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  • प्रेमचंद के अपूर्ण उपन्यास मंगलसूत्र का अंश

    आज प्रेमचंद की जयंती है। आज पढ़िए उनके अंतिम और अपूर्ण उपन्यास ‘मंगलसूत्र‘ का यह अंश- मॉडरेटर

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         ‘मंगल-सूत्र’ प्रेमचंद की अंतिम और अपूर्ण रचना है, जिसे वे पूर्ण न कर सकें, जब विधाता ने उन्हें बुला लिया। इसका बहुत थोड़ा अंश ही वे लिख पाए थे। यह ‘गोदान’ के तुरंत बाद की कृति है, जिसमें लेखक अपनी शक्तियों के चरमोत्कर्ष पर था। निस्संदेह यह रचना बहुत महान होती जैसी की प्रारंभिक पृष्ठों से ही पता चल जाता है। लेखक इस उपन्यास को अपने जीवन दर्शन का प्रतीक मान कर चला था। उनका कहना था कि इसकी संपूर्ण परिकल्पना उनके अपने जीवन पर आधारित थी-किन्हीं अर्थों में आप इसे एक आत्मकथात्मक उपन्यास मान सकते है। उन्होंने बताया था कि इस कृति के द्वारा वे प्रमाणित करेंगे कि आदर्शों पर चल कर भी कही माने वाली भौतिक सफलता प्राप्त की या सकती है-या कम से कम उसका आत्म-संतोष उपलब्ध किया जा सकता है, जो अंततोगत्वा जीवन की एकमात्र सार्थकता है। सफलता की प्राप्ति के लिए जीवन में असत्य, नैतिक पतन और नृशंस मानवहीनता तनिक भी अनिवार्य नहीं है। और यह कि जिस सामान्य जीवन को जनसमूह निरादर और तिरस्कार की दृष्टि से देखता है, असल में वही उदात्त सार्थक और स्पृहणीय है। इस नैतिक और दार्शनिक सत्य के स्थापन को प्रेमचंद ने “इस उपन्यास रचना का आधार बनाया। लेखक का अपना जीवन इस सत्य का सबसे प्रबल प्रमाण था और उन्होंने इस जीवन द्वारा यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि साहित्यकार एक आदर्श मानव होता है और उसका अस्तित्व देश-काल से निरपेक्ष। मानवता के लिए वह प्रकाशपुंज है जिसका आलोक कभी धूमिल नहीं होता।

    बड़े बेटे संतकुमार को वकील बनाकर, छोटे बेटे साधुकुमार को बीए. की डिग्री दिला कर और छोटी लड़की पंकजा के विवाह के लिए स्त्री के हाथों में पांच हजार रुपये नकद रख कर देवकुमार ने समझ लिया कि वह जमीन के कर्त्तव्य से मुक्त हो गए और जीवन में जो “वह जमीन के कर्त्तव्य से मुक्त हो गए और जीवन में जो कुछ शेष रहा है, उसे ईश्वर चिन्तन को अर्पण कर सकते हैं। आज चाहे कोई उन पर अपनी जायदाद को भोगविलास में उड़ा देने का इल्जाम लगाए, चाहे साहित्य के अनुष्ठान में लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि उनकी आत्मा विशाल थी। यह असंभव था कि कोई उनसे मदद मांगे और निराश हो। भोग विलास जवानी का नशा था और जीवन भर वह उस क्षति की पूर्ति करते रहे, लेकिन साहित्य-सेवा के सिवा उन्हें और किसी काम में रुचि न हुई और यहां धन कहां? हां यश, मिला और उनके आत्मसंतोष के लिए इतना काफी था। संचय में उनका विश्वास भी न था। संभव है, परिस्थिति ने इस विश्वास को दृढ़ किया हो लेकिन उन्हें कभी संचय न कर सकने का दुख नहीं हुआ। सम्मान के साथ अपना निर्वाह होता जाए, इससे ज्यादा वह और कुछ न चाहते थे। साहित्य-रसिकों में जो एक अकड़ होती है, चाहे उसे शेखी ही क्यों न कह लो वह उनमें भी थी। कितने ही रईस और राजे इच्छुक थे वह उनके दरबार में जाएं, अपनी रचनाएं सुनाएं उनको भेंट करें, लेकिन देवकुमार ने आत्म-सम्मान “को कभी हाथ से न जाने दिया। किसी ने बुलाया भी तो धन्यवाद देकर टाल गए। इतना ही नहीं वह यह भी चाहते थे कि राजे और रईस मेरे द्वार पर आयें मेरी खुशामद करें, जो अनहोनी बात थी। अपने कई मंदबुद्धि सहपाठियों को वकालत या दूसरे सीगों में धन के ढेर लगाते, जायदादें खरीदते नए-नए मकान बनवाते देखकर कभी-कभी उन्हें अपनी दशा पर खेद होता था, विशेषकर जब उनकी जन्मसंगिनी शैव्या गृहस्थी की चिन्ताओं से जल कर उन्हें कटु वचन सुनाने लगती थी। पर अपनी रचना-कुटीर में कलम हाथ में लेकर बैठते ही वह सब कुछ भूल साहित्य-स्वर्ग में पहुंच जाते थे। आत्म गौरव जाग उठता था। सारा अवसाद और विषाद शांत हो जाता था।

         मगर इधर कुछ दिनों से साहित्य रचना में उनका अनुराग कुछ ठंडा होता जाता था। उन्हें कुछ ऐसा जान पड़ने लगा था कि साहित्य-प्रेमियों को उनसे वह पहले की सी भक्ति नहीं रही। इधर उन्होंने जो दो पुस्तकें बड़े परिश्रम से लिखी थीं और जिनमें उन्होंने अपने जीवन के सारे अनुभव और कला की सारी प्रौढ़ता भर दी थी, उनका कुछ विशेष आदर न हुआ। इसके पहले उनकी जो रचनाएं निकली थीं “आदर न हुआ। इसके पहले उनकी जो रचनाएं निकली थीं उन्होंने साहित्य संसार में हलचल मचा दी थी। हर एक पत्र में उन पुस्तकों की विस्तृत आलोचनाएं हुई थीं। साहित्य-संस्थाओं ने उन्हें बधाइयां दी थीं, साहित्य मर्मज्ञों ने गुणग्रहाकता से भरे पत्र लिखे थे। यद्यपि उन रचनाओं का देवकुमार की नजर में अब उतना आदर न था, उनके भाव उन्हें भावुकता के दोष पूर्ण लगते थे। शैली में भी कृत्रिमता और भारीपन था, पर जनता की दृष्टि में वही रचनाएं अब भी सर्वप्रिय थीं। इन नई कृतियों से बिना बुलाए मेहमान सा आदर किया गया मानो साहित्य-संसार संगठित हो कर उनका अनादर कर रहा हो। कुछ तो यों भी उनकी इच्छा विश्राम करने की रही थी, इस शीतलता ने उसे विचार को और दृढ़ कर दिया। उनके दो-चार सच्चे साहित्यिक मित्रों ने इस तर्क से उनको ढाढस देने की चेष्टा की कि बड़ी भूख में मामूली भोजन भी जितना प्रिय लगता है, भूख कम हो जाने पर उससे कहीं रुचिकर पदार्थ भी उतने प्रिय नहीं लगते, पर इससे उन्हें आश्वासन न हुआ। उनके विचार में किसी साहित्यकार की सजीवता का यही प्रमाण था कि उसकी- रचनाओं की भूख जनता में बराबर बनी रहे। जब वह भूखे “न रहे तो उसको क्षेत्र से प्रस्थान कर जाना चाहिए। उन्हें केवल पंकजा के विवाह की चिन्ता थी और जब उन्हें एक प्रकाशक ने उनकी पिछली दोनों कृतियों के पांच हजार दे दिए तो उन्होंने इसे ईश्वरीय प्रेरणा समझा और लेखनी उठा कर सदैव के लिए रख दी। मगर इन छह महीनों में उन्हें बार-बार अनुभव हुआ कि उन्होंने वानप्रस्थ लेकर भी अपने को बन्धनों से न छुड़ा पाए। शैव्या के दुराग्रह की तो उन्हें कुछ ऐसी परवाह न थी। वह उन देवियों में थी, जिनका मन संसार से कभी नहीं छूटता। उसे अब भी अपने परिवार पर शासन करने की लालसा बनी हुई थी। और जब तक हाथ में पैसे भी न हों, उसकी यह लालसा पूरी न हो सकती थी। जब देवकुमार अपने चालीस वर्ष के विवाहित जीवन में उसकी तृष्णा न मिटा सके, तो अब उसका प्रयत्न करना वह पानी पीटने से कम व्यर्थ न समझते थे। दुःख उन्हें होता था संतकुमार के विचार और व्यवहार पर जो उनको घर की सम्पत्ति लुटा देने के लिए इस दशा में भी क्षमा न करना चाहता था। वह सम्पत्ति जो पचास साल पूर्व दस हजार में फेंक दी गई, आज होती तो उससे दस हजार साल की निकासी हो सकती थी। उनकी जिस आराजी में दिन को सियार लोटते थे, वहां अब नगर का सब से गुलजार बाजार था, जिसकी जमीन सौ रुपये वर्ग फुट पर बिक रही थी। संतकुमार का महत्वाकांक्षी मन रह-रह कर अपने पिता पर कुढ़ता रहता था। देवकुमार के पास पुत्र के स्वभाव में इतना अंतर कैसे हो गया, यह रहस्य था। देवकुमार के पास जरूरत से हमेशा कम रहा पर उनके हाथ सदैव खुले रहे। उनका सौन्दर्य भावना से जागा हुआ मन कभी कंचन की उपासना को जीवन लक्ष्य न बना सका। यह नहीं कि वह धन का मूल्य जानते न हों। मगर उनके मन में यह धारण जम गई थी कि जिस राष्ट्र में तीन चौथाई प्राणी भूखे मरते हों, वहां किसी एक को बहुत साधन कमाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, चाहे इसकी उसमें सामर्थ्य हो। मगर संतकुमार की लिप्सा ऐसे नैतिक आदर्शों पर हंसती थी। कभी कभी तो निस्संकोच होकर वह यहां तक कह जाता था कि जब आपको साहित्य से प्रेम था तो गृहस्थ बनने का क्या हक था। आपने अपना जीवन तो चौपट किया ही, हमारा जीवन भी मिट्टी में मिला दिया। और अब आप वानप्रस्थ लेकर बैठे हैं, मानो आपके जीवन के सारे ऋण चुक गए।

    “जाड़ों के दिन थे। आठ बज चुके थे। सारा घर नाश्ते के लिए जमा हो गया था। पंकजा तख्त पर चाय और संतरे और सूखे मेवे तश्तरियों में रख दोनों भाइयों को उनके कमरों से बुलाने गई और एक क्षण में आकर साधुकुमार बैठ गया। ऊंचे कद का, सुगठित, रूपवान, गोरा, मीठे वचन बोलने कला सौम्य युवक था। जिसे केवल खाने और सैर-सपाटे से मतलब था। जो कुछ जुट जाए भरपेट खा लेता था और यार-दोस्तों में निकल जाता था।

         शैव्या ने पूछा-सन्तू कहां रह गया? चाय ठंडी हो जाएगी तो कहेगा यह तो पानी है! बुला ले तो साधु, इसे जैसे खाने-पीने की भी छुट्टी नहीं मिलती।

         साधु सिर झुका कर रह गया! संतकुमार से बोलते उसकी जान निकलती थी। शैव्या ने एक क्षण बाद फिर कहा-उसे भी क्यों नहीं बुला लेता?

         साधु ने दबी जबान से कहा-नहीं, बिगड़ जाएंगे सवेरे-सवेरे तो मेरा सात दिन खराब हो जाएगा।

         इतने में संतकुमार भी आ गया। शक्ल सूरत में छोटे भाई से मिलता-जुलता केवल शरीर का गठन उतना “ और सूखे मेवे तश्तरियों में रख दोनों भाइयों को उनके कमरों से बुलाने गई और एक क्षण में आकर साधुकुमार बैठ गया। ऊंचे कद का, सुगठित, रूपवान, गोरा, मीठे वचन बोलने कला सौम्य युवक था। जिसे केवल खाने और सैर-सपाटे से मतलब था। जो कुछ जुट जाए भरपेट खा लेता था और यार-दोस्तों में निकल जाता था।

         शैव्या ने पूछा-सन्तू कहां रह गया? चाय ठंडी हो जाएगी तो कहेगा यह तो पानी है! बुला ले तो साधु, इसे जैसे खाने-पीने की भी छुट्टी नहीं मिलती।

         साधु सिर झुका कर रह गया! संतकुमार से बोलते उसकी जान निकलती थी। शैव्या ने एक क्षण बाद फिर कहा-उसे भी क्यों नहीं बुला लेता?

         साधु ने दबी जबान से कहा-नहीं, बिगड़ जाएंगे सवेरे-सवेरे तो मेरा सात दिन खराब हो जाएगा।

         इतने में संतकुमार भी आ गया। शक्ल सूरत में छोटे भाई से मिलता-जुलता केवल शरीर का गठन उतना अच्छा न था। हां, मुख पर तेज और गर्व की झलक थी और मुख पर एक शिकायत सी बैठी हुई थी, जैसे कोई चीज उसे पसंद न आती हो।

         तख्त पर बैठ कर चाय मुंह से लगाई और नाक सिकोड़ कर बोले-तू क्यों नहीं आती पंकजा? “और पुष्पा कहां है? मैं कितनी बार कह चुका हूं कि नाश्ता, खाना पीना सब का एक साथ होना चाहिए।

         शैव्या ने आंखे तरेर कर कहा-तुम लोग खा लो यह सब पीछे खा लेंगी। पंगत थोड़ी है कि सब एक साथ बैठें।

         संतकुमार ने एक घूंट चाय पीकर कहा-वही पुराना लचर। कितनी बार कह चुका हूं कि उस पुराने लचर संकोच का जमाना नहीं रहा।

         शैव्या ने मुंह बना कर कहा-सब एक साथ तो बैठें लेकिन पकाए कौन और परसे कौन? एक महाराज रक्खो पकाने के लिए, दूसरा परोसने के लिए जब वह ठाट निभेगा।

         ‘तो महात्मा जी उसका इन्तजाम क्यों नहीं करते या वानप्रस्थ लेना ही जानते हैं।”

    “उनको जो कुछ करना था, कर चुके। अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो।’

         ‘जब पुरुषार्थ नहीं था तो हम लोगों को पढ़ाया-लिखाया क्यों? किसी देहात में ले जाकर छोड़ देते। हम अपनी खेती करते या मजूरी करते और पड़े रहते। तो यह घटराग ही क्यों पाला?’

         ‘तुम उस वक्त न थे, सलाह किससे पूछते?’

         संतकुमार ने कड़वा मुंह बनाए चाय पी, कुछ मेवे खाए, फिर साधुकुमार से बोले-तुम्हारी टीम कब बंबई जा रही है जी?

         साधुकुमार ने गरदन झुकाए त्रस्त स्वर में कहा-परसों।

         ‘तुमने नया सूट बनवाया?’

         ‘मेरा पुराना सूट अभी काम दे सकता है।’

         ‘काम तो सूट के न रहने पर भी चल सकता है। हम लोग तो नंगे पांव, धोती चढ़ा कर खेला करते थे। मगर जब एक आल इंडिया टीम में खेलने जा रहे हो, तो वैसा ठाट भी तो होना चाहिए। फटेहाल जाने से तो कहीं अच्छा “न जाना। जब वहां लोग जानेंगे कि तुम महात्मा देवकुमार जी के सुपुत्र हो तो दिल में क्या कहेंगे?’

         साधुकुमार ने कुछ जवाब न दिया। चुपचाप नाश्ता करके चला गया। वह अपने पिता की माली हालत जानता था और उन्हें संकट में न डालना चाहता था। अगर संतकुमार नए सूट की जरूरत समझते हैं तो बनवा क्यों नहीं देते? पिता के ऊपर भार डालने के लिए उसे क्यों मजबूर करते हैं?

         साधु चला गया तो शैव्या ने आहत कंठ से कहा-जब उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि अब मेरा घर से कोई वास्ता नहीं और सब कुछ तुम्हारे ऊपर छोड़ दिया तो तुम क्यों उन पर गृहस्थी का भार डालते हो? अपने, सामर्थ्य और बुद्धि के अनुसार जैसे हो सका उन्होंने अपनी उम्र काट दी। जो कुछ वह नहीं कर सके या उनसे जो चूक हुई उन पर फिकरे कसना तुम्हारे मुंह से अच्छा नहीं लगता। अगर तुमने इस तरह उन्हें सताया तो मुझे डर है कि वह घर छोड़ कर कहीं अंतर्धान न हो जाएं। वह धन न “कमा सकें, पर इतना तो तुम जानते ही हो कि वह जहां भी जाएंगे लोग उन्हें सिर और आंखों पर लेंगे।

         शैव्या ने अब तक सदैव पति की भर्त्सना ही की थी। इस वक्त उसे उनकी वकालत करते देखकर संतकुमार मुस्करा पड़ा।

         बोला-अगर उन्होंने ऐसा इरादा किया तो उनसे पहले मैं अंतर्धान हो जाऊंगा। मैं यह भार अपने सिर नहीं ले सकता। उन्हें इसको संभालने में मेरी मदद करनी होगी। उन्हें अपनी कमाई लुटाने का पूरा हक था, लेकिन बाप दादों की जायदाद को लुटाने का उन्हें कोई अधिकार न था। इसका उन्हें प्रायश्चित करना पड़ेगा। वह जायदाद हमें वापस करनी होगी। मैं खुद भी कुछ कानून जानता हूं। वकीलों, मजिस्ट्रेटों से भी सलाह कर चुका हूं। जायदाद वापस ली जा सकती है। अब मुझे यही देखना है कि इन्हें अपनी संतान प्यारी है या अपना महात्मापन।

         यह कहता हुआ संतकुमार पंकजा से पान लेकर अपने कमरे में चला गया।

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