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  • उत्सव’ तभी मनाये जाते हैं, जब अंधकार गहरा होता है!

    दिवाली महा-उत्सव है। भारत की उत्सवधर्मिता पर महान लेखक उदय प्रकाश ने यह लेख लिखा है। कल उनका यह प्रकाशित लेख जब मैंने पढ़ा तो आदरपूर्वक उसने जानकी पुल के लिये उस लेख की माँग की और उदय जी ने हमारे पाठकों के लिए दीवाली का यह उपहार दिया है। आप पढ़िए और भारत की बहुलता, उत्सवधर्मिता पर उनका यह ज्ञानसंपन्न लेख पढ़िए। दीवाली प्रकाश पर्व है और ज्ञान को भी प्रकाश कहा गया है। शुभ दीवाली- प्रभात रंजन

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    (यह लेख कल कहाँ पढ़ा था यह सूचना लेख के अंत में दर्ज है)

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    अभी जब मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी प्राधिकृत क्षेत्र की हवा भयावह रूप से प्रदूषित और विषाक्त है। यह प्रदूषण दिवाली तक और बढ़ जाएगा। दिवाली लगभग वैश्विक उत्सव बन चुका है। दिवाली में जब ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में 58-60,000 भारतीय आप्रवासी अपने ऑस्ट्रेलियाई दोस्तों के साथ दिवाली मना रहे होंगे दिल्ली और एनसीआर के ढाई करोड़ निवासी एक-एक साफ़-सुथरी साँस के लिए तड़प रहे होंगे। किसी भी देश और सामाजिक-संस्कृति के विकास के साथ उत्सवों, त्यौहारों, पर्वों, कर्मकांडों को भी विकसित होना चाहिए। मानव विकास सूचकांक (एच डी आई) अक्सर एफ़डीआई और जीडीपी के सूचकांकों से भिन्न होता है।

    ‘उत्सव’ कहते ही आज से ठीक चालीस साल पहले, सन् 1984 में, हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में, शूद्रक के संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ पर आधारित गिरीश कर्नाड द्वारा निर्देशित और शशि कपूर द्वारा निर्मित-अभिनीत एक ऐसी बॉलीवुड फ़िल्म का नाम याद आता है, जिसके संवाद हिन्दी के प्रख्यात व्यंग्य-साहित्यकार शरद जोशी ने लिखे थे और पृष्ठभूमि में आवाज़ ‘गब्बर सिंह’ ख्यात अमजद ख़ान की थी। संस्कृत नाट्य ‘मृच्छकटिकम’ के मूल रचनाकार शूद्रक के बारे किंवदंती है कि वे 200 ईसा पूर्व से लेकर मध्यकाल में 5वीं-छठी सदी के बीच कभी विदिशा से लेकर कई अन्य नगरों के शैव-शाक्त मत को मानने वाले राजा थे जिन्होंने ईसा से 200 साल पहले सातवाहन राजवंश की स्थापना की थी। लेकिन बहुत से विद्वानों का मत है कि शूद्रक, जिनका ज़िक्र न तो कहीं कालिदास ने किया न, उस समय के अन्य परवर्ती संस्कृत रचनाकार ने, इलियड के लेखक होमर की तरह, या अंग्रेज़ी के नाटककार शेक्सपियर जैसे एक नहीं, कई रचनाकारों को जोड़कर गढ़े-बनाये गये किंवदंती किरदार ही थे। बाक़ी, पुराणों या पुरा-कथाओं की इतिहास-सम्मत सत्यता पर जिनकी आस्था और विश्वास अडिग-अचल है, वे इसका खंडन-मंडन कर सकते हैं।

    आप सोच रहे होंगे कि आज, जब हमारे देश भारत के बारे में कई तरह की पंच-पंक्तियाँ हर रोज़ हवाओं और सुर्ख़ियों में हैं, दिवाली, पोंगल, धनतेरस, भाईदूज, गोवर्धन पूजा, वग़ैरह,  बस कुछ दिन ही दूर है, दशहरा और नवरात्रि, रक्षाबंधन, ईद -मोहर्रम अभी-अभी गुज़रे हैं, और कोई कह रहा है- ‘भारत एक उत्सव प्रधान देश है’, कोई –‘भारत एक कुर्सी प्रधान’ या ‘पुरुष प्रधान’ देश है, सदियों से दुहराई जाती कहावत –‘भारत एक कृषिप्रधान देश है’ जैसी कहावतों को भूलकर बॉलीवुड की एक, ठीक-ठाक कमाई न कर पाने वाली फ़िल्म ‘उत्सव’ का ज़िक्र क्यों?

    इसका एक महत्वपूर्ण कारण है।

    यह फ़िल्म भारतीय मानव-सतह की सांस्कृतिक-सामाजिक विविधता और बहुलता का एक रोचक मेटाफर है। महा-रूपक या प्रतीक। भाषा और भूगोल, खगोल-अध्यात्म और अनगिनत धर्म-दर्शनों-पंथों के रीति-रिवाजों, पर्वों-त्यौहारों के कई अबूझ इलाक़ों को यह अपने आप उजागर करती है। यानी इन दुर्गम्य क्षेत्रों के अंधेरे कोनों में कोई दिया, चिराग़ या बल्ब चुपचाप जलाकर एक नया राजनीतिक या व्यापारिक नहीं, बल्कि एक बहुत पारंपरिक प्राचीन अर्थ दे देती है। भारतीय उप-महाद्वीप के मध्यकाल के ‘स्वर्ण-युग’ की कथा कहती फ़िल्म ‘उत्सव’ तब बनी, जब 1980-90 के दशक में ताजा-ताज़ा अखिल-भारतीय हो चुके नेशनल टेलीविजन या दूरदर्शन का ‘स्वर्ण-काल’ चल रहा था। सोशल मीडिया का अवतार नहीं हुआ था। बॉलीवुड में समांतर सिनेमा की दुंदुभी बज रही थी। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री द्वारा लिखी गई ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ पर आधारित श्याम बेनेगल की ‘भारत की खोज’,  भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’,  मनोहरश्याम जोशी की ‘बुनियाद’, ‘हमलोग’, उत्तर छायावाद के चर्चित कवि पंडित नरेंद्र शर्मा और ‘आधा गाँव’ के सुप्रसिद्ध कथाकार राही मासूम रज़ा द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गयी पटकथा में ‘महाभारत’ आदि टीवी सीरियल उस समय प्रासंगिक और अन्य मिथकीय पौराणिक कथाओं पर आधारित भावी टीवी सीरियलों की नींव तैयार कर रहे थे। बी आर चोपड़ा के ‘महाभारत’ की लोकप्रियता इतनी कि बीबीसी समेत कई विदेशी चैनल उसे अपने-अपने देशों में प्रसारित कर रहे थे। पीटर ब्रुक्स उस पर वैश्विक महा-नाटक तैयार कर रहे थे। ‘अर्द्धसत्य’, ‘सारांश’, ‘मालगुड़ी डेज़’, ‘नुक्कड़’, ‘अंकुर’, ‘मंथन’ आदि जैसी फ़िल्मों और टीवी शृंखलाओं की धूम थी। हिन्दी कथाकार भीष्म साहनी सईद मिर्ज़ा की फ़िल्मों में अपने स्व. भाई बलराज साहनी की तरह अभिनय कर रहे थे। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से ओम पुरी, अनुपम खेर, नसीरुद्दीन शाह, ओम शिवपुरी जैसे अभिनेता उभर रहे थे। डॉ. धर्मवीर भारती का कालजयी हिन्दी नाटक ‘अंधायुग’ पुराने क़िले में मंचित हो रहा था। संक्षेप में यह वह दौर था जब साहित्य, सिनेमा, रंगमंच, संगीत और कलाएँ एक-दूसरे की निकटतम संगत में आकर भारतीय उत्सवों का  चेहरा रचने-गढ़ने में लगीं थीं।

    फिर इस फ़िल्म ‘उत्सव’ की पूरी टीम पर नज़र दौड़ाइये। इस फ़िल्म में वसंतसेना की भूमिका निभाने वाली सदाबहार अभिनेत्री रेखा, यदि महान जेमिनी गणेशन की सुपुत्री मद्रास से थीं, तो उनके प्रेमी चारुदत्त का अभिनय करने वाले शेखर सुमन पटना, बिहार से, संस्थानक की भूमिका अगर शशि कपूर स्वयं निभा रहे थे, तो कामसूत्र के रचयिता ऋषि वात्सायन के रूप में अमजद ख़ान मौजूद थे। अभी हाल में ही दिवंगत हुए विख्यात हास्य अभिनेता सतीश कौशिक हरियाणा और पद्मभूषण अनुपम खेर शिमला, हिमाचल से। क्रांतिकारी आर्यक की भूमिका में शशि कपूर और उनकी पत्नी लंदन में जन्मी विख्यात अभिनेती जेनिफ़र,  जिन्होंने ‘पृथ्वी थिएटर’ की स्थापना की और स्वयं विख्यात अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों में सम्मानित अभिनेत्री थीं, के बेटे कुणाल कपूर ने निभाई। ग़रीब ब्राह्मण चारुदत्त की पत्नी अदिति का अभिनय करने वाली अनुराधा पटेल मुंबई से थीं तो नीना गुप्ता बंगाल से और अन्नू कपूर भोपाल मध्य प्रदेश से। इस फ़िल्म के जिस गीत ने सबसे अधिक लोकप्रियता और सम्मान पाया, उसके गीतकार वसंत देव थे, जो स्वयं मराठी कवि और हिन्दी-मराठी साहित्य के अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध थे। वह गीत संगीत जगत की दो महान बहनों-लता मंगेशकर और आशा भोंसले ने लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के निर्देशन में मिलकर गाया था-‘मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को’। क्रांतिकारी आर्यक के गुरु बने थे दिल्ली विवि के किरोड़ी मल कॉलेज में पढ़ाई करने वाले कुलभूषण खरबंदा। फिर भला ‘मृच्छकटिकम’ के चतुर चोर सज्जल को कौन भूलेगा, जिसका अभिनय कर्नाटक के शंकरनाग ने किया, जिन्होंने बाद में भारतीय साहित्य के महान तमिल कथाकार पद्म-विभूषण, साहित्य अकादमी जैसे सम्मानों से अलंकृत विश्वविख्यात आरके नारायण के ‘मालगुड़ी डेज़’ टीवी सीरियल का अविस्मरणीय निर्देशन किया। हिन्दी, कन्नड़, तमिल, मलयालम, अंग्रेज़ी सभी के निकट थे शंकरनाग।

    इसीलिए ‘उत्सव’ वृहत् बिंब या महा-रूपक फ़िल्म थी, जिसे आज चालीस साल बाद पलट कर देखना, हमारे सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक के चार स्वतंत्र दशकों में उत्सवों-त्यौहारों, पर्वों के सफ़र का रोडमैप सामने रखता है।

    1984 का साल अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रस्थान बिंदु है। पिछले इतिहास की निरंतरता का आंशिक पटाक्षेप करने वाला साल। दो साल पहले सरकार नियंत्रित बाज़ार और उद्योग के दरवाज़े खुलने शुरू हो गए थे। कोटा-परमिट अर्थनीति बंद मुट्ठियाँ ढीली हो रही थी, जिसके खुलेपन में नयी उदार अर्थनीति अपने पंख हासिल कर रही थी। मनोरंजन उद्योग में भी निजी पूँजी और बाहर की अ-लेखित पूँजी दाखिल हो रही थी, जिसका संक्षिप्त लेकिन पहला वर्णन मनोहरश्याम जोशी ने ‘हमज़ाद’ में किया है। लेकिन 1984 ही वह अभागा वर्ष था, जब संसार की सबसे बड़ी औद्योगिक-त्रासदी भोपाल में घटित हुई, जिसे ‘भोपाल गैस ट्रेजेडी’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें लगभग 5000 लोग एक रात में यूनियन कार्बाइड बहू-राष्ट्रीय कंपनी की ज़हरीली गैस से मारे गये और 75000 से अधिक लोग उससे प्रभावित हुए। लेकिन विडंबना यह थी कि ठीक उसी समय, उसी शहर भोपाल में संस्कृति विभाग एक उत्सव आयोजित कर रहा था। उस उत्सव का नाम था –‘ बगरो बसंत है’। मैंने इसी साल की जिस फ़िल्म ‘उत्सव’ को आधार बनाया था, वह भी कामानन्द केंद्रित ‘वसंतोत्सव’ या ‘मदनोत्सव’ की कथा ही कह रहा था।

    कहावत है कि किसी भी सहमे-ठिठुरते राष्ट्र-राज्य में जब वसंत आता है, तो अब तक का चला आता इतिहास एक नयी करवट लेता है। 20वीं सदी के चेकोस्लोवाकिया के प्राग स्प्रिंग से लेकर हमारी २1वीं सदी के मिस्र में क़ाहिरा का ताहरीरी चौक और अभी बिलकुल अभी बांग्लादेश के ढाका-वसंत इसकी गवाही देते हैं।

    सबसे विडंबनापूर्ण यह तथ्य कि इसी 1984 में, जब ‘उत्सव’ फ़िल्म रिलीज़ हुई,  हमारे देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की अक्तूबर महीने के अंतिम दिन हत्या हुई। उसके पीछे जो मुख्य कारण था, वह था ‘स्वर्ण मंदिर’ पर सैनिक कार्रवाई। उन्हें यह स्मरण दिलाने वाला कोई भी सलाहकार उनके पास नहीं था, जो यह बताता कि दीवाली का सिख समुदाय में एक विशेष महत्व है। इसी दिवाली पर्व में ही अमृतसर में ‘स्वर्ण मंदिर’ की स्थापना-शिला रखी गई थी।

    इसीलिए कोई भी ‘उत्सव’ जब कहीं होता है, तो वह किसी एक समुदाय का नहीं होता। भारत जैसे संस्कृति-समुदाय-वर्ण-वर्ग बहुल गणतंत्र में कई उत्सव एक ही समय में समानांतर चलते हैं। उनमें टकराहटें न हों, साझेदारी हो, समरसता हो, इसे देखना और सँभालना हमेशा जनता द्वारा चुनी गयी सरकार और विपक्ष दोनों की ज़िम्मेदारी होती है।

    याद रहे वह मौर्य-गुप्त काल, इतिहासकार जिसे संस्कृति और समृद्धि का ‘स्वर्ण-युग’ के नाम से संबोधित करते हैं, अर्थशास्त्री यह बताते हैं कि वह भारतीय किसानों का सबसे कठिन काल था। ‘उत्सव’ तभी मनाये जाते हैं, जब अंधकार गहरा होता है। अंग्रेज़ी में उत्सव को फेस्टिवल कहा जाता है। इसमें ‘फीस्ट’ पद सम्मिलित है। संपन्न-समृद्ध लोगों के लिए यह फीस्ट यानी महा-भोज का मौक़ा होता है, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में लोग इसी उत्सव को उपवास, निरन्न रह कर मनाते हैं।

    अंत में वही पुराना श्लोक : ‘असतो मा सद्गमय/ तमसो मा ज्योतिर्गमय …’ के साथ सभी उत्सवों,  त्यौहारों की शुभकामनाएँ।

    ‘दैनिक जागरण’ से साभार

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