• कथा-कहानी
  • सुमन शेखर की कहानी ‘बारह साल की स्त्रियाँ’

    मजबूरी कैसे किसी व्यक्ति को ऐसे पेशे में धकेल देती है जो उनके जीवन के साथ-साथ दूसरों को भी बुरे तरीके से प्रभावित करती है इसे समझने के लिए ‘बारह साल की स्त्रियाँ’ सहायक लगती हैं। सुमन शेखर की यह कहानी कथादेश के अगस्त 2024 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है। आज जानकीपुल पर भी प्रस्तुत है- अनुरंजनी

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    बारह साल की स्त्रियाँ

    “बारह साल की बच्चियाँ तो देखी हैं, लेकिन बारह साल की स्त्रियाँ भी होती हैं! यह कैसा शहर है! यहाँ की बच्चियाँ कहाँ गईं!” मैं लगातार नींद में बड़बड़ा रहा था। 

    नींद की ख़ुमारी में दृश्य अपने गाँव के घर से शुरु होकर यहाँ समंदर तक पहुँचते तो कुछ यहाँ के चेहरे, गाँव‌ की नदी में तैरते-तैरते गुम हो जाते।

    रात भर मैं अंधेरे कमरे में अपनी देह पर काँटों की चुभन महसूस करता रहा। देह जैसे गुब्बारा हो, उसपर बारह साल की स्त्रियों की अंगुलियाँ नागफणी सी चुभती रहीं। मन फूटता चटकता रहा। आँखें खोलूँ तो सत्य का बोध मन कसैला करता, आँखें बंद करूँ तो समंदर किनारे का बीता दृश्य बार-बार सामने घूमने लगता। इस शहर में मेरी देह अचानक से उस शाम इंच भर ज़मीन में धँस गई, मेरा सीना और उसके भीतर धड़कता दिल, घिसकर इतना छोटा हो गया कि उसकी उपस्थिति का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।

    “बारह साल की स्त्री! यह सच नहीं हो सकता!” झटके से मेरी आँखें खुलीं। सपने की दीवार ढह गई। हक़ीक़त की दुनिया बहुत ही वीभत्स, निरीह महसूस होने लगी। कुछ सच्चाइयों के लिए हम कामना करते हैं कि काश वह सच में नहीं हुआ होता। काश..

    इस शहर में आने से पूर्व बहुत से सपने मन को खिलाते हैं। सपने चकाचौंध सी रौशनी में जगमगाते हैं। मेरे पास बैग में एक क़लम और डायरी ज़रूर रहती, ताकि कुछ भी दर्ज़ करना छूट ना जाए। शुरुआती दिनों के हर दृश्य को मैं बहुत ही स्पष्टता से दर्ज़ करना चाहता था। समंदर और चाँद के खेल को विज्ञान की भाषा से नहीं, मन की आत्मा से देखना चाहता था। हर एक दृश्य को मैं ‘बस मेरे लिए है’ के उत्साह से भरना चाहता था। 

    इसी कोशिश में पिछली शाम मैं पेप्सी का छोटा कैन और चकली का पैकेट लेकर समंदर किनारे बैठा। वर्षों के इंतजार के बाद आई वह मेरी समंदर किनारे की पहली शाम थी। देखते-देखते सूरज के साथ शाम भी डूब गई। चाँद पूरा खिला था आसमान में। चाँद-रातों में समंदर पागलों की तरह बौखलाया रहता है, यह सुना तो था मैंने, देख अब रहा था। लहरों के शोर से लदी रात में समंदर किनारे, दूर तक मदमस्त पड़े गोल-गोल पत्थरों की पीठ पर मैं पसरा हुआ था। यूँ एकांत में, समंदर के करतब को देखने का सुख विलक्षण होता है।

    सबसे ज़्यादा एकान्त के क्षणों में सबसे ज़्यादा सवाल जन्म लेते हैं। आँखों में लहरों का, चाँद की परछाई का दृश्य बनता तो मन, ज़हन को उकसाता और सवालों के विस्फोट होने लगते। जैसे समंदर के विशाल क्षेत्र के पार क्या होगा! समंदर कितना गहरा होगा! क्या वहाँ हम अपनी सारी पीड़ा और दुख भूल जाएँगे! उस एकांत में, हम कौन हैं और क्यों हैं, क्या इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे! ऐसे कौतूहल के दृश्य, आँख में भरते जाना सुंदर था। मन का सारा संताप यहाँ लुप्त होने लगता। जितना भी भरकर आओ, समंदर है कि सब सोख लेता है। यह विशाल समन्दर अवसादों का पाचक है। इसके पेट मे जाने कितने दुःखों का, अकेलेपन का, हताशा का, आत्महत्याओं को टालने का हुनर छुपा है। मेरी क़लम निरंतर यह सब दर्ज़ कर रही थी।

    मेरी पीठ की तरफ़ बड़ी-बड़ी इमारतें थीं। इस सपनों के शहर की पथरीली इमारतों में जलते बल्बों की भड़कीली पीली-सफ़ेद रौशनी निढाल सी लेटी समन्दर के पानी पर काँप रही थीं। 

    क़सम से मुझे तब तक नहीं मालूम था कि ठीक इसी तरह निढाल होकर मेरे मन का काँपना अभी बाक़ी है…

    समंदर ज़ोर-ज़ोर से फन फैलाकर, किनारे उड़ेले गए पत्थरों पर औंधे मुँह आ गिरता। इतना भव्य और अद्भुत दृश्य। लहरों की गिनती करना शुरू करता, गिनती भूल जाता, नई लहर पुरानी लहर को दबा कर ढक लेती।

    “कुछ लोगे?” मेरे पीछे खड़े फेरी वाले ने पूछा। मैं समंदर के खेल के सामने सब भूल जाना चाहता था। मैंने जवाब नहीं दिया।

    उसने दुबारा पूछा।

    इस बार मैंने पीछे पलटकर “ना” कहा। 

    “कुछ तो ले लो” उसने फिर से पूछा। मैंने खीझ कर उसे देखा तो उसने मुस्कुराते हुए अगला सवाल किया।

    “अकेले हो?”

    महानगर में छल कपट कि इतनी कहानियाँ सुनी थी कि इस तरह का सवाल दिमाग में एक अजीब सी घंटी बजाने लगा। मैंने सचेत होते हुए कहा-“तुमसे मतलब!”

    मेरे जवाब से उसके होठों पर ठहरी उसकी ढीठ मुस्कुराहट और बड़ी हो गई।

    मुझे उसकी आँखों में क्रूरता की झलक दिखी। वह बिना कुछ बोले आगे बढ़ गया।

    समंदर की लहरें अब और पास आ चुकी थी। मन ख़ुद को अकेला देखकर संतुष्ट था। वहाँ शायद सिर्फ़ मैं ही था, जिसके लिए यह दृश्य नवीन हो। 

    घुप्प अंधेरे में पीछे की तरफ़ से मोबाइल का टॉर्च जला। नज़र घूमकर टॉर्च की रौशनी पर पड़ी। ‘टॉर्च के इर्द-गिर्द है क्या!’ को ढूँढने के लिए नज़र अंधेरे में थाह मारने लगी। टॉर्च की रौशनी धीरे-धीरे पास आती हुई और गाढ़ी हो गई। मेरे ठीक पीछे दो लड़कियाँ खड़ी थीं।

    लड़कियाँ! नहीं-नहीं, दो बच्चियाँ। समंदर का साफ़ दृश्य धुँधला, टॉर्च के पीछे का धुंधला दृश्य साफ़ दिखने लगा। वह अटपटे ढंग से मुझसे सटने लगीं। मेरी देह ने रात के अंधेरे में किसी अनजान लड़की को इतना करीब महसूस नहीं किया था। किसी भी अनजान लड़की का इस कदर पास आना मेरे भीतर डर पैदा कर रहा था। टॉर्च की रौशनी में सामने की तरफ़ फैली मेरी छाया काँप रही थी। फड़फड़ाता हुआ एक कबूतर सामने से उड़ता दिखा। 

    अचानक से बदले हुए दृश्य को आँखों में भरने के लिए, आँखें अभी तैयार नहीं थीं। कुछ भी समझ पाने से पहले ही मेरी कमर के दाहिने तरफ़ एक अंगुली आकर गिरी। अगले पल, दूसरी अंगुली दूसरी तरफ़ से। मैंने चौंककर उन्हें देखा। दोनों बच्चियाँ, महज़ ग्यारह-बारह की है! 

    दोनों एक-एक कर मेरी पीठ पर अँगुलियाँ बिछाने लगी। उनकी समझ में उनके चेहरे मादक मुस्कान लिए थे पर मेरे लिए उनके वही चेहरे कठपुतलियों जैसे। सन्नाटे में गिरती उनकी अँगुलियों से मेरा शरीर घिन्न महसूस कर रहा था। अभी-अभी समंदर के दिखे सारे खूबसूरत दृश्य ओझल होते-होते डूब गए। आसपास की सारी रौशनी निचोड़ी जा चुकी थी। मैं दोनों के सामने निसहाय, चौंका हुआ, प्रश्नों के गुच्छे भरे चेहरे के साथ तटस्थ था। उनके चेहरे का भाव ठीक वैसा जैसा अनंत गोपनीय क्षणों में परिपक्व लड़कियों के होते हैं। उस पल अचानक से मैं ख़ुद को माया नगरी की दुनिया में सबसे ज़्यादा हारा हुआ, लाचार और अकेला महसूस करने लगा।

    कमर पर गिरी अँगुलियाँ हथेली की शक्ल में धँसने लगी। नाखून का हर निशान कमर पर गहरे घाव की तरह बिछा। आसमान में बाज़ ने कबूतर पर झपट्टा मार दिया। 

    मैं बहुत दूर भाग जाना चाहता था। धड़कन तेज़ गति से दहाड़ रही थी। 

    मैं ऐसा खेल पहली बार देख रहा था, सिर्फ़ देख ही नहीं रहा था बल्कि उस खेल में दाँव पर मैं ही लगा था। 

    मेरी आँखों के सामने दोनों लड़कियाँ कमर पर हाथ रख मादक रूप से भंगिमाएँ दिखाने लगीं। जांघ के बहुत ऊपर के उठे कपड़ों के भीतर से अंगुलियाँ घूमती हुई पेट, छाती पर सुस्ताते हुए माथे पर लहरा रही थी। अंगुलियों की भी जैसे कोई शक्ल उग आईं हों। मुझे मितली आने लगी। ग्लानि में डुबाती हुई। ग्लानि! हाँ…मेरा मन हुआ कि उन्हें बुरी तरह डपट दूँ और ऐसा करने का कारण पूछुँ! खुद को अकेला देख मैं यह भी न कर सका। मेरे भीतर का डरा हुआ कबूतर, अब मेरी बगल में आकर बैठ गया था। सफ़ेद कबूतर, जिसके माथे पर पहले ही एक खरोंच का निशान था, रात में और भी चमकता हुआ। 

    “कुछ मैसूस नहीं हो रहा क्या तेरको! कैसा मरद है रे तू!” दूसरी लड़की ने पूछा।

    “मरद बनाते हैं न आज रात इसको। देख तो कितना शाना बन रहा। अबे दबा मत खुद को, खाली हो जाने दे सब। देख न कैसा लाश के माफ़िक है रे!” पहली ने आँख मारते हुए उसका जवाब दिया।

    मैं न कुछ बोल पा रहा था, न भाग पाने की जुगत लगा पा रहा था। लड़की चिहुँकती हुई आवाज़ निकालकर मेरे चेहरे के पास तक अपना चेहरा ले आई। मैं उसे ज़ोर से धक्का देना चाहता था। मैंने सिहरकर चेहरा पीछे की तरफ़ घुमाया। वही फेरी वाला जो कुछ देर पहले पूछ रहा था ‘कुछ लोगे’ पीछे खड़ा मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था, कुटिल सी मुस्कान। 

    उनमें से एक लड़की ने मेरा चेहरा अपनी तरफ़ वापस घुमा लिया। मेरे होंठ के बहुत पास तक आई, अपने निचले होंठ को अपने ऊपरी होंठ से दबाया, बचे हुए कोने के गोल हिस्से से मेरे मुँह पर फूँक मारी। दूसरी ने ‘आज तू है पानी’ के गाने पर रील्स बनाना शुरू किया। पहली वाली मेरे गाल के इर्द-गिर्द अपनी जीभ घूमाती रही। उसकी जीभ से टपका लार मेरे गाल पर फिसलता जा रहा था। 

    पहली लड़की की अँगुलियाँ फिर से मेरे पेट पर उछल रही थीं। उसने मेरे जींस का बटन खोलने की कोशिश की। तीव्र प्रतिक्रिया में मेरी हथेली ने उसकी हथेली को झटक दिया। लड़की ने हाथ बाहर निकाला, मेरे चेहरे तक अपने छोटे लेकिन पुष्ट उरोज रख दिए। मेरी आँखें दहशत, ग्लानि, बेबसी से गीली हो चुकी थीं। चेहरा शहर के मेरे पहले और नए घर की दिशा की तरफ़ मुड़ गया। मन पर जैसे समंदर ने तेज़ लहर लाकर पटक दिया हो। 

    रील्स बनाना बंद कर दूसरी लड़की कमर और देह को घुमाती हुई धीरे-धीरे मेरी दाहिनी तरफ़ आई। पहली लड़की पत्थरों के बीच की खाई के ऊपर अपने कपड़े घुटने तक खींचकर बैठ गई। नीचे गिरते पानी की आवाज़ के साथ वह शरमा भी रही थी। 

    “बची है इसमें शर्म!” मैने बहुत धीमी आवाज़ से ख़ुद से सवाल किया। 

    दूसरी लड़की अपना मोर्चा संभालते हुए मेरी गर्दन पर नाखून चुभाने लगी। मेरी हथेली पर जैसे काई उग आई हो, देह पत्थर बन गई। उधर उम्र की कोमलता और तन की वहशियाना हरकत का कोई मेल नहीं था। इधर हरकत केवल मन में, तन निष्प्राण। अचानक से समंदर इतना गलीज़ दिखने लगा कि अब उठकर जाऊँ तो दुबारा क़सम से शक्ल न देखूँ कभी इसकी।

    बचपना उनकी देह से बुरादे की तरह झड़कर रेत में घुलता गया। समंदर की लहर सारी रेत पीती और वापस चली जाती। वह मेरे सामने नीचे की तरफ़ बैठी, उसने जींस की चेन पर फिर से अंगुलियां फेरकर उसे खोलना चाहा। मैंने रोकने की कोशिश की तो दूसरी लड़की ने मेरे हाथ कसकर पकड़ लिए। पहली लड़की ने जबरदस्ती चेन खोल दिया। मैं अब तक पूरी तरह सुन्न पड़ चुका था। अपनी देह में दांतों की चुभन महसूस हुई। पीड़ादायक चुभन, जो जहाँ-जहाँ चुभे, वहाँ की त्वचा तेज़ाब के जले सी झुलस जाए। 

    “चल बस कर अब” पीछे खड़े फेरी वाले ने लड़की का मुँह मेरी चेन से हटाते हुए कहा। लड़की का बाल चेन में फंस गया था, हटाने पर जोर से चिहुँकी। 

    “रोकड़ा निकाल अब” फेरी वाले ने कड़ी आवाज़ में मुझे कहा। 

    मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। मैं ख़ुद को वाकई एक लाश की तरह देख रहा था। 

    “रोकड़ा!” यह शब्द मेरे कान के पास गूँजने लगा।

    “तुम दोनों अपने घर चलो। अगले ग्राहक के टेम बुला लूँगा। जा..” लड़कियों को बोलकर वह आदमी किसी को फ़ोन करने के लिए थोड़ी दूर हटा। एक मिनट पहले जो लड़कियाँ मुझ पर बिछी जा रही थीं उन्होंने मेरी तरफ हिकारत से देखा और पीछे हट गई। मैं जैसे नींद से जागा। मेरी देह हवा सी हल्की लेकिन बोझिल लग रही थी। 

    मैं पाँवों को हवा में पटकता हुआ भागने लगा। सफ़ेद कबूतर मेरे साथ-साथ उड़ता रहा। अचानक से एक बाज़ आया और उस कबूतर को पंजों में दबोच लिया। कबूतर के पँखों का ख़ून मेरे इर्द-गिर्द फैल गया। मेरे पैरों की जान ख़त्म होने लगी। मैं गिर चुका था। मासूम बचपन और कामुक जवानी के बीच का फ़र्क़ यहाँ मिट गया था। 

    क्या मिल रहा होगा इन्हें मेरे साथ इस तरह करने से! कहीं मैं पहला तो नहीं हूँ जिसके साथ आज ये! नहीं-नहीं! कितनी क्रूर हैं ये। इनकी आँखों के नीचे उग आए काले गड्ढे और चेहरे पर पुती हुई कामुक भंगिमाएं अचानक से नहीं उपजी हैं। मन में आया कि खींचकर थप्पड़ रसीद कर दूँ फिर सोचा इन्हें थप्पड़ से डर लगना बन्द हो गया होगा। मैं उन्हें झटक कर फिर भागा। मेरे पैरों के टप्प-टप्प में दो जोड़ी पैरों के निशान और जुड़ गए। रात मैं कहाँ तक दौड़ा, कहाँ जाकर देह को पनाह मिली, मेरे साथ कौन था, नहीं मालूम। सुबह आँख खुली तो कबूतर घाव से मर चुका था, उसके पँख यहाँ-वहाँ बिखरे थे। 

    मेरी डायरी के पन्नों मे शहर ने कई हार लिखीं, कई छोटी-छोटी मौतें लिखीं, ढेर सारी बंद चीखें और हर कदम पर अचानक से आ जाने वाला अज्ञात डर लिखा। बड़े शहरों में एक जीत के नीचे जाने कितनी हार का मलबा दबा होता है यह मेरी डायरी के पन्ने जानते हैं। 

    **

    घटना की अगली सुबह एक बच्ची को उसके पिता के साथ सड़क पार करते हुए देखा था। पिता ने बच्ची का हाथ कसकर थाम रखा था। जिस तरह से लड़की अपने पिता के पीछे-पीछे चल रही थी, मुझे लगा शायद उस लड़की में कोई दिक़्क़त है, विकलांगता! लेकिन नहीं, वह लड़की बहुत डरी हुई थी। मैं सामने की टपरी पर चाय ले रहा था। उसे तब तक देखता रहा जब तक कि वह नज़र से ओझल नहीं हो गई। 

    कितना अद्भुत सुख है कि हम किसी की हथेली में महफूज़ हैं, कोई है जिसके होने भर से सारे जोखिम भरे रास्तों को नापा जा सकता है। हम अकेले चलते हुए भी, साथ चलने की याद को बचाए रखना चाहते हैं। 

    मैं तब उन सुरक्षाओं के बारे में सोचने लगा, जो लगातार मुझे मिलती रहीं थीं और मैं हमेशा ख़ुद को महफूज़ महसूस करता रहा। माँ के हाथ की सुरक्षा, पिता के साथ की सुरक्षा, बहन के मुस्कान की सुरक्षा…

    लेकिन मेरे साथ यहाँ इस महानगर में…!!!!

    माया नगरी में आने के दूसरे दिन ही काम के सिलसिले में मेरी मीटिंग लोखंडवाला सर्किल के एक कैफ़े में नामचीन निर्देशक के साथ तय हुई थी। निर्देशक लगभग तय समय पर आ चुका था। शीशे की तरफ़ वाली टेबल लेकर हमने कॉफ़ी ऑर्डर की। बात करते हुए उसकी आँखें चमक रही थी। क़रीब आधे घण्टे बाद मैंने महसूस किया कि मेरे पैर पर निर्देशक अपना पैर सहला रहा है, थोड़ी देर बाद पैर मेरी कुर्सी की सीट तक पहुँच चुका था। मैंने नज़रंदाज़ किया। एक स्क्रिप्ट पर मैं चहकते हुए बात कर रहा था। थोड़ी देर बाद वह मेरे पास की कुर्सी पर आकर बैठ गया और बात सुनते हुए मेरी हथेली सहलाने लगा। वह स्पर्श बहुत ही लिजलिजा था। मैं भीतर तक काँप रहा था। मुझे वहाँ से उठ जाने का मन हुआ, उसे रोक देने का मन हुआ। उसके गाल पर ज़ोर से थप्पड़ मार देने का मन हुआ। पर मैं ऐसा कुछ नहीं कर पाया। हर नए शहर का अपना एक डर होता है, हम उस डर को हर सुबह चाय की चुस्की के साथ गटक रहे होते हैं ताकि आने वाले दिन में फिर से उसका सामना करने के लिए ख़ुद को तैयार कर सकें।

    ठीक यही बात मैं अपने एक मित्र से भी सुन चुका था जिसे अंधेरी के ऑफिस में एक निर्देशिका ने अपनी केबिन में बुलाकर ग़लत तरीक़े से छुआ भी और उसके मना करने पर बुरी तरह उसपर चिल्लाई भी। उसका करियर दांव पर लग गया। कुछ दांव इतने बड़े होते हैं कि उसका वज़न एक समय के बाद बोझ लगने लगता है। 

    महानगरों का यह सबसे ज़्यादा क्रूर सत्य है। लेकिन बारह साल की स्त्रियों से मिलने के बाद मैंने जाना, सबसे ज़्यादा को हम कभी तय नहीं कर पाते। बड़े शहरों की चकाचौंध वहाँ के ग़लीज़ अंधेरे को ढकने के लिए होती है यह भी यहाँ आकर ही समझ आता है।

    लेकिन मेरे सपने मेरे डर से शायद ज़्यादा बड़े रहे। मैं शुरुआत से जानता था धीरे-धीरे रोज़ मर रहा हूँ लेकिन टिकना मेरे लिए सारे हार को एक दिन खत्म करने का एकमात्र हथियार है। 

    इस शहर ने नन्हीं चिड़ियों को बाज़ों में बदल दिया है। अगर आज के कबूतर कल के बाज बनेंगे, इसमें हार किसकी है! और जिम्मेदार कौन है! 

    कुछ दिनों से बंद कमरे में मैं अपने ख़्यालों में गुम था जब फ़ोन के स्क्रीन पर भूषण का नाम फ़्लैश हुआ।

    भूषण मेरे ही गाँव का है और मेरी ही तरह कुछ सपने लेकर थोड़े दिन पहले ही यहाँ आया। उसने कई बार मिलने का मैसेज किया, मैं उससे मिल नहीं पाया।

    मैं समझ गया कि फ़ोन मिलने के लिए ही किया है। मैं फ़ोन उठाकर कुछ बोल पाता इससे पहले ही उसकी घबराई आवाज़ आई,

    “विहाग यह कैसा शहर है भाई! तुझे पता है अभी क्या हुआ! बाज़ार से लौटते हुए गली में एक बारह-तेरह बरस की लड़की ने बेल्ट का किनारा पकड़ा। मैंने चौंककर देखा तो आँखों से इशारे करने लगी। मैं घबराकर आगे हटा तो उसने हाथ पकड़ लिया। मेरी देह उसके लिए प्रक्षेपण का पदार्थ थी जैसे। पीछे से आता हुआ ऑटो हॉर्न बजाने लगा तो मुझे छूटने का मौका मिला। पता है मेरे हाथ पर उसके नाखूनों के गहरे निशान पड़ गए हैं यार!“ उसने एक साँस में सारी बात कह दी। वह जाने उसके बाद और भी क्या-क्या बोलता रहा। मैं बस हाँ-हूँ कहता गया।

    उसकी बात ख़त्म होने के बाद मैंने फ़ोन काट दिया। 

    बाहर बारिश तेज़ थी, शीशे से होती हुई बूंदें कई-कई रास्तों से जाने कहाँ जाकर गुम हो जाती। मैं एक बूँद की लकीर पर उम्मीद की उंगली रखता, थोड़ी दूर जाकर ही वह कहीं छिप जाती। 

    **

    “बारह साल की बच्चियाँ तो होती हैं, बारह साल की स्त्रियाँ भी होती हैं, यह तो मैंने इस महानगर में आकर ही जाना” मैं यही वाक्य दोहरा रहा था। नींद में। जगे में। चलने में। रुकने में। हर समय।

    समंदर से होते हुए, मेरे नये घर और फिर पूरे शहर की गलियों में एक रस्सी बिछी है। जिस पर मेरा उस रात का बिलखना टँगा हुआ है। उस रस्सी से रोज़ दो बूँद ख़ून टपकता है, शहर रोज़ दो-दो बूँद से गीला हुआ जाता है। 

    मैं भूषण को कुछ नहीं कह पाया। ना कोई सलाह दे पाया, ना कोई सांत्वना। मैं जानता हूँ ,कुछ दिन में एक रस्सी भूषण की भी टंग जाएगी। यह शहर ऐसी ख़ून टपकती रस्सियों से पटा हुआ है।

    *****

    संक्षिप्त परिचय

    नाम- सुमन शेखर
    शिक्षा- मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर।

    जन्म- 13 जुलाई 1995

    फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन, निर्देशन के साथ ही अभिनय में निरत। दशक भर से रंगमंच में सक्रिय। 

    प्रकाशन- आलोचना, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, सरस्वती पत्रिका, मधुमती, राजस्थान पत्रिका, कृति बहुमत, उद्भावना, हिंदी चेतना, अहा ज़िन्दगी, इन्द्र धनुष वेब पोर्टल, गोल चक्कर, स्वाधीनता शारदीय विशेषांक और कौशिकी सहित कई पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

    वर्तमान पता-अंधेरी वेस्ट, मुम्बई में ठिकाना।

    स्थाई पता-माँ,कृष्णा नगर, खगड़िया-851204

    मोबाइल-8877225078

     

     

     

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