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स्त्रीत्व को लेकर हिन्दू धर्म का रुख

देवदत्त पट्टनायक हमारे समय में संभवतः मिथकों को आम लोगों की भाषा में पाठकों तक सरल रूप में पहुंचाने वाले सबसे लोकप्रिय लेखक हैं. उनकी नई पुस्तक आई है ‘भारत में देवी: अनंत नारीत्व के पांच स्वरुप‘. यह हिन्दू धर्म में देवी के स्वरुप को लेकर संभवतः पहली पुस्तक है, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रचलित मिथकों के आधार पर देवी के स्वरुप को समझने-समझाने का प्रयास किया गया है. अंग्रेजी से इसका हिंदी अनुवाद मैंने किया है. पुस्तक राजपाल एंड सन्ज प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत है पुस्तक का एक अंश- प्रभात रंजन 
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पुरुष आत्मा तथा स्त्री पदार्थ
वैसे तो वैदिक विचारों में हिन्दू विचारों का प्रभाव रहा है, हिन्दू धर्म वेदांत से लेकर योग के रहस्यवाद, तंत्र की रसविद्या से लेकर ब्राह्मणवादी धर्म का सम्मिलन है. इसके अलावा, हिन्दू धर्म ने लोक की अनेक मान्यताओं एवं आदिवासी आचारों को अपने में शामिल करके खुद को समृद्ध बनाया.
इनकी शुरुआत हुई सैकड़ों साल पहले वैदिक काल में और उसने आज के आधुनिक हिन्दू धर्म को जन्म दिया. वैदिक कर्मकांड जिसको यज्ञ के रूप में जाना जाता था, साधुओं ने आहुति और मन्त्रों के माध्यम से पृथ्वी के जीवों को शक्तिशाली बनाने का काम किया इस उम्मीद में कि इससे मानव समाज में जीवनदायिनी रह का प्रवाह बना रहे. समय के साथ ये जो विस्तृत उत्सव थे वे समाज की आध्यात्मिक जरूरतों के को पूर्ण करने वाले नहीं थे. कुछ बौद्ध या जैन धर्म की मठ केन्द्रित व्यवस्था की तरफ मुड़ गए. बाकी योग जैसी रहस्यवादी प्रथाओं की तरफ मुड़ गए. कुछ नास्तिक हो गए तथा और भक्ति की तरफ मुड़ गए. पूजा के माध्यम से भक्त भगवान् को खुश करने लगे जिनको जीवन के चक्र को चलाने के लिए उत्तरदायी माना गया. कुछ लोगों ने सबसे सबसे बड़े देवता के रूप में शिव को देखा, जो संन्यासी थे जबकि दूसरे लोगों ने उसे विष्णु के रूप में देखा, जिनको दुनिया को पसंद करने वाले देवता के रूप में देखा गया, विशेषकर उसके सबसे सम्मोहक अवतार कृष्ण के रूप में.
शिव और विष्णु हिन्दू आस्तिक धर्म के दो स्तम्भ हैं, लेकिन उनकी अलग से  पूजा नहीं की जाती थी. दोनों की एक एक सहचारी थी: शिव की शक्ति और विष्णु की लक्ष्मी. यह माना जाता था कि ईश्वर जो होते हैं वे अपने सहचरियों के शक्तिहीन होते हैं. वे शक्तियां थीं जो शक्ति और दमक के माध्यम होते थे. देवता केवल देवियों की कोख में ही रूपकार ले सकते थे.   
शिव के भक्तों के लिए ईश्वर के लिंग में ब्रह्मांडीय चेतना का बीज छिपा होता है जबकि देवी की योनि समस्त ऊर्जा का स्रोत होता है. दुनिया तभी तक रहती है जब तक कि दोनों एक रहते हैं. अलगाव का मतलब होता है ब्रमांड का विखंडन: ‘साधू लोग इस बात को लेकर गुस्से में थे कि शिव उनके आश्रम से गुजर रहे थे, वे नंगे थे और उनका लिंग जाग्रत था. इसलिए उन लोगों ने उसको काट डाला. शिव का लिंग अग्नि अस्त्र में बदल गई और हर दिशा में इस धमकी के साथ घूमने लगी कि वे तीनों संसार को मिटा देंगे. साधू गण ब्रह्मा के पास गए तो ब्रह्मा ने उन्हें यह कहा कि अगर शिव के लिंगम को शांत नहीं किया गया तो वे वे इस ब्रह्मांड को मिटा देंगे. तब साधुओं ने शक्ति का आह्वान किया जिन्होंने शिव के लिंगम के द्रव्य के लिए अपने कोख को आगे कर दिया. शक्ति की योनि में शिव के लिंगम की भयभीत करने वाली ऊर्जा बिखर गई. इस तरह शिव और शक्ति के मेल ने दुनिया को बर्बाद होने से बचा लिया. शिव के लिंगम की छवि शक्ति की योनि में बंद हो गई और इसीलिए सभी उनका आदर करते हैं.’ (शिव पुराण)
शिव नाम का अर्थ है ‘शुद्धता’. शुद्ध चेतना के रूप में शिव सभी कर्तव्यों, कार्यों और रूपों से बेदाग़ हैं. ऊपर की कहानी में, शिव इस बात से अप्रभावित हैं कि उनका पुरुषत्व चला गया. वे इस बात से पूरी तरह से उदासीन लग रहे हैं कि उसके नतीजे में जो अराजकता हो सकती है. शिव से जुडी कथाओं में यह बात बार बार आती है कि शिव विवाह नहीं करना चाहते थे. जबकि उन्होंने ब्रह्मांड के जन्म का विरोध किया था, वे उस समय आनंद की अवस्था में थे जब पदार्थ जड़ अवस्था में थी और आत्मा रूप से मुक्त थी. आश्चर्य की बात नहीं है कि उनको विध्वंस का देवता माना जाता है.  
विष्णु वे देवता हैं जिन्होंने उस निर्मिति को सतत बनाए रखा है और जिसे शिव नष्ट करना चाहते हैं. वह विशुद्ध चेतना है. उनके नाम का मतलब है व्यापक. विष्णु सभी चीजों में व्याप्त हैं और वे सभी चीजों में जीवित भी हैं. विष्णु के भक्तों के लिए, विष्णु का नीला रंग यह बताता है कि वे आकाश की तरह व्यापक तथा अस्पष्ट हैं जबकि उनकी सहचरी लक्ष्मी की लाल साड़ी पृथ्वी की उर्वरता का प्रतिनिधित्व करती है. वे रक्षा करने वाले हैं; जबकि लक्ष्मी देने वाली है:
“पृथ्वी-देवी भूदेवी लक्ष्मी ही है जो कि समुद्र पर तैर रही है, लहरों की गोद में, जिसे सूरज गर्मी प्रदान करता है, वर्षा नमी प्रदान करता है. एक दिन राक्षस हिरण्याक्ष भूदेवी को खींचकर समुद्र के भीतर ले गया. जब वह मदद के लिए चिल्लाई तो विष्णु ने जंगली वराह का रूप ले लिया, समुद्र में कूद गए, सींग से मार-मार कर हिरण्याक्ष को मार दिया और भूदेवी का बचा लिया. जब वे ऊपर आये तो विष्णु ने भूदेवी को भावावेश में ले लिया. इस तरह, पहाड़ और धरती अस्तित्व में आये. उन्होंने अपने वीर्यवान दाँतों को मिटटी में गाड़ दिया और भूदेवी को बीज से भर दिया. इस तरह, पौधे और पेड़ जन्मे. भूदेवी ने विष्णु को अपने अभिभावक के रूप में स्वीकार कर लिया औए उनका नाम भूपति रखा. नीले अम्बर की तरह विष्णु ने उससे यह वादा किया कि वे उसे हर समय देखते रहेंगे.” (भगवत पुराण)   
हिन्दू पावन कथाओं के लोकप्रिय रूपों में त्रिदेव जीवन के चक्र को घुमाते हैं. ब्रह्मा निर्माण करते हैं. विष्णु चलाते हैं और शिव विध्वंस करते हैं. निर्माण करने के लिए ब्रह्मा को सूचना की जरुरत पड़ती है जो कि सरस्वती से आती है, जो ज्ञान की देवी हैं और उनकी सहचरी भी. चलाये रखने के लिए विष्णु को साधन की जरुरत होती है जो कि उनको अपनी सहचरी लक्ष्मी से मिलती है, जो कि धन एवं शक्ति की देवी है. शिव विध्वंस बन जाते हैं और उनको अपनी सहचरी शक्ति से ताकत एवं प्रेरणा मिलती है. शक्ति गौरी भी है प्रेम की तेजस्वी देवी, तथा काली भी है जो कि गहरे रंग की विनाश की देवी है. देवता निर्माण करने वाले और कर्ता हैं; जबकि देवियाँ बस होती हैं. सरस्वती प्रकृति के ज्ञान का साकार रूप हैं. लक्ष्मी प्रकृति के धन धन्य का साकार रूप हैं. शक्ति प्रकृति की इस शक्ति का साकार रूप हैं कि किस तरह जीवन को आगे करती है और उसका उपभोग करती है. देवियाँ निष्क्रिय रूप से जीवन के चक्र का निर्माण करती हैं जबकि देवता उसके प्रति प्रतिक्रिया करते हैं तथा सक्रिय रूप से उसे चलाते हैं. पदार्थ तथा आत्मा का दायाँ और बायाँ हिस्सा, स्त्री और पुरुष की तरह एक दूसरे के पूरक होते हैं. वह कुम्हार हैं जबकि देवी मिटटी. जीवनरूपी घड़े को दोनों ही चाहिए. हिन्दू कवियों ने काल्पनिक रूप से इस अंतरनिर्भरता को प्रस्तुत किया है दो यथार्थ को एक शरीर के दो हिस्सों के रूप में प्रस्तुत करके:
‘ऋषि भृंगी शिव की परिक्रमा करना चाहते थे. पार्वती ने उनको रोका. ‘आपको हम दोनों की परिक्रमा करनी होगी क्योंकि वे मेरे बिन अधूरे हैं.’ लेकिन ऋषि ने उनकी परिक्रमा करने से मना कर दिया. तब पार्वती शिव से लिपट गईं और उन्होंने भृंगी के लिए यह असंभव बना दिय कि वे अकेल शिव की परिक्रमा कर सकें. लेकिन भृंगी या तय कर चुके थे कि वे केवल शिव की परिक्रमा ही करेंगे, इसलिए उन्होंने मधुमक्खी का रूप ले लिया और शिव की जटा की परिक्रमा करने लगे. उनके मंसूबे को असफल करने के लिए पार्वती ने अपने शरीर को शिव के शरीर के साथ एकाकार कर लिया और इस तरह से वे एक ही शरीर के दो हिस्से बन गए- पार्वती बायाँ हिस्सा और शिव दायाँ. तब भृंगी ने कीड़ा का रूप ले लिया और उस देवी आधे शरीर के एकदम बीचोबीच गुजरने लगा और और केवल दायीं तरफ से होकर गुजरा. भृंगी की इस धृष्टता से गुस्से में आकर देवी ने ऋषि के दो पांवों को इतना कमजोर बना दिया कि वह न खड़े हो सकते थे न चल सकते थे. भृंगी ने माफी मांगी. जब वे देवी देवता दोनों की परिक्रमा करने के लिए तैयार हो गए तब उनको तीसरा पाँव दिया गया जिससे कि वह समर्थ हो सके और देवी-देवता की परिक्रमा कर  सके.’ (तमिलनाडु की मंदिर कथा)
देवी जो कि ऊर्जा होती है की उपेक्षा करके भृंगी ने चलने की क्षमता खो दी. उनके बिना शिव और कुछ नहीं बल्कि शव के समान है.
पार्वती उभयलिंगी शरीर का बायाँ हिस्सा है. शतरूपा ब्रह्मा के बाएँ हिस्से से निकल कर आई. हिन्दू मान्यता में बाएँ हिस्से का स्त्रीत्व से जुड़ाव इतना मजबूत है कि स्त्री को वामांगी कहकर बुलाया जाता है, सुन्दर बायाँ हिस्सा. उर्वरता के पन्थ ने महिलाओं को प्रमुखता दी, जैसे तंत्र पंथ, जिसको वामाचारी कहा जाता है, बाएँ तरफ चलने वाले. हिन्दू कर्मकांडों में कोई महिला हमेशा अपने पति के बाईं तरफ बैठती है. मंदिरों में, देवी की मूर्ति भगवान की मूर्ति की बायीं तरफ होती है. बायाँ ही क्यों? इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता. इस सन्दर्भ में, महाभारत में एक मजेदार कथा आती है: ‘नदी की देवी गंगा ने प्रतिपा को देखा, जो हस्तिनापुर के राजा थे, वे नदी के तट पर ध्यान लगाए हुए थे. वह गई और उनकी गोद में बैठ गई और उसने उनसे कहा कि वह उससे शादी कर ले. लेकिन राजा ने मना कर दिया क्योंकि उसने दुनिया से संन्यास ले लिया था. जब गंगा ने जोर दिया तो प्रतिपा ने कहा कि अगर तुम में बायीं जंघा पर बैठी होती तो मैं तुमको अपनी पत्नी के रूप में अपनाने के बारे में सोच सकता था. ‘तुम मेरी दायीं जंघा पर बैठी जो कि बेटियों के लिए आरक्षित होती है. इसलिए जाओ और मेरे बेटे शांतनु से विवाह कर लो और मैं तुमको अपनी बहू के रूप में देख सकता हूँ.’ (महाभारत)

 

इसका मतलब यह हो सकता था कि अगर पत्नी बायीं तरफ हो तो दायाँ हाथ योद्धाओं के लिए खाली रहता है ताकि वे तलवार पकड़ सकें और पुजारियों के लिए वह दान के लिए खुला रहता है. इसका मतलब यह भी हो सकता था है कि चूँकि शरीर का बायाँ हिस्सा वह होता है जिसमें दिल अवस्थित होता है और दिल भावनाओं एवं प्रवृत्तियों का केंद्र होता है इसलिए वहीं ‘प्रकृति माँ’ अवस्थित होती है. इसका मतलब यह भी हो सकता है कि पुराने जमाने के लोग इसलिए पुरुष को दायीं तरफ से जोड़ कर देखते थे क्योंकि वे इस बात को जानते थे कि शरीर का दायाँ हिस्सा बाएँ दिमाग के द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जिसके बारे में आधुनिक विज्ञान यह पुष्ट करता है कि वह तर्क का स्थान होता है. इस बात के ऊपर भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बायाँ हिस्सा हिन्दू धर्म में अशुद्ध और अशुभ माना जाता है. बाएँ हाथ से न तो उपहार दिया जाता है न ही लिया जाता है. बायाँ हाथ सुरक्षित रखा जाता है दान के बाद सफाई करने के लिए. कोई यह सोच सकता है कि इससे स्त्रीत्व को लेकर हिन्दू धर्म के रुख के बारे में क्या पता चलता है.   

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