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  • विभा रानी के उपन्यास ‘कांदुर- कड़ाही’ का एक अंश

     

    जानी-मानी लेखिका, अनुवादिक, रंगकर्मी, अभिनेत्री विभा रानी का उपन्यास आया है ‘कांदुर- कड़ाही’। वनिका प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का एक अंश पढ़िए-

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    दिल्ली में काजल कौल को राजमा की आदत पड़ गई। जगह- जगह राजमा चावल की रेहड़ी। लाजवंती देवी का बनाया राजमा उसे पागल कर देता। बाजार में कई तरह के राजमा थे- डार्क ब्राउन, लाइट ब्राउन, बड़े दाने, छोटे दाने। एक बार तो उसकी एक हिमाचली दोस्त ने भी अपने यहां का राजमा लाकर दिया था- फूलकर अठन्नी के आकार का हो जाता था वह राजमा। स्वाद में भी एकदम अलग। लेकिन उसे पसंद है छोटे- छोटे दानेवाला राजमा। आलू की तरह झट से पक जानेवाला राजमा। पककर अपना रस प्रेम के रस की तरह गाढा कर देनेवाला राजमा! इस रस से राजमा गाढ़ा और मलाईदार बनता।

    राजमा की यह आदत काजल कौल की मुंबई में भी नहीं छूटी थी। पहले तो महीने में हर दूसरे- तीसरे दिन बनाती थी, लेकिन मुंबई में सरिता मंडल से मिलने के बाद उसके जीवन की कड़ाही, छोलनी, गैस में ढेर सारे परिवर्तन हुए, जिसमें राजमा तीसरे दिन से सप्ताह, सप्ताह से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह दिन से महीने में बदलने लगा।

           दिल्ली आने के बाद काजल कौल को हर दिन, बल्कि कहा जाए तो हर घड़ी सरिता मंडल याद आती रहती है। हर दूसरे तीसरे दिन वह उसे फोन भी कर लेती है। हर बार कहती है- ‘तुम दिल्ली आ जाओ।’

    ‘और जब आपका ट्रांसफर दिल्ली से कहीं और हो जाएगा तब?’

    ‘तो तुम वहीं चलना। जहां मैं, वहां तुम।’

    ‘हेसबेंड को तलाक देना पड़ेगा।’

    सरिता मंडल की मोहिनी मुस्कान राजमा के रस की तरह ही है- गाढी और प्रेमिल। काजल कौल की मम्मी राजमा बनाती। गर्म- गर्म राजमा के साथ चावल। काजल कौल की भूख जैसे उस दिन कई गुना ज्यादा बढ़ जाती। वह कहती- ‘मम्मी, आज तो पेट में राक्षस समा गया है।’

           ‘अरे, राक्षस समाए दुश्मनों के। तू तो खा। जी भरकर खा।’ मम्मी उस दिन ज्यादा राजमा और ज्यादा चावल बनाती।

    ‘आपको नॉनवेज नहीं पसंद?

           ‘कुछ खास नहीं, जबकि हमलोगों के लिए नॉनवेज मस्ट है। बिना नॉनवेज के हम लोग नहीं रह सकते हैं।’

           ‘मिथिला के पंडित लोग की तरह।’ सरिता मंडल ने कहा था।

           ‘अच्छा? वे लोग सब्जियां नहीं खाते हैं?’

           ‘सब्ज़ी भी खूब खाते हैं। घरे- घर कदीमा, कद्दू, सेम, कोहरा, पोए का साग, नोनी साग, तिलकोर का बेल लगा होता है।‘

    ‘लीफ़ी वेजिटेबल?’

    ‘कदीमा, कद्दू आदि के पत्तों का तरुआ भी बनता है।’

           ‘अरे वाह! मुझे इतनी सब्जियाँ मिले तो मैं मटन खाऊं ही नहीं।‘

    ‘अच्छा?’

    ‘हमारे यहां तो शिवरात्रि में भी नॉनवेज बनता है।’

           ‘हमारे यहां दुर्गा पूजा में देवी को बलि चढ़ती है। बाकी के रोज दिन में भी जो लोग मानता माने रहते हैं, वे सब भगवती को बलि चढ़ाते हैं।’

           ‘अच्छा।’

           ‘मिथिला का खासियत तो वहां का पोखरा सब और उसमें मिलनेवाली मछली सब है। बाप रे बाप! इतना वैरायटी!”

           ‘तो?’

           ‘तो बस! ई मछली सबको खानेवाला लोग सब भी तो होना चाहिए न?’

           ‘तो क्या मिथिला में केवल ब्राह्मण ही होते हैं?’

           सरिता मंडल हंसने लगी। केवल ब्राह्मण सब ही होता तो हमलोग कहां से आ जाते? वहां ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ आदि से लेकर छोटका जात तक दुसाध, मुसहर, धानुख, कुर्मी सब होते हैं और डोम और चमार भी। ये लोग सबकुछ खाते हैं- डोका, सिथुआ, केकड़ा- सबकुछ। पंडित लोग केवल मछली और छागर खाते हैं।

           ‘छागर?

           ‘मटन।’ सरिता मंडल को शायद बकरा और मांस कहना अच्छा नहीं लगा था। बोली- ‘मिथिला में मछली शुभ का प्रतीक है। सीता के साथ साथ शक्ति की उपासक है मिथिला। शक्ति को बलि चढ़ती है। इसलिए बली को लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। लेकिन बाकी चीज़ सब नहीं खाते।‘

           ‘बाकी मतलब?’

           ‘अंडा, चिकन।’

           ‘क्यों?’

           ‘इसको मुसलमानी भोजन मानते हैं।’

           ‘मुसलमानी भोजन का मतलब?’

           ‘कहते हैं कि ई सब खाना मुसलमान लेकर आए।‘

           ‘मुसलमान तो बहुत कुछ लेकर आए, नहीं तो हम आज बिरियानी या मुगलई कैसे खाते या फिर सिले हुए कपड़े कैसे पहनते? तुम कैंची कैसे चलाती और पाजामा, लुंगी, शेरवानी सब कैसे पहनती, पहनाती?’

           ‘पता नहीं दिदि। मैं इतना सब कहाँ जानती हूँ?’

           ‘जानती तो हो। अभी इतनी अच्छी ज़बान में अपनी मिथिला के बारे में बताया। अच्छा लगा। जानकारी मिली। हमलोगों के लिए तो मिथिला का मतलब अभी तक केवल सीता ही है। सीता के संग राम। लेकिन अब जय श्रीराम! सीता फिर से नेपथ्य में। अच्छा, अभी भी वहाँ ऐसा ही चलता है?’

           ‘नहीं। अभी तो बहुत कुछ बदल गया है। अब तो सभी लोग सबकुछ खाते हैं। घर में भी पता भी रहता है सभी को। अब तो पकता भी है- एक ही चूल्हे पर।‘

           ‘एक ही चूल्हे पर?’ काजल कौल  के लिए सरिता मंडल की हर बात हैरानी का एक पिटारा होती।

           ‘हाँ। पहले बल्कि अभी भी कई घर में मांस- मछली पकाने- खाने के लिए अलग घर, अलग चूल्हा रहता है। कितना घर सब में अभी भी मांस- मछली खाने के बाद लोग सबको पहले नहाना पड़ता है। फिर वे घर में घुस पाते हैं।‘

           सिम पर चढ़ा कुकर सीटी ना मार कर खाली सी….सी…. कर रहा था।

    ‘हू….हु….! सरिता मंडल की बातें सुनकर काजल कौल के मुंह से भी सीटी निकल गई थी। फ्रिज में आटा रखा हुआ था। काजल कौल उसे निकालना भूल गई थी। इसका मतलब कि आज सरिता मंडल उसके दिलो- दिमाग पर गहरे से छाई हुई है। कितना आराम रहता था सरिता मंडल के रहने से। मन को एक सुकून मिलता था। सरिता मंडल का मुस्कुराता चेहरा उसकी सारी थकान को पतझड़ के मौसम में गिरे पत्तों की तरह झाड जाता। काश, वह सरिता मंडल को अपने साथ मुंबई से दिल्ली ले आई होती।

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