• पुस्तक अंश
  • भारतीय भक्ति कविता और एक संचयन

    विद्वान आलोचक माधव हाड़ा के संपादन में  ‘भक्ति अगाध अनंत’ का प्रकाशन हुआ है(रज़ा न्यास एवं राजपाल एंड सन्ज़ का सह प्रकाशन)  जिसमें में पहली बार छठी शताब्दी से उन्नीसवीं-बीसवीं सदी तक के, देश सभी क्षेत्रों के संत-भक्तों- अप्पर, संबंदर, सरहपाद, परकाल, सुंदरमूर्ति, आंडाल, माणिक्कवाचकर, शठकोप, गोरखनाथ, बसवण्णा, अल्लमप्रभुदेव, अक्क महादेवी, शेख़ फ़रीद, नामदेव, ज्ञानदेव, मुक्ताबाई, ललद्यद,  मुल्ला दाउद, विद्यापति, पीपा, कबीर, रैदास, नरसी मेहता, शंकरदेव, गुरु नानक, बलराम दास, चैतन्य, मीरां, सूरदास  जायसी, कुतबन, तुलसीदास, रसखान, नंददास, दादू दयाल, रहीम, गुरु अर्जुनदेव, रज्जब मलूकदास सुंदरदास, तुकाराम, दरिया साहिब, बुल्लेशाह, चरणदास, पलटू साहिब, सहजोबाई दयाबाई, लालन शाह फ़क़ीर, रवींद्रनाथ ठाकुर और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ संकलित की गई हैं। यहाँ बानगी के लिए संचयन के कवियों- अप्पर, अल्लमप्रभुदेव और मुक्ताबाई की रचनाओं का भाव रूपांतर उनके परिचय के साथ प्रस्तुत हैं-

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    अप्पर

    अप्पर (छठी सदी) विख्यात नायनार शैव संत-भक्त और तमिल कवि थे। वे दक्षिण के चार प्रमुख शैव आचार्यों में से एक हैं। ‘अप्पर’ का शाब्दिक अर्थ ‘पिता’ है। यह नाम उनको प्रतिष्ठित नायनार संत संबंदर ने दिया, जो उनके समकालीन थे। उनको ‘तिरुनावुक्करकर’ नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ अर्थात् ‘भाषा का राजा’, या ‘भाषा का स्वामी’ है। कहते हैं कि अप्पर ने भगवान शिव के लिए 4900 भक्ति पदों की रचना की, जिनमें से केवल 313 बच गए हैं, जो ‘तिरुमुरई’ के चौथे छठे खंड में संकलित हैं। अप्पर की मूर्तियाँ तमिल शिव मंदिरों में पाई जाती हैं। अप्पर पहले जैन धर्म में दीक्षित हुए और इसमें वे एक मठ के अधिपति भी रहे, जहाँ उनका नाम धर्मसेना था। अप्पर की रचनाओं में जैन धर्म के अनुभव, अपने शारीरिक कष्ट से मुक्ति के लिए प्रार्थना, शिव और शिव-तीर्थों की महिमा मिलती है। उनकी रचनाओं में छठी और सातवीं सदी के बीच के तमिल हिंदुओं के इतिहास और संस्कृति के कई साक्ष्य हैं। उनकी रचनाओं का लिखित रूप उनके निधन के 400 वर्षों बाद पहली बार मिलता है।

    अप्पर का जन्म छठी सदी के अंत में, संभवतः 570 और 596 ई. के बीच कभी हुआ। कुछ विद्वान् उनका जन्म सातवीं सदी की शुरुआत में मानते हैं। अधिकांश उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार अप्पर का बाल्यकाल अटिकाई के पास तिरुवमुर गाँव में व्यतीत हुआ। उनका बाल्यकालीन नाम मारुनिक्कियार था। उनके पिता का नाम पुकलनार और उनकी माता का नाम मथिनियार था। माता-पिता की मृत्यु के बाद उनका पालन-पोषण उनकी बड़ी बहन थिलागावथियार ने किया। थिलागावथियार का संबंध एक सैनिक से हुआ था, जो युद्ध में मारा गया। उसके बाद उसने विवाह नहीं किया। उसने अपने को शैव धर्म के लिए समर्पित कर दिया और अपने छोटे भाई की देखभाल करने लगी। वह भगवान् शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। उसके गौरवशाली तपस्वी जीवन का गुणगान ‘तिरुमुरई’ में आया है। अप्पर सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज करने और उसका पालन करने के लिए उत्सुक थे। उन्होंने जैन धर्म और उसके अहिंसा के अद्भुत अभ्यास के बारे में बहुत कुछ सुना था। उनको विश्वास था कि जैन धर्म उन्हें मुक्ति देगा और इसलिए वे जैन धर्म में दीक्षित हो गए। उन्होंने घर त्याग दिया और वे पाटलिपुत्र (दक्षिण अर्काट जिले में) गए और जैन संप्रदाय में सम्मिलित हो गए। उन्होंने इसके सभी शास्त्रों में महारत हासिल कर ली। बाद में वे तिरुप्पतिरिप्पुलियुर में जैन मठ के प्रमुख भी बने।

    अप्पर कुछ समय बाद, पेट की एक कष्टकारी रोग से पीड़ित होकर अपने घर लौट आए। उनकी बहन ने उन्हें भगवान् शिव की पूजित पवित्र राख दी और उन्हें पंचाक्षर का मंत्र ‘नमः शिवाय’ सिखाया। अप्पर अपनी बहन के साथ अटिकाई के एक शिव मंदिर गए, जहाँ उन्होंने अनायास ही ‘तेवरम’ का अपना पहला भजन तैयार किया, जिसमें उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की कि‌ “हे भगवान्, मैंने आपका और आपके धर्म का अपमान किया है। मैंने कई बुरे काम किए हैं। एक बार गोदावरी के तट पर, मैंने संतों के साथ तर्क किया और जैन धर्म की श्रेष्ठता स्थापित की। इस सारी बुराई के लिए, भगवान् यम स्वयं इस कष्टदायी दर्द के रूप में मेरे पास आए हैं। हे भगवान, आप ही मेरा एकमात्र सहारा और शरण हैं। मुझे बचाएँ। मैं हमेशा आपके चरण-कमलों को अपने हृदय में रखूँगा।” दूसरा भजन गाते ही, उनके पेट का रोग चामत्कारिक ढंग से ख़त्म हो गया।

    जैन मतावलंबियों को जब पता लगा कि अप्पर ने शैव धर्म स्वीकार कर लिया है, तो उन्होंने राजा के कान भरे। राजा ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि वे अप्पर को उसके सामने पेश करे। मंत्री जब अप्पर के पास गए, तो उन्होंने कहा कि “हे मंत्रियो! मैं अब आपके राजा का अधीन नहीं हूँ। मैं भगवान् शिव का भक्त हूँ, जो सभी प्राणियों के रक्षक, सभी पापों का नाश करने वाले, सभी देवताओं के स्वामी, अमरता और शाश्वत आनंद के दाता हैं। राजा की अवज्ञा करना अन्य लोगों के मामले में राजद्रोह के समान हो सकता है, मेरे मामले में नहीं, क्योंकि मैं उनके संरक्षण में हूँ। भय मेरे पास नहीं आ सकता, क्योंकि मैं उस व्यक्ति के संरक्षण में हूँ, जिसने एक बार अपने (शिव के) भक्त को बचाने के लिए भगवान् यम को लात मारी थी।” मंत्रियों ने अप्पर को राजा के समक्ष पेश किया। राजा ने उन्हें दंडित करने के लिए कई उपक्रम किए। इस संबंध में कई जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। कहते हैं कि उन्हें सात दिन तक एक भट्टी में बंद कर दिया गया। वे इसमें रहकर भगवान् का नाम जपते रहे, जिससे भट्टी की गर्मी ठंडी हवा में बदल गई। सात दिनों के अंत में लोगों ने देखा कि अप्पर जीवित थे और गहन ध्यान में लीन थे। जैनों ने राजा को उन्हें ज़हर देने का परामर्श दिया, जो भगवान् शिव की कृपा से अमृत में बदल गया। जैनों ने राजा को सलाह दी कि उन्हें हाथी से कुचलवा दिया जाए। अप्पर ने साहसपूर्वक हाथी का सामना किया और भगवान् की स्तुति में एक भजन गाया। अप्पर की प्रेमपूर्ण दृष्टि से हाथी का स्वभाव बदल गया। जैनियों ने अंततः राजा को सलाह दी कि अप्पर को एक पत्थर से बाँधकर समुद्र में फेंक दिया जाए। राजा के आदेश के अनुसार ऐसा ही किया गया। अप्पर ने अपना ध्यान भगवान् शिव पर केंद्रित किया और लगातार पंचाक्षर का जाप करते रहे। पत्थर तैरने लगा और अप्पर पत्थर पर बैठ गए। कहते हैं कि अप्पर एक बार जब भगवान् शिव के मंदिर में सेवा कर रहे थे, तो भगवान् ने पूरे फ़र्श को ऐसा बना दिया, मानो उस पर सोना और हीरे बिखरे पड़े हों।अप्पर के लिए सोना और हीरे मूल्यहीन भूसे की तरह थे।उन्होंने उन सभी को एकत्र कर पास के एक टैंक में फेंक दिया। भगवान् ने उनके सामने दिव्य युवतियों को प्रकट किया और उनके आकर्षण से उन्हें लुभाया, लेकिन अप्पर अविचलित रहे।

    अप्पर ने जब संबंदर के बारे में सुना, तो उनसे मिलने सिरकाली गए। संबंदर ने आदरपूर्वक उनको अप्पर (पिता) कहकर संबोधित किया। संबंदर से उनके संबंध घनिष्ठ थे- कहते हैं कि दोनों भजन गाते हुए साथ-साथ यात्राएँ करते थे। कहा जाता है कि अप्पर ने तमिलनाडु के विभिन्न शहरों और गाँवों में लगभग एक सौ पच्चीस मंदिरों की यात्रा की थी। तमिल माह चिथिरई के सांध्य नक्षत्र में तिरुपुकलूर शिव मंदिर में 81 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। तमिलनाडु के लगभग सभी शिव मंदिरों में अप्पर की पत्थर की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं। कहते हैं कि पल्लव राजा महेंद्रवर्मन अप्पर के शिष्य थे। अप्पर के प्रयासों से शैव संप्रदाय के प्रभाव का दायरा विस्तृत हुआ। उनके कारण कई छोटे शिव मंदिरों को प्रतिष्ठा और सम्मान मिला। अप्पर ने शिव मंदिरों में वैदिक अनुष्ठानों की शुरुआत की, जिनका पालन आज भी किया जाता है।

    अप्पर की रचनाएँ शिव के प्रति अंतरंग प्रेम और भक्ति संबंधित हैं, लेकिन उनमें ऐसे छंद भी शामिल हैं, जहाँ वे अपने जीवन के जैनकाल पर पश्चाताप करते हैं। अपनी रचनाओं में उन्होंने कई जैन धार्मिक सिद्धांतों और आचारों की निंदा की है। अप्पर की रचनाएँ तमिल भाषा के काव्यरूप ‘तेवरम’ में है। ‘तेवरम’ दस गीतों एक संगीतबद्ध समूह है। ‘तेवरम’ में स्थानों के नामों को शामिल करने की प्रथा है। अप्पर ने भी अपनी रचनाओं में तदनुसार तीर्थस्थानों के  नामोल्लेख किए हैं।

    रचनाएँ

    1.

    मैंने अपने मन में

    जगह बना रखी है केवल आपके लिए

    मुझे नहीं पता

    आपके नाम-स्मरण के बिना

    मैं अब तक कैसे रहा जीवित?

    मुझे इतना कष्ट कभी नहीं हुआ

    पेट के साथ आँतों को जोड़कर

    आपने मुझे बना दिया है अक्षम

    विष की तरह कष्टकारी इस रोग को

    न तो तुम करते हो ख़त्म

    न यह कहते हो कि मत हो भयभीत

    2.

    मुझे नहीं पता

    क्या मैं जल, फूल और सुगंधित धूप से

    आपकी पूजा करना भूल गया हूँ?

    समृद्धि और विपत्ति में

    हमेशा किया है आपका स्मरण

    तमिल में करता रहा आपकी स्तुति

    गाता रहा आपका संगीत

    आपकी महिमा को अपनी भाषा में

    कहना नहीं भूला कभी

    आप हैं कपाली

    मेरे शरीर में जमकर बैठ गए

    गठिया रोग से करें मुझे मुक्त

    मेरे लिए यह है बहुत कष्टकारी

    मैं हूँ आपका दास

    चंदन के लेप जैसी पवित्र राख

    लगी हुई है उनके शरीर पर

    श्वेत किरणोंवाला चंद्रमा

    उनकी शिखा में है रत्न की तरह

    धारण कर रखा है

    उन्होंने मृगछाल का रंगीन वस्त्र

    वृषभ हैं उनके साथ

    जो लड़ने के साथ करता है रक्षा

    नाग ढके हुए हैं उनके वक्ष को

    उनके पास है पवित्र जलवाली केतिलम नदी

    हम हैं शिव के परिजन

    भयभीत होने की ज़रूरत नहीं है

    4.

    हे मेरी आँखो!

    करो उन शिव के दर्शन

    जिनके कंठ ने धारण कर लिया

    समुद्र मंथन से निकला विष

    हे मेरी आँखो!

    करो उन शिव के दर्शन

    जो खड़े होकर

    अपने आठ कंधों को झुलाते हुए

    करते हैं नृत्य

    5.

    हे मेरे मन!

    तू कर निष्कलंक शिव का ध्यान,

    जिनके केश हैं खड़े हुए और काले

    हे मेरे मन!

    उस पर्वतपुत्री के पति का ध्यान कर

    जिस पर चलते हैं

    बादल नाचते हुए

    6.

    फूलों की सुन्दरता

    बढ़ाने वाला है कमल

    गायों की सुन्दरता बढ़ाता है शिव

    शासको की सुंदरता बढ़ाती है निष्पक्षता

    जीभ की सुंदरता बढाता है

    ‘नमः शिवाय’

    7.

    श्रेष्ठ और सुंदर देने में

    शिव नहीं करते पक्षपात

    वे अपने कुलीन-अकुलीन शरणागत का

    करते हैं कल्याण

    ‘नमःशिवाय’ कहने पर

    वे प्रदान करेंगे प्रचुर मात्रा में

    समुचित और सुंदर

    8.

    डरेंगे, रोएँगे, आँखें खोलेंगे, चिल्लाएँगे

    भूल जाएँगे सद्-असद्

    परमानंद में वे प्रहार करेंगे अपने सिर पर

    शिव हैं हमारे पिता और नायक

    जो करते हैं उनकी स्तुति

    तिरुवरूर के अथिराई नक्षत्र में

    मनाए जाने वाले उत्सव का

    उनके लिए यही है सौंदर्य

    9.

    हे शिव! आपके शरीर पर

    लाल और उलझी जटाएँ

    हे प्रभु!

    आपकी गर्दन का रंग है

    अभी-अभी उगते हुए काले बादल के समान

    चमक ताज़े कोमल पत्तों की तरह

    आपने ही मुझे बनाया है अपना शिष्य

    मुझ पर करें कृपा

    खोल दें मेरे लिए

    अपने लंबे और दीर्घकाय द्वार

    10.

    जो लोग पुष्प लेकर नहीं करते

    शिव के स्वर्ण-चरणों की पूजा

    जो लोग नहीं लेते

    अपनी जिह्वा से शिव का नाम

    वे करते हैं केवल शरीर के लिए

    भोजन की तलाश

    मन रहता है उनका भ्रमित

    वे मृत्य के बाद अपना शरीर

    कौवों के भोजन के लिए

    छोड़कर चले जाते हैं संसार से

    11.

    जल्दी से हावी हो जाती है

    लोगों पर ग़रीबी

    उनके पीछे लग जाते हैं

    धन, दुष्ट क्रोध, सुख और अप्रसन्नता

    भोग की वस्तुएँ हैं कई

    जो एक साथ दौड़कर

    कुतर-कुतर कर खाती है दुनिया को

    शिव मेरे लिए हैं कल्पवृक्ष की तरह

    जीवन से ऊपर सर्वोच्च प्राणी

    जिन्होंने ज़हर को पी लिया

    मैं तिरुवरुर में करूँगा

    सर्वोच्च दिव्य प्रकाश के दर्शन

    मैं दुनिया के स्वभाव का नहीं बनूँगा शिकार

    मुझे लुभाएँ नहीं

    मै दौड़ रहा हूँ बहुत तेज

    12.

    हे मेरे पिता!

    आपने मुझे बाँध दिया है

    अपने प्रेम की डोरी से

    मुझे अपनी कृपा दृष्टि के

    निर्मल जल से कर दिया है पवित्र

    कितना सरल है आप तक पहुँचना

    कितना मुश्किल है आपको पा लेना

    आपने किया मुझ पर अनुग्रह

    मुझे बना लिया अपना दास

    मेरे कामों को मान लिया अपना काम

    मैं हूँ पागल, मैं हूँ अज्ञानी

    मैं भटकता रहता हूँ निरुद्देश्य

    मैं हूँ कुत्ते के समान नीच

    क्या आपने मेरे अपकर्मों को क्षमा नहीं किया?

    हे प्रभु! क्या हम आपकी दया के पात्र हैं?

    जब सोचता हूँ

    आपके दयालु स्वभाव के संबंध में

    तो मुझे होती है अपार प्रसन्नता

     

    2.

    अल्लमप्रभुदेव

    अल्लमप्रभुदेव बारहवीं शताब्दी के एक रहस्यवादी शरण संत और कन्नड़ भाषा के कवि-वचनकार थे। उन्होंने स्वयं और शिव की एकात्मक चेतना का प्रचार किया। अल्लमप्रभुदेव उन प्रमुख लिंगायत संत-कवियों में से से एक हैं, जिन्होंने मध्ययुगीन कर्नाटक समाज और लोकप्रिय कन्नड़ साहित्य को नया रूप दिया। शरण और लिंगायत आंदोलन के प्रमुख बसवण्णा और अक्क महादेवी उनके समकालीन थे। उन्हें बसवण्णा और अक्क महादेवी के साथ लिंगायतवाद की त्रिमूर्ति में सम्मिलित किया जाता है। वे बसवण्णा द्वारा स्थापित अनुभवमंडप के अध्यक्ष थे। शरणों में बसवण्णा को ‘बड़ा भाई’ और अक्क महादेवी को ‘बड़ी बहन’ कहा जाता था, लेकिन अल्लम सबके के लिए ‘प्रभु’ अर्थात् सबके स्वामी थे।

    अल्लम के जीवन संबंधी ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत कम मिलते हैं। उनके संबंध में जानने का स्रोत प्रचलित जनश्रुतियाँ हैं। अल्लम के जीवन के संबंध दो तरह की धारणाएँ प्रचलित हैं। एक के अनुसार वे स्वयं शिव थे, जो मुक्ति की शिक्षा के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए। धारणा के अनुसार अल्लम के माता-पिता का नाम निरंकार (अस्तित्वहीन) और ममाकरा (माया) था। अल्लम के जीवन के संबंध में दूसरी धारणा उपलब्ध स्रोतों के अनुसार है। उनके प्रारंभिक जीवन के कुछ विवरण होयसल राजा नरसिंह, प्रथम (1152-1173 ई.) शासनकाल में हुए हरिहर की रचनाओं में उपलब्ध है। विजयनगर के कवि चामरसा ने राजा देवराय द्वितीय के दरबार में ‘प्रभुलिंगलीले’ (1430 ई) की रचना की, जिसमें अल्लम के जीवन और शिक्षाओं का विवरण दिया गया। उन्होंने अल्लम को हिंदू भगवान् गणपति का अवतार माना है। वीरशैव संप्रदाय की एक और ग्रंथ ‘शून्यसम्पदाने’ में भी अल्लम केंद्रीय चरित्र हैं। दूसरी धारणा के अनुसार अल्लम का जन्म कर्नाटक के शिमोगा जिले में सुजनानी और निरशंकर के घर पर हुआ था। हरिहर के अनुसार वे मंदिर के कलाकार परिवार से संबद्ध थे। वे स्वयं मडेल नामक एक प्रकार का ढोल बजाने में निपुण थे। अल्लम ने कमलाथे नामक एक नर्तकी से विवाह किया, लेकिन उसकी असमय मृत्यु हो गई। शोकग्रस्त अल्लम लक्ष्यहीन भटकते रहे। अंततः उनकी भेंट संत अनिमिसय्या (खुली आँखों वाले) से हुई। संत ने उन्हें एक लिंगचिह्न और ज्ञान-प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। अनिमिसय्या को अल्लम ने अपनी रचनाओं में गुहेश्वर कहा है, जिसका अर्थ है वह देवता जो हृदय की गुफा में सभी के साथ रहता है।

    अल्लम के जीवन के सबंध में कई जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें से एक बहुत प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि उनकी भेंट एक सिद्ध गोरक्ष से हुई। अपनी सिद्धियों के लिए प्रसिद्ध गोरक्ष ने अल्लम को एक तलवार देकर कहा कि वे उन पर इससे प्रहार करे। अल्लम ने ऐसा ही किया और तलवार एक वज्र जैसे पत्थर पर लगी और गोरक्ष पर इसका कोई असर नहीं हुआ। अल्लम ने भी गोरक्ष को कहा कि वे भी उन पर तलवार से प्रहार करे। गोरक्ष ने वैसा ही किया- तलवार उन पर हवा को चीरती हुई निकल गई। यह जनश्रुति अन्य सिद्धओं से अल्लम की साधना को अलग करती है। दरअसल उनकी साधना अपने को अस्तित्वहीन करने की थी। अल्लम ने गीतों के माध्यम से अपना संदेश फैलाया। उनकी अधिकांश रचनाएँ स्वतःस्फूर्त और देशभाषा में थीं। उन्होंने सांध्यभाषा का भी प्रयोग किया। उनकी मृत्यु श्रीशिला (आंध्रप्रदेश) के पास कदलीवन में हुई। कहते हैं कि “वे लिंग के साथ एक हो गए।”

    अल्लम की रचनाओं में गूढ और रहस्यमय ईश्वरानुभव के साथ अतिमानवीय शक्तियाँ (सिद्धियाँ) और उनकी प्राप्ति, मंदिरपूजा, पारंपरिक विश्वासों और अनुष्ठानिक प्रथाओं की आलोचना है। उन्होंने वीरशैवों- बसवण्णा और अक्क महादेवी की भी आलोचना की है। उनकी सभी कविताएँ ग़ैर-सांप्रदायिक हैं और उनमें से कुछ में सरल भाषा का प्रयोग हुआ है। उन्होंने लगभग 1300 वचनों की रचना की है। कन्नड़ साहित्य के विद्वान् एच.एस. शिवप्रकाश के अनुसार, अल्लम की कविताएँ जापानी ज़ेन परंपरा की गूढ, रहस्यमय और सांकेतिक अभिव्यक्तियों की तरह हैं। ए.के. रामानुजन ने अल्लम जैसे संत के संबंध में सही लिखा है कि “तितली को कैटरपिलर की कोई स्मृति नहीं होती।” उनकी कविताओं का केवल एक छोटा-सा हिस्सा उनके संत-भक्त जीवन का पहला चरण है। उनकी शेष कविताएँ संत के जीवन के बाद के चरण भगवान् से संयोग और ऐक्य पर आधारित हैं। अल्लम की रचनाओं में धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना और नैतिक मूल्यों और शिव की भक्ति का आग्रह मिलता है। उन्होनें वैदिक धर्म की ‘महान्’ परंपराओं और ‘छोटी’ स्थानीय परंपराओं, दोनों को ख़ारिज कर दिया। उन्होंने शास्त्रीय विश्वास-प्रणालियों, सामाजिक रीति-रिवाज़ो और अंधविश्वासों, छविपूजा, जातिव्यवस्था, यज्ञ के वैदिक अनुष्ठान और बलि की प्रथा को प्रश्नाहत किया। अल्लम ने लिंगैक्य का प्रचार किया और इसके लिए उन्होंने अपने वचनों को माध्यम बनाया। वे भाषा को ‘सत्य के एकात्मक अनुभव’ को व्यक्त करने के लिए एक सीमित साधन मानते थे। कदाचित् इसी कारण कुछ विद्वान् उन्हें कवि नहीं, केवल संत मानते हैं।

    रचनाएँ

    1.

    अंग के हाथ में है लिंग

    मन है संसार में लीन

    हे भाई!

    तुम कैसे हुए प्राणलिंगी?

    बाहर है लिंग का चिह्न

    हे गुहेश्वर!

    तन और मन नहीं हैं एक

    तो कैसे हुए प्राणलिंगी?

    2.

    नहीं लौटतीं

    समुद्र में विलीन नदियाँ

    जला हुआ कपूर

    फिर नहीं आता अपने पूर्व रूप में

    वायु में लीन सुगंध से नहीं होता

    फिर से लेपन

    हे गुहेश्वर!

    लिंग में विलीन शरण

    लिंगैक्य के बाद

    नहीं लेता फिर से जन्म

    3.

    पवित्र जल, बिल्वपत्र

    पुष्प-धूप-दीप की आरती

    पूजा करते-करते थक गए

    नहीं पता

    यह क्या और क्यों है?

    लोग हैं मूर्ख

    या यह है केवल भेड़चाल

    देखा-देखी कर रहे हैं पूजा

    हे गुहेश्वर!

    नहीं आया कुछ हाथ

    सब हो गए ख़त्म

    4.

    अमृत उपलब्ध हो समुद्र में

    तो गाय का क्या उपयोग?

    सुमेरु हो बीच में

    तो क्यों छाननी सोनामिली धूल?

    गुरु हो साथ में

    तो तत्त्वज्ञान के लिए क्या हाय-तौबा?

    कृपा हो उनकी

    तो फिर कैसी मुक्ति?

    जब हो हाथ में लिंग

    तो हे गुहेश्वर!

    फिर कोई चिंता क्यों?

    5.

    हे भाई!

    जो नहीं बोलता सत्य

    जो नहीं है सदाचारी

    जो नहीं है सद्भक्त

    निज मुक्ति के लिए नहीं है चिंतित

    नहीं करता है सद्कार्य

    नहीं पहुँचता है सद्ज्ञान तक

    धिक्कार है

    ऐसे छद्मवेशधारियों के विचार

    यह सब देखकर

    हँस रहा गुहेश्वर लिंग

    देखो, हे चेन्नबसवन्ना!

    लोभ के लिए

    मर गए करोड़ों लोग

    मांसाहार के लिए

    मर गए करो‌ड़ों लोग

    सोना, स्त्री और भूमि के लिए

    मर गए करो‌ड़ों लोग

    हे गुहेश्वर!

    मैं नहीं जानता किसी को

    जो मरा हो तुम्हारे लिए

    7.

    केवल दिखावे लिए बना शिष्य

    दिखावे के लिए लिंग

    दिखावे के लिए जंगम

    दिखावे के लिए गुरुकृपा

    दिखावे लिए गुरुसेवा

    दोनों अंधे

    दोनों ने ठेला एक-दूसरे को

    और हे गुहेश्वर!

    दोनों भटक गए

    8.

    सब कुछ जान सकते हैं

    लेकिन असंभव है मृत्यु का ज्ञान

    विद्याएँ, सकल विस्तार को

    संभव है जानना

    लेकिन मृत्यु है अज्ञात

    हरि, ब्रह्म, काल, काम, दक्ष और मनुष्य

    सभी की होती है मृत्यु

    महापुरुषों की भी होती है मृत्यु

    शिव-शिव!

    लोक नहीं समझता मृत्यु

    संसार को भुलाकर

    जो करता है मन को लिंग में ध्यानस्थ

    उस संत की नहीं होती है मृत्यु

    9.

    कपूर के पहाड़ पर लगेगी आग

    तो क्या बनेगा कोयला?

    कोहरे से ढ़के हुए शिवालय पर

    क्या चढ़ेगा धूप का कलश?

    अंगारों के पहाड़ पर चलाया हुआ

    लाख का बाण

    क्या खोजने पर मिलेगा?

    गुहेश्वर लिंग को जान लिया

    तो अब जानने के लिए

    क्या है शेष?

    10.

    चोर के भय से भागोगे जंगल में

    तो क्या शेर नहीं खाएगा?

    शेर के भय से जाओगे बाँबी में

    तो क्या साँप छोड़ देगा?

    मृत्यु के भय से बन जाओगे संत

    पर कर्म तो वहाँ भी पीछा करेंगे

    मृत्यु के आहार

    छद्मवेशधारी अभिमानियों को

    हे गुहेश्वर! कैसे समझाऊँ?

    11.

    आकाश में चलाया गया बाण

    उसे छुए बिना गिर जाता है जैसे नीचे

    उसी तरह चढ़-चढ़कर

    नीचे गिरने वाले हे जीव!

    कैसे जान पाओगे उसे?

    हे गुहेश्वर!

    आपको क़ैद कर

    मैं ख़ुद हो गया बंदी

    12.

    पंगु के विवाह में

    बजा रहे हैं भाँड लोग बाजे

    नकटी स्त्रियाँ ले जा रही हैं

    आरती के कलश

    जय हो, जय का घोष करते हैं बाराती

    भोजन के बाद

    पान के लिए कर रहे हैं रोष

    तीनों लोक इस तरह बने हुए हैं बारात

    गुहेश्वर को समझने का

    चल रहा है ढोंग

    13.

    शिला के अंदर जैसे है अग्नि

    जल के भीतर है जैसे प्रतिबिंब

    बीज में है जैसे वृक्ष

    शब्द में जैसे है शून्य

    हे गुहेश्वर! ऐसा ही है

    आपका और शरणों का संबंध

     

    3.

    मुक्ताबाई

    मराठी संत-भक्त मुक्ताबाई (1279-1297 ई.) मराठी के विख्यात संत-भक्त ज्ञानदेव की छोटी बहन थी। मराठी में उन्हें ‘मुक्ताई’ भी कहा जाता है। वे मराठी की पहली कवयित्री के रूप में भी विख्यात हैं। उन्होंने केवल 41 अभंग लिखकर अपार ख्याति अर्जित की। उनके संबंध में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उनकी कविता में उनके स्त्री होने की अलग से कोई चेतना नहीं है। उनकी कविता अन्य पुरुष संत-भक्तों की तरह गूढ़ दार्शनिक और आध्यात्मिक चेतना से युक्त है। वरकरी संप्रदाय में उनकी मान्यता ‘आदिशक्ति’ के रूप में है।

    मुक्ताबाई का जन्म 1279 ई. पैठन जिले के अपेगाँव में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता विट्ठलपंत कुलकर्णी अपनी परिवार के परंपरा के अनुसार वेदों के विद्वान् अध्येता थे। उनकी माँ का नाम रुक्मिणीबाई था। कुलकर्णी दंपती की तीन अन्य संतानें- निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव और सोपानदेव मुक्ताबाई से बड़ी थीं। मुक्ताबाई को भी अपने माता-पिता और भाइयों के साथ ब्राह्मणों की उपेक्षा और प्रताड़ना झेलती पड़ी। दरअसल उनके पिता ने काशी जाकर संन्यास ग्रहण किया, लेकिन वे इसे त्यागकर घर लौट आए और सामान्य गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगे। उनकी चारों संतानों को संन्यास की संतानें मानकर ब्रह्माण जाति से बहिष्कृत कर दिया। प्रायश्चितस्वरूप मुक्ताबाई के माता-पिता ने प्रयाग जाकर गंगा में अपना प्राणांत कर लिया, लेकिन इसके बाद भी उनकी संतानों को ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं किया। मुक्ताबाई और उनके तीनों भाई अनाथ तरह पलकर बड़े हुए। मुक्ताबाई ने बहुत अल्पायु में ही परिवार का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। बाद में उन्होंने ज्ञानदेव और सोपानदेव के साथ निवृत्तिनाथ से दीक्षा ली। कहते हैं कि ज्ञानदेव के समाधि लेने के एक वर्ष-दो वर्ष बाद ही मुक्ताबाई, निवृत्तिनाथ और सोपानदेव तीर्थयात्रा के साथ पर निकलीं और एक जगह बरसात में चमकती हुई बिजली के प्रकाश में विलीन हो गईं।

    मुक्ताबाई के जीवन के संबंध में दो घटनाओं का विवरण मिलता है। कहते हैं कि महाराष्ट्र के विख्यात संत-भक्त नामदेव विट्ठलनाथ के सबसे बड़े भक्त के रूप में मान्य थे। मुक्ताबाई अपने साथी संतों के साथ पंढ़रपुर गईं। सभी ने नामदेव को प्रणाम किया, लेकिन मुक्ताबाई ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपने साथी गोराबा कुम्हार से ‘बर्तन जाँचने’ का आग्रह किया। वे इसका आशय समझ गए। वे सभी को डंडों से मारने लगे। मार खाकर अन्य सभी संत शांत रहे, जबकि नामदेव चिल्लाने लगे। गोराबा कुम्हार ने निष्कर्ष निकालकर कहा कि नामदेव अभी कच्चा है। नामदेव को अपने अपूर्ण होने अहसास हो गया। बाद में वे विसोबा खेचर के शिष्य हुए और उनके अधीन उन्होंने संत होने की पूर्णता प्राप्त की। मुक्ताबाई के जीवन की दूसरी घटना चाँगदेव से संबंधित है। चाँगदेव सिद्धियाँ प्राप्त विख्यात संत थे। कहते हैं कि उन्होंने नहाती हुईं मुक्ताबाई को देखकर अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया। मुक्ताबाई ने उनसे कहा कि यदि वे साधु हैं, तो उनमें यह भाव नहीं होना चाहिए। मुक्ताबाई ने चाँगदेव को कहा कि “यदि तुझ पर गुरु कृपा होती, तो ऐसा विकार तेरे अंदर नहीं उठता। दीवार में जैसे आले होते हैं, वैसा ही देख-समझकर तू मेरे सामने आता। जन में, वन में जो गायें घूमती हैं, क्या वे कपड़े पहने रहती हैं? उन पशुओं को जैसे तू देखता है, वैसी ही  प्रतीति तुझे मुझे देखकर क्यों नहीं होती?” चाँगदेव को अपनी ग़लती का अहसास हुआ और वे मुक्ताबाई के शिष्य बन गए। “आठ साल की उम्र में मुक्ताई  चांगदेव के आध्यात्मिक गुरु बन गईं।” चांगदेव कृतज्ञतापूर्वक कहते हैं, “मुक्ताई करे लेइले अंजन”। मुक्ताबाई के अभंगों में यहाँ-वहाँ चाँगदेव का का उल्लेख ‘चाँग्यासुत’ (चाँगदेव बेटा) के रूप में आता है।

    मुक्ताबाई का रचना संसार बहुत सीमित है। उन्होंने केवल 41 अभंगों की रचना की, जिनमें ‘ताटी चे अभंग’ (द्वार के अभंग) ‘ज्ञानबोध’ आदि सम्मिलित हैं। उनके कुछ अभंग पंढ़रपुर के माहात्म्य, संत महिमा, उपदेश आदि पर आधारित हैं। ‘ताटीचे अभंग’ उनकी सबसे चर्चित रचना है। कहते हैं कि आत्मग्लानिवश ज्ञानदेव ने दरवाज़ा बंद कर लिया। मुक्ताबाई अपने 12 अभंगों में विभिन्न तर्क देकर ज्ञानदेव से दरवाज़ा खोलकर बाह्य संसार का एक चुनौती की तरह सामना करने का आग्रह किया। उन्होंने इसमें संसार की रीति-नीति, संत के आचरण, ईश्वर महिमा आदि से संबंधित कई तर्क दिए। उन्होंने ज्ञानदेव को उन संतों का स्मरण करवाया जो उनसे पहले अवतरित हुए और जिनको विरोध और अपमान सहन करना पड़ा। उन्होंने ज्ञानदेव को उनके कुल के वैभव और उनकी योग्यता का स्मरण कराया। उन्होंने ज्ञानदेव से कहा कि “जो लोगों के पापों को सहन करता है वह योगी है। भले ही ब्रह्मांड हमसे नाराज़ हो, हम उस गुस्से को पानी की तरह की शीतलता से बुझा देंगे।” मुक्ताबाई के कुछ अभंगों अपने परिवार के साथ होने वाले अन्याय की व्यथा बोलती है। एक अभंग में वे कहती हैं- हम घिए हुए हैं / राक्षस ब्राह्मणों से / अपने हाथ पकड़ें एक साथ / नाराज़ मत होओ / जीभ कटी हुई है / अपने दांतों से / दीपक किसने तोड़ा? / आहत हुआ हृदय / लोहे के चने चबाये / फिर से नाचो ब्रह्मपदी पर / अपने मन को मारो / हे ज्ञानेश्वर! खोलो दवार।”

    रचनाएँ

    1.

    नाम-स्मरण से

    होती है जीव की मुक्ति

    हमने देखा है उनका रूप

    मूर्ख डूबे रहे भ्रम में

    पुंडरिक विट्ठल को ले आया पंढ़रपुर

    मुक्ताई विचार से हो गई मुक्त

    करती है हरिनाम का पाठ

    2.

    उसे कहते हैं शून्य

    लेकिन वह शून्य नहीं है

    उसे देखो और समझो

    कैसे दिखाता है वह माया?

    पंढ़रपुर में ईश्वर हुए हैं प्रकट

    नहीं पता कुछ भी

    वेदों में कहा गया है नेति नेति

    मुक्ताई को है विठ्ठल से प्रेम

    वह है शून्य

    लगभग शून्य

    कैसे हो

    सिद्धांतों की भूल-भुलैया में

    परमत्त्त्व की पहचान?

    सोहम् का प्रभाव क्या है?

    ऊपर-नीचे कैसे होते हैं?

    यह संज्ञान नहीं, केवल ज्ञान है

    संज्ञान है

    आत्मा की धन-संपत्ति

    मुक्ताई है सभी तरह से मुक्त

    मुक्त ही पाता है

    आत्मबोध से मुक्ति

    चींटी उड़ गई

    आकाश की ओर

    उसे निगल लिया सूरज ने

    देखा एक आश्चर्य

    बाँझ के हुआ पुत्र-जन्म

    बिच्छू के नीचे जाओ

    बाकी सिरों को

    पैरों से बदल दिया गया है

    घर घिरा हुआ मक्खियों से

    यह देखकर

    हँस पड़ी मुक्ताई

    संसार को होना चाहिए

    संत के समान

    बोलने में सक्षम

    लेकिन हो महान्

    अभिमान व्यर्थ है

    जहाँ है महानता का निवास

    वहाँ दया तो होगी ही

    किससे हो नाराज़?

    सभी में है ब्रह्म

    इस पर करो विचार

    हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

    सुख में हो गई ऊँच-नीच

    वह नहीं होता

    हमारी इच्छा के अनुसार

    ऐसा नाटक एक क्षण के लिए भी

    नहीं रहता स्थिर

    इसमें एक से लेकर

    कई लोग हैं शामिल

    शून्य के साक्ष्य पर

    करो विचार

    केवल वेद-ओंकार के नाम पर एकता?

    चली गई घर की शान

    द्वंद्व दूर करो

    शांति रखो

    हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

    हम घिरे हुए हैं

    ब्राह्मणों से

    अपने हाथ पकड़ें हम एक साथ

    नाराज़ मत होओ

    जीभ कटी हुई है

    अपने दाँतों से

    दीपक किसने तोड़ा?

    आहत हुआ हृदय

    लोहे के चने चबाए

    फिर से नाचो ब्रह्मपदी पर

    अपने मन को मार

    हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

    आओ! हम बनाएँ

    खुशियों का सागर

    हमें करना चाहिए

    दुनिया को रोशन

    दूरी समझ में नहीं आती

    संत नहीं हैं

    तो नहीं है हमारा जीवन

    जीवन देना चाहिए

    न कि वापस लेना चाहिए

    मन को पकड़ें

    करें उसका उपचार

    हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

    नहीं

    ख़ुशी पाप नहीं है

    नहीं

    कर्म कोई विचार नहीं है

    कोई मोक्ष या भवबंधन नहीं है

    वे कहते हैं कि

    वटेश्वर ब्रह्म नहीं है

    सहज भाव से

    कहती हैं मुक्ताई

    जब आप स्वतंत्र होते हैं

    तो बंधन समाप्त हो जाता है

    हमने बाँध ली हैं

    अपनी ही रस्सियाँ

    घर में रहकर

    घर के बंधन तोड़ना है आसान

    अतीत की दुनिया खो गई है

    अच्छे वटेश्वर प्रार्थना करते हैं

    नयी दुनिया के लिए

    सुख के अंत में

    आता है दुःख

    घूमने के लिए बहुत अच्छा है

    सुख से दुःख की ओर

    दुःख से दुःख की ओर

    दोनों हैं अज्ञान के कारण

    मुक्ताई है मुक्त और स्वतंत्र

    वटेश्वर हैं स्वयंभू

    निर्गुण की शाखा पर

    लगाया पालना

    सो गया

    उसमें मुक्ताबाई का लाल चाँगदेव

    सो जाओ, मत करो हठ

    मैं बजाती हूँ अनाहत की ताली

    न निद्रा है, न जागरण

    है केवल उन्मन का भोग

    पवन की डोर से

    बुना हुआ पालना

    अजपा में करो स्थिर

    नहीं है नींद, नहीं जागना

    यहाँ क्या सोना है?

    हे चाँगदेव!

    अब तो पार उतरना है

    ===============

    अल्लमप्रभुदेव की रचनाओं का भावरूपांतर एम.एम. कुलबुर्गी द्वारा संपादित एवं प्रभाकर प्रेमी और उनके सहयोगियों द्वारा अनुदित ‘वचन’ (बसव समिति, बैंगलुरु) पर आधारित है। नायनार संत-भक्त अप्पर की रचनाओं का भावरूपांतर ‘शैव धर्मग्रंथ’ हिमालियन अकादमी (https://www-himalayanacademy-com) के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है। लेखक-संपादक सभी अनुवादकों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है।

     

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