्त ही है न। इंस्टा और फेस बुक पर बहुत ज़्यादा चर्चित। इसने ग्रीक देवताओं की मैस्कुलिनिटी का महाजाल बिछाया हुआ है। उसकी तस्वीरें कहीं आप ही तो नहीं खींचते और एडिट करके चेपते  हैं।  और फिर आप उसी की  कहानी को मांज कर पेश करते हैं। असलियत यह है कि  साहिल की दोस्त आपकी भी दोस्त है देव साहब। कहानी में ट्विस्ट यहां था। गरिमा साहिल के साथ होते हुए भी ,  शामों को एन्जॉय करते हुए भी आपको मेसेज करती रहती थी।”

    किरण कहती चली गईं। अर्चना ने देव का बचाव करना शुरू किया। अर्चना स्नैक्स और ड्रिंक्स पर बातों को लाना चाहती थीं। ” किरण, इसे फिनिश करो न दूसरा ड्रिंक देती हूं।” साहिल को वर्थ नहीं मानतीं अर्चना। “क्यों उस पर समय खर्च किया जाय।” पर  अर्चना दमदार तर्क और बहाने नहीं जुटा पा रही थीं जो इस मौके को डिफ्यूज कर सके,  राकेश सामने बिल्कुल चुप बैठे थे। किरण और उग्र हो उठीं।

    देव ने कहा ” सोच समझकर इल्जाम लगाइए, किरण। आपकी भी कई बातें बोली जा सकती हैं। हमाम में बहुत फिसलन है। कभी भी गिर सकते हैं हम लोग। हम सभी कमज़ोर लोग हैं। अपनी कमजोरियों के गुलाम। मतलब इज्जत किसी की भी, कहीं भी जा सकती है।”

    किस्सागोई भी अजीब चीज है न, विस्मय के सन्दर्भ बदल देती है।  आदमी खुद को टटोलता रहता है हतप्रभ होकर। उत्कर्ष को पराभव के बरक्स खड़ा करके चमत्कार पैदा कर देती है। साहिल को बेहतर ठहराते थे देव ताकि साहिल भी खुश रहे और किसी को कुछ समझ में न आए। गरिमा अब उनकी चाहत  थी। उनके इस नये प्यार का भेद खुलने का डर उन्हें  अलग से साल रहा था। किरण माकन कह रही थीं : “स्टोरी में दरअसल वहीं साहिल की नैतिक हार थी, उसका निम्न स्तर का समझौता था। हमारे सामने आपका नरेटिव उतना ग्रेट क्यूं। दो पेग अंदर जाते ही अपनी  कहानियों में ट्विस्ट ले आते हैं आप।  साहिल ने अपने को गिराया था , गरिमा को आप तक जाने दिया, अपनी एक्स को वापस लाने के लिए। वह गरिमा से छुटकारा चाहता था।”

    अर्चना के पास भी मौका था। वो इतना सब कुछ नहीं जानती थीं  । पर देव को इस सिचुएशन से निकालना चाहती थीं। “चाहतें अजीब मोड़ पर ले जाती हैं। कमज़ोर कर देती हैं इंसान को। दिल के अनुसार जिंदगी की कहानी बन नहीं पाती। जो हारता हुआ दिखाई पड़ता है दरअसल उसी को सब कुछ मिला, नाटक खेला जाता है। देव साहब छुपे रुस्तम निकले आप भी। गजब साहब। गरिमा से इश्क कर बैठे। मुबारक हो नया आगाज। कहानी दिलचस्प है।” देव साहब नहीं चाहते थे अर्चना यह सब जाने। लेकिन किरण माकन ने आज मिट्टी पलीद कर दी। अर्चना को खुश रखने की लगातार कुछ महीनों से कोशिशें की थीं देव साहब ने। मैं भी हतप्रभ था देव का विस्तृत फैलाव देखकर।

    मैंने प्लेट, चम्मच और कटोरे जो यूज किए गए थे उन्हें हटाते हुए जान बूझकर कुछ गिरा दिया।  चम्मच और कांटे फर्श पर गिरते हैं तो ध्यान बांटते हैं। उनकी आवाज तीखी होती है। साइमन को फिर मैने पकड़ाया कि इसे किचन ले जाओ। फ्रेश प्लेट और चम्मच वगैरह ले आओ। हॉल के अंदर मद्धिम रोशनी थी। मैने पूछा रोशनी थोड़ी सी तेज कर दूं। चेहरा तमतमाया था देव साहब का भी। अर्चना को मद्धिम रोशनी पसंद थी। उसने मना कर दिया।  किरण टेबल सजा हुआ पसंद करती हैं। उन्हें रूमाल तक  की बारीकियां भी ध्यान में रहती हैं और वह भी  करीने से सजी होनी चाहिए। उन्होंने  भी मना किया। मैने कहा “ये अंधेरे मुझे इसलिए हैं पसंद इनमें साया अपना दिखाई न दे। ये गाना नहीं कयामत है।” अर्चना का ध्यान बंट चुका था। उन्होंने कहा उसे गाकर सुनाओ। राकेश ने इशारा किया कि सिगरेट पीना है और हम बालकनी की तरफ जाने ही वाले थे कि किरण खेल में फिर वापस आ गईं।

    किरण ने बीच में ही फिर टोका: “और आखरी बात । आपके इन नायकों के पास  ऐतबार के लायक बहुत सारे दोस्त कहां से मिल गए थे। साहिल और गरिमा दोनों घुटे हुए अजीब लोग हैं। यह एक चालबाज जोड़ा है, सुन लीजिए हमारी महफिलों के किस्सागो। बखूबी ये जाल रचते हैं अपने लाभ के लिए। मूल्यों की बात क्या उसका लेश मात्र भी नहीं इनके दिलों में। आज यहां, कल वहां। ताज्जुब नहीं कल गरिमा आपको भी छोड़ दे। कोई आंख का अंधा, भरी पूरी विरासत वाला उसे फिर मिल जाएगा। या फिर साहिल के साथ गोआ के कैसिनो में। फोटो डलेगा इंस्टा पर, बाहों में बाहें डाले और आप किसी और की कहानी दो पेग लेकर सुना रहे होंगे।”  किरण रुक ही नहीं रही थीं।

    मैं राकेश के साथ बालकनी में आ गया था। राकेश पूरे प्रसंग में चुप थे। हम दोनों थोड़ी दूर आए अर्चना के हाथों में इस फिसल गई शाम का एक शिरा पकड़ाकर, ताकि कुछ संभाल सके तो वो संभाले। अर्चना भी चाहती थी बात बदल दी जाए पर हो नहीं पा रहा था। राकेश दूर देख रहे थे।  बालकनी से  दिख रही थी दूर सड़क पर गाड़ियों की कतारें। उनकी रोशनी सुंदर दृश्य बना रही थी रात में। हवा थोड़ी ठंडी, बिल्कुल हल्की सी थी। मैं अक्सर बालकनी में देर रात घंटों बैठता हूं। राकेश सिगरेट और लाइटर अपने साथ ही रखते थे। राकेश ने कहा “जानते हो मैं  गाड़ी लेकर रातों को निकल जाता हूं, अकेले। दूर तक जाकर, कुछ गाने सुनकर, एक दो सिगरेट फूंककर फिर लौट आता हूं।”  राकेश एक लॉयर थे और लॉ फ्रेटरनिटी में उनकी अच्छी इज्जत थी। कोर्ट के बाहर वे बहुत कम बोलते थे। उन्होंने सिगरेट सुलगाई, मैने भी उनके बाद उनके ही हाथों के लाइटर से। राकेश ने दो कश के बाद ही पूछा  “क्या तुम तलाक लेनेवाले हो। तुम्हारा अब ठीक नहीं हो सकता क्या।”

    मैने कहा  “शायद ठीक न हो पाए अब। लेकिन कुछ कह नहीं सकता। मैं कोशिश करूंगा इस रिश्ते को ज्यादा दिन चलाने के लिए। शायद रियलाइजेशन बाद में हो जाय हम दोनों को।”  मैं फैमिली कोर्ट के जज की तरह बोल रहा था। राकेश भी ध्यान से मेरी बातों को सुनने का ड्रामा कर रहा था, जबकि हम दोनों का ध्यान हॉल में किरण और देव पर था।

    राकेश मुद्दे पर थोड़ी ही देर में आ गए “देव और  किरण के बीच कुछ पहले से रहा है क्या?” मैने कहा “नहीं, पर एक दूसरे के विचारों के विरोधी दोनों ही हैं। कुछ खास कभी दोस्ती रही नहीं दोनों के बीच।”  मैं सोच रहा था कैसे कहूं कि देव तो तुम्हारी गर्ल फ्रेंड अर्चना की दुनिया में अपने लिए जगह तलाश कर रहा है राकेश। उसे अपनी दाल गलती हुई दिख  भी रही है । देव अजीब ढंग का किरदार है। बचकर रहना आप राकेशजी। कुछ भी बोल नहीं सका मैं, कुछ बातें कभी नहीं आ पाती हैं जुबान पर।

    सिगरेट खत्म करके हम हॉल में लौट चुके थे। मैने एक गाना भी गाया। “जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे।” लेकिन शाम फिसल चुकी थी अपनी जगह से और अपने मजे से भी। बातें असर कर गईं, चेहरे सामान्य रहे नहीं। साइमन ने खाना गरम किया। किरण और अर्चना दोनों एकदम गरम खाना पसंद करते थे, यह साइमन को मालूम था। आखरी ड्रिंक लगाई जा चुकी थी। इधर – उधर की बची हुई बातें हुईं, फिनिशिंग अर्चना कर रही थीं। मरहम कम था, छाले अधिक। अपने कुछ उदास, कुछ बनावटी चेहरों के साथ इस फिसली हुई शाम के  सब किरदार डिनर लेकर विदा हो गए। मैं छूट गया था हर लम्हे की पेचीदगी का विश्लेषण करते हुए।  थोड़ी खटास रह गई मेरे घर में डिनर के बाद हॉल के एक कोने में छूट गई सी, एक अनाम सी।

    मुझे नींद नहीं आ रही थी। अरुणा का फोन था इस बार बेटी के नंबर पर। यह जानने के लिए कि पार्टी खत्म हुई कि नहीं। आधी नींद में मेरी बेटी  मां के सवालों से झुंझला रही थी। कुछ दिनों से देख रहा हूं मैं कि बेटी और मां के संवाद में झुंझलाहट आती है फिर बेटी फोन काट देती है। मैं सोचता रहा। आपके इर्द – गिर्द ऐसे कितने लोग हैं जिन पर आंख मूंदकर ऐतबार  किया जा सकता है ।  गरिमा और साहिल नाचते – नाचते गिर जाते, कोई दोस्त घर छोड़ देता, कोई सोफे पर कोई जमीन पर और नींद टूटती  सुबह देर से।  हौज खास के अड्डों पर पलती  जोड़ियां कई अलहदा जिंदगियां एक साथ जीती हैं।  जिसे सोया हुआ मान लेती है दुनिया, वह सब कुछ सुन रहा होता है।  इनकी नींद टूटने से पहले कई बार इनका अपना समय ही धोखा देकर निकल चुका होता है, आधी रात को ही किसी और दोस्त के साथ।

    गरिमा वकील थी। उसने मुझसे कहा था मैं अमेरिका  जाऊंगी। इस शहर दिल्ली में कई क्लाइंट्स और दोस्त  थे उसके। उनसे लगातार कम्युनिकेट करती रही है वो। कई लॉ फर्म में उसकी पैठ थी। वह सोशल मीडिया की प्रिंसेस थी। सोशल मीडिया ने पुराने रिश्तों का निरंतन पुनरावलोकन आसान कर दिया है। रिविजिटिंग दैनंदिन का हिस्सा हो गया है। उसकी अभिव्यक्ति आकृष्ट करती है। लाइक्स तो संभाल नहीं पाती। कभी मेरी भी अच्छी दोस्त बनी थी वो। मैं उसके अभिव्यक्त होने के तरीकों का कायल था। वह यॉट और चार्टर्ड जेट की बात करती थी । उन दिनों अरुणा और हम साथ थे । हमारी दूरियां एक घटना के कारण हुई, अरुणा से एक दिन वह लड़ बैठी। मैं दोनों में किसी को समझा नहीं सका। कुछ दिनों के बाद ही हम दोनों  के रास्ते अलग हो गए। अब चार साल बाद घूमकर अब देव साहब की दोस्त बन गई। शायद कभी हम पास बैठें, देव साहब के साथ वो भी हो, ऐसी ही एक हाथों से फिसल गई शाम को। शाम जो संभाले न संभाली जा सकी आज भी। उस दिन कुछ नया फिर हो जाए, जो आज की ही तरह सबको अच्छा न लगे। “अब तुम उतने बिखरे हुए नहीं रहे। तो चलो, कॉफी मैं आज भी लेती हूं और कनॉट प्लेस आज भी वाइब्रेंट जगह है। ” उसका यह असहज कर देनेवाला संवाद याद है मुझे। ऐसे संवादों की मास्टर थी वो। मुझे नींद आ ही नहीं रही थी। अरुणा, देव, अर्चना, किरण और अब गरिमा भी सारे किरदार चक्र में घूमते हुए। रोशनी बहुत कम, आवाज़ें मुखलिफ हवालों से शोर करती हुई। नींद दगा दे गई फिर से।

    यहां बरस बीते नींद टहलने भी नहीं आती कभी। मेरी बालकनी में कोई अनाम छाया बैठती है आधे अंधेरे में, अपने किसी खुशनुमा वक़्त का इंतजार करते हुए। सिगरेट से ज़्यादा नाउम्मीदी में जले हुए हम लोग हैं । फिक्र उड़ाते हुए धुएं में, रेजा रेजा ख्वाब उड़ता हुआ ऊपर की तरफ । एक कुर्सी, मोबाइल, सिगरेट और लाइटर, ग्लास आधी भरी हुई।  बस गुजर गई रात खरामा – खरामा। ऐसे घर दिल्ली में हज़ारों हैं, और धुएं में उड़ते लोग लाखों में। जागते हुए पछताती रात में, भड़क कर गिर पड़ी एक शाम के बाद।

    क्या हमारे शेड्स औरों को भी उतना ही  ग्रे दिखते होंगे। हमारा अंधेरा किसी को तो दिखता होगा। सच अलग ही होता है, यहां तो पहलू में बैठी हुई आंखों के सामने से ही खो जाती है दुनिया। पल भर में बदल जाता है मंजर।   शेक्सपियर के समय से लेकर आज तक सब कुछ लोभ और धोखा है।  ज़िन्दगी को  क्रूर बनाती है, प्रतिस्पर्धा ।  दूसरी अदाकाराओं का  क़त्ल करके रैंप की मुस्कान कीमती बनाई जाती है। किसी दूसरे की सहेली के साथ जीने का उपाय बहुत जल्दी कर लिया जाता है।  आगे निकल जाओ एक संजीदा सा छलिया चेहरा दिखाकर। देव साहब, यह तो छल है यार, तुम तो शातिर निकले। साहिल को तो तुमने कुहरता हुआ छोड़ दिया। साहिल ने गरिमा के साथ ढेर सारे सपने बुन लिए थे। यह तो ढह जाना है महल का। वह तो लोगों के सामने ड्रामा करेगा कि कोई बात नहीं, लेकिन वर्षों इस सदमे से उबर नहीं पाएगा। दिल और दिल्ली करीब से देखो मेरी जान। सच सामने आने दो, बनावट नहीं। इसी समय किरण का व्हाट्स एप मैसेज था  “सो जाओ, जिंदगी ऐसी ही है मेरे दोस्त। मैं जानती हूं और चिंतित भी हूं कि तुम जागते रहते हो।” जबकि जग रही थी वो भी।

    मैं कहना चाहता था जवाब में कि किरण, क्या तुम सच में  ज़िन्दगी को समझ पाई अभी तक? रातों में जागते रहना अब वर्षों पुरानी आदत है। पर आज की शाम तो तेरे दामन से फिसलकर गिरी, किरण। तुम बोलते हुए रुक जाती तो बात संभल जाती। हालांकि इस शाम को संभाल न सकने का दर्द मुझे भी है। पर चुप ही रहा, कोई जवाब नहीं दे पाया। सिगरेट खत्म हो चुका है, सुबह होने के आभास होने लगे।

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