मंडला में ‘रज़ा स्मृति’

मंडला में मूर्धन्य चित्रकार सैयद हैदर रज़ा का बचपन बीता था। मैंने किताबों में उनके बचपन की स्मृतियों के बारे में बहुत पढ़ा था। इस बार रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘रज़ा स्मृति समवाय’ में भाग लेने गया तो नर्मदा किनारे बसे मंडला की सुंदरता देखने का अवसर मिला। मानसून में वहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य देखने लायक़ होता है।

वैसा ही रचनात्मक ऊर्जा से भर देने वाला था वहाँ आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम। कला के दो शिविरों देखे। एक तो स्क्रैप से कलाकृति बनाने वालों के शिविर से। दूसरा जनगढ़ कलम चित्रकला शिविर। क्षेत्रीय कलाकारों को अवसर प्रदान करने की दृष्टि से यह आयोजन बेहतरीन है।

दो दिन के आयोजन में साहित्य से जुड़े तीन सत्र थे। जिनमें अरुण कमल, आशुतोष दुबे, तेज़ी ग्रोवर, सुशीला पुरी, संगीता गुंदेचा, पवन करण, रश्मि भारद्वाज, व्योमेश शुक्ल, सत्यव्रत रजक, सुंदर चंद ठाकुर, पराग पावन, शैलेय, जोशना बैनर्जी आडवाणी, बाबुशा कोहली, पूनम अरोड़ा, अजित कुमार राय कुल सोलह कवियों को सुनने का मौक़ा मिला।

एक आयोजन में हिन्दी के वरिष्ठतम कवियों में एक अरुण कमल और युवतम कवियों में एक सत्यव्रत रजक को सुनना यादगार अनुभव रहा। ग़ौतलब है कि सत्यव्रत रजक की उम्र महज़ 19 साल है और वे दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में बीए द्वितीय वर्ष के छात्र हैं। इसी तरह, सुंदर चंद ठाकुर को सुनना। सुंदर चंद ठाकुर ने मंच से यह बताया कि वे क़रीब पंद्रह साल बाद कहीं काव्य पाठ कर रहे हैं। याद रहे कि सुंदर चंद ठाकुर को 2003 में युवा कविता के लिये प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिल चुका है।

रज़ा स्मृति समवाय के आयोजन में कविता पाठ पर इतना अधिक लिखने का कारण यह है कि इस तरह से चयनित कवियों के आयोजन बहुत कम होते हैं। हर उम्र के, हर काट के कवि थे, और सबको एक साथ सुनते हुए हिन्दी कविता की समृद्ध विविधता का गहरा एहसास हुआ।

एक अच्छी चर्चा ‘कविता का अरण्य’ विषय पर हुई। यह बहुत अच्छा और ओपन विषय था जिसके ऊपर ज्योतिष जोशी, अरुण होता, विनोद तिवारी, अजित कुमार राय, व्योमेश शुक्ल और मैंने अपने अपने हिसाब से वक्तव दिये। मेरे अपने हिसाब से अरण्य का एक अर्थ एकांत होता है जिसको काव्य रचना के लिए ज़रूरी माना जाता रहा है। मैंने यह सवाल उठाया कि हम जिस डिजिटल युग में हैं इसमें जब किसी की एकाग्रता ही नहीं अभी है तो वह अरण्य वह एकांत कहाँ से लाया जाये। हम सब अपना अपना अरण्य गँवा चुके हैं।

भरत नाट्यम की प्रसिद्ध नृत्यांगना आरोही मुंशी और ओडिसी नृत्यांगना अरुणिमा घोष की नृत्य प्रस्तुति बहुत आकर्षक रहा। दूसरी शाम व्योमेश शुक्ल की मंडली ने अपनी प्रसिद्ध प्रस्तुति दी। निराला की कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ की नाट्य प्रस्तुति। जिसको देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग पधारे थे।

साहित्य-कलाओं से भरपूर आयोजन था। और बरसों बाद इस तरह के किसी आयोजन में बतौर प्रतिभागी शामिल होने का अवसर मिला।

23 जुलाई को रज़ा साहब की पुण्यतिथि होती है। उस दिन सभी लोगों ने उनके स्मृति स्थल पर जाकर उनकी स्मृति को प्रणाम किया और यादों को समेटे अपने अपने गंतव्य की ओर चल पड़े।

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