हरे पीले लाल के बीच झूलती ज़िन्दगी: अजय सोडानी

इंदौर शहर के जाने-माने चिकित्सक डॉक्टर अजय सोडानी जाने-माने लेखक हैं। कोरोना काल में चिकित्सा के अनुभवों को लेकर उन्होंने तीन अंकों में एक सीरिज़ ‘दैनिक भास्कर’ में लिखी। आप लोगों के लिए तीनों एक साथ प्रस्तुत कर रहे हैं-

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“बेटा मिल सके तो कहीं से एक अनार लेते आना’’, हस्पताल में दाख़िल सत्तर बरस के डोकरे ने दरवज्जे पर खड़े अपने पैंतिस बरस के बेटे से कहा। पाँच मिनिट की मुलाक़ात में यह बात वो तीसरी दफ़ा दोहरा रहा था।

’’हाँ पापा कोशिश करुँगा कि कल कहीं से एक अनार मिल जाए’’, लड़के ने भी वादा दोहराया। इस मर्तबा उसका गला भर्राया था। दिल ही दिल में व¨ अपने झूठ का भेद जानता था। मालूम था उसे कि जिस काल और जिस शहर में वह खड़ा है उसमें अनार हासिल करना नामुमकिन से भी ज़्यादा असम्भव ठहरा।

बता दूँ कि उपर्युक्त सम्वाद कपोल कल्पित नहीं। कि डोकरा चटोरा नहीं, संयमित जीवन जीने का कायल है। और यह भी कि रोगी निर्धन नहीं, बड़ा आसामी है- दो- दो फेक्ट्रियों का मालिक। फिर एक मामूली से अनार की आपूर्ति में ऐसे कैसी अड़चन? कि क्यों पुत्र का कंठ भर आया?  ये सवालात हल होंगे मुआमले में गहरे पैठने से।

यह क़िस्सा है दो हज़ार बीस के उतरते अप्रैल का। बोले तो तब का, जब कोरोना अपने नापाक पंजे भारत में फैला चुका था। ख़बरकाग़ज़, टीवी पर नज़र पड़ते के साथ हिया में ऐसा डबका होता कि अब रुका कि रुका। दिल घिरता जाता अधिक से भी अधिक गहन तम से। मन रहने लगा था डूबा-डूबा। ऐसे में अपने डोकरे मियाँ की तबीयत बिगड़ी। ज्वर व अपच संग पेट चल पड़ा। उनके परिवार में हलचल मची कि कहीं बाबूजी पर कोविड की छाया तो नहीं ? संशय वाले बादल घिरे। ऊहापोह कि छुप कर बैठें या हस्पताल जाएं ? मेधा ने भय पर विजय पायी। शुरू हुई निदान हेतु हस्पताल दर हस्पताल भटकन। ख़ूब मग़जपच्ची के बाद और सरकारी अफ़सरान पर दबाव डलवाने उपरान्त, जाँचे हुईं। डोकरे मियाँ के फेफड़े संक्रमित मिले । अब मियाँ जी हस्पताल में एकले पड़े-पड़े  आरटी पी.सी.आर. रिपोर्ट नमूदार होने का इंतजार कर रहे हैं।

सवाल उठता है कि रोगी को निदान हेतु भटकना क्यों पड़ा? भरे पूरे परिवार वाला डोकरा हस्पताल में एकला क्यों? और क्यों तरस रहा है एक सर्वसम्पन्न मानुष अदना से अनार के लिए? मुआमला ठीक से समझने वास्ते हमें करना होगी लम्बी बात। बतफ़सील औ’ तरतीब बताना होगा मुझे वो सारा जो  मेडिकल शोधकर्ता, मेडिकल शिक्षक तथा एक मनुष्य की हैसियत से मैंने देखा। भुगता। समझा। कोरोना महामारी काल में। चुनाँचे रखता हूँ आपके सामने उस दौर के चुनिंदा नुक़्ते जो मेरे मन को उद्वेलित किये हैं।

कहा चुका कि यह वाक़िया है दो हज़ार बीस के चौथे मास का। वैसे तो कोरोना विषाणु की आहटें दिसम्बर दो हज़ार उन्नीस से सुनायी पड़ रहीं थीं। परन्तु चीन के एक छोटे इलाके़ से उठती कराहों    पर किसी ने कान न धरे। नतीज़न इस बेख़ौफ़ विषाणु ने तकनीक-प्रबल अमेरीका सहित अन्य कई देशों के सत्ताधीशों को ऊँघते में धर दबोचा। अपनी-अपनी विचार-गुहाओं में कै़द आत्मविमुग्ध सत्ताधीश सोते में पकड़े जाना स्वीकारते भी तो कैसे? कि श्रेष्ठता बोध से बाधित मनक खुद के गिरेबां में नहीं झाँकते। झाँक सकते ही नहीं। अलबत्ता वे दूसरे के गिरेबां थामते बरामद होते हैं। यही इस बार भी देखने मिला। अमेरीका, इंग्लैंड हो  या ब्राजील या कि भारत सभी दूर के साहिब-ए-मसनद लोगों   का हाल हुआ कक्षा में सोते पकड़े गये मास्टरों का सा। हड़बड़ाहट में आँय बाँय शाँय, जो मुँह में आये वो बोलने लग पड़े ऊँनींदे राजनेता।

कोई एन्टीसेप्टीक पीने की सलाह देने लगा, कोई हाईड्रोक्लोरोक्वीन खाने की। किसी ने इसे चीन का षड़यंत्र बताया, किसी ने वैज्ञानिकों-दवा कारोबारियों का फ़रेब। कोई कोरोना-विषाणु के अस्तीत्व को ही नकारने में मशगूल दिखा, तो कोई मामूली रोग साबित करने की ग़रज़ से कोरोना-रोगियों से हाथ मिलाते हुए तस्वीरें खींचवाने में। भारत के प्रधानमंत्री भी पीछे नहीं रहे। उनने भी लपक कर तस्वीरें शाए करवायीं। कभी मुँह पर दुपट्टा लपेटने की तरक़ीब बताते, कभी सैनिक अस्पताल में तन के बैठे सिपाहियों से बतियाते तो कभी अपने घर-आँगन में मोरों को दाना चुगाते हुए उनकी छवियाँ दुनिया को दिखलायी गयीं।

ख़ुदपसंदी में मुब्तला हज़रात उन इलाकों में भी घुस पड़े  जिनके बारे में इनको क़तई भी मालूमात न थी। गोया माँ के पेट से ही सब सीख आए हों। इनमें सरेफे़हरिस्त हैं सियासी लोग। जो रातों-रात कोरोना विशेषज्ञ बन बैठे। उनने अपनी अवधारणा से साबिका रखने वाले वैज्ञानिकों, चिकित्सकों,  अफ़सरों,  को साथ लिया। इतर सोच वालों की खिल्ली उड़ायी, परोक्ष में धकेल दिया। नज़र रखने     वाले  नज़रें बिछाते बरामद हुए। जी हुज़ूरी के इस अनुष्ठान में विज्ञान, विमर्श, विचार, विरोध नामक जीव जिबह किये गये।

बात मध्यप्रदेश या इंदौर की करुँ, जहाँ के हस्पताल में हमारे डोकरे मियाँ भर्ती हैं, तो देखने मिलेगा कि एक विचारधारा विशेष से जुड़े अफ़सर और चिकित्सक ही मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधीशों के सलाहकार नियुक्त थे। ज्ञातव्य है कि इन शुरुआती दिनों में भी कोरोना का संक्रमण-रोग होना जगजाहिर था। साफ़ था कोरोना संक्रमित से संसर्ग रोके बिन यह महामारी नियंत्रित होने की नहीं। मालूम था कि संक्रमित की श्वास का आरोहण कर, विषाणु क़रीब मौज़ूद लोगों (तथा वस्तुओं) तक पहुँचता है। अलबत्ता साँस के जरिये यह कितनी दूर जाता है इस पर बहसें चल रही थीं। किन वस्तुओं      पर यह ठहरता है, कितनी देर जीवित रहता है, इस मुतअल्लिक़ मुसलसल पड़ताल जारी थी।

मतलब साफ़ है कि रोज़ आती जानकारियों को संज्ञान में ले  रोग के फैलाव पर शिकंजा कसने का काम संक्रमण-रोग नियंत्रण में निष्णान्त विशेषज्ञों के अलावा किसी पर नहीं छोड़ा जा सकता। इस पर भी, अकेले इंदौर में ही तीन मेडिकल कॉलेज होने के बावज़ूद सलाहकार समिति में न तो मेडिकल   कॉलेज के डीन थे न प्रिवेन्टीव मेडिसिन के प्रोफेसर ही। समिति में शुमार थे  ’संघ’ से साबिका रखने वाले प्रायवेट डॉक्टर व चिकित्सासंघ के नेतागण। इनके संग एक पूरा तबका जुड़ा था वाट्सएप-वीरों    और ट्वीटर-योद्धाओं का। इन सबों की प्रवृत्ति थी ध्वनि विस्तारक यंत्र की सी। इमान था साहिबे-मसनद के कहे को, फिर चाहे उसका कोई वैज्ञानिक आधार हो  न हो, आवाम तक पुरजोश पहुँचाना। उनके हर निर्णय को सुपर से भी ऊपर वाला बतलाना।

उदाहरण के लिये 22 मार्च 2020 को शाम पाँच बजे पाँच मिनिट के लिये ताली-थाली पीटने का मसला लें या पाँच अप्रेल की रात नौ बजे घर की लाईटें बन्द रख दीपक बालने या टॉर्च चमकाने की घटना याद करे लें। दोनों आयोजनों पर आखा देश बौराया दिखा। सामूहिक वातोन्माद (हिस्टीरिया) का विरल नमूना! शिक्षित-अशिक्षित, सभ्रान्त इलाक़े-पिछड़ी बस्तियाँ, अफसर-चपरासी, सेना-पुलिस, व्यापारी-भिखारी कोई अछूता न रहा। सबको मुगालता कि ताली-थाली-शंख नाद से उत्सर्जित ऊर्जा कोरोना  विषाणु को मार देगी। या कि अँधेरे में जलते दीपों से दैदीप्तमान धरती देख कोरोना की घिग्घी बँध जावेगी। वो पलायन कर लेगा। भाग कर जाएगा कहाँ, यह किसी ने नहीं सोचा।

यह मतिभ्रम औचक नहीं पैदा हुआ। सोची-समझी तकनीक से पैदा किया गया। चमत्कारों में अटूट भरोसा रखने वाली रियाया को गुनिये में लाने की तरक़ीब भिड़ा। इस ग़रज़ से प्रधानमंत्री के       गोलमोल शब्दों में किये आह्वान को ’ध्वनिविस्तारक गुट’ ने सोशल मिडिया-ठंडाई में भाँग की तरह  घोला और हर कंठ में ऊँड़ेल दिया। बाद में अपनी बात को वज़न देने के लिये भाई लोगों ने  ’शटरस्टॉक’ से एक तस्वीर उठा पाँच अप्रेल की रात 8.59 पर नासा-सेटेलाइट द्वारा खेंची भारत भूमि की छवि के रूप में चरितार्थ कर दी। रही सही कसर पूरी की ज्योतिषाचार्यों ने।

कबिलायी मानस वाले भयज़दा आवाम में भ्राँन्तियाँ दावानल से भी द्रुत गति से फैलती हैं। चुनाँचे भयभीत भारतीयों में भी फैलीं। घर-घर, गली-गली पहुँचीं। जनता को लगा कि महान् मोदी जी ने उनके हाथ रामबाण नुस्ख़ा पकड़ा दिया। कोरोना मुक्ति-ताबीज़! नतीज़ा यह कि आते कई हफ़्तों तक लोग हर शाम शंख-थाली पीटते रहे, दीप जलाते रहे। इसके बाद भी जब कोरोना थल्ले नहीं आया और लोग कसमसाने लगे तो नेतागण निर्मम निर्लज्जता से सामने आये। भाजपा के बड़े नेता, कैलाश विजयवर्गी, ने तो इसका ज़िम्मावार उनको ठहरा दिया जिनने ताली नहीं बजायी, अपने घर की बत्ती नहीं बुझायी। परिणामतः हम सरीखे हो गये स्वःघोषित मोदी विरोधी, देशद्रोही। हमारा महल्ले में निकलना मुहाल हो गया। रोज़ दुआ-सलाम करने वाले आँखें तरेरने लगे। फब्तियाँ कसने लगे।

मेरा मानना है, इन आयोजनों का प्रयोजन वह नहीं था जो करवाने वाले ने बतलाया। कहना मैं यह चाहूँ कि देशबन्दी का निर्णय लेना अगले के लिये आसान थोड़े ही रहा हो गा। शाहीनबाग़ झेल रही हुकुमत को डबका होगा कि कोरोना वास्ते लिये कड़े निर्णय कहीं नया बवाल खड़ा न कर दें। चाहती होगी वह जानना कि नागरिकता कानून विरोधी लहर के बीच कितने लोग आँख मूँद उसके साथ हैं। कालान्तर में, देशबन्दी के तरीके व असर को लेकर जब आक्षेप लगने लगे तब भी इसी तर्ज़ की मालूमात वह चाहती होगी। जनमानस की चाशनी कैसे लें, यह था तब का यक्ष प्रश्न। लक्ष्य करें कि ताली बजवायी गई देशबन्दी घोषणा के दो दिन पहले, दीपक बाले गये घोषणा के तेरह दिन पश्चात। रियाया को एकजुटता दिखाने को कहा गया। कोरोना के विरुद्ध। वाट्सएप-बहेलिये, जमीनी       नियोजक सन्नद्ध हुए अपने-अपने तरीकों से। फैलाया भ्रान्तियों का जाल। गोरैया फँस गयी। दिगभ्रमित जनता का किया सबके सामने है। नतीज़ा? विरोध बन्द, विरोधी सन्न! जुड़ा कूटनीति शास्त्र् में नूतन प्रसंग! बहरहाल इन दीगर नुक़्तों को छोड़ पकड़ता हूँ बातों का वो सिरा जो जाने कब छूट गया।

जैसा कि सर्वज्ञात है दीपक-काण्ड से कुछ दिन पूर्व, 24 मार्च, 2020 को, देशबन्दी घोषित हो  चुकी थी। हमें मुगालता दिया गया कि तब हमने अठारह दिनों में कौरव सेना को पस्त किया अब इक्कीस दिनों में हम कोरोना को हरा देंगे। इस वक्तव्य ने मुझे भीतर तक झकझोर डाला। अव्वल तो युद्ध-बिगुल फूँकने के साथ विजय-दिवस की घोषणा बड़ा बचकाना ख़याल है। और जो न भी हो तो भी महामारी से जूझने को युद्ध कहना ही भूल है। यूँ कि अनचिन्हे रोगों से लड़ने के लिये दरकार होती है ठंडे दिमाग़ सोचने की। गहन बहुस्तरीय शोधों की। इसके मुख़्तलिफ युद्ध के औज़ार हैं क्रोध, जुगुप्सा, तड़ातड़ी, हिंसा व असला। और यूँ भी कि जंग में विजयी कोई नहीं होता। मार दुतर्फा पड़ती है। हार भी। इतिहास इस बात की भी गवाही देगा कि युद्ध रियाया नहीं सत्ताएं लड़ती हैं। अपनी स्वार्थपूर्ति, अहंतुष्टि हेतु। युद्ध– इस शब्द में अंतर्भूक्त है लोगों की सोच कुंद कर उन्हें भावुकता के बवंडर में ठेलने की अशेष क्षमता। युद्ध– शब्द कान में पड़ते ही लोग उपान्तरित हो जाते हैं चूहों में। अपने त्रास भूल, निज स्पृहा तज, चल देते हैं युद्ध-बिगुल फूंकते नेता के पीछे।

देखा जावे तो बिदकते, मनानुसार कारज करते लोगों को काबू करने का कारगर उपाय है ’एलान-ए-जंग’। वही किया गया 24 मार्च को। देशबन्दी के निर्णय को जंग का जामा पहनाने वास्ते युद्ध-शब्दावलियों का जम कर प्रयोग हुआ। जैसे कि  ‘कोरानावीर’, ’कोरोनायोद्धा’, ’फ्रन्टलाइन वॉरियर’, ’कोरोना शहीद’….। जब जंग छिड़ी हो  तो जो नेता-अनुगामी वो देशभक्त। जो लीडर के कहे में नहीं, उसकी खामियाँ बताये वो एवं जो कोरोना के चपेट में आ जावे वो भी ठहरा गद्दार! ऐसों           का सामाजिक बहिष्कार लाज़िमी। ग़रजे़ कि उस सारगर्भित भाषण में जनमानस के साथ-साथ भविष्य में उठने वाले विरोधों (तथा विरोधियों) को साधने के सारे सामान समाहित थे!

ख़ैर, जब यह बात कही गयी तब दुनिया के वैज्ञानिक इस नव विषाणु की संरचना, चाल-चलन ठीक-ठीक बूझने में दिन रात एक किये थे। आदमी तब आदमी से भयज़दा था। मुँह पर मास्क बाँध, आदमी से दूर रहने के सिवा कोई हथियार नहीं था उसके कने। ऐसे में देश का प्रधानमंत्री मात्र      तीन सप्ताह में कोरोना को परास्त करने का दम भर जनता को कैसे गुमराह कर सकता है, यह     सोच मैं शर्म से गड़े जा रहा था!

इस युद्ध-घोष में मानव के दूध-धुले होने की, हर सम्भव और हर बखत धर्म सम्मत कारज करने वाला होने की अनुगूँज सुन पड़ी मुझे। सोचने लगा कि क्या यही ध्रुव सत्य है? मन नहीं माना। कि कुदरत की नज़र से देखें तो क्या उसकी सर्वोत्कृष्ट सृजना ने अपना धर्म निभाया? कि नित नूतन औज़ार गढ़ सृष्टि की अन्यान्य सृजनाओं पर पिल पड़ने वाला मानव चाहे जितनी आत्मस्तुति कर ले परन्तु कुदरत क्या उसे एक आततायी न समझती होगी? क्या उसकी निगाह में मनुष्य एक दुष्ट हिंसक पशु नहीं होगा जो धरती ही नहीं आकाश पर भी काबिज़ होने पर आमादा है। जो आमादा है कुदरत के कारोबारों को हथियाने को |

बहरहाल, बात चल रही थी तीन सप्ताह में कोरोना पर विजय पाने वाले दावे की। सो वहीं लौटता हूँ । खुर्दबीन से ताज (क्राउन) की तरह दिखने वाले कोरोना वायरस से चिकित्सा विज्ञानी नावाकिफ नहीं। वे 1968 से इस नाम से परिचित हैं। दरअस्ल यह आर.एन.ए. विषाणुओं के एक विशिष्ट परिवार का नाम है, जिसके अंतर्गत रोज़मर्रा के नज़ला जुकाम से लेकर विगत दशकों में कहर बरपा चुके अनेक बीमारियाँ हैं। यथा बर्ड-फ्लू, स्वाईन फ्लू, मिडिल ईस्ट सिवियर रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिन्ड्र¨म आदि। आर.एन.ए. विषाणुओं में महामारक इंफ्लूएन्जा वायरस भी है जिसने कभी पाँच से दस करोड़ लोगों       के प्राण हरे थे। जी हाँ मेरा इशारा 1918 के तथाकथित ’स्पेनिश फ्लू’ की ओर है। बीमारी जिसने महाकवि ’निराला’ के परिवार को लीला। और जिसके ग़िर्द स्टीफन स्वाइग ने ’लेटर फ्रॉम एन अननोन वूमन’ नामक कहानी गूँथी।

यद्यपि इस फ्लू का विषाणु कोरोना-परिवार में शुमार नहीं तथापि इसका ज़िक्र निकाला क्योंकि इन  दोनों के व्यवहार में बहुत साम्य है। ताजा शोध बताते हैं कि कोरोना के मानिंद ही ’स्पेनिश फ्लू’ विषाणु भी अन्यान्य जीवों से मानव के यहाँ आया। जैसे कोविड-19 चमगादड़ से मानव में प्रविष्ट हुआ उसी तरह ’स्पेनिश फ्लू’ विषाणु पक्षी से निकल किसी स्तनधारी से गुज़र मनुष्य तक पहुँचा था। जानकार कहते हैं कि अभी भी वनीय जीवों व जलचरों पर आश्रित कितने ही जीवाणु/विषाणु हैं जो  मानव-संज्ञान में नहीं। मनुष्य जब तक इनके हलकों से दूर है, महफूज़ है। इनसे छेड़खानी करते ही, इनके संसर्ग में आते ही आदमी पर क़हर बरपा हो  जाता है।

माना जा रहा है कि चीन के वुहान में जंगली जानवरों का बाज़ार सज़ाने का नतीज़ा आज समूचा विश्व भुगत रहा है। चमगादड़ से मानव तक बीमारी पहुँचने का अग़रचे यह पहला मामला होता तो मैं इस उड़न्तु स्तनधारी के अँधेरे गलियारे में आपको नहीं खेंचता। परन्तु यह वाहिद मुआमला नहीं। यह प्राणी पूर्व में भी हमारे यहाँ सेंध मार चुका। रोना है कि आदमी इतिहास को नजरअंदाज कर फक़त वक़्ती मसलहात में मशगूल रहता है। ऐसे में जो बिगड़ैल समय औचक आ घेरे तो उसे बचने के उपाय नहीं सूझते। बौराया आदमी तब फड़बाजों के से दाँव खेलने लग पड़ता है। धत् तेरे की! मैं बात करते हुए दूसरी तरफ़ निकल आया। लिहाज़ा लौटता हूँ पुनः चमगादड़-गली में।

विगत काल में निपाह विषाणु की दस्तक हम एकाधिक बार सुन चुके। पहले 1998-99 में मलेशिया व सिंगापुर में फिर 2004 में बंगलादेश तथा 2018 में भारत के केरल प्रदेश में इस रोग ने कई जानें ली। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार इस रोग का वास्ता वनों के क्षरण से है। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के चलते वहाँ निवासरत चमगादड़ (फ्लाईंग फॉक्स यानी फ्रूट बेट) भूखमरी का शिकार हो  कमजो      र हो  गये। उनके शरीर में पहले से मौजूद निपाह वायरस उन्हीं पर हावी हो  गया। भोजन तलाशते ये चिमगादड़ मानव बस्तियों में घुस आये, वहीं मरे भी। उन जीवों के तथा उनके मल-मूत्र के सम्पर्क में आने से मानव में तेजी से निपाह रोग फैला। तब भी दुनिया भर के विशेषज्ञों ने वनीय चिमगादडों के शिकार से बाज़ आने की नसीहत की थी। क्या किसी ने मानी? नहीं! तब भी पर्यावरणविदों ने वनों     की कटाई रोकने हेतु गुहारा था। क्या किसी ने अमल किया? नहीं। क्यों अमल नहीं हुआ?

दरअस्ल दुनिया पर लागू है  ‘पसे आईना कोई और सरे आईना कोई और’  वाला जुमला। वो यूँ कि असल में मानव जगत् की बागडोर राजनेताओं के बनिस्बद स्वार्थान्ध-व्यापारियों के हाथ में है। ऐसा व्यापारी आज में जीता है, कल में नहीं। उसका वास्ता धन से होता है, धरा से नहीं। सत्यनिष्ठ, तथ्यपरक बातों को वो प्रलाप करार दे झुठला देता है, चुटकियों में। सच है कि स्वार्थान्ध तथा अपने पर विमुग्ध मनुष्य के कर्णरिन्ध्र सुनते हैं छान कर, उसके चक्षु देखते हैं छाँट कर। अपने कहे व अपने सोचे के सिवा उसके यहाँ सब बेमानी। ऐसे मानस वाला मनक जो सत्तारूढ़ हो  तो चढ़ जाता है करेले      पर नीम। फिलवक़्त जारी कोरोना-काल में सत्ताधीशों का बर्ताव मेरे इस कथन को गाढ़े रंग से रेखान्कित कर रहा है।

ग़ौर किया जाये कि कोरोना प्रजाति के मुतअल्लिक अपने पूर्वानुभवों के चलते और ’स्पेनिशफ्लू’  विषाणु के चरित्राध्ययन के मद्देनज़र मेरे जैसे शोधकर्मी तब भी जान रहे थे कि कोरोना-19 कहीं जाने का नहीं। कि दीगर आर.एन.ए. विषाणुओं की तरह यह भी समय के साथ अपनी मारक शक्ति बदलेगा। कि ख़लाई-कायदे में फ़र्क़ की फाँक नहीं। कुदरत ने तक़सीम किया है सब में जीने का हक़ बराबरी से। विषाणुओं से मनुष्य तक। हर शै को ठीक मानव प्रजाति जित्ता। किसी को न राई बराबर अधिक, न रत्ती जित्ता कम। हर एक को हासिल बचे रहने के अपने-अपने औज़ार। जैसे विषाणुओं      को उसने अता फ़रमाई है ऐसी ताक़त जो आदमी के यहाँ नहीं। कैसी ताक़त?  इस मुद्दे पर मुझे इतमीनान से बात की इजाज़त दी जाए।

कोरोना कुनबे वाले ठहरे अधूरे गुणसूत्र वाले विषाणु। मानी इसमें होता है फ़क़त आर.एन.ए, डी.एन.ए. क़तई नहीं। ख़ुद को बचाये रखने के लिए इसे चाहिये होती है एक मेजबान (होस्ट) देह। मेजबान के डी.एन.ए. को हथियाकर ही यह अपना कुल बढ़ा सकता है, बचा रह सकता है। इसमें है ताकत चुप से किसी देह में घुस अपने को बनाये रखने की। किन्तु यहाँ कहानी में एक पेंच है। वो यह कि मेजबान, विशेषतः मानव, कोई माटी का माधव नहीं। न तो उसकी देह चुप बैठती है न दिमाग़ ही। दोनों गढ़ते हैं अपने-अपने आयुध, कोरोना मुक्ति की ग़रज़ से। आदम देह पैदा करती है एन्टीबॉडी| दवा आविष्कारित होती है दिमाग़ से । परन्तु कोरोना अपनी दैहिक संरचना बार-बार बदल मानव सिरजित आयुधों से बच निकलता है। कहे का सार यह कि जन्तु-जगत् से मानव-देस में प्रविष्ट हुआ यह विषाणु अपनी भौतिक संरचना को बार बार बदल इस नव-देस में बना रहेगा। इस सिलसिले में ग़र आदमज़ाद लाखों की संख्या में भी फ़ौत होता है तो इसका जिम्मा सिर्फ़ विषाणु पर ही नहीं, काफ़ी हद तक, आदमी पर भी होगा। कैसे?

यहाँ और भी तफ़सील से बात करने की दरकार है। इसके लिये मुझे लौटना हो गा 1918-20 ई. में, जब दुनिया ’स्पेनिश फ्लू’ की गिरफ़्त में थी। आगे बढ़ने से पहले मुझे वह दोहराने दिया जाए जो दरअस्ल सर्वविदित है। वो यह कि कोरोना-रोग कितना और कैसा विकट असर डालेगा यह रोगाणु/विषाणु की मारक शक्ति के साथ-साथ काया की रोगप्रतिरोधक क्षमता पर भी निर्भर करता है। इस तथ्य की    रौशनी में ’स्पेनिश फ्लू’  महामारी को देखने से समझ पड़ता है इससे करोड़ों के हताहत होने का कारण। वाज़ेह हो, वो काल प्रथम विश्वयुद्ध से सटा काल था। दुनिया भर में विपन्नता, भूखमरी पसरी थी। छोटे देशों में, खास कर एशिया में, मलेरिया एवं तपेदिक का बोलबाला था। इन देशों से ट्रेन भर-भर के सैनिक सीमाओं पर आ जा रहे थे। काम की तलाश में लोग जत्थों में एक से दूसरी जगह भटक रहे थे। कई स्थानों पर सैनिक तथा सामान्यजन भी हफ़्तों -महिनों से खंदकों में दुबका बैठा था। आधा पेट भोजन करके और बाज़ दफ़ा हफ़्तों-हफ़्तों बिना वर्जिश किये। कसरत-भोजन की कमी, भीड़ भरी बोगियों में आवाजाही, सँकरी खन्दकों में कै़द, ऊपर से काया को खोखला करने वाले रोग। लुब्बेलुबाब यह कि तब करोड़ों जर्जर शरीर तैयार थे फ्लू विषाणु द्वारा लील लिये जाने के लिये। हुआ भी यही। अकेले भारत में (जिसमें आज के पाकिस्तान तथा बँगलादेश भी शुमार हैं) तब एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की मौत का बायस बना यह रोग।

उस काल की तुलना 2020 से करें तो मन में चिन्ता व्यापती है। गो कि भूखमरी, कुपोषण आज भी  मौजूद हैं। काम के लिये देश-विदेश भटकना अब भी बदस्तूर जारी है। अलबत्ता उच्चकोटि चिकित्सा के चलते मलेरिया, तपेदिक अब उतने नहीं। परन्तु आलातरीन इलाज़ पद्धति, बेहतर आमदनी तथा बेक़दर आरामतलबी के बायस आज हमारे (भारत) पास दूसरे क़िस्म के रोगी भरपल्ले हैं। रोगी जिन पर कोरोना के बेजा असर सर्वाधिक हो  रहे हैं। बतौर नमूना कुछ आँकड़े पेश हैं- मधुमेह (7.25    करोड़), उच्चरक्तचाप (23 करोड़), मोटापा (34.3 करोड़)। इनमें जीवन में साठ बसन्त देख चुके 10.4   करोड़ जनों को और जोड़ लें तो गिनती पहुँचती है तक़रीबन 75 करोड़! मान लिया कि कई लोगों       को एकाधिक रोग हो  सकते हैं। इसे संज्ञान में लेने पर भी यह गिनती लाखों के दायरे में सिमटने की नहीं। ऐसे में देशबन्दी लागू कर, कर्फ़्यू लगा या लाठियाँ चमका आवाम को रोजी-रोटी कमाने से रोक उसे कुपोषण की ओर ठेलना, उसे व्यायाम से विमुख करना क्या उचित था?

ज्ञातव्य है कि तत्कालीन वैज्ञानिक, ख़ासकर ’स्वतंत्र’ वैज्ञानिक, इसके पक्षधर नहीं थे। विश्व स्वास्थ संगठन ने भी ’लॉकडाउन’ कारगर नहीं होने की बात एकाधिक बार की थी। उसी दौरान बहुप्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका ‘दी लेन्सेट’ में प्रकाशित लेख में  देशबन्दी को आज की होनी को कल पर टालने वाला क़दम बताया गया। पर क्या राजनेताओं ने सुना? नहीं। जब देश में मात्र पाँच सौ कोरोना रोगी थे तब भारत में दुनिया का सबसे लम्बा व कठोरतम ’लॉकडाउन’ लागू किया गया। लेन्सेट-लेख में प्रतिबन्ध हटते ही रोगियों की संख्या में धड़नतख़्ता इजाफ़े का क़यास लगाया गया था। जो तहरीर दर तहरीर सच साबित हुआ। आज, जब ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ , भारत में कोरोना रोगियों की गिनती सवा करोड़ पार है। डेढ़ लाख जानें जा चुकी हैं, और पिक्चर अभी शेष नहीं हुई है। सनद रहे कि ये सरकारी आँकड़े हैं। झोलदार। लम्बी चर्चा के हक़दार।

देस-दुनिया के विशेषज्ञों की सलाह ताक पर रख आख़िरकार और बिल्कुल ही ताबड़तोड़ मार्च 24, 2020 को भारत-बन्द का ऐलान हो  गया। विडम्बना देखिए कि लोकसभा में दिये बयानानुसार भारत में चार मार्च को कोरोना की आमद हो चुकी थी, और बकौल सरकार वो इसके रोक थाम में पाँच फरवरी से जुटी थी। लेकिन देशबन्दी के चार दिन पूर्व तक मैदानी तैयारी लगभग नहीं जित्ती ही थी, यह किस जागरूक नागरिक से छुपा है? सरकार की ‘युद्धस्तर की तैयारी’ की कलई लोकसभा में आयुषमंत्री के कहे से भी खुलती है। उनके कथनानुसार बीस मार्च दो हज़ार बीस तक कोविड हेतु  कोई फण्ड नहीं था। अलबत्ता वे देशवासियों को कोरोना से बचने के उपाय बताने का दम ज़रूर भरते हैं। आयुषमंत्री के अनुसार लेन्सेट  में वर्णित लक्षणों के आधार पर होमियोपेथी औषधी, आर्सेनिकम एलबम 30 सी, खाने की सलाह रियाया तक पहुँचायी जा चुकी थी।  यह सच्ची बात है जी। इसकी ज़मानत मुझसे ले लें। क्यों कि, बरास्ता इंदौर नगर निगम, ऊपर बतायी दवा की शीशी के संग काढ़े का एक पैकेट हमारे घर भी पहुँचा था। मुफ़्त। पर मेरी चिन्ता दूसरी है। बिना पुख़्ता सुबूत के किसी को दवा विशेष खाने को प्रेरित करना उचित है क्या? यह भयज़दा आवाम के भरोसे के साथ छल नहीं क्या? इसका निर्णय आप ही करें तो बेहतर।

तो मैं कह रहा था कि मार्च 24 को ज़िन्दगी थम गयी। चाभी-खुटे खिलौनों की मानिंद लोग जहाँ के तहाँ खड़े रह गये। फिर शुरू हुआ ’वन्स इन लाईफ टाईम’ अनुभवों का सिलसिला। यूँ तो लॉकडाऊन का असर सारे देश ने लिया, पर जो इंदौरियों ने भुगता उसने नाजी यातना शिविरों की तस्वीरें सामने ला पटकीं। पैंसठ के युद्ध से 2020 के दिल्ली दंगों तक न जाने कितनी उठापटक देख चुका, पर ऐसे दुर्काल से सामना अपूर्व था।

संज्ञान में लिया जावे कि जिस कालखण्ड से अपन मुख़ातिब हैं उसमें मध्यप्रदेश, खासकर इंदौर, राजनितिक तौर से अनाथ था। कमलनाथ सरकार के कई मंत्री-विधायक, प्रदेश के स्वाथ्यमंत्री तुलसीराम सिलावट सहित, गुम थे। इंदौर की स्थानीय निकाय कुछ माह पूर्व अपना कार्यकाल सम्पन्न कर घर बैठी थी। ऐसे में जब देशबन्दी हुई, और उस पर आपदा प्रबन्धन अधिनियम लागू हुआ, तब सारा प्रदेश एक तरह से जिलाधीशों के अधीन हो  गया। ऐसे में हमारे यहाँ आमद हुई एक दूजे किसम के कलेक्टर की। बेदर्द, बेक़दर, बेलगाम। जिनने आते के साथ इंदौर पर कर्फ़्यू लादा। मामूली नहीं महाविकट। महल्ले की सुनसान गली में अकेले सुबह-शाम सैर करने वालों को, अपनी ही छत पर बैठ हज़ामत बनाने वालों को भी कै़द किया जाने लगा।  ग़ैरज़रूरी चीज़ों की दुकानें बन्द हुईं सो हुईं परन्तु अब तो जीवन यापन हेतु अत्यावश्यक सामानों के लिये भी इंदौरवासी तरसने लगे। गो कि जिलाधीश साहेब ने दूध, किराना, सब्जी, फल व डॉक्टर की ‘दूकान’ तक को कर्फ़्यू में शुमार कर लिया। जनता तिलमिलाने लगी तो लॉकडाऊन से एक दिन पूर्व मुख्यमंत्री बने शिवराज ने दूध पर से प्रतिबन्ध हटाया, इस शर्त के साथ कि दिन में सिर्फ़ एकबार बन्दी का दूध वितरण होगा।  ग़नीमत है कि मुख्यमंत्री समय रहते चेते वरना कितने ही बच्चे-बूढ़े दूध की आस मन में लिये दम तोड़ देते!

एक आध हफ़्ते बाद जब हमारे घर में बस एक वक़्त का आटा और प्याज-आलू बचा था तो उनकी  नौबत क्या हुई होगी जो रोज़ कमाते खाते हैं। उन जैसों पर तो यह दुतरफ़ा मार थी। अव्वल तो कमाई के साधन ख़त्म, ऊपर से घर से राशन भी ग़ुम! पेपरबाजी हुई तब जाकर जिलाधीश महाशय ने नगर निगम की कचरा गाड़ी के मार्फ़त हफ़्ते में एक बार पाँच किलो आटा, चावल, एक किलो  तेल, चीनी, एक पाव चाय पत्ती, इतना ही दूध पावडर तथा दो किलो आलू-प्याज़ मुहैया करवाने की स्कीम निकाली। जिसे ज़मीनी जामा पहनते-पहनाते तीन सप्ताह से अधिक व्यतीत हो  गये।

इसबीच हालात ऐसे बने कि कॉलोनी के वाट्सएप ग्रुप में बक़ायदा बताया जाने लगा कि कहाँ कौन चक्कीवाला गुपचुप आटा बेच रहा है। और कौन किराना वाला शटर के पीछे बैठ माल दे रहा है। बताया तो यह भी जाता कि उन दुकानों तक पहुँचना कैसे और उनका दरवज्जा खटखटाना किस तरक़ीब से! अपने ही महल्ले की गलियों में जिलाबदर मुलजिम की तरह डरते-छुपते घूमने का यह अनुभव मैं कभी नहीं भूल सकूँगा। लाज़िमी है कि यहाँ एक सुकून दायक बात दर्ज़ करता चलूँ। वो  यह कि इस पूरे दौर में किसी दुकान वाले ने बढ़ाचढ़ा कर दाम नहीं वसूले आलावा पनवाड़ी व कलालों के। ठेकेदारों ने तो चौराहों पर दारू बेची। एम्बुलेंस में बैठ। वैसे मयकशों के लिए यह जीवनदायनी गाड़ी से कम न थी। ख़ैर !

जिस मेडिकल कॉलेज हस्पताल से मैं जुड़ा हूँ वो इंदौर के सीमावर्ती क्षेत्र में है। लिहाज़ा प्रतिदिन शहर से सोलह किलोमीटर दूर जाना मेरी दिनचर्या का हिस्सा ठहरा। यह सफ़र तय करने में जहाँ पूर्व में तीस-पैतीस मिनट खप जाते थे, वो उन दिनों पन्द्रह-सत्रह मिनट में तय हो  जाता। कर्फ़्यू के चलते रास्ते साँय-साँय जो हो  चुके थे। पर इसबीच सड़क पर फिर चहल-पहल देख माथा ठनका। सोचा जिस शहर में फिलवक़्त सिवा परिंदों के कोई आज़ाद नहीं, उसकी सड़कों पे सर पर अपने घरौंदे उठाये इतने बहुत सारे लोग कैसे? मालूम हुआ वे दिहाड़ी कामगार हैं। आज़ाद मगर बरबाद रियाया। बेगाने शहरों को छोड़ अपनी माटी को लौटते लोग। सैकड़ों जोड़ी कातर निगाहों से शहर को घूरते लोग। तपती दुपहरी में सिर पर पोटली, काँख में बचुआ उठाये हाँफती दोजीवाँ जनानियों, शाम के धुँधलके में पिता की उँगली थाम रिरियाते बच्चों को देख कई बार रुका। ग़रज़ कि उनसे कुछ बात करुँ। किन्तु वातानुकुलित कार से उतर उनका हाल पूछना मुझे निर्मम कर्म लगा। इन्सानियत का अपमान जान पड़ा। फिर जी किया कि कुछ नहीं तो दो-चार बोतल पानी की, दस-पाँच पुड़े बिस्कुट के ही दे दूँ  उनको। पर इतना सामान जुगाड़ूँ तो जुगाड़ूँ कैसे? दुकानें सब बन्द। चोरी छुपे सामान मुहैया करवाने वाले एकमुश्त इतना बहुत सारा देने को राजी नहीं। बाज़ार बन्द होने से उन पर स्टॉक सीमित था। अपने कने का माल वो देना चाहते अपने जाने-चिन्हे लोगों को। वो भी थोड़ा-थोड़ा। गोया  ’जनता कर्फ़्यू’ की तरह जनता राशनिंग लागू थी इन दुकानों पर। ख़ैर, हुआ यह कि आत्मा पर पत्थर रख घर लौटते लोगों से नज़र चुराते हस्पताल आना-जाना मेरी मज़बूरी बन गयी। अपने को जीवन में इतना हताश, इस क़दर लाचार मैंने कभी महसूस नहीं किया। ख़ुद की नज़र में इतना नीचे मैं पहले      कभी नहीं गिरा।

पूछने वाले पूछेंगे कि सरकार ने ’ऑन लाईन’ सामान वितरण का इन्तजाम तो कर ही रख्खा था। जनता ने उसका उपयोग क्यों नहीं किया ?  मेरा कहना है कि भारत में ’टेक सेवी’ या कि  उच्चवर्गीय जन ही नहीं बसते। करोड़ों हमवतन कमपढ़ हैं। करोड़ों बेसाख़्ता तंगहाली में गुज़र को मज़बूर भी। और साठ-सत्तर नौ तपा देख चुकने के बाद अकेले जीवन भुगत रहे बुजुर्ग भी तो हैं यहाँ। उनका क्या? उनमें से कितने स्मार्ट फ़ोन रख-बरत सकते हैं। जो रखते भी हों तो कितनों में  ‘बिग बाजार’ या ’रिलायन्स फ्रेश’ से एक मुश्त सामान मँगवाने का सामर्थ्य है? सच तो यह है कि नून-पानी  से रोटी खाने वाले के सपने में भी जो ’बिग बाजार’ आवे तो बापड़ा मारे डर के अगली तीन रात सो   न पावे!

एक बात और। भारत में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो न पाँच सितारा दुकानों से ख़रीदारी करते हैं, ना ही डिजिटल बाज़ार से। कोरोना काल में तो जिनने एक तरह से क़सम ही उठा ली कि वे वह पेढ़ी नहीं चढ़ने के जिसके हाथ बाज़ार सौंपने को सरकार कटिबद्ध है। फिर अंजाम चाहे जो हो । गोया उन्हें इलहाम हुआ कि  ‘आपदा में अवसर’ की आड़ से आवाम पर वह सारा थोपा जा रहा जो थोप नहीं पा रही थी सरकार, विगत् छः बरसों से। मुख़्तसर बात यह कि देशबन्दी ने आवाम को बेक़दर परेशान किया। करेले पर नीम का कारज किया अज्ञान व अज्ञात के घटाटोप ने। हवा में तिरती अफ़वाहों    ने। ओहदेदारों के गै़र ज़िम्मादाराना जुमलों ने। वैज्ञानिकों के असंयमित बर्ताव ने।

अपने अनुभव से जानता हूँ कि विचार उपजने से शोध मुक़म्मल होने तक में महीनों, बाज़ दफा बरसों खप जाते हैं। कि विज्ञान के यहाँ हबड़तान की कोई जगह नहीं। अब से पहले वैज्ञानिक अपने       शोध-परिणामों को पहले समकालीन अन्वेषकों के साथ साझा किया करते थे, मिडिया से नहीं। इस परिपाटी का समूल नाश होते देखा मैंने कोरोना-काल में। अधपके, अधकचरा शोध जो बड़े शोर शराबे के संग जनता के बीच उतारे गये, उनमें से कई तो हफ़्ते रोज़ में ही गटरों में बरामद हुए। वैज्ञानिकों की कनपटी पर सरकारों द्वारा कट्टा अड़ा कर दो से दस बरस में बनने वाली वैक्सीन को चन्द महिनों में तैयार करवाने का कारनामा (?कारस्तानी) भी हमने इसी दौर में देखा।

संकटकाल में, हालातों के मद्देनज़र, जो स्थापित मानकों में एकतरफ़ा परिवर्तन किये जाएं तो क्या उनकी ख़बर (और सच्ची ख़बर) रियाया को देना हुकुमत पर लाज़िम नहीं? पर क्या कोविड-टीकों     के बाबत हम तक ऐसी कोई जानकारी पहुँची? दिखाया यूँ  जा रहा कि सरकारें जन-स्वास्थ्य को ले        कर चिन्तित हैं। उनके हित में शोध में रोड़ा डालने वाली नियंत्रक व पर्यवेक्षण संस्थानों पर नकेल कसी जा रही है। जो  दवा/वेक्सीन पहले बरसों में बन पाती थी, उन्हें चुटकियों में बनवाया जा रहा। इस दाब के चलते हुई रिसर्च-एथिक्स में हुई कोताही की एक झलक देना ज़रूरी है।

कहा जा चुका कि टीकों को बनने और सामान्यजन तक पहुँचने में पहले दो से दस बरस खप जाते थे। इसलिये नहीं कि तब अन्वेषक आलसी थे या कि वे मनुष्य की स्वास्थ्य-आवश्यकताओं के प्रति चैतन्य न थे । दरअस्ल, उनकी चैतन्यता ही विलम्ब का कारण थी। अनुसंधान प्रक्रिया का अनुपालन करना वे अपनी नैतिक जिम्मेवारी जानते थे। प्रक्रिया जो बढ़ती है विभिन्न चरणों से हो  कर। शोध पर लाज़िम था हर पायदान पर कामयाब होना। पर्यवेक्षकों की दृष्टि में सौ टन्च खरा उतरना।

वेक्सीन सम्बन्धित शोध का प्रथम पायदान है समीचीन रोग का एक प्रादर्श (मॉडल) जीव तैयार करना। प्रादर्श जीव जिसमें शोधाधीन रोग के, हूबहू मानवों के से, लक्षण व दुःष्प्रभाव पैदा किये जा सकें। आदर्श शोधों में, ऐसे जीव पर ही तमाम शुरुआती परीक्षण किये जाते हैं। टीके के असरों का पता इसी स्तर पर हो  जाता है। विशेषकर अस्वीकारणीय असरों का। आज दिन तक, जबकि हम रूबरू हैं, वैज्ञानिकों के पास ऐसा कोई प्रादर्श जीव नहीं जिसमें मानव-कोविड-19 रोग के से लक्षण हूबहू पैदा किये जा सके हों।  समय माँगता है यह काम। समय ही तो न था हाथ में। हायतौबा मची थी तब। चुनाँचे, मानव परीक्षण पूर्व लाज़िम इस चरण में, समय बचाने की ग़रज़ से ढील दी गयी।

सटीक जीव-मॉडल की अनुपस्तिथि में जब कोरोना-19 टीकों पर काम आरम्भ हुआ तब कोविड सम्बन्धित बहुत से महीन नुक़्तों की सटीक जानकारी वैज्ञानिकों पर नहीं थी। नुक़्ते जिनका इल्म कारगर टीका बनाने वास्ते क़तई ज़रूरी। जैसे कोरोना किस तरह से आदमी पर काबू करता है, उसकी देह का कौन सा हिस्सा साधने से विषाणु पंगु हो  सकता आदि। ये जानकारियाँ अभी जुट ही रहीं थीं कि कई तरह के टीकों पर एक साथ काम आरम्भ हुआ। लब्धप्रतिष्ठ पत्रिका  ’सेल’ में अप्रेल 16, 2020 को प्रकाशित शोधपत्र में बताया गया कोरोना के मानव शरीर में प्रविष्ट होने का तौर-तरीका।  सितंबर, 2020 तक तो टीका-संधान में आने वाली सम्भावित अड़चनों पर चर्चा चल रही थी।  जबकि अप्रेल 2020 में ही टीकों पर प्रथम/द्वितीय चरण के ट्रायल आरम्भ हो  चुके थे।

वैसे इसमें कुछ बुरा भी नहीं। जब सूझ न पड़े तो अँधरे में तीर चलाना पड़ता है। पर यहाँ एक दुबिधा भी है। कि इतर टीकों के चाहे-अनचाहे असर भी दीग़र होते हैं। उनसे हासिल रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) का जोर व जीवनकाल फर्क़ होता है। इन बातों की मुक़म्मल ख़बर मिलती है टीका-परीक्षण के तीसरे चरण में। जो पूर्व में कम से कम दो बरस जारी रहता। अमरिका ने इसे फ़क़त दो  माह पर ला पटका।

यहाँ हमें ठहरना होगा। ताकि टीकों के असर की प्रविधि बूझी जा सके। मानव शरीर जो दिखता तो इकाई है पर यथार्थतः यह है एक एकीकृत-टॉउनशिप। इतर व्यवस्थाओं का समन्वयन। जिनमें शुमार है शरीर की रोग निवारण व्यवस्था- इम्यूनिटी सिस्टम। थायमस ग्रंथि (टी-सेल्स) व रक्त-मज्ज़ा (बी-सेल्स) आधारित सिस्टम। इन्हीं के चलते, टीकाकरण बाद, हमारी देह में दो तरह की इम्यूनिटी उपजती है। पहली टी-सेल्स के चलते, दूजी बी-सेल्स के। टी-सेल की कमायी (एन्टीबाडी आधारित) प्रतिरोधक क्षमता अल्पकालिक होती है। जबकि बी-सेल अवलम्बित (रोग-स्मृति आधारित) लम्बे समय तक रहती है। बाज़दफा ताउम्र। फ़िलहाल कोविड-19 की बी-सेल आधारित इम्यूनिटी अज्ञात है। कितनी  मात्रा में एन्टीबाडी होना कोरोना से बचने हेतु दरकार, यह भी फ़िलवक़्त नामालूम। चुनाँचे हमें यह नहीं पता कि इन टीकों का असर कितना होगा व कितने दिन रहेगा।

अपनी बातचीत वहाँ आ पहुँची है जब हमें दो शब्दों के वैज्ञानिक अर्थ भलीभाँति बूझ लेना चाहिए। शब्द हैं ’इफिकेसी’ और’इफेक्टीवनेस’। विज्ञान की नज़र में वेक्सीन की ’इफिकेसी’ और’इफेक्टीवनेस’ के मायने अलहदा होते हैं। इफिकेसी परिक्षण होता है प्रयोगशाला तथा क्लीनिकल ट्रायल के प्रथम दो  चरणों में। इसके मानक हैं टीकाकरण उपरान्त हो ने वाले अवान्छित असर तथा बनने वाली एन्टीबॉडी की मात्रा व गुणवत्ता। गुणवत्ता यानी एन्टीबॉडी की विषाणु से जुड़ उसकी मारक क्षमता को छिजाने की क्षमता।

यहाँ फिर एक पेंच है। वो यह कि इन मानकों पर खरा उतरना वेक्सीन के इफेक्टीव होने, यानी प्रयोग परिस्थितियों के बाहर रोग के बहुस्तरीय नियंत्रण में कारगर होने, की जमानत नहीं। इफेक्टीवनेस की ख़बर मिलती है ट्रायल के तीसरे-चौथे चरणों में। जब देखा जाता है कि टीकाकरण बाद समाजिक स्तर पर रोग का फैलाव थमा कि नहीं? कि वास्तविक दुनिया में टीका लेने वाला रोग-संक्रमण से बच पाया या नहीं? और यह भी कि जिस रोग से बचने वास्ते जो टीका इज़ाद हुआ वो उसी रोग को बढ़ावा तो नहीं देता? जैसा कि खसरा व इंफ्लूएन्जा हेतु आरम्भिक टीकाकरण के दौरान देखा गया था। विडम्बना देखिये कि इस आलमे बेख़बरी के बीच ही टीका बनाने वालों द्वारा साझा ’इफिकेसी’ के आँकड़े हम तक वेक्सीन के ’इफेक्टीव’ होने के प्रमाण की मानिंद पहुँचाये जाने लगे।  वो भी आसमां तले हर बशर के फ़ौरन टीकाकरण को महामारी नियंत्रण का एकमेव उपाय जतलाते हुए। हालाँकि नामचीन विषाणु-विशेषज्ञ चलती महामारी के बीच एकमुश्त टीकाकरण उचित नहीं जानते। उनके अनुसार इससे वायरस और भी प्रबल रूप में प्रकट होने का धड़का है। उसके अधिक तेज़ी से फैलने का ख़तरा है।

कहना मैं यह चाहूँ कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी हमें टीकों के अनचाहे असर की पूरी ख़बर है, न मनचाहे की। ऐसे में दवा कम्पनियों की मंशा पर शुबह कुफ़्र है क्या? सनद रहे सो कहता हूँ    कि नवम्बर 2020 तक टीका-शोध के तीसरे चरण को कम से कम एक बरस जारी रखने की चर्चा थी। आठ दिसम्बर 2020 को टीकों बाबत अंतरिम नतीजे़ शाए हुए, जिसे सात जनवरी 2021 को सुधारा गया। और मजे़ की बात देखिये कि सोलह जनवरी 2021 से भारत में भी टीकरण आरम्भ होने की चर्चा है। सवाल किया जाना चाहिए कि इतने कम समय में इतनी बहुत सी मात्रा में वेक्सीन कैसे बन गयी? बनी बात है कि मुट्ठी भर लोगों पर हुए प्रथम चरण के परिक्षणों के फ़ौरन बाद ही युद्धस्तर पर टीका-निर्माण आरम्भ हो  चुका था। यानी, टीकों के तमाम असर अब नमूदार होंगे दवा जनता में जाने के बाद ही।

महाविद्यालयों में बतायी जाती है भावी चिकित्सकों को नैतिक जिम्मावारी। कि मरीज़ तक दवा तब ही पहुँचे जब उसके लाभ अवगुणों से ऊपर हों। ख़ूब ऊपर। जो गाहे-ब-गाहे इम्तिहान पास करने के पहले      दवा देनी ही पड़े तो मरीज़ से अनुमति ली जावे। पुख़्ता ख़बर नहीं होना उसके संज्ञान में हो। क्या इस नैतिक जिम्मावारी का निर्वहन होगा?

राजनितिक अभिष्टपूर्ति हेतु शोधकर्ताओं को तमाम ज़रूरी सावधानियों और स्थापित मानकों को अपने हाथों छिजाते देख मैं बतौर विज्ञान अभ्यार्थी आश्चर्यित हूँ। आशंकित भी। कि केदारनाथ जलजला तथा चेर्नोबिल परमाणु काण्ड गवाह हैं- वैज्ञानिक गणनाएं फुस्सी निकलने के। हरितक्रान्ति के एवज़ में कैन्सर-प्रताड़ना झेलते पंजाब की गवाही है कि तक़नीकें असफ़ल हो  सकती हैं। कि दूरंदेश इंसान भी दरअस्ल बहुत दूर देख नहीं पाता। चाह कर भी नहीं। कि कुदरत-व्यापार के बरअक़्स हर बीनाई सीमित जो ठहरी। परन्तु वैज्ञानिक ओन हड़बड़ी में हैं। ऐसी तकनीकों से टीके बना रहे जो कभी जाँची गयीं, न परखी। सोचता हूँ तड़ातड़ी में गढ़े इन टीकों के दूरगामी बेज़ा असर हुए तो क्या होगा?  इन असरों की ख़बर कब, किसे और कैसे मिल सकेगी? अकूत धन के संग एकाधिक हुक़्मरानों की साख भी दाँव पर है। ऊपर से आज बाध्य हैं नज़र रखने वाले संस्थान ही नज़रों पर पट्टी बाँधने को। ऐसे में वेक्सीन के बेज़ा असरों को दबाया-दबोचा नहीं जावेगा, यह भरोसा कैसे हो?

क्या अचरज कि जनता वैज्ञानिक शोधों पर शक़ करने लगी है, कहीं-कहीं इनकी खिल्ली उड़ते भी देखी है मैंने पिछले दिनों। सोशल मिडिया का कमाल है कि आज राजनेता से पनसारी तक हर कोई कोरोना का शर्तिया इलाज और मुकम्मल एहतियात बताता बरामद होता है। गोबर, गो-मूत्र से लेकर कबूतर की ज़ुबान तक, तंत्र संधान से मदिरापान तक लोगों को बतौर दवा स्वीकार्य है। विज्ञान पर ऐसा अविश्वास मुझे पहले कभी नहीं देखने मिला। लेकिन इसके पहले कि गुफ़्तगू इस मसले के सिम्त जावे क्यों न वो बात मुकम्मल कर लें जो अधर में लटकी पड़ी है। मेरा इशारा अफवाहों, भ्रान्तियों की ओर है।

ऊहापोह व अनिश्चितता से भरे कोरोना-काल में इतनी बदगुमानियाँ बोई, काटी और परोसी गयीं कि बड़े-बड़े पढ़े लिखे सूरमा भी गच्चा खा गये। बदगुमानियाँ जिसका ख़मियाजा आवाम ने भुगता और इस क़दर भुगता कि आते कई दशकों तक उसके दिए घाव तराड़े मारते रहेंगे। सभी ऊहापोहों पर तो चर्चा सम्भव नहीं। इसलिए मैं उन चन्द ग़लत फ़हमियों पर आता हूँ जिनने मेरे जाने सबसे गहरे घाव दिए। जैसे कि इस विषाणु के फैलने की प्रक्रिया को लेकर संशय।

कोरोना-काल के आरम्भिक दिनों में ही वैज्ञानिक कोरोना-विषाणु का  ’एरोसोल’ मार्फ़त फैलना बता चुके थे। एरोसोल यानी बोलते/खाँसते समय मुँह से निकला थूक मिश्रित हवा का भभका। यह भी कहा जा चुका था कि इस भभके के संग निकला कोरोना वायरस कुछ दूरी तय करने बाद ज़मीन पर गिर जाता है। कि वज़नी कोरोना-विषाणु हवा में दूर/देर तक तैरता नहीं रह सकता। खुली हवा में तो क़तई भी नहीं।

समीचीन महामारी के आरम्भिक दिनों में एक बहुनाम मेडिकल जर्नल (एन.इ.जे.एम.) में कोरोना के एरोसोल तथा विभिन्न सतहों पर ठहराव को लेकर एक शोध प्रकाशित हुआ। इसी लेख का हवाला दे प्रचार तंत्र ने चरितार्थ कर दिया कि समीचीन विषाणु हवा में तीन घण्टे ’तैरता’ रहता है और ’वस्तुओं’ की सतह पर बहत्तर घण्टे तक जीवित रह सकता है। ब्रेकिन्ग न्यूज देने/पाने की आपाधापी में न वे बता पाये ना लोग ही समझ सके कि ये शोध-परिणाम प्रयोग की नियंत्रित अवस्था का नतीज़ा हैं। कोई शोधपर्चे के सप्लीमेन्ट्री मटेरियल को देखता तो जानता कि एरोसोल पैदा करने के लिए एक बन्द ड्रम काम में लिया गया था (गोल्डबर्ग ड्रम), आद्रता 60%, व तापमान 21-23 से. रख्खा गया था। गरज़े कि प्रयोगशाला के बाहर, असल दुनिया में, जहाँ हवा के बहाव, आद्रता किंवा तापमान में निरंतर बदलाव होते हैं, ये शोध परिणाम अक्षरशः खरे नहीं उतरेंगे।

मेरी बात को पुष्ट करते कई शोध हैं। इनमें से अधिकतर को अस्पतालों के उन हिस्सों में जहाँ प्राकृतिक हवा प्रवाह अक्षुण्ण था, न के बराबर संक्रमण मिला। मानी यह कि जहाँ पवन निर्बाधा बहता हो वहाँ कोरोना-19  मौज़ूद होने व जीवित रहने के पुख़्ता प्रमाण नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी बारम्बार दोहराया कि पार्सल, खाने-पीने की वस्तुओं पर इस विषाणु के होने सम्भावना नगण्य है। पर इन खुलासों का कोई असर दुनिया ने नहीं लिया। ’वाट्सएप विश्वविद्यालय’ तमाम शोधों पर भारी साबित हुआ और विश्व सामुहिक पागलपन का शिकार हो  गया।

जैसे कि इंदौर तथा नीमच के कलेक्टर महोदय। पहले को शाक-भाजी-फलों पर कोरोना लिपटे होने पर इतना प्रबल पक्का भरोसा था कि इनकी ख़रीद-फ़रोख़्त को सज़ा योग्य जुर्म घोषित कर दिया गया। सैकड़ों टन सब्जी फल, यहाँ तक कि किसानों/व्यापारियों के गोदामों में धरा माल भी जप्त कर ज़मीदोज़ किया गया। नीमच जिले के मनासा गाँव में, जहाँ से मैं आता हूँ, लॉकडाउन होते के साथ ही,  दुकानों में रखी खाद्य वस्तुएं गटर में फेंकी गयीं या ट्रेक्टरों में भर गाँव के बाहर मिट्टी के नीचे दबा दी गयीं। यह सब तब हुआ जब देश में असंख्य लोग रीते पेट सो  रहे थे, सड़कों पर चल रहे थे।

हवा में वायरस उड़ते रहने के भ्रम ने भी रियाया को बहुत दिग किया। यूँ कि उनसे (जिनमें चिकित्सक भी शुमार थे) ऐरोसोल के मायने बूझने में गफ़लत हुई। सबों ने इसे ’एयर’ मान लिया। नतीज़न हवा में विषाणुनाशक उड़ाया जाने लगा। प्रशासन ने सड़कों, पेड़ों, गाड़ियों और राह चलते आदमियों को भी ’सेनिटाइज’ करवा डाला। डर इस कदर तारी था कि हमारे महल्ले के कई लोग    दो-ढाई माह तक न आँगन में आये न छत पर ही चढ़े। बाज़ लोग खिड़की-दरवाजे खोलने से बचते दिखे। कईयों को तो मैंने घर के भीतर भी मास्क पहने देखा।

बतौर बानगी एक क़िस्सा पेश है। टहलने की मंशा से मैं एक शाम घर से बाहर निकला। अभी मैं कुछ दूर ही गया होऊँगा कि एक छत से किसी ने गुहारा-

’अरे आप घर से बाहर क्यों आए?’

’क्यों क्या हो गया? ’

’अरे क्यों रिस्क ले रहे हैं डाकसाब?’

‘रिस्क? कैसी रिस्क? पुलिस की, घूमते पकड़े जाने की?’

‘नहीं जी, कोरोना की।  मालूम नहीं आपको कि आपकी गली में कोरोना है?’

’ऐं! गली में कोरोना कैसे होगा भाई साब, ग़र होगा तो किसी आदमी में ही होगा’

’वही तो बता रहा हूँ आपको | गुप्ता जी भरती हैं, कोरोना है उनको’

’कौन से गुप्ता जी?’

’अरे वही आपके सामने वाले’

गुप्ता जी, यानी वही अपने डोकरे मियाँ, जो हस्पताल में पड़े अनार की बाट जोह रहे। टहलक़दमी मुल्तवी कर मैं गुप्ता जी के घर की तरफ़ बढ़ा। उनका लड़का बाहर ही मिल गया। घबराया सा , लटका सा चेहरा। उसीने मुझे पिता संग हुआ वह वार्तालाप बताया, जिससे मैंने अपनी बात शुरू की। क्योंकि मैं रोज़दिन अस्पताल जाता था अतः लड़के ने मुझसे गुज़ारिश की, कहीं से एक अनार ला देने की। शहर में तो कहीं फल मिलने की सम्भावना नहीं, मैं उसे यह कहते कहते थम गया। देशबन्दी के पहले खरीदे अनारों का हमारे फ्रिज में धरे होने का मुझे ध्यान जो आ चुका था। फ़ौरन ही वे अनार गुप्ता जी के लिये दे दिए गये। भला हुआ कि मेरी उस लड़के से भेंट हो  गयी। भला यह भी हुआ कि घर पर उनका मनचाहा फल था। नहीं तो बेचारे डोकरे मियाँ की अनार खाने की अंतिम इच्छा कभी पूरी नहीं हो ती।

इस हौलनाक़ माहौल के चलते आपका यह मित्र कई दिनों तक एकतरह से अवसादग्रत रहा। सोचता रहता कि क्या किया जाये ताकि लोग भयमुक्त हों। बीमार फल के लिए न तरसें। लोग मुफ़ीद      मौकों पर मास्क पहनें, भीड़ से दूर रहें । बाहरी सम्पर्क उपरान्त हाथ तो साफ़ करें किन्तु सब्जियाँ साबुन से न धोएं। लोग चैतन्य रहें परन्तु घर की छत पर मास्क पहन न घूमें। कि वे अपने घर को, जहाँ पिछले कई दिनों से कोई बाहरी मनक नहीं घुसा हो, दिन में तीन बार सेनिटाइज करने के पागलपन से छुटकारा पायें।

जानने वालों को फ़ोन किये। घर परिवार वालों से सम्पर्क साध विज्ञान सम्मत तथ्य बताये। पर नतीज़ा सिफ़र। सुनते के साथ ही अगला किसी ’फेक’ ख़बर की लिंक भेज देता। महाविचित्र दौर था वह (जो कमोबेश अब भी जारी है) जिसमें आदमी एक चिकित्सक की, अपने सखा की, बातों को दरकिनार कर ’वाट्सएप’ ख़बरों पर भरोसा कर रहा था।

मसलन मास्क ही को लें। विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार कह रहा था कि इस रोग से बचने का कारगर उपाय है  मास्क– ’एन-95 मास्क’ । जो यह न हो  तो तीन तहों वाला ’सर्जिकल’ मास्क भी चलेगा, कम से कम सामान्य लोगों के लिये। पर करोड़ों-करोड़ लोगों वास्ते एकदम से इतने एन-95 मुहैया करवाना किसी सरकार के बस का नहीं था। चुनाँचे अमरिका से लेकर भारत तक की सरकारों    ने विशेषज्ञों के मार्फ़त तीन वर्ता सूती-मास्क प्रयोग करने की अपील करवाई। इसे कोरोना बचाव में कारगर बतलवाया। भारत में तो मास्क की परिभाषा बक़ायदा बदली गयी। रुमाल, गमछा, दुपट्टा, साड़ी का पल्ला तक ’मेडिकल मास्क’ समतुल्य हो  गया। घर-घर पर मास्क बनने लगे। मुफ़्त मास्क बाँटने वालों की तस्वीरें शाए हो ने लगीं। वो भी तब जब शोध-नतीज़े सूती मास्क को ख़तरनाक़ बता रहे थे। यूँ कि इन्हें पहन लोग सुरक्षित होने का मुगालता पाल लेते। दैहिक दूरी रखने के नियम की अनदेखी करते।

सूती मास्क पहने जब चिकित्सक भी दिखने लगे, तो मेरा माथा ठनका। लगा कि मास्क में हो  रही कोताही कोरोना के धड़नतख्ता फैलने का एक कारण है। ख़ासतौर पर भारत में। मैंने भी जानने वालों से बात की, समझाया। सिर्फ़ विज्ञान सम्मत मास्क ही पहनने की अपील की। हश्र क्या हुआ, बताऊँ आपको? लोग सूती मास्क पहने, दुपट्टा मुँह पर लपेटे भारत देश के प्रधानमंत्री के चित्र भेजने लग पड़े। मेरी अपील को राजनितिक चश्मे से देखा जाने लगा। दूसरों की तो छोड़िये मेरे अपने घर वाले      मुझसे बिदकने लगे। दुःख है कि इनमें मेरे माता पिता भी शुमार थे। उनकी नज़र में मैं मोदी विरोधी जो था।  पिता जी ने तो मुझे नेस्तोनाबूद करने की धमकी तक दे डाली। कहने लगे कि फेसबुक पर लिख देंगे कि मैं एक घटिया लेखक हूँ, मेरी किताबें कोई ना पढ़े! फेसबुक से याद आया, उस दौर में मैंने इसी सोशल साईट पर सब्जी-कोरोना सम्बन्ध लेकर कुछ लिखा तो मोदीदाँ मुझ पर पिल पड़े। जिसने मुझे प्रेरित किया फल-सब्जी को लेकर एक अनुसंधान की ओर। बिल्कुल उन परिस्थितियों की निर्मिति करते हुए शोध करने की ओर जिनमें सब्जी खरीदी बेची जाती है।

उतरती मई (2020) में प्रयोग किया गया। जिसमें दस कोरोना-पॉजिटीव मरीजों में से प्रत्येक को फल-सब्जी से भरी एक-एक ट्रे दी गयी। उनसे सब्जीवाला होने की कल्पना करने को कहा गया। और यह भी कहा गया कि आधे घण्टे तक वे जैसा चाहें वैसा, जितना बुरा चाहें उतना बुरा बर्ताव ट्रे में धरे सामान के संग करें। सबों ने वैसा किया भी। लगभग सभी ने सामान पर क़रीब से खाँसा, किसी ने उन पर थूक लहेसा, किसी ने जुबान फेरी। तदन्तर,  ट्रे को एक घण्टे खुली हवा में रखने के बाद फल- सब्जी की सतह से नमूना उठा आर.टी.पीसीआर टेस्ट करवाया गया। सारी प्रक्रिया में सम्पूर्ण गोपनीयता बरती गयी। और तो और लैब वालों को भी हमारे प्रयोग की ख़बर नहीं थी। नतीजों से हमारे पूर्वानुमान की खात्री हुई। किसी भी फल/सब्जी पर से कोरोना-19 बरामद नहीं हुआ।

लॉकडाउन में एक काम और हुआ जिसने पहले से कमज़ोर भारतीय स्वास्थ्य सेवा की बखिया बिखेर दी। आपदा प्रबन्धन कानून लागू होते ही तमाम चिकित्सकीय सेवाएं सरकार ने जिलाधीशों के सुपुर्द कर दीं। भाई लोगों के हाथ उस्तरा क्या आया वे आँख मूँद उसे हर दिशा में चलाने में जुट गये। इसी के चलते कलेक्टर इंदौर प्रायवेट क्लिनिक बन्द करवा सका। इसी बीच, सात अप्रेल’20 को केन्द्र द्वारा अस्पतालों में बाह्य रोगी सेवा (ओ.पी.डी.) प्रतिबन्धित कर रोज़मर्रा की बीमारियों का इलाज रोका जा चुका था। साथ ही जिलाधीशों को आदेशित किया गया कि वे अपने जिले के अस्पतालों को रेड, येलो,  ग्रीन के हिसाब से बाँटे। रेड सिर्फ़ कोरोना पॉजिटीव रोगियों के लिये, येलो कोरोना सस्पेक्ट वास्ते एवं  ग्रीन अन्य रोगियों हेतु।

इंदौर में इस आदेश को अचम्भित करने वाले ढंग से लागू किया गया। पहले तो कलेक्टर ने तमाम बड़े हस्पतालों को अधिग्रहित किया, छोटे शिफ़ाख़ाने बंद करवा दिए। फिर किया गया रुग्णालयों का वर्गीकरण। ‘लाल’ के रूप में चिह्नित चिकित्सालयों की तो जैसे शामत आ गयी। इसलिये नहीं कि वे कोरोना इलाज से बचना चाहते थे, बल्कि इसलिये कि उन्हें रातों रात अपने यहाँ पहले से भर्ती रोगियों की छुटटी करने अथवा ग्रीन अस्पताल में भेजने के आदेश मिले थे । ज्ञातव्य है कि ’रेड’ के रूप में कायान्तरित होने वाले प्रमुखतयः प्रायवेट मेडिकल कॉलेज से जुड़े दो हस्पताल थे। जिनकी साझा बिस्तर ज्ञमता दो हज़ार से बढ़ती हुई थी। समस्या थी कि इतने बहुत से मरीज़ों को रातों रात भेजे भी कहाँ और कैसे? न मालूम ऐसा कैसे और क्यूँकर हुआ कि शहर के कारपोरेट अस्पताल पूरे कोरोना काल में या तो ग्रीन रहे किंवा येलो । मेडिकल कॉलेज़ में इलाज का बहुत कम ख़र्च भी जो लोग बमुश्किल वहन कर सकते हैं, वे महँगे ग्रीन चिकित्सालय में कैसे इलाज करवा सकेंगे, यह खयाल किसी को नहीं आया। परिणाम स्वरूप सैकड़ों लोग चिकित्सा अधबीच में छोड़ घर जाने को मजबूर हुए।

अस्पताल के वर्गीकरण के साथ एक नियम था, जिसने कोरोना से जूझते रोगी व उसके परिवार को बड़ा त्रास ही नहीं दिया आम आदमी को दब्बू बना देने की सीमा तक भयभीत किया। वो नियम था परिजन को रोगी के पास तो छोड़िये जहाँ वह भर्ती है उस अस्पताल में फटकने तक की मनाही। यहाँ तक कि मृत्यु होने की दशा में मृतक की देह सीधे मसान/क़ब्रिस्तान भेजी जाती। अक़्सर परिजन दूर से ही दिवंगत का मुख देख पाते। इस कायदे ने जनमानस पर गहरा असर डाला। लोग डर गये। हस्पताल जाने से कतराने लगे। भय तब और गहराया जब दिवंगत की मिट्टी ख़राब होने की खबरें आयीं। रुग्णालयों के मुर्दागृहों में पड़े शवों को चूहों द्वारा कुतरे जाने की ख़बरें। जनता को भीतर तक हिला देने वाला एक नियम और भी था, पृथकीकरण (क्वारेन्टाइन) का नियम। मेरे जाने ऐसे अनेक लोग हैं जिनने कोविड के लक्षण होने पर, और बारम्बार चेताने पर, भी जाँच नहीं करवायी। कि उन्हें पृथकनिवास (क्वारेन्टाइन सेन्टर) में दो-तीन सप्ताह के लिये बन्द कर दिया जावेगा।

सवाल उठता है कि जनता में पृथकनिवास के प्रति गहरा विकर्षण था तो क्यों था? जबकि सब जान रहे थे कि सम्भावित संक्रमित के सम्पर्क में आना भारी पड़ सकता है। और यह भी कि संक्रमित व उसके संसर्ग में आये लोगों को आमजन से अलग करना महामारी नियंत्रण में बड़ा महत्व रखता है। बावज़ूद इसके क्यों पृथकनिवास का नाम सुन लोग घिघियाने लगते? क्यों ये सेन्टर उन्हें यातना शिविरों के से जान पड़ते ? इन सवालातों के हल के लिये ज़रूरी है क्वारेन्टाइन सेन्टरों को जरा क़रीब से, थोड़ा ठहर के देखना। वैसे जो बात कहने जा रहा वो इनदिनों तो आमफ़हम है, पर ऐसी वह हरदम रहने की नहीं। यूँ कि यादों का व्यापार बेढब जो ठहरा। खासकर सामूहिक यादों या कि जनस्मृति का। जहाँ ठहरते हैं बार-बार कहे-सुने दिलख़ुश क़िस्से। दुर्काल, दुर्भिक्ष, दुर्दैव की मायूस करती कहानियाँ,  ज़रूरी कहानियाँ, बिसरा दी जाती हैं सायास। लिहाज़ा, आने वाले वक़्तों के हक़ में आज के क्वारेन्टाइन सेन्टरों का हाल दर्ज़ करने की इजाज़त मुझे दी जावे।

कहा जा चुका है कि आरम्भिक दिनों में जिम्मादार लोगों ने कोरोना को हल्के में लिया। इससे निपटने की छिटपुट पूर्व तैयारियाँ तो हुईं पर वे पुख़्ता न थीं। तदन्तर, कोरोना जब गाज़ बन टूटा तब क्वारेन्टाइन सेन्टर बनाने की सूझ पड़ी। पाठशाला, धर्मशाला, पंचायत भवन आदि को अधिग्रहित कर,  वहाँ पृथकनिवास की पाटियाँ लटका दी गयीं। अपने देखे  और भुक्तभोगियों के हवाले कह सकता हूँ    कि इंदौर ही नहीं अन्यान्य शहरों के पृथकनिवास बदइंतजामी के नमूने बन सामने आये। नर्स-डॉक्टर का ज़िक्र क्या करना जबकि बाज़ जगहों पर संडास,  ओढ़ने-बिछाने-खाने के इंतज़ामात भी तलाशे      नहीं मिलते थे।

इसबीच कोरोना रोगियों के संसर्ग में आये लोगों की संख्या इस तेज़ी से बढ़ने लगी कि ये तिलक-काढ़ू तैयारियाँ चरमरा उठीं। एक अनार सौ बीमार वाली कहावत हर ओर चरितार्थ होती दिखने लगी। दैहिक दूरी के मापदण्ड ताक पर धर छोटे-छोटे कमरों में पाँच-सात लोग रखे  गये। कई केन्द्रों पर तो दीगर घर-महल्लों से उठाए औरत-मर्दों को एक ही खोली में ठूँसा गया। एक ही संडास उपयोग करने को बाध्य किया गया। जब कमरे खाली न रहे तो लोगों को सामूहिक भवनों की छतों पर ठेला गया। जहाँ नहानघर-संडास तो होने से रहे। कोरोना के सताये कम-क़िस्मत लोग उसी चाँदनी पर हगते-मूतते और गंदगी के बीच दरी पर पड़े रात भर चाँद टुकुरते। हासिल यह कि भले-चंगे लोगों में से कई क्वारेन्टाइन सेन्टर में आने बाद या तो मानसिक संतुलन गँवा बैठे या फिर कोरोना संक्रमित हो गये। कईयों को तो वहीं इस रोग के लक्षण उभरे और वे समुचित निगरानी के अभाव में वहीं मारे भी गये।

मानसिक संतुलन गँवाने से जुड़ा एक क़िस्सा याद आ रहा है। मेरा अपना देखा, जाना क़िस्सा- उमा बाई की दास्तां। एक हम्माल की बीवी, तीस वर्षीय, उमा बाई हमारे हस्पताल में नर्सिंग अस्सिटेन्ट है। देशबन्दी के साथ ऐलान हुआ कि आवश्यक सेवाएं जारी रहेंगी, बशर्ते कि एक समय में वहाँ पचास फ़िसद लोग ही उपस्थित रहें। इस नियम का सहारा ले मालिकों ने अपने कर्मचारियों की छटनी आरम्भ की। उन्हें रातों-रात घर बैठा दिया। गाज़ उमा पर भी गिरी। मंडी बन्द होने से हम्माल आगे ही रोज़गार गँवा चुके थे। उमा के खटे से जो दो निवालों का जुगाड़ था, वो भी ख़त्म हो गया। इस बीच पति को बुख़ार आने लगा। ख़बर फैली तो सरकारी महकमे ने उसे घर से उठा पृथकवास में पटक दिया। तीन सप्ताह बाद जब घर लौटा तो वह बदला-बदला था। भयभीत, अवसादग्रस्त। रात दिन आकाश टुकुरता बैठा रहता। दो टाबर, एक बावरा पति और आलमे-फ़ाक़ाकशी– उमा टूट गयी। कुछ न सूझा तो परिवार सहित ज़हर खाने की ठान ली। शुक्र है कि तभी देशबन्दी के बीच, तमाम ज़रूरी चीजों से पहले, कलालियाँ खोल दी गयीं। उमा ने अवसर ताड़ा। गाँव की कलाली के क़रीब बैठ उबले      अण्डे व पानी-पाऊच बेचने लगी।

बनी बात है कि इस तरह की ख़बरों- किस्सों को सुन लोग पृथकनिवासों से डरते। और भयज़दा लोग घरों में ही रह इलाज लेने की जुगत जमाते। यही हुआ भी। अनगिनत लोगों ने, कोरोना जाँच करवाये बिना, घर पर ही वह इलाज लिया जो आये दिन ख़बरों में बताया जाता। पेरासिटामाल, विटामिन-सी तथा ज़िन्क। जब बात बिगड़ती तो ऑक्सीजन तथा रेमडेसिविर भी घर पर ही लिया जाता। प्रायवेट क्लिनिक बन्द होने से निठल्ले बैठे गली-महल्ले के डॉक्टर-कम्पाउन्डरों के दिन फिर गये। रेमडेसिविर के भाव आसमाँ छूने लगे। और न मालूम कितने बिना किसी सरकारी रजिस्टर में दर्ज़ हुए दुनिया से कूच भी कर गये।

पृथकनिवास के ख़ौफ को फ़क़त इंदौर तक या कम तालीमयाफ़्ता लोगों तक महदूद जानना भूल होगी। इसकी बानगी मुझे औरभी शहर/ राज्यों में देखने मिली। मिसाल के लिये देहरादून के राजीव रावत उर्फ़ सोनी का हाल हाज़िर है। पर्वतारोही सोनी को सपरिवार ऐसे लक्षण हुए जो कोरोना के ही थे। फ़ोन पर मुझसे इलाज पूछने लगा। मैंने टेस्ट करवाने को कहा, वो नकर गया। साँस की तकलीफ़ के मद्देनज़र अस्पताल जाने को कहा, वो नहीं माना। कहने लगा- ’’टेस्ट पॉजिटीव आया तो जानवरों जैसे कहीं बन्द कर देंगे।अस्पताल नहीं जाना हमें। सर, यहाँ किसी को इस बीमारी की कुछ ख़बर नहीं। हर दिन नयी बात करते हैं। मुझे लगता है कोरोना-सोरोना नाम की कोई चीज़ है ही नहीं। यह तो चायना का फैलाया डर है…. सर मैं तो घर ही पर रहूँगा… फिर जो हो सो हो…’’

सोनी का कहा प्रमाण है कि बिना सोचे-समझे दिए बयानों, अधपके शोधों के प्रसार का बेजा असर होता है। गो कि इसीके चलते लोग जागरूक होने के बनिस्बद विज्ञान व सरकारी व्यवस्थाओं से बिदकने लगे। बेतरतीब व ताबड़तोड़ प्रचार से भय कमने की जगह बढ़ता चला गया।

इन भयभीत लोगों को ग्रीन/येलो-अस्पताल मालिकों ने मेमनों की तरह बरता। विशेष कर मुसलमानों को। उनसे कहा गया कि रेड अस्पताल में मरोगे तो फूँक दिए जावोगे। जन्नत से महरूम होने का ख़तरा कौन उठाना चाहेगा भला! कहते हैं कि चुनिन्दा प्रायवेट-ग्रीन/ येलो हस्पतालों ने ऐसे लोगों का बिना कोरोना जाँच करवाये इलाज किया। जानने वाले डॉक्टरों के मार्फ़त मुझे ख़बर है कि इस ’सेवा’ के एवज में हस्पताल वालों ने लोगों से पाँच से पन्द्रह लाख रुपये तक वसूले। वो भी पेशगी। जो इतना ख़र्च वहन न कर सके उन्होंने घर के बीमार को ड्योढ़ी के भीतर ही रखा, वहीं मरते देखा। यह ख़बर आम है कि सामान्य दिनों से कहीं ज़्यादह कफ़न-दफ़न इस काल में हुए। मौंते जो कोरोना- आँकड़ों न शुमार हुईं न आगे कभी होंगी ।

कोरोना मुतअल्लिक जो भी आँकड़े सामने हैं, उन पर मुझे संदेह है। जो अस्पताल नहीं गये, किंवा जाँच बग़ैर घरों में ही ठीक हो गये, या फिर मर गये, उनको कुछ देर के लिये भूल जाएँ। अस्पतालों के स्तर पर भी आँकड़े इस तरह उठाये/दबाये जा रहे कि कोरोना पर नियंत्रण हो ने का भ्रम न टूटे। इस बात का गवाह मैं ख़ुद हूँ। इसी दर्जे़ की ख़बरें देश भर से मेरे चिकित्सक मित्रों, पूर्व विद्यार्थियों से भी मिल रही है।

इत्तफ़ाकन मेरा एक विद्यार्थी उत्तरप्रदेश में कार्यरत है। उसने बताया कि वहाँ पर जिला अधिकारी पर कम से कम टेस्ट करवाने का दाब है। मृत्यु-प्रमाण पत्र में मौत का कारण कोरोना नहीं लिखने का ’ऊपर’ से आया मौखिक आदेश डॉक्टरों को बहुत पहले ही मिल चुका। नतीज़ा यह कि उसके शहर के मसान में उनदिनों रात दिन चिताएं जलती मिलतीं। तीन लाख की आबादी वाले शहर के लिए यह   दृश्य अभूतपूर्व था। पर वो चुप रहा। अब भी छुप के ही रहना माँगता है। बापड़ा यूपी-दरीया में है। लाज़िमी है उस पर मगरमच्छ से डरना। जो हो, इस बात को तूल देना ठीक नहीं। सुनी सुनायी बातों पर क्यों दम भरना? तो कहता हूँ वो जो आप देखी हो।

कुछ माह पूर्व हमारे निष्चेतना विभाग का एक रेसिडेन्ट डॉक्टर बीमार पड़ा। उसे सौ टन्च कोरोना के लक्षण थे। चेस्ट सी.टी. स्कैन का इशारा इसी दिशा में था। अलबत्ता उसका कोरोना टेस्ट नेगेटीव आया। कोरोना की तर्ज़ पर उसका इलाज शुरू हुआ। रेमडेसिविर दी गयी। प्लाज्मा थेरेपी तक देने की योजना बनी। दुर्भाग्य से कुछ पुख़्ता कर सकने के पूर्व ही उसकी हालत बिगड़ी और बिगड़ती चली गयी। यहाँ तक कि हमने उसे खो  दिया। क्या उसने कोरोना शहीद का दर्ज़ा पाया? नहीं। क्योंकि लक्षण के आरम्भिक दिनों में हुआ उसका आर.टी.पीसीआर टेस्ट वह नेगेटीव था!

बता दूँ कि हमारे अस्पताल, अरबिंदो अस्पताल, का शुमार प्रदेश के प्रमुख कोरोना अस्पतालों में है। उस वक़्त इसके सौ प्रतिशत बिस्तरे, यानी तक़रीबन 1200, इन्ही रोगियों के लिये सुरक्षित थे । एक लम्बा दौर गुज़रा जब इनमें से 60-70 टका, बाज़दफ़ा तो सभी के सभी, बिस्तर भर जाते। मार्च ’20 से लेकर 30-12-20  तक हम आठ हज़ार आठ सौ  तिहत्तर मरीज़ों की तिमारदारी कर चुके। इनमें से तीन सौ सैंतीस मरीज़ ज़िन्दगी की जंग हारे। लेकिन इस मृत्यु-आँकड़े में लोचा है। ये वो संख्याएं हैं जो सरकार हमसे जानना चाहती है। उसका सारोकार सिर्फ़ कोरोना-पॉजिटीव तक महदूद है। वो उन मरीज़ों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहती, जिनका टेस्ट पॉजिटीव न हो । फिर भले ही उनमें इस रोग के सभी लक्षण हों। ख़ून व फेफड़े की खराबियां कोरोना के सिम्त इशारा करती हों और चाहे उनका इलाज भी तदनुसार ही हुआ हो।

जानते तो सब हैं फिर भी दोहरा दूँ कि तक़रीबन तीस प्रतिशत रोगियों में पहला आर.टी.पीसीआर टेस्ट नेगेटीव आना आम है। दूसरा टेस्ट एक सप्ताह बाद भेजा जाता है। यदि उस पर भी बात न बने, और लक्षण कोरोना के ही हों तो तीसरे हफ़्ते जाँच फिर की जाती है। यदि इस बीच मरीज़ ठीक हो कर घर चला जावे या मर जावे तो वह  ’कोरोना’ मरीज़ की फ़ेहरिस्त से बाहर ही रहेगा। इसी तर्ज़ पर कोई पॉजिटीव केस दूसरे/तीसरे हफ़्ते निगेटिव होने के बाद यदि इस रोग के दुष्प्रभाव से भी मरे, तो भी उसकी मृत्यु कोरोना-मृत्यु के खाते में नहीं चढ़ती। इसका ख़मियाजा पीछे छूट रहे परिजनों को भुगतना पड़ा है। क्योंकि उनको न कोरोना इलाज हेतु दी जाने वाली सरकारी सहायता मिल सकी ना ही कोरोना-बीमा की मुआवज़ा राशि ही।

यह तो रही उनकी बात जिनको कोरोना रोग हुआ और मुफ़्त इलाज के तमाम हल्ले-गुल्ले के बावज़ूद             न्याय-वंचित रहे। ग़ौरतलब है कि कोरोना से दीगर मर्ज़ से परेशान आदमी को बेइन्तहां कष्ट झेलना पड़ा। ग्रीन हस्पतालों में इलाज लेना हर किसी के बस का कहाँ? यह बात इंदौर पर पूरी तरह लागू जानिए। सुविधा के अभाव में एम.वाय. अस्पताल कोई चाह कर भी नहीं जा पाता। इस करके पन्द्रह सौ बिस्तर वाला यह सरकारी ग्रीन अस्पताल अमूमन पूरे लॉकडाउन में खाली सा ही रहा। हार्ट अटैक, डायलिसिस, कैन्सर आदि के रोगियों ने जो यंत्रणा भोगी उसका बयान असम्भव जानिए। इनमें न्यूरोलॉजी के उन मरीजों को भी जोड़ा जावे, जिनको ताउम्र देखरेख-दवा की दरकार होती है। अस्पताल की ओपीडी बन्द, प्रायवेट डॉक्टर घर क़ैद। तमाम नॉन-कोविड रोगी 24 मार्च को यकायक अनाथ हो गये। मेडिकली-ऑर्फेन्ड! बेचारे तार पर झूलते कपड़ों के से पीछवाड़े छूट गये। सुकून है कि प्रशासनिक दबावों /धमकियों के बीच अरबिंदो हस्पताल का न्यूरोलॉजी विभाग हम बदस्तूर चालू रख पाए। जिसके चलते कई अनूठे अनुभवों से दो-चार हो पाया।

एक अनुभव। देशबन्दी के चलते छुट्टी पर गये और दूसरे जिलों/ कस्बों में रहने वाले स्वास्थ्यकर्मी घर कै़द हो  गये। इस पर सात दिन काम के बाद हफ़्ते भर के अनिवार्य क्वारेन्टाईन का सरकारी आदेश। नतीज़न अन्य की तरह हमारा हस्पताल भी काम करने वालों की कमी से जूझ रहा था। इस सबके बाद भी हमारा वार्ड, न्युरॉलाजी वार्ड, कुछ दिनों तक ठीक ठाक चलता रहा। फिर यकायक ही नर्स, वार्ड बॉय, सफ़ाईकर्मी हमारे वार्ड में काम करने से कतराने लगे। इनमें तीन-चार बरस से इसी विभाग में पदस्थ लोग भी शामिल थे। मालूम हुआ कि लोग कोविडवार्ड में ही कार्य करना चाह रहे। अचरज हुआ। तपास की। ख़बर मिली कि कोविड-वार्ड में काम करने वालों को हस्पताल वालों ने अतिरिक्त भुगतान देना आरम्भ किया है। तीन सौ से एक हज़ार रुपये प्रति आठ घण्टे का अतिरिक्त भुगतान। जो ’कोविडवार्ड’ का तमगा हासिल न होने से, हमारे यहाँ सम्भव न था। बहरहाल, मेरे संज्ञान में ऐसे कई साथी हैं जिनने प्रतिदिन दो पारियों में काम किया। यानी सोलह घण्टे रोज़! बिन साप्ताहिक अवकाश लिए। कई तो सात दिन काम उपरान्त क्वारेंटाईन में भी जाने से भी मुकर गये। नतीज़न कई पेरामेडिकल साथी कोरोना के चपेट में भी आये। कुछ हताहत भी हुए। और कुछ ठीक होने के बाद फिर से डबल ड्युटी में जुट गये!

इसके पीछे कारण क्या रहा होगा? लालच? महामारी-काल में मरते दम तक सेवा करने का भाव? ज़वाब मुझ से ले लें। लालच – क़तई नहीं। सेवाभाव- शायद कि हो । मूल कारण था- मजबूरी। मरता क्या न करता वाली बात। किसी का पति नौकरी से हाथ धो बैठा था, किसी का कमाऊ पूत घर बिठला दिया गया था। घर चले तो कैसे, ख़र्च पटे तो कैसे? इस घटाटोप में सुनहली किरण बन चमका हमारे हस्पताल द्वारा कोरोना चपेट में आये कर्मचारियों का इलाज मुफ़्त करना।

एक अनुभव और। मरीज़ों का फ़ोन पर समय तय कर लेने के बाद भी न आना। ऐसा पहले शायद गाहे-ब-गाहे ही कभी हुआ हो। लगा कि आवाजाही के साधन न होने का परिणाम है यह। लेकिन जब घर से निकले गंभीर रोगी भी हम तक नहीं पहुँचने लगे, तो माथा ठनका। तपास करने पर जो नज़ारा नमूदार हुआ उसने दिल दहला दिया। दरअस्ल रेड-अस्पताल होने से पुलिस ने हमारे हस्पताल के ग़िर्द नाकाबन्दी कर रख्खी थी। बिना कोविड लक्षण/ रिपोर्ट वालों को वे भीतर ही नहीं घुसने देते। यहाँ तक कि एम्बुलेन्स से आये बेहोश मरीज़ों का भी प्रवेश निषेध था। सामान्य, मानी नॉन-कोविड, रोगियों की दशा देख आत्मा लरज़ उठी। पुराने मरीज़ों के हाल दरियाफ़्त करना ज़रूरी जान पड़ा।

फ़ोन-सम्पर्क शुरू किया गया। जानकारियाँ जुटायीं। इल्म हुआ कि साठ प्रतिशत लोगों का चिकित्सा जगत् से भरोसा ही उठ चुका। आधे से अधिक लोग या तो दवा बन्द कर चुके थे या आधा अधूरा नुस्खा ले रहे थे। अकारण नहीं मजबूरीवश। मजबूरी दवा खरीदने न जा पाने की। मजबूरी पैसों           की तंगी के चलते दवा न ख़रीद सकने की भी। मजबूरी जिस वज़ह से कुछ ने प्राण खोये तो कइयों     के रोग अनियंत्रित हो  चुके थे। यथा मिर्गी रोगी, जो औषधियों में कोताही के बायस फिट्स झेल रहे थे।

हस्पताल का रेड-येलो-ग्रीन में वर्गीकरण आवाम की छाती पर दूसरी तरह से भी मूँग दलता रहा। दहलाने वाले क़िस्से तो बहुत से हैं मेरे कने। फ़िलहाल तो ये वाला सुन लें।

देशबन्दी हुए दस-बारह रोज़ गुज़रे होंगे। तब हमारे संग एक बूढ़ी माँ भरती हुई। उस पर कोविड के साथ फ़ालिज का भी असर था। दरअस्ल वो और उसका डोकरा लॉकडाउन से दो-चार दिन पहले      ही इंदौर आये थे। रिश्तेदारी में। देशबन्दी होने से यहीं फँस गये। इकलौती बेटी मुरैना में, वे दोनों     यहाँ, जहाँ दोनों की तबीयत बिगड़ी। बुढ़िया का कोविडटेस्ट पाजिटिव आया तो सरकारी गाड़ी उसे हमारे यहाँ ले आयी। कोविड-नेगेटीव रिपोर्ट के चलते उसके डोकरे को किसी येलो अस्पताल में जमा करवाया गया। अब दोनों एक दूजे से दूर। एक दूजे से बेख़बर। उधर सड़क मुकम्मल बंद होने से लड़की पाँच सौ किलो मीटर दूर तड़पे। वैसे यातायात सुगम होने पर भी वो कौन कोविड-हस्पताल में घुस पाती, माँ-बाप को देख लेती। कोविड-शिफ़ाखाने क़ैदख़ाने जो होते थे तब। रिश्तेदारों की ज़द से बाहर। जेल में भी मिलने का दिन-समय होता है। यहाँ कुछ भी नहीं। ठीक हो कर बाहर आये तो नातेदारों के अगाड़ी नेता द्वार पर खड़े मिलेंगे। पहले उनके साथ फ़ोटू खेंचवाओ। फिर रिश्तेदार के आगोश में जाओ ।

कुछ प्रदेशों में तो चलन्तु-फ़ोन भी चतुर सरकारों ने कोरोना वार्ड के भीतर नहीं घुसने दिए। कि दोज़ख़ में पड़े प्रियजन को देख नातेदार भड़क न उठें। कहना होगा हमारे इधर हालात इतने बुरे नहीं थे। फ़ोन किया सुना जा सकता था। पर हमारे बूढ़ा-बूढ़ी फ़ोन करें किस तरह, सुने किस विध। डोकरी को फ़ालिज, डोकरा वेन्टिलेटर पर। दुर्भाग्य देखिये कि इस बीच बेचारा डोकरा चल बसा। फूँक दिया गया लावारिसों की तरह। न मरणोपरान्त कोई नातेदार उसका मुख देख सका, ना ही उसने देखा अपने वालों को मृत्युपूर्व। बहरहाल, इधर बोलने-चलने-फिरने से लाचार बुढ़िया, सबसे बेख़बर। कुछ समय में उसकी तबीयत सम्भली। बोल फूटे। तब मालूम पड़ा कि वो अपने आदमी को क़रीब के मर्दाना वार्ड में भरती जानती रही इतने दिनों। अब वो रोज़ दरियाफ़्त करे हमसे अपने डोकरे का हाल। रोज़ चाहे वो हस्पताल का गाऊन नहीं साड़ी लपेटना। डाल कर कंगन-बिन्दिया-बिछिया, रोज़ मचले कुरसी पर बैठ मरदाना वार्ड जाने को। रोज़ हम एक नयी कहानी गढ़ें। नया झूठ बोल बुढ़ी माँ का दिल बहलाएं। यह सिलसिला जारी रहा पूरे पैंतालिस दिन। रास्ते खुलने तक। उसकी बेटी के आने तक।

कोरोना दुर्काल ने जिग़र इस दर्ज़ा घायल किया है कि बची ज़िन्दगी वो दुरुस्त होता नज़र नहीं आता। अनगिनत दिलगुदाज़ क़िस्से खरोचा करेंगे उसे भीतर ही भीतर। रात-दिन। दास्तानें ऐसी-ऐसी कि मैं कह सकूँ न आप सुन ही पाएं। बहुत दमदार जिग़र दरकार सुनने-सुनाने वाले में।

कैसे महसूसाऊँ आपको मैं एम.ए. पास सुनील का दर्द जिसने चपरासी की नौकरी नामन्जूर कर सब्जी का ठेला कुबूल किया। लॉकडाउन में जब एक दिन बाहर निकला तो हो गया बेचारे का ठेला ज़ब्त। सामने स्कूल की फीस, दस तरह की किस्तें ऊपर से पेट की अगन। क़िस्मत का मारा निकलता नहीं तो भी तो धरा जाता। साहूकार द्वारा। भारी पड़ा उसे बाहर निकलना। घूँस में दिए दस हज़ार चुकाने का अतिरिक्त बोझ जो आन पड़ा उस पर।

और पूना की उस महरी, लक्ष्मी, की दास्तां मेरी कलम लिक्खे तो लिक्खे किस तो तरक़ीब से? नाम और माली हाल में यह कैसा विरोधाभास। लक्ष्मी, जिसने लॉकडाउन ख़त्म न होते देख घर का सामान बेचा। पच्चीस हज़ार खड़े किये। निकल पड़ी, अपने ड्रायवर पति व दो छोटे बच्चों के संग, गाँव को।  आस यह कि वहीं कुछ मेहनत मजूरी करेंगे, पेट भरेंगे। बच्चे पालेंगे। पर तब छोड़ा गाँव अब वैसा का वैसा कहाँ बचा था। उधर आगे ही त्राही-त्राही थी। किसानों की सब्जियाँ सड़कों पर सड़तीं थीं। ऊपर से सरकारी डेरी वालों का ऐलान हफ़्ते में चार ही दिन दूध लेने का। दाम भी पहले से दो रुपये कम। मनरेगा भी ठप। ऐसे में काम मिलता तो कैसे और कहाँ? मजबूरन फिर रूख़ किया पूना की सिम्त। खीसे का सारा माल तो गाड़ी कर गाँव आने में ही खप गया। मरता क्या न करता। फिर पैसा उठाया। साहूकार से। पूरे साठ हज़ार रुपये। दर? दस रुपये प्रति सैकड़ा, प्रति माह। पूछा जा सकता है कि इतने बहुत सारे पैसे लेना ही क्यों ? कारण है जनाब, और बड़ा पुख़्ता कारण है लक्ष्मी के पास। खोली का अग्रिम किराया। टाबरों की फीस, उनके लिये स्मार्ट फ़ोन। स्मार्ट फ़ोन बिन बच्चे पढ़ नहीं सकते। जो  फ़ोन नहीं तो फीस गयी बेसबब! गरीबन का आटा और गीला हो  गया कि अब लोग उसे घरों में घुसने नहीं दे रहे। काम के अभाव में ड्रायवर पति भी घर बैठने को मज़बूर। लक्ष्मी पूना लौट तो आयी पर परेशान है। कर्ज़ को ले कर। उसे लगता है ज़िन्दगी खुट जावेगी उसकी कर्ज़ उतरते-उतराते।

नहीं साब अब और नहीं। यह क़िस्सागोई तमाम मनहूस यादें ताज़ा किये दे रही है। सो  इस सिलसिले      को विराम दे निकलता हूँ दूसरी ओर। मार्च से शुरू हो  उतरते वर्ष दो हज़ार बीस की रातों की तरफ़। जब पलक मूँदना मुहाल था। तकिये से सर टेकते ही उठने लगता तूफ़ान सा ज़हन में। सोच का तूफ़ान बाध्य कर देता आँख मलते हुए उठ बैठने को। सोचने को । हर रात एक मसला। हर शब कोई दीग़र मुद्दा-

*

खाई…..बहुधा चौंक उठता नींदों से, देख अपने को गिरता एक फाड़ में। फाड़ जो साफ़ तौर पर नज़र आयी कोरोना-काल में। उच्च व निम्नवर्गीय लोगों के बीच की फाड़। दिन दिन खाई में तब्दील होती फाड़। खाई जिसके दोनों ओर चिन्ता व्यापी थी। इस ओर दरकता जीवन साधने की, उस ओर लम्बा दिवस काटने की। जुगत दोनों तरफ़ बैठायी जाती। इस तरफ़ रोटी कमाने की, उस तरफ़ ख़बरों को भुनाने की। दूसरे शब्दों में, दो ध्रुवों में बँटे संसार का भास अपने चरम पर था। कि जिस पल फाड़ के इधर वाले रिरियाते थे ठीक उसी पल उधर वाले होते अपने में मस्त। कोई यूँ ख़ुश कि कोरोना के चलते उन्हें भागम्भाग की ज़िन्दगी से थोड़ा अवकाश मिला। अवसर मिला परिवार के साथ रहने, नित नये पकवान बनाने-खाने का। मनचाहा पढ़ने व छूट रही फिल्में देखने का। इन लोगों के क़रीब महामारी में मरते लोग आँकड़ा भर थे। आँकड़े जिनकी बिना पर ये वणिक-मना लोग विभिन्न देशों   की कोरोना बैलेंसशीटें का मिलान करते। अपने इधर की देशबन्दी को सही ठहराते। गोदी मिडिया व वाट्सएप ख़बरों से मुतमईन ये लोग सड़क पर चल रहे कामगारों को गुड़-लोलुप मकौड़ा बतलाते। जमातियों को कोरोना-वाहक जतलाते। और सरकारी आपदा-राशन पाने वास्ते भटकते मुफ़लिसों      को न सिर्फ़ मुफ़्तखोर, जमाख़ोर निरुपित करते वरन् उनके हाथों में राम-नामी पताकाएं भी पकड़ाते। भयभीत हूँ निरन्तर गहराती इस फाड़ को देख। सोचता हूँ, ग़र इसकी ज़द में कभी देश का नक़्शा ही आ गया तो क्या होगा?

*

होड़…जब सपनों में यह घुस आती तो रात आँखों में कटती। होड़ टीके बनाने की। दिखता मेरा सीना मैदान सा। वैज्ञानिक मेराडोना, विज्ञान गेंद सम। खिलाड़ियों की मार झेलती, हवा में उछलती, ’हैंड ऑफ गॉड’ सहती गेंद। होड़….। नियम क़ायदे ताक पर। होड़ाहोड़ी में सब शुमार-दर्शक,  रेफरी,  खिलाड़ी… और…बापड़ी गेंद भी…..क्यों ? विज्ञान से वैज्ञानिकों द्वारा विश्वासघात…क्यों?  रेफरी की आँखों पर पट्टी… कैसे?

ज्ञान-विज्ञान ही तो मनुष्य की लाख बरस की मेहनत-मजूरी का हासिल है। और वैज्ञानिकों से ख़ूबतर  साथी कौन है मनुज का?  साथी का राजनीतिज्ञों, धनपतियों संग गुज़ारे भर का वास्ता होना तो स्वीकारा जा सकता है। उनका हमबिस्तर होना नहीं। इसका ख़मियाज़ा आदम भुगत चुका- हिरोशिमा,  चेर्नोबिल के रूप में। आज के दौर में वैज्ञानिक फिर गिद्धों के पंजों में फँसा जान पड़ रहा है। जो समय रहते यह सिलसिला नहीं थमा तो आते समयों में कहीं मानव का भरोसा ही न डगमगा जावे विज्ञान पर से…… बहुत लरजता है मन …रातों में…

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घर-क़ैद….अस्पताल…..। पूछता हूँ ख़ुद से बहुधा कि क्या यह आपदा हस्पतालों के वर्गीकरण बिन नहीं निपट सकती थी? अब तो सब खुल चुका। रेड-ग्रीन का झमेला भी अब ख़त्म। जबकि कोरोना  बदस्तूर तारी है। और मरीज़ भी आगे से कहीं अधिक। उन दिनों का सा हाहाकार फिर क्यों नहीं सुन पड़ता? कैसे चल रहा है सब कुछ बिना किसी अड़चन के? लोग कहते हैं कि यह सब विश्व स्वास्थ्य संगठन के मशवरे पर हुआ। कौन जाने ऐसा मशवरा उसने बर्ड फ्लू में क्यों नहीं दिया? क्या उसको भी कोविड इतर मरीज़ों की नहीं पड़ी थी? भरोसा नहीं होता। यही बात देशबन्दी पर भी खरी बैठती सी जान पड़ती है। फिर सोचता हूँ कि फ़िलहाल इस देशबन्दी के मुद्दे पर आख़िरी बात कहना न ठीक, न मुमकिन ही। अभी तो कोरोना दौर जारी है। बवन्डर थमे तो दिखे  असर। गो कि इस दौर का फ़ैसला करेँगी आने वाली नस्लें। पर कैसे? किस विध पहुँचेंगे वो सत्य तक? कैसे हासिल हो  सकेगी उनको पूरी ख़बर? जबकि आँकड़ों में बेक़दर झोल-झाल हो, ख़बरों-अख़बारों पर सरकारों का अख़्तियार हो। और ज़ुबान-ऐ-अवाम तब्दील हो रही दुम में…. रफ़्ता रफ़्ता

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लेटलतीफ़ी….इसका भी ख़याल आता है जे़हन में अक़्सर। कि सरकार समय पर चेती क्यों नहीं? क्यों  सोचती रही वह कि कोरोना से भारत महफूज़ है। जबकि सब जानते और मानते हैं कि गैलीलियो बाबू की गोल धरती फिर हो गई है चपटी। कि जगहों के दरमियान अब कोई फाँक ही नहीं। इंसान एवं तकनीक की गैंग ने कुदरत के खीसे के सारे रिक्त स्थान जो लूट लिये। चुनाँचे एक ही डोर बाँधे     है आज बशर को। एक गिरा, सब गिरेंगे। मुझ सा मूढ़मति जब यह गूढ़ मंत्र समझ गया तो कैसे भूलावे में रहे ज़हीनतरीन कि महामारी फ़क़त एक देश तक ही महदूद रहेगी? जो ऐसा नहीं तो कोई समझावे मुझे कि सरकार समय रहते चेती क्यों नहीं? जबकि उसके पास दुनिया भर से ख़बरें थीं, तब भी समय रहते ज़रूरी तैयारियाँ करने से वह चूक क्यों गयी? क्या कारण रहे होंगे विलम्ब के?  मूढ़ता? नहीं। आलस्य? नहीं। तब? शायद…बल्कि… पक्के से आत्ममुग्धता। अतिआत्मविश्वास। सोचता हूँ हुक़्मरान ग़र सही वक़्त ख़ामख़याली के अन्ध-कूप से बाहर आ पाते तो क्या होता? तो शायद चिकित्सा-पुलिस-सफ़ाई कर्मियों को बिना समुचित सुरक्षा साधनों के कोराना-सेवा में न जुतना होता।  और रियाया वो न भुगतती जो उसे फड़बाजों-सरीखे पल-पल बदलते निर्णयों के चलते भुगतना पड़ा। गोया सरकार भी बच जाती कोरोना फैलाव की जिम्मावारी पहले मुस्लिम फिर मज़दूर अंततः आमजन के मत्थे मढ़ने से।

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नींदों में ख़लल डालती है एक दूसरी सोच भी। बहुत पीछे तक जाती सोच। तीस बरस या उससे भी उधर तक। याद आता है कि तब इंदौर जैसे मामूली शहर के सरकारी हस्पताल,  एम.वाय. अस्पताल,  में हृदय-शल्य चिकित्सा रोज़मर्रा की बात थी। यहाँ के विद्यार्थी तब ब्रेन-एन्जियोग्राफी जैसी जाँच भी अपने तईं करने में सक्षम थे। फिर ना मालूम किसकी नज़र लगी। इंदौर ही नहीं देश भर में सरकारी स्वास्थ्य-सेवा के खम्बे खोखले होने लगे। रफ़्ता-रफ़्ता नज़ारा बदलता गया। सोचता हूँ,  यदि विगत् काल में स्वास्थ्य सेवा का धड़नतख्ता निजीकरण नहीं हुआ होता तो कैसा रहता आज का परिदृश्य? पूर्व सरकारें स्वास्थ्यतंत्र को छिजाने की बनिस्बद उन्हें टटका बनाते चलतीं तो कैसा रहता? शायद स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की कमी और सरकारी हस्पतालों की दयनीय हालत से नहीं जूझना होता।  21 मार्च ’20 को ताबड़तोड़ भर्तियाँ करने का आदेश देने की दरकार नहीं पड़ती तब। नहीं पड़ती ज़रूरत कोरोना केयर एकमुश्त निजी हाथों में देने की। नहीं फँसता आवाम कॉरपोरेट मगरमच्छों के जबड़ों में।

माना कि व्यापार सरकार का काम नहीं। घड़ी-कार, तेल-साबुन, टेलिफ़ोन-कपड़े बनाने-बेचने जैसे धंधे उसे छोड़ना चाहिये। पर छोड़ने की एक सीमा भी है। हर चीज़ नहीं छोड़ी जा सकती, जैसे कि शिक्षा व सेहत सेवाएं। आदमी की मूलभूत ज़रूरतें हैं ये। बेचे जाने वाला सामान नहीं। निरन्तर बदतर होती राजकीय शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं महती कारण है शहर की ओर पलायन का। ग़रीबी का। जो ये बेहतर होतीं तो हमें घर लौटने का दिलख़राश मंज़र शायद नहीं देखने मिलता। क्या ही अच्छा हो हम जान लें कि कुछ चीज़ों का मुनाफ़ाख़ोरों हाथों में रहना ठीक नहीं।

*

आपदा में अवसर…..सोचता यह भी हूँ कि हुक़्मरान आपदा में अपनी छुपी मंशाओं को निकालने का अवसर न तलाशते तो कितना गर्व होता मुझे उन पर। पक्ष विपक्ष एकजुटता दिखाते, कुछ घरानों     को पुष्ट करने के फेर में आदमी का गला न घोंटा जाता, सरकारें गिराने-बनाने-चुनवाने में जाया हुआ वक़्त व धन बेहतर कामों में खपाया जाता तो तब कामू की ’दी प्लेग’, ऑरवेल की ’1984’ चरितार्थ होते देखने का दंश झेलने से बच जाता आवाम।

सनद रहे कि यह पहली आपदा है न अन्तिम। समय-गर्भ में न मालूम ऐसे कितने ज़लज़ले      करवट ले रहे हों ? नमूदार होंगे जो आगे कभी। हुकुमतें तब भी होंगी और उनके सरोकार आज वाली के से ही होना तय जानिए। क्योंकि सत्ता पाने वाला किसी विचारधारा विशेष के अधीन होने से बच नहीं सकता। जनमानस को अपनी सोच के रंग में रंगने की उसकी जो चाहत आज गोचर है वो तब भी दिखेगी। उसका मंत्र तब भी होगा, ‘मैं तुम्हें अक़्ल दूँगा, तुम अपना दिमाग़ दो’। दूसरे शब्दों में,  हुक़्मरान हुकूमत के साथ आवाम की अक़्ल पर भी अख़्तियार माँगता है। मुक़म्मल अख़्तियार। और इसे हासिल करने हेतु वो हैरतअंगेज चालें चलता है। चालें जो बनाती हैं मासूम रियाया को साहिबे मसनद का फ़रमाबरदार। चालें जो याद दिलाती है स्टेनली मिलग्रेम के हैरतनाक़ शॉक-प्रयोगों       की।  चीज़ों को भले-बुरे के खाँचे में डाल देखने की मानवीय आदत का दोहन कर किस तरह सत्तासीन सामान्यजन की सोच पर काबू करता है- इसका खुलासा करते प्रयोग। काबू भी इस क़दर कि अधिकारी की मंशापूर्ति वास्ते फ़रमाबरदार कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हो  जावे।

जो ऐसा न हो ता तो जनता ताली-थाली पीटने से पहले सौ दफा सोचती। मुसलमानों में दुश्मन देखने, उनके संग व्यापार-व्यवहार न रखने के संदेसों पर सवाल उठाती। मज़दूरों का दर्द समझती, उन के हक़ में खड़ी होती। कोरोना-मृतकों की भीत से पीठ टेक राममंदिर भूमि पूजन करने वाली सरकार से सवाल करती। अफ़सोस कि ऐसा कुछ भी नहीं किया आमजन ने। सोचता हूँ, क्या होगा जो गर्दन झुकाये खड़े दौर ने रीढ़ विहीन संताने जनी तो ? सोच झुरझुरी भरने लगती है।

*

एक अंतिम बात। वो यह कि आने वाली नस्ल को गढ़ने का हक़ व दायित्व सीधे तौर पर समाज का है, सरकार का नहीं। पाँच बरस रहने वाली सरकार के हाथ सौ बरस बाद की पीढ़ी को सुपुर्द तो कोई नपुंसक समाज ही कर सकता है। चुनाँचे आदमी तय करे कि उसकी नस्लें कैसी हों ? ऐसा क्या पढ़ें, क्या सीखें ताकि वे बनें चिन्तनशील। मज़हब-क़फ़स से आज़ाद वो सोचें खुले दिमाग़। गो कि विचारवान, संवेदनशील राजनेताओं का जनक विचारशील चैतन्य समाज ही हो  सकता है। ऐसा हो  सकेगा या नहीं, कौन जाने? इस आपदा से सीखने की जद्द-ओ’-जहद आमजन करेगा या नहीं, किसे ख़बर? दुआ है वे सीखे।

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