रमेश ठाकुर की कहानी ‘फिर कभी मिलेंगे’

आज पढ़िए युवा लेखक रमेश ठाकुर की कहानी। पढ़कर अपनी राय ज़रूर दीजिएगा-

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“हैलो राकेश! कहाँ हो तुम?”

“मैं अपने कॉलेज में हूँ। तुम बताओ, तुम कहाँ हो? आज कैसे याद किया?”

“मैं कैंपस आ रही हूँ। तुम मुझे आर्ट्स फ़ैकल्टी में मिलोगे?”

“बताओ, कुछ काम होगा तो आ जाऊँगा।”

“अरे! जब काम होगा तभी तुम आओगे? इतने बड़े आदमी हो गए हो तुम? बिना काम के तुमसे मिला नहीं जा सकता क्या?”

“अरे! नहीं नहीं! ऐसी कोई बात नहीं है। बताओ कितने बजे आना है? मैं आ जाऊँगा।”

“मैं करीब-करीब दो बजे के आसपास पहुँच जाऊँगी। तुम भी आ जाना। ठीक है?”

“हाँ ठीक है। मैं आ जाऊँगा।”

गीता बहुत जल्दी-जल्दी बोल रही थी। वह हाँफ रही थी। शायद बस या ऑटो से आ रही थी इसलिए आसपास से गाड़ियों की बहुत ज़ोर-ज़ोर से आवाज आ रही थी। राकेश ने उससे उसके जल्दी-जल्दी बोलने का कारण नहीं पूछा। वह आश्चर्यचकित था कि इतनी तेज धूप में गीता उससे मिलने के लिए क्यों आ रही है। मई के महीने में पैंतालीस डिग्री का तापमान बदन को जला रहा है। एक बार तो यह तापमान उनचास डिग्री के पार चला गया था। कुछ लोग कह रहे हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे बमबारी के कारण इस बार गर्मी समय से पहले आ गई है। गर्मी क्या है! आग बरस रही है! गर्मी नहीं लग रही है, बदन जल रहा है। जलन हो रही है। सौ मीटर पैदल चल ले तो आदमी बीमार हो जाए इतनी गर्मी है। इतनी गर्मी में गीता क्यों आ रही है? यह सवाल राकेश को परेशान कर गया।

    राकेश की शादी के दो वर्ष हो चुके थे। जब उसकी शादी हुई थी तब दिल्ली में दंगा हो रहा था। राकेश की शादी उसी दंगे वाले इलाके में होनी थी। लेकिन वहाँ नहीं हो पाई। कॉलेज कैंपस के एक मंदिर में उसकी शादी किसी तरह हो पाई थी। उसकी शादी से कुछ ही दिन पहले गीता की शादी हुई थी। गीता की शादी हो जाने के बाद उन दोनों के बीच कभी बातचीत नहीं हुई। इन्स्टाग्राम के पोस्ट से दोनों  एक-दूसरे को देख रहे थे। कोरोना ने दोनों के कई साथियों को छीन लिया था। कम ही मित्र रह गए थे जिनसे कभी-कभार बातचीत हो जाती थी। दो साल के लॉकडाउन में दोनों किसी से मिल नहीं पाया था। दो वर्ष कैसे बीता यह संसार जानता है। लोग तो बस जिंदा रहने की उम्मीद में ही जी रहे थे! फेसबूक पर दोस्तों की फोटो देखकर दिल को सुकून मिलता था। राकेश ने कई बार सोचा कि फेसबूक देखना बंद कर दे। रोज-रोज किसी न किसी परिचित के चले जाने की खबर से उसका मन विषाद से भर गया था। परंतु हताशा और निराशा के बीच यही सोशल मीडिया उम्मीद भी जगाता था। यह नहीं होता तो जीवन बहुत नीरस हो जाता। उसके ऐसे कई मित्र थे जिससे बातचीत तो नहीं होती थी पर फेसबूक से उसका अपडेट मिलता रहता था। इतनी तसल्ली बहुत थी दिल को बहलाने के लिए। इसलिए चाहकर भी सोशल मीडिया से वह अलग नहीं हो पाया। सुख और दुःख जीवन के दो अभिन्न पहलू हैं। इससे कोई भी मनुष्य नहीं बच सकता। बचा ही नहीं जा सकता। भले कोई लाख कोशिश कर ले! राकेश ने सोशल मीडिया को इसी रूप में स्वीकार किया। अच्छी और बुरी खबर वह इसी से पाता रहा। दो साल का ‘काल’ इसी तरह बिता।

    शादी के बाद गीता से राकेश की कभी बातचीत नहीं हुई थी। शादी से पहले दोनों अक्सर कैंपस में मिला करते थे। दोनों क्लासमेट थे। एमए की पढ़ाई साथ-साथ की थी। पढ़ाई के दौरान दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते थे। दोनों में शायद ही कभी बात हुई हो। मास्टर करने के बाद उसकी बड़ी-सी मित्र मंडली बिखर गई। सब अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े। राकेश एमफिल करने के लिए महाराष्ट्र चला गया। डेढ़ साल वहाँ रहा। गीता कहाँ गई किसी को कुछ पता नहीं चला। वह कथक डांस बहुत अच्छा करती थी। एमए करने के दौरान उसे विश्वाविद्यालय की ओर गुड परफ़ोर्मेंस के लिए अवार्ड भी मिला था। इतना अच्छा कथक डांस करने वाली खूबसूरत लड़की मास्टर के बाद कहीं गुम-सी हो गई।

    चार साल बाद राकेश जब कैंपस से होकर गुजर रहा था तो उसने देखा कि कुछ मित्रों के साथ पत्थर की बेंच पर कतार में बैठी गीता गप्पे मार रही थी और ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी। उसकी हँसी के कारण राकेश का ध्यान उसकी तरफ गया। जैसे ही उसने पलटकर गीता की ओर देखा, लोकेश फट से उठकर खड़ा हो गया और हाथ आगे बढ़ाते हुए राकेश से कहा- “तुम्हारी उम्र बहुत लंबी है यार! अभी हम तुम्हारी ही चर्चा कर रहे थे कि राकेश भाई का पीएचडी में एडमिशन हो गया। तुम्हें फोन करने ही वाले थे हम लोग। ईमानदारी से कह रहा हूँ भाई। कसम से!” अब्दुल भाई भी उठकर खड़े हो गए। उसने राकेश को गले से लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाई। राकेश जब संघर्ष कर रहा था तब अब्दुल ने ही अपने वेतन का पहला ब्याज उसे दिया था। करीब सोलह सौ रुपये थे। अब्दुल का कहना था कि ब्याज का पैसा खाना इस्लाम में हराम माना जाता है। एमए के सभी दोस्तों में अब्दुल ही थे जिसकी सरकारी नौकरी सबसे पहले लगी थी। एमए करते समय ही वह हरियाणा के किसी प्राइमरी स्कूल का मास्टर बन गया था। वहाँ बेंच पर बैठे सभी एमए के साथी थे। चार साल बाद पहली बार राकेश गीता को देखा रहा था। उस दिन सभी ने खूब मस्ती की।

    राकेश को उस दिन पता चला कि गीता चार साल से खाली बैठी है। उसका कहीं एडमिशन नहीं हुआ और न ही कहीं कोई काम मिला। उसने राकेश से नेट की तैयारी कराने के लिए कहा। तभी राकेश को अचानक याद आया कि गीता बहुत अच्छा डांस करती है। उसने गीता से कहा- “गीता, तुम कथक डांस तो बहुत अच्छा करती हो फिर अभी तक कुछ क्यों नहीं किया? मुझे तो लगा कि तुम बहुत आगे निकल गई होगी! क्या घर वाले इसकी इजाजत नहीं दे रहे हैं?” “पापा को ये सब पसंद नहीं है राकेश!” गीता ने सिर्फ इतना ही कहा। राकेश ने उसे एक सलाह दी- “देखो गीता! नेट की तैयारी तो मैं तुम्हें करा दूँगा। इसमें दिक्कत ही क्या है! दस लोगों को तो पढ़ाता हूँ, उसमें तुम भी बैठ जाना। लेकिन इसके साथ-साथ तुम डांस भी जारी रखो। बताओ! इतना अच्छा डांस करती हो फिर भी आज…! तुम्हें तो बहुत ऊपर होना चाहिए था। हम तो यही सोच रहे थे कि तुम बहुत दूर निकल गई होगी। पर कोई बात नहीं। अब एक काम करो, अपना यूट्यूब चैनल बनाओ और डांस की वीडियो बनाकर अपलोड करो। आगे जो होगा देखा जाएगा।” राकेश का यह सुझाव गीता को पसंद आया। वह रोमांचित हो उठी- “अरे यार! ये तो तूने बहुत अच्छा आइडिया दिया! मेरे दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई पहले?” इतना कहकर उसने माथा पीट लिया। गीता ने वैसा ही किया जैसा राकेश ने उसे बताया। देखते-देखते उसके सब्सक्राइबर बढ़ने लगे। व्यूज़ आने लगे। थोड़े दिन बाद उसने फोन करके राकेश को बताया कि यूट्यूब चैनल के माध्यम से उसे एक स्कूल में डांस टीचर की नौकरी मिल गई है। वेतन ठीक-ठाक दे रहे हैं। करीब तीस हजार रुपये हर महीना। वह बहुत खुश थी। नेट की पढ़ाई तो छूटती रही पर वह सेट हो गई, यह जानकर राकेश ने राहत की साँस ली। उसके बाद से राकेश और गीता में लगातार बातचीत होने लगी। उसकी डांस वाली स्कूल की वीडियो रोज यूट्यूब और इन्स्टाग्राम पर अपलोड होती थी। राकेश अक्सर उसे लाइक कर कमेन्ट कर देता था। कमेन्ट करने से व्युअर और फ़ालोवर बढ़ते हैं। राकेश को मित्र गीता की मदद करनी थी, इसलिए वह सोचता ही नहीं था कि गीता अच्छा डांस कर रही है या बुरा। वह डांस कर रही है उसके लिए इतना काफी था। मदद करने वाले सिर्फ मदद करते हैं। मीन-मेख नहीं निकालते। सुझाव देकर सुधार करते हैं, कमी बताकर खारिज नहीं करते। अगर कोई ऐसा इंसान मिले तो समझना चाहिए कि इंसान के ऊपर किसी की विशेष कृपा है। उसे खोना नहीं चाहिए।

    कुछ महीनों बाद उसने राकेश को फोन करके बताया कि उसकी शादी की बातचीत चल रही है। लड़का को दहेज नहीं चाहिए। उसके घर वाले भी तैयार हैं। यह रिश्ता भी यूट्यूब चैनल की वीडियो से तय हुआ था। गीता ने राकेश से पूछा- “राकेश, बताओ क्या करना चाहिए? शादी के लिए हाँ बोल दूँ?” गीता सिर्फ राकेश का मन टटोल रही थी। शादी के लिए तो वह कब से तैयार बैठी थी। उसकी पहली इच्छा ही शादी करने की थी। जब भी मिलती थी, शादी की बात करती थी। “शादी करूँगी और आराम से रहूँगी। शादी हो मुक्ति मिले!” हमेशा शादी की बात करती रहती थी। उसकी बात सुनकर राकेश ने उससे सिर्फ इतना पूछा कि “पहले तुम शादी करोगी या तुम्हारी बड़ी दीदी?” उसने तपाक से उत्तर दिया- “अरे यार! पहले मैं करूँगी। दीदी अभी शादी करने से मना कर रही है।” राकेश ने फिर पूछा- “तो दीदी को बुरा नहीं लगेगा कि बड़ी बहन कुंवारी है और छोटी शादी कर रही है? बाद में उनके रिश्ते में दिक्कत नहीं आएगी? लोग तरह-तरह के सवाल करेंगे। फिर क्या जवाब दोगी?” “नहीं, दीदी को बुरा नहीं लगेगा। वह बहुत खुश है। उसे दूसरे लोगों की परवाह नहीं है कि कौन क्या सोचता है। उसे जब तक नौकरी नहीं मिलेगी शादी नहीं करेगी।” उसने एक सांस में सब बोल दिया। “और तुम शादी करोगी?” राकेश ने हैरान होकर फिर पूछा। “हाँ यार! क्यों नहीं करूँगी मैं शादी! मैं तो इसी दिन का बेशब्री से इंतजार कर रही थी!” इतना कहकर वह ठहाके मारकर हँसने लगी। राकेश थोड़ी देर तक सन्न रहा। बात करना और हँसना गीता के स्वभाव की दो खूबसूरत विशेषताएँ हैं। वह मुरदों को भी हँसाने की क्षमता रखती है। बिना हँसे वह बात ही नहीं करती और बोलकर न हँसे ऐसा कभी हुआ नहीं। इतनी खुशमिजाज़ और साफ दिल की लड़की राकेश ने कॉलेज लाइफ में दूसरी नहीं देखी।

    गीता की शादी हो गई। दूरी की वजह से राकेश उसकी शादी में नहीं जा सका था। शादी की रात उसने दूल्हे की फोटो देखी। लड़का सुंदर है। सरकारी विभाग में ठेकेदारी का काम करता है। आमदनी अच्छी है। उसने गीता को डांस करने से कभी मना नहीं किया। बल्कि उसके डांस की वजह से ही वह गीता पर फिदा हुआ था। बहुत खुले मन का है। गीता को उसने पूरी आज़ादी दी। तभी विवाह के बाद भी उसकी वीडियो इन्स्टाग्राम और यूट्यूब पर अपलोड होती रही। रील्स तो रोज दिन में चार-पाँच आ ही जाते थे। भाई साहब भी अपनी मुंछों पर ताव देते हुए अक्सर नजर आ जाते थे उस रील्स में। राकेश को यह सब देखकर खुशी होती थी कि चलो गीता का घर बस गया और वह अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश है। धीरे-धीरे अपने वैवाहिक जीवन में वह रमती चली गई। शादी के बाद राकेश ने उसे कभी फोन नहीं किया। शादी के तुरंत बाद तो लॉकडाउन ही लग गया। दोनों यूट्यूब की वीडियो और फेसबूक पोस्ट से ही एक-दूसरे के जीवन का जायजा लेने लगे।

    पूरे दो साल बाद उसका फोन आया था। राकेश ठीक दो बजे कैंपस पहुँच गया। वहाँ पहुँचकर उसने गीता को फोन किया। वह कमला नगर मार्केट में थी। दस मिनट में पहुँच जाएगी ऐसा उसने कहा। राकेश वहीं कैंपस के गेट पर उसका इंतजार करने लगा। गीता आई और हमेशा की तरह दूर से ही खिलखिलाने लगी। दोनों ने हाथ मिलाया और कैंपस के भीतर प्रवेश किया। गीता ने मास्क पहन रखा था। दोनों बैठने की जगह तलाश ही रहे थे कि इतने में एक लड़का आया और राकेश को नमस्ते करने के बाद गीता से हाथ जोड़कर बोला- “भाभी नमस्ते।” गीता ने फट से मास्क उतार दिया और हँसती हुई बोली- “भाई साहब! मैं इसकी पत्नी नहीं फ्रेंड हूँ।” उसके बाद सब इतना हँसे, इतना हँसे कि क्या बताएँ! हँसते-हँसते दम फूलने लगा था। राकेश ने मज़ाक में ही कहा- “यदि किसी ने मेरी पत्नी को कह दिया कि मैं किसी दूसरी औरत के साथ घूम रहा था तो वह मेरा भर्ता बना देगी। खाट खड़ी हो जाएगी मेरी।” गीता ने दम लगाकर एक घूंसा राकेश की पीठ पर मारा और कहा- “क्या भाभी इतना शक करती हैं? मेरे पति को तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता।” राकेश ने मुसकुराते हुए कहा- “अरे नहीं नहीं! मज़ाक कर रहा हूँ। वह ऐसा नहीं है। तुम्हारे बारे में जानती है।” राकेश की बात सुनकर गीता ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा- “हम्म! मेरे हसबेंड को भी तुम्हारे बारे में सब पता है। वे तुमसे मिलना भी चाहते थे। पर कोरोना के कारण नहीं मिल पाए। लेकिन अब जल्द ही तुमसे मिलेंगे।”

    दोनों बात करते-करते पुरानी लॉं फ़ैकल्टी के पास वाली चाय की दुकान पर गए। चालीस रुपये वाली दो ब्लैक कोल्ड कॉफी का पैकेट लिया और पत्थर की बेंच पर बैठकर कॉफी पीने लगे। राकेश ने गीता से पूछा- “आज इधर कैसे आई हो गीता?” “अरे! तुमसे मिलने आई हूँ! और नहीं तो क्या! तुम भी हद करते हो यार! अच्छा ये सब छोड़ो, इस पर हम बाद में बात करेंगे, पहले कोई खुशखबरी सुनाओ। कोई नई ताजा खबर?” गीता ने बड़े एक्साइटेड होकर पूछा था। राकेश समझ गया कि गीता उससे फैमिली प्लानिंग के बारे में पूछ रही है। बोला- “अभी कोई खुशखबरी नहीं है गीता। पहले व्यवस्थित हो जाऊँ तब इसके बारे में सोचूंगा। तुम बताओ, तुम्हारी शादी तो मुझसे पहले हुई थी। तुम्हें तो देखकर भी लगता है कि…..!” राकेश ने इतना कहा ही था कि गीता ने ज़ोर का एक चाटा उसके कंधे पर मारा और कहा- “अरे! मैं बस फूल गई हूँ। तुम जो सोच रहे हो वैसा नहीं है। मैं प्रैगनेंट नहीं हूँ यार! हद करते हो तुम भी! इतना गौर से मत घूरो! नजर लग जाएगी!” इतना कहकर गीता थोड़ी देर तक हँसती रही। कुछ देर हँसने के बाद बोली- “अब कितना व्यवस्थित होओगे तुम? नौकरी तो मिल ही गई है न तुमको। अब क्या दिक्कत है? निकाल दो एकाध फटाफट!” “अरे नहीं नहीं! इसे तुम व्यवस्थित होना कहती हो? एडहॉक की नौकरी का कोई भरोसा है गीता? आज है कल नहीं। हर वक्त डरा डरा-सा रहना पड़ता है। डरे आदमी का हार्मोन्स बच्चा पैदा करेगा क्या? साली डरपोक औलाद ही पैदा होगी।” इतना कहकर राकेश ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। गीता ने मुक्का बाँधकर राकेश के मुँह पर मारने की कोशिश की, लेकिन मुस्कुराकर रह गई। दोनों हँसते रहे। फिर गीता ने पूछा- “क्या तुम्हारे कॉलेज में भी एडहॉक को डराकर रखते हैं सब? उसका शोषण करते हैं?” “नहीं गीता। हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। दूसरे कॉलेज का मुझे पता नहीं है। मेरे खयाल से किसी भी कॉलेज के शिक्षक एडहॉक को डराकर नहीं रखते होंगे। पर साली यह नौकरी ही ऐसी है कि हर वक्त सिर के ऊपर तलवार लटकी रहती है। उसका भविष्य सुरक्षित हो ही नहीं सकता। हाल ही में कुछ एडहॉक को वर्कलोड के नाम पर कॉलेज से निकाल दिया गया है। अभी देखो, दिल्ली सरकार के अधीन जितने भी कॉलेज हैं उसके एडहॉक शिक्षक को कई महीनों से वेतन नहीं दिया गया है। मैं अक्सर सोचता हूँ गीता, जो दो बच्चों के पिता होंगे, पता नहीं कितना अपमान सहकर जीते होंगे! दूसरा कोई चारा ही नहीं है उसके पास। वह किसी काम के लिए मना नहीं कर सकता। इच्छा के विरुद्ध भी बहुत-से काम उसे करने पड़ते हैं। उसके रहन-सहन, पहनावा ओढ़ावा को बड़ा नोटिस किया जाता है। एक परमानेंट शिक्षक ट्राउजर पहनकर कॉलेज आ सकता है लेकिन एक एडहॉक शिक्षक नहीं। हुक्मी बंदे होते हैं सब। इसलिए जब तक व्यवस्थित जीवन का आभास नहीं होगा बाप नहीं बनूँगा साला। चाहे जीवन भर बेऔलाद ही क्यों न रहना पड़े। तुम बताओ, कब दो से तीन हो रही हो?” “यहाँ साली लाइफ की बीन बजी हुई है और तुम दो से तीन की बात कर रहे हो!” इतना कहकर गीता फिर हँसने लगी। कभी-कभी राकेश सोचता है कि क्या गीता बिना हँसे कोई बात कह सकती है। अंदर से आवाज आती है- नहीं। उसके चेहरे पर शिकन नहीं देखी जा सकती। “क्यों? क्या हुआ?” राकेश ने बड़े आश्चर्य से पूछा। “अरे यार! बेरोजगार बैठी हूँ शादी के बाद से। कोविड में स्कूल की नौकरी चली गई। साला अब हर चीज के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है। हालाँकि पैसा देने से कोई मना नहीं करता है, मेरे पति तो कभी नहीं, फिर भी यार! अपना पैसा तो अपना ही होता है! जो मर्जी खरीदो, जो मर्जी पहनो। जहाँ मर्जी वहाँ घूमो, खाओ पियो मौज करो! लेकिन….!” इतना कहकर वह चुप हो गई। उदास तो नहीं हुई पर उसके चेहरे से हँसी गायब थी। उसने फिर कहा- “तुम्हें पता है, अभी मैं कमला नगर मार्केट में थी, एक सूट मुझे बहुत पसंद आया। पर खरीद नहीं पाई। उसके लिए घर में किसी न किसी से पैसे माँगने पड़ते। मेरे अकाउंट में तो वैसे पैसे हैं, पर उसका भी तो हिसाब देना ही पड़ता न यार! इसलिए मन मारकर लौट आई। मैं तुम्हें सच बताती हूँ राकेश, लड़कियों को जब तक नौकरी नहीं मिल जाए, उसे शादी नहीं करनी चाहिए। कम से कम उसे इतने पैसे तो जरूर कमाने चाहिए जिससे कि वह अपनी जरूरतों को पूरा कर सके। किसी के सामने उसे हाथ न फैलाना पड़े। भले वह पति ही क्यों न हो! सच कह रही हूँ। कसम से!” इतना कहकर उसने अपनी उँगलियों से कंठ पकड़ लिया। जैसे कसम पर सच्चाई की मुहर लगा रही हो! “और तुम्हारे डांस का क्या हुआ? काफी दिनों से तुम्हारी कोई वीडियो भी नहीं देखी मैंने।” राकेश ने पूछा। गीता ने बड़े भारी मन से इसका जवाब दिया- “अब वीडियो बनाने का समय ही कहाँ मिलता है यार! दिन भर घर में काम करती रहती हूँ। मेरे ससुराल वाले को मेरा डांस करना पसंद नहीं है। पहले स्कूल में बच्चों को सिखाती थी तो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर अपलोड कर देती थी। जब से शादी हुई है तब से सब छूट गया है। यहाँ तक कि पढ़ाई-लिखाई भी खत्म हो गई। जानते हो, जब भी पढ़ने बैठती हूँ, मेरी सास कोई न कोई काम करने लगती है। फिर मुझसे देखा नहीं जाता तो उनके हाथ से काम छीन लेती हूँ।” “तो तुम घर में काम करने वाली क्यों नहीं रख लेती?” राकेश ने गीता से पूछा। “मेरी सास को काम वाली रखना पसंद नहीं है। पता है, हम सोए ही रहते हैं कि वह घर में झाड़ू लगाने लगती है। मजबूरन मुझे उठकर उनके हाथ से झाड़ू लेकर सब साफ करना पड़ता है। पोछा, बर्तन सब करती हूँ। और सुनो! एक दिन क्या हुआ, मैंने अपने पति से एक थाली धुलवा दी, फिर क्या हुआ मालूम है? भाई साहब! मेरी सास ने बवाल खड़ा कर दिया। मुझे बहुत सुनाया उसने। उस दिन मैं अकेले में बहुत रोई थी। तब से लेकर आज तक मैंने एक चम्मच तक धोने के लिए किसी से नहीं कहा।” यह कहते-कहते गीता बहुत मायूस हो गई। राकेश को उसकी बातें सुनकर बड़ी हैरानी हुई। उसने गीता से पूछा- “और तुम्हारा पति कुछ नहीं बोलता?” कुछ देर सोचने के बाद वह बोली- “वैसे तो मेरे पति बहुत अच्छे हैं। मैं कुछ भी करूँ, कहीं भी जाऊँ, किसी से भी बात करूँ, उनको कोई परेशानी नहीं है। लेकिन अपने माँ-बाप के खिलाफ वे एक शब्द नहीं बोल सकते। अब तुम्हीं बताओ, मैं उन्हें क्या बोलूँ? दिन भर एक टाँग पर खड़ी रहती हूँ। दाल, रोटी, चावल, दो-दो सब्जी रोज बनती है घर में। वह भी एक-दो आदमी का नहीं, पूरे चार-चार पाँच-पाँच आदमी का। उस पर भी कोई इधर से कहेगा कि चटनी बना दो तो कोई उधर से बोलेगा पापर-तिल्लौरी छान दो। मैं तो चटनी की तरह पीसती रहती हूँ यार! पहले ही ठीक था। मुझे इतनी जल्दी शादी नहीं करनी चाहिए थी।” गीता धीरे-धीरे निराश होने लगी। राकेश पहली बार उसे इतना उदास देख रहा था। तभी राकेश की पत्नी का फोन आया। वह स्कूल से निकल चुकी थी। राकेश को रोज उसे साढ़े तीन बजे मेट्रो स्टेशन लेने जाना पड़ता था। उसने गीता से कहा- “परेशान मत हो गीता। सब ठीक हो जाएगा। अभी मैं निकलूँगा। मेरी पत्नी स्टेशन पहुँचने वाली है। उसे रिसिव करना है।” यह सुनकर गीता बड़ी हैरान हुई। एकदम से गुस्से में आ गई और राकेश को डांटते हुए बोली- “मैं यहाँ तुमसे मिलने आई हूँ और तुम हो कि जा रहे हो! तुम्हारी पत्नी एक दिन खुद से घर नहीं जा सकती? छोटी बच्ची है क्या जो रोज उसे लेने जाते हो? पता है, आज कितनी मुश्किल से मैं घर से बाहर निकल पाई हूँ! पूरे दो साल बाद घर से बाहर अकेले निकली हूँ मैं। वह भी यह कहकर कि डीयू के जॉब फेयर में जाना है। घर से बाहर निकलने के लिए जब तक कोई ठोस कारण न हो तब तक मैं बाहर नहीं निकल सकती राकेश! कैद हो गई हूँ मैं यह समझ लो तुम!” उसका गुस्सा फिर धीरे-धीरे निराशा में बदलने लगा था। राकेश उसकी बातों को सिर्फ सुन सकता था। उसे देने के लिए उसके पास कोई उत्तर नहीं था। वह चुप रहा। माथे पर हाथ रखकर गीता थोड़ी देर शांत रही फिर बोली- “जाओ। धूप बहुत तेज है। भाभी को आने में दिक्कत होगी। हम फिर कभी मिलेंगे।” राकेश बड़े भारी मन से वहाँ से उठा। गीता भारी मन से वहीं बैठी रही। गेट पर आकर राकेश ने पलटकर गीता को देखा। वह एकटक उसे देख रही थी। राकेश के कानों में उसके शब्द गूँजते रहे- “फिर कभी मिलेंगे!”

                                             रमेश कुमार राज

                                               असिस्टेंट फ्रोफेसर

                                                          हिंदी विभाग, हिन्दू कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली- 110007

                                                                        मो. 8448971626/8810399646

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