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  • विनोद दूबे की कविताएँ

    आज पढ़िए विनोद दूबे की कविताएँ। वे पेशे से जहाज़ी हैं और दिल से लेखक। हिन्द युग्म और राजकमल प्रकाशन से उनके एक एक उपन्यास प्रकाशित हैं। चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सिंगापुर में रहते हैं और इंस्टाग्राम पर वीकेंड वाली कविता चलाते हैं। आज पढ़िए उनकी कुछ कविताएँ- मॉडरेटर

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    1

    वजूद

    कभी कभार मान लिया करो,
    अपनी ग़लतियाँ,
    बिना अनभिज्ञता या संदेह की ओट में छुपाए,
    हँस लिया करो अपनी,
    ख़ालिस मूर्खता पर,

    कालका मेल से धड़धड़ाकर गुजरते इस जीवन में,
    तथ्यों के कई स्टेशन छूट जाएँगे,
    कबूतर से डाकिया और फिर इंटरनेट,
    ये सारे संदेशवाहक समझ न आयेंगे,

    परिवर्तन के इन तूफ़ानों में,
    दीवार पर अधचिपके पोस्टर सा वजूद बचाते रहना,
    सेल्फ़ी साशित इस संसार में,
    अपना शटर वाला कैमरा चलाते रहना,
    पाप संगीत के डिस्को लाइट नुमा थिरकन में,
    तुम विलंबित लय में सधे मौन का ध्रुपद गाते रहना,

    परिवर्तन में पीछे छूट जाने की,
    ये ग़लतियाँ रोबिनहुड नुमा की गई परम सात्विक चोरियाँ हैं,
    जिनके लिए अपने गाल पर थपकी की सज़ा दे लेना,
    किंतु इस परिवर्तन के रफ़्तार में भी,
    पीछे छूट जाने की चिंता से परे,
    अपने वक्त का घोड़ा बाँधकर,
    अपने वजूद की कुण्डी खटखटाकर,
    अपने स्वाभिमान वाले कमरे में ,
    गाहे-बगाहे विश्राम करते रहना,
    कितना भी पिछड़ापन दिखे किंतु,
    अपने मन का काम करते रहना,

    2

    कहाँ से हो?

    शहरों की रोशनी ने ले ली है,
    पास के सारे गावों की बिजली,
    शहरों की बाढ़ में डूब से गये हैं,
    इन गाँवों की अपनी पहचान,

    जब कोई पूछता है कि कहाँ से हो?
    मैं बड़े विस्तार से बताना चाहता हूँ,
    परसीपुर से आठ किलोमीटर दक्खिन,
    बरवाँ गाँव है मेरा,
    कोई ऑटो या ताँगा भले मिल जाये,
    किंतु लठिया पुल से तीन किलोमीटर पैदल ही जाना होगा,
    एक बूढ़े पीपल के पास का खड़ंजा रास्ता मेरे घर की ओर ताकता होगा,

    पर मेरे सकुचाये गाँव को,
    उघाड़ने की मुझमें हिम्मत नहीं,
    और मुझे इतने क़रीब से जानने की,
    तुम्हारे पास इतनी फ़ुरसत नहीं,

    इसलिए मैं अपने गाँव की सारी मिठास,
    शहर के चमचमाते रैपर में पेश करता हूँ,
    “मैं बनारस से हूँ” सिर्फ़ यही कहता हूँ,
    मेरे इतने कहने भर से,
    तुम्हें गंगा से लेकर मोदी तक
    हर चीज़ की फ़िक्र है,
    किंतु इन बातों में कहाँ,
    मेरे गाँव का ज़िक्र है,

    इस तरह के अनेक गाँवों से बने मेरे देश की अजीब विडंबना है,
    पगड़ी बांधे भटिंडा के पाजी ख़ुद को
    दिल्ली का कहते हैं,
    सफ़ेद चप्पल पहने आसनसोल के बड़े बाबू,
    ख़ुद को कलकत्ते का समझते हैं,
    हर कोई ख़ुद को किसी न किसी
    शहर का कह रहा है,
    जबकि उसके भीतर पहचान छुपाए,
    उसका छोटा सा गाँव रह रहा है

    3

    रात 

    आँखों में अचानक खुली नींद,
    और पैरों में जूता बाँधे,
    मैं सुनसान सड़क पर चलता हूँ
    किसी भिनसार के तारे की तरह,

    अधिकतम की लालसा लिए
    दिन के निकल आने से पहले,
    अपने न्यूनतम से बेहद खुश
    रात सुस्ता रही है,

    बेसुध सो रहे हैं घरों में लोग,
    मानो मर चुके हों
    और जलने की कोई जल्दबाज़ी न हो,
    सारी भागदौड़ जीवन तक ही सीमित थी,

    यहीं ऊँघती सड़कें थोड़ी देर में,
    पट जायेंगी ट्रैफिक की चिल्ल पों से,
    कितनी यात्रायें, मिलन बिछोह
    कितना कुछ ढोयेंगी सुबह होते,
    जीवन से मृत्यु की लंबी यात्रा में,
    प्रेम, घृणा, क्रोध के कई पड़ाव मिलेंगे,

    यही गहरी नींद में सोये ऑफिस,
    अपने मीटिंग रूम में तय करेंगे,
    अगले कई वर्षों का भविष्य,
    मृत्यु की योजना से अनभिज्ञ,
    जो चील की तरह झपट्टा मार लेगी
    या फिर बिना धूप के बंद कमरों में,
    एक लंबी नीरस प्रतीक्षा कराएगी,

    विद्यालय की सो रही कक्षायें,
    जहां आज सुबह परीक्षा में बच्चे पन्नों पर,
    अपनी तक़दीर लिख रहे होंगे,
    जबकि सच तो यह है,
    दीमक खा गये उन अंक पत्रों को,
    जिन्हें देखकर हम फूले नहीं समाते थे,
    रद्दी के भाव बिक गई वो कॉपियां,
    जिनपे Very Good देखकर इठलाते थे,

    न जाने कितनो के लिये कितनी वजहों से
    ख़ास हो सकता है यह दिन,
    किंतु रात ने एक जादूगरिनी की तरह,
    घुमा दी है विश्राम की छड़ी,
    इस सारी दौड़ भाग पर ,
    सड़कें, विद्यालय, ऑफिस, दुकानें,
    सब गहरी नींद में सो गये हैं,
    और बन गई है सबकी ख़ास,

    जिस मज़दूर ने अपनी प्रेमिका को
    रानी बनाने का वादा किया था,
    वह अपने सिर पर मुकुट का स्वप्न देख सकता है,

    और मैं ,
    जो सिर से पाँव तक एक कवि ठहरा,
    जिसकी आत्मा तक में स्याही का नीला काला रंग पुता पड़ा है,
    रात के वीराने से कई सहमे शब्द चुन लेता हूँ,
    जिन्हें लेकर एक सुंदर वाक्य बनाऊँगा,
    जिसे कहे जाने पर,
    प्रेम और करुणा की गूंज सुनायी देगी,
    इससे पहले की बीत जाये यह रात,
    और दौड़ भाग प्रतियोगिता की घोषणा करता,
    दिन पुनः उपस्थित हो

     

    4
    मज़दूर की प्रेमिका

     

    उस मज़दूर ने अपनी प्रेमिका की,
    नरम और मुलायम हथेलियों को,
    जब अपनी खुरदरी हथेली में रखा,
    उसे लगा जैसे अंगारों पर किसी ने,
    रुई के ठन्डे फाहे रख दिए हों,

    काम पर लौटते हुए उसे लगा,
    मानो प्रेमिका की हथेलियों के परमाणु,
    उसकी हाथों की रेखाओं में उतर आये हों,
    उस रोज दिन भर काम करते हुए,
    वह जिस चीज़ को हाथ लगाता,
    उसमे उसकी प्रेमिका आ जाती,
    पहली बार उस दिन मज़दूरी करते,
    वह इतना ज्यादा खुश था,

    उस लड़की ने जो कवितायें सुनाई थी,
    उसे उनके ज़रा सा भी मानी न पता थे,
    किन्तु कानों में सितार की तरह,
    गूंजती रही वे कवितायेँ नींद आने तक,

    उस रात नींद में उस मज़दूर ने,
    राजमुकुट साजने का स्वप्न जिया था,
    जब प्रेम के अतिरेक में उस लड़की को,
    रानी बनाने तक का वादा किया था,

    इसी दुनिया में इसी तरह से रहते,
    किस्मत के तमाम अत्याचार सहते,
    वह जब भी उस लड़की से मिलकर लौटता,
    उसे यही दुनिया खूबसूरत और
    जीने लायक लगने लगती,
    वह लड़की सिर्फ उसका प्रेम नहीं,
    एक विश्वास थी,
    कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा

    5

    दिसंबर में सिंगापुर

    सिंगापुर सुस्ताता है,
    दिसंबर के महीने में,
    जैसे तेज रफ़्तार से भागता कोई धावक,
    धीमा हो गया हो रेस के बाद,

    आदतन जिस शहर को भागते देखा,
    अजीब सा लगता है उसका,
    यूँ धीमी गति से चलना,

    अमूमन जिन बसों और ट्रेनों में,
    भीड़ उमड़ आया करती थी,
    उदास सी लगती हैं खाली सीटें,

    जिन स्कूलों के पास के चौराहे,
    पटे रहते थे बच्चों की मसखरी से,
    वीरान से दिखती हैं वे काली सड़कें,
    ऑफ़िस के मीटिंग रूमों की,
    सारी गहमागहमी और शोर शराबा,
    मानो क्रिसमस मनाने में व्यस्त हों,

    लोगों के बिना लगता है जैसे,
    इस चिड़ियाघर के सारे पंक्षी
    उड़ गए हैं किसी अस्थायी प्रवास को,

    और मौसम भी सहजोर हो जाता है,
    इस अनायास से उपजे अकेलेपन का,
    जब सुबह की गुलाबी ठंड,
    हिलते डुलते से पेड़ों के पत्ते,
    और हर शाम एक सीली सी हवा,
    हाथ जोड़े बारिश की प्रतीक्षा करती हैं,
    लगता है पी जाएगी साल भर की,
    भूमध्यरेखीय गर्मी की तपिश को,

    बेहतर होते चले जाने की,
    अनवरत दौड़ में शामिल,
    इस देश के विश्राम का समय है दिसंबर,
    एक अजीब खुशनुमा नीरसता लिए,
    सिंगापुर इस प्रतीक्षा में है कि,
    लौट आयेंगे सारे प्रवासी पंक्षी
    जनवरी के महीने में और फिर से,
    पट जायेंगी सड़कें, स्कूल, ऑफिस,
    जगह न होगी बसों और ट्रेनों में,
    और जब दौड़ पड़ेगा तेज रफ़्तार में,
    लगेगा की अब सब सामान्य है,

    6

    वियोग

    तुम्हारे चले जाने का वियोग,
    हृदय पर कैसे तीव्र घात कर गया है,
    कि घटता जा रहा इसका स्पंदन,
    और होता जा रहा यह पाषाण सरीखा,

    तुम्हारे इस तीव्र विछोह के पीछे,
    इससे भी तीव्र तुमसे प्रेम था मेरा,
    जो दुबककर अदृश्य हो गया है,
    इस पाषाण हृदय की तलहटी में,

    धीमी लौ की तरह बहती रहती हैं,
    तुम्हारी स्मृतियाँ इस पत्थर पर,
    और झर आते हैं एकाध आंसू,
    किन्हीं एकांतिक टीस के क्षणों में,

    गुज़रते हुए वक्त के साथ,
    मेरे आँसुओं ने तुम्हारी स्मृतियों को,
    धीरे धीरे जमाना शुरू कर दिया है,
    इस पत्थर की बाहरी परत पर,

    तुम्हारी अनंत स्मृतियों की,
    गाढ़े चटक हरे रंग की काई,
    अब पूरी तरह जम चुकी है,
    मेरे इस पाषाण हृदय पर,

    अब इस पत्थर दिल पर से,
    फिसल जाता है, कोई नया प्रेम,
    नहीं टिकता कोई नया भाव,
    या फिर कोई नई सी संभावना,

    अब तुम्हारे वियोग में बस मैं हूँ,
    अपना पाषाण हृदय लिए,
    और तुम्हारी स्मृतियों की काई है,
    इस पत्थर को आच्छादित किए हुए,

    7

    अगर मैं सड़क होता

    अगर मैं सड़क होता,
    मना कर देता बिछने से,
    किसी सूखी नदी के सीने पर,

    नहीं लगता मुहर इस सरकारी दलील पर,
    कि इस नदी में फिर कभी धार न फूटेगी,
    नदी का काम है पानी संग बहना,
    मैं नदी पर बिछकर,
    उसकी पानी से मिलने की उम्मीद,
    सदा के लिए नहीं खारिज करता,

    मेरे लिए करने को,
    और भी तो कई काम हैं,
    मसलन, मैं बनाता उन रास्तों को,

    जिनसे होकर मटरगश्ती करते स्कूली बच्चे,
    जा पायें झमाझम बारिश में स्कूल,
    मैं उनके पैरों की फिसलन थाम लेता,
    जिनसे होकर ब्याहता लड़कियां,
    लौटती हों गाड़ियों में अपने पीहर,
    मैं उनके पहुँचने की जल्दबाज़ी पहचान लेता,
    जिनसे होकर मरीज़ की टूटती साँसे,
    झट पहुँच सकें हस्पताल,
    मैं अपने सीने पर एम्बुलेंस बाँध दौड़ जाता,
    जिसके होकर दूर गाँव का डाकिया,
    पहुँचा पाता विरहन को प्रेम की पाती,
    मैं उसके खतों का झोला संभाल लेता,

    और इन कामों से जो फुर्सत मिलती,
    तो मैं सिखाता किसी नन्हे को,
    पहली बार साइकिल चलाना,
    नहीं छिलने देता मैं उसका घुटना,
    अपने किनारे लगता मैं,
    डेजी के सफेद फूल,
    जो सर्दियों की गुलाबी ठंड में,
    खिल खिल आते मेरे सीने पर,
    मैं खेलता उनसे,

    इस जीवन में मैं किसी का हक,
    मारने की फिराक में नहीं होता,
    करने को वैसे भी कितने काम थे
    जहाँ मेरी थोड़ी सी भी ज़रूरत होती,
    मैं बस वहाँ अपने हिस्से का दे आता

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