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  • लोक गायन और पं. छन्नूलाल मिश्र

    आज पढ़िए प्रसिद्ध गायक छन्नूलाल मिश्र की गायकी पर अम्बुज पाण्डेय का यह लेख- मॉडरेटर

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    पं. छन्नूलाल मिश्र को सत्तर प्रकार के लोक गीत कंठस्थ हैं। इन गीतों में जन्म से लेकर मृत्यु तक के सारे भाव चटख रंगों में लोक रंजन करते हुये जनमानस का कंठहार बन चुके हैं। शास्त्रीय गायन में वे जितने सिद्धहस्त हैं, उपशास्त्रीय गायन में भी उन्हें उतनी ही महारत हासिल है। सच कहा जाय तो उनकी अपार लोकप्रियता का मूल आधार यह उपशास्त्रीय गायन ही है। उपशास्त्रीय गायन में ठुमरी, दादरा, चैती, सोहर, कजरी, और टप्पा पर उनका अप्रतिम अधिकार है।

    ठुमरी के पारंपरिक प्रारूपों में वे निष्णात हैं। पूरब अंग ठुमरी हो अथवा पंजाबी अंग ठुमरी, इनकी न केवल वे तात्विक मीमांसा करते हैं, बल्कि अलग-अलग लय और भावदशा के साथ उसकी व्याख्या करते हुये अपनी प्रस्तुति देते हैं। ठुमरी को और भी लोकग्राह्य और मधुर बनाने के लिए वे बरबस कुछ न कुछ साहित्यिक समावेश करके एक मौलिक प्रस्तुति देते हैं। आयोजन के कितने भी प्रारूप हो, वे समापन हमेशा ठुमरी से ही करते हैं। कहना न होगा, इस विशेष शैली के प्रस्तोताओं में इनके साथ पं. राजन-साजन मिश्र और पं.अजय चक्रवर्ती का भी नाम शुमार है।

    ऐसे ही कजरी गाते समय वे मीरजापुरी कजरी, बनारसी कजरी, आज़मगढी कजरी और छपरा की कजरी को शैलीगत वैशिष्ट्य के आधार पर निरूपित करते हुये गा कर भेद बता देते हैं। लोक गायन की जितनी शास्त्रीय तैयारी पं.छन्नूलाल मिश्र ने की है, वह विरल है। लोक के प्रति वे इतने भावाविष्ट और आग्रही हैं कि लोक से इतर उन्हें कुछ रुचता ही नहीं। लोक का उनका अनुभव इतना विराट और समावेशी है कि उसमें सब का अंतर्भाव हो जाता है। उनकी श्रेणी में लोक पहले है और शास्त्र बाद में। यह लोक इतना भास्वर, सृजनात्मक और संभावनाओं से भरा है कि इससे निसृत परंपराएँ शास्त्र का आधार बन जाती हैं।

    किराना घराने से ख्याल गायन की शास्त्रीय शिक्षा लेने वाले पं. छन्नूलाल मिश्र बनारस घराने का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। बनारस घराने के अंतर्गत कुछ हेर-फेर के साथ उपघराने भी हैं। इन घरानों में कुछ परंपरानुयायी हैं तो कुछ शास्त्रीय दख़ल रखने वाले संगीत के स्वनामधन्य हस्ताक्षर भी हैं। मिश्र जी इन घरानों की बारीक समझ रखने वाले न केवल संगीत मर्मज्ञ हैं, अपितु संवाहक भी हैं।

    पं.छन्नूलाल मिश्र को स्वरमंडल सिद्ध है। गायन के वक़्त उनकी उंगलियाँ स्वरमंडल को तरंगाइत करती रहती हैं। बड़े गुलाम अली खान, राशिद खान, पं.जसराज, किशोरी अमोनकर जैसे ख्यातिनाम गायकों की तरह मिश्र जी की पहचान भी स्वरमंडल के साथ जुड़ गयी।

    सितार और तबला भी उनके प्रिय वाद्ययंत्रों में है। अपने पुत्र राम कुमार मिश्र को रियाज़ कराकर इन्होंने तबले में पारंगत कर दिया है।

    कहते हैं ललितकलाओं में संगीत अध्यात्म का सर्वाधिक निकटवर्ती अनुशासन है। ऐसे में एक बनारसी गायक भला तुलसी और कबीर से कैसे निस्संग रह सकता है ? जाहिर है, पं.छन्नूलाल मिश्र तुलसी और कबीर दोनों को उतनी ही तीव्रतम अनुभूति के साथ प्रस्तुत करते हैं। ये जिस त्वरा और अधिकार के साथ रामचरितमानस का गायन करते हैं, उतने ही कौशल से कबीर के निर्गुण को स्वर और आलाप से संवलित कर देते हैं। गायन के समय उनकी चिर-परिचित ‘काशीकी’ शैली श्रोताओं को एक नायाब माधुर्य से सराबोर कर देती है। तुलसी की आराधना और लीला वर्णन को जितने उत्साह से छन्नूलाल मिश्र उत्सवधर्मी बना देते हैं, कबीर के अनहद को भी उतनी ही विश्वसनीयता और प्रतीति के स्तर तक ले जाते हैं।

    शिव की होली पं.छन्नूलाल मिश्र का सिग्नेचर गीत बन गया है। इसे उनके संगीतोत्सव का स्वस्तिवाचन कहा जाय तो कोई अतिरंजना न होगी। मंच पर बैठते ही श्रोता एक स्वर से पहले इसी की माँग करते हैं…खेलैं मसाने में होली दिगंबर खेलैं मसाने में होली….!

    मणिकर्णिका पर होने वाली होली बनारस का एक अलग ही निदर्शन कराती है। एक तरफ चिताएँ जल रही हैं, अघोरी और कापालिक भस्म पोत कर तंत्र क्रिया और शवसाधना कर रहे हैं, तो दूसरी ओर वारांगनाएँ मादक नृत्य से विलास लोक रच रही हैं। इस महा उत्सव में श्मशानी वैराग्य को तिल भर भी जगह नहीं। यह अघोर और त्रिपुरसुंदरी की लीलास्थली है। यहाँ काम भस्म हो रहा है लेकिन अगले ही क्षण वह पुनर्नवा हो लोगों में संचरित होने लग रहा है। कोई इसे निवृत्ति और प्रवृत्ति का द्वन्द्व समझता है तो कोई इसे दिगंबर का चिद्विलास समझ कर हाथ जोड़ लेता है। काशी का यह गर्भ-गृह विचित्र कंट्रास्ट रचता है। यहाँ शिवालयों में महामृत्युञ्जय का पाठ हो रहा है और मणिकर्णिका की तरफ जाने वाली गलियों में ‘श्रीराम नाम सत्य है’ का घोष हतचेष्ट कर दे रहा है। केदार नाथ सिंह ने ठीक लिखा था – यह आधा है, आधा नहीं है।

    अस्ति और नास्ति यहाँ दर्शन नहीं, जीवन शैली है। जीवन-मृत्यु का प्रतिसंध कोई परिघटना नहीं केवल दो धाराओं का संगम है। सब अपनी धुन में रमे हैं। परस्पर विरोधी परिस्थिति में भी कोई संघात नहीं। छन्नूलाल मिश्र ने बनारस के इस वैचित्र्य को बार-बार गाया है लेकिन श्रोता इससे कभी तृप्त नहीं नहीं होते। पूर्व स्वादानुभूति के लिए वे बारंबार इसकी फ़रमाइश करते हैं।

    होली के गीत समाज में जिस अश्लीलता और भदेस के पर्याय बन चुके हैं उसी होली को छन्नूलाल मिश्र ने अपनी गायकी से क्लासिकल ऊँचाई तक पहुँचाया है। उन्होंने अपने रियाज़ और फ़न से यह सिद्ध कर दिया है कि सरस, कमनीय और रोमांटिक प्रसंगों को शालीनता से गाकर श्रोताओं में रसोद्रेक किया जा सकता है।

    मिश्र जी चैती भी निराले अंदाज़ में प्रस्तुत करते हैं। सबसे पहले वे चैता और चैती का भेद बताते हैं, उसकी ऋतु, उसका आध्यात्मिक महत्व समझाते हैं, उसके मिथकीय प्रसंग की चर्चा करते हैं, फिर सुर छेड़ते हैं। एक ही बंदिश में स्वरों के आरोहावरोह व ध्वन्यात्मक विपर्यय से वे गायन की मनोरम सृष्टि करते हैं। बंदिश में अनुस्यूत साहित्यिकता और बदलते भाव सौंदर्य उनकी गायकी से उद्दीप्त हो उठते हैं।

    पं.छन्नूलाल मिश्र आँख मूँद कर आलाप लेने वाले गायकों में से नहीं हैं। वे गायन के साथ-साथ दर्शकों और श्रोताओं से संवाद भी करते चलते हैं। मंच पर प्रस्तुति देता एक स्वरसिद्ध गायक अपने श्रोताओं को रसाभास मात्र कराकर उपराम नहीं होना चाहता। वह चाहता है कि श्रोताओं का समूह भी समवेत रसदशा तक पहुँचे। इसका सुफल है कि संगीत का शास्त्रीय ज्ञान न रखने वाला श्रोता समूह भी छन्नूलाल मिश्र और उनके संगीत के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। उनकी यह शैली जहाँ श्रोताओं को प्रीतिकर लगती है, वही कुछ संगीत मर्मज्ञ इसकी आलोचना भी करते हैं। उनका मानना है कि इससे यति, छंद और राग में बाधा पड़ती और बार-बार लय टूट जाती है। कहना न होगा, लोग जिसे गायन का अपारंपरिक विधान मानते हैं, उसे छन्नूलाल मिश्र रसबोध हेतु सहकारी उपादान के रूप में देखते हैं। जो भी हो, उनके गायन में न्यस्त यह शैली श्रोताओं को रास आती है। मंच पर वे सधे गायक के साथ एक आचार्य के रूप में भी नुमाया होते हैं जो निर्व्याज अपने श्रोताओं को संगीत की बारीक समझ और हुनर से भी परिचित कराता चलता है।

    संगीत में घाल-मेल की संस्कृति छन्नूलाल मिश्र को रास नहीं आती। उनका मानना है कि संगीत के इतने विस्तारित आयामों में रसोद्बोधन के तमाम साधनों का विधान किया गया है और अलग-अलग राग-रागिनियों व गायन पद्धतियों से अभिप्रेत आनंद तक पहुँचने के अनेक प्रकल्प उपलब्ध हैं। विलंबित, मध्यम और द्रुत से भावों को न केवल उद्दीप्त किया जा सकता है बल्कि गमक, मीड, मुर्की और खटका जैसे अलंकरणों से संगीत को अलंकृत करके उसके सौंदर्य में श्रीवृद्धि भी की जा सकती है। हिन्दुस्तानी संगीत की परंपरा इतनी समृद्ध, गौरवशाली और प्रयोगधर्मी है कि उसके रिक्थ से नूतन और मौलिक संगीत रचने की संभावना निरंतर बनी रहती है। ऐसे में घाल-मेल करके एक कौतुक तो रचा जा सकता है, लेकिन यह कभी भी रचनात्मक और स्थाई महत्व का नहीं हो सकता। इससे न तो उदात्त संगीत की निर्मिति हो सकती है और न ही यह लोकमंगलकारी हो सकता है।

    छन्नूलाल मिश्र का मुखमंडल हमेशा मुस्कान और आभा से दीप्त रहता है। पीछे की ओर फैले लंबे केश और ललाट पर बड़ा सा टीका उनके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बनाता है। चटख रंग के परिधान में जब वे मंच पर बैठते हैं तो गायन की रंगत और बढ़ जाती है। बनारस की आब-ओ-हवा को अपने व्यक्तित्व से मुखर करने वाले और बात-बात पर बनारस का बखान करने वाले छन्नूलाल मिश्र बनारसी पान और बनारसी गालियों से न जाने कैसे ख़ुद को बचा ले जाते हैं। यह संयम उल्लेखनीय और अनुकरणीय है। रोष हो या ख़ुशी, दोनों अवस्थाओं में अभिव्यक्ति हेतु बनारसी गालियों का लोभसंवरण करना किसी अचरज से कम नहीं। अतिशय रोष में भी छन्नूलाल मिश्र किसी अप्रिय के लिए अपशब्द का प्रयोग नहीं करते। बस यही कहते हैं, अमुक आदमी बहुत बेसुरा है। एक-एक भाव के लिए दर्ज़नों बंदिश सुना देने वाला व्यक्ति जब भर्त्सना और आलोचना हेतु मात्र बेसुरा संबोधन देकर चुप हो जाय तो यह उसके सुरुचिसंपन्न और सुसंस्कृत होने का सर्वोत्तम प्रमाण है। ऐसे ही जब किसी की तारीफ की बात आती है तो उसे सुरीला कहकर उपकृत करते हैं। उनके शब्दकोश में भर्त्सना और आलोचना हेतु बेसुरा शब्द है, जबकि तारीफ और गुणों के बखान हेतु सुरीला। उनके संगीत प्रेम और संगीत संस्कार को इस उदाहरण से समझा जा सकता है।

    छन्नूलाल मिश्र के जीवन में संघर्ष और अभाव का जितना आधिक्य रहा है, उनका गायन उतना ही समृद्ध और वैभव से परिपूर्ण। देश का द्वितीय उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त करके भी वे अपनी ग़रीबी भूले नहीं। प्रसंगानुकूल वे अपने अतीत के संघर्षों और दुश्वारियों का उल्लेख करते रहते हैं। जिन मंचों पर बैठ कर वे अपने गायन का मुजाहिरा करते और सम्मान पाते हैं, उन्हीं सार्वजनिक मंचों से वे अकुंठ अपनी आप बीती भी सुना जाते हैं। श्रोता इसे सहानुभूति बटोरने का उद्यम नहीं, बल्कि उनके लोक गायन का अपरिहार्य लोकपक्ष मानते हैं। लोक के प्रति यह उनकी अनुरक्ति रागात्मिका वृत्ति को ही दर्शाती है। उन्हें सुनने और समझने वाले जानते हैं कि उनका यह लोकपक्ष कितना मूल्यवान, गार्हस्थिक और प्रवृत्तिमूलक है।

    उस्ताद अब्दुल गनी खान का शिष्य और पं.अनोखे लाल मिश्र का दामाद होने का उन्हें जितना भान है, उतनी ही शालीनता से वे मर्यादा और परंपराओं का पोषण भी करते हैं। अपार सफलता और लोकप्रियता प्राप्त करने के बावज़ूद उनमें तुनकमिजाज़ी और अहंकार का लेशमात्र नहीं है।

    कोविड में अपनी पत्नी और बेटी को खो चुके पं.छन्नूलाल मिश्र इन दिनों मिर्ज़ापुर में अपनी छोटी बेटी के घर रह रहे हैं। यह उनके लिए किसी संताप से कम नहीं कि जिस गायक के रोम-रोम में बनारस स्पंदित होता हो, संन्यास बेला में वह उस बनारस से दूर रहे। स्पिरिट ऑफ़ बनारस उनमें अब भी है। शिव और गंगा के साथ, तुलसी और कबीर से संपृक्त, लेकिन वे बनारस में नहीं हैं। उन्हें बनारस और श्रोताओं ने निर्वासित नहीं किया, यह उनका कौटुंबिक निर्वासन है। उनकी सुश्रूषा, चिकित्सा की जिम्मेदारी और देख-रेख उनकी छोटी बेटी प्रो.नम्रता मिश्रा करती हैं।

    अपने गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले छन्नूलाल मिश्र अब ऊँचा सुनते है।

    मेरी दस वर्षीया बेटी उनके कान के पास जाकर गुनगुनाती है, ‘अयि गिरिनंदिनी नंदितमेदिनी’ तो तत्काल उनकी आँखों में एक कौंध तैर जाती है। थोड़े ही समय में वे चैतन्य हो कर समझाने लगते हैं कि ताल देकर गाना चाहिए। बिना ताल के गायन बेसुरा हो जाता है। वार्धक्य और रुग्णता के बोझ से अवसन्न छन्नूलाल मिश्र में अब भी गायन परवाज भरने को आतुर है। गायन के प्रति ऐसी ललक देखकर उनकी साधना और जिजीविषा के प्रति सम्मान और बढ़ जाता है।

    यह नियति की विडंबना ही कही जाएगी कि प्राण-पण से गायन में जीने वाला स्वर-जित अपनों से हार गया।

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    डॉ.अम्बुज कुमार पाण्डेय
    असि.प्रो. हिन्दी विभाग
    के.बी.पी.जी. कालेज, मीरजापुर
    उ.प्र. 231001
    mailtoambuj@gmail.com

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