मुखौटा इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत है

कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनको न ईनाम-इकराम मिलते हैं, न कविगण उनको अपनी जमात का मानते हैं, लेकिन इससे उनकी कविताओं की धार कम नहीं होती है. मुझे लगता है कि हिंदी कविता में आज अगर कुछ ताजगी नजर आती है तो ऐसे कवियों की कविताओं में ही. त्रिपुरारि कुमार शर्मा ऐसे ही युवा कवि हैं. बड़े दिनों बाद उनकी ताजा कविताएं पढ़ी तो आपसे साझा करने का मन हुआ- मॉडरेटर. 

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मुखौटा
वह जानती है कि ख़ूबसूरत शब्दों के पीछे
उसका चेहरा आज भी नंगा है
बेलिबास हैं उसकी आँखें
जिनकी पुतलियों की सतह पर
नीले रंग का एक फूल
बत्तीस जुगनुओं की रोशनी में
शाम होते ही महकने लगता है
और सूरज के निकलते ही सूख जाता है।
वह जानती है कि नाबालिग माँ होना
कितना सुखद और शर्मनाक है
कितनी बेबस हो जाती है आत्मा
जब एक कविता बन जाती है नगर-वधु
और कवि को
दलाल घोषित कर दिया जाता है।
वह जानती है कि शहर की दीवारों पर लिखे नाम
उस नाम से मेल नहीं खाते हैं
जो उसने पढ़ा था अपने बचपन में
अपनी क्लासमेट की सियाह स्लेट पर
या पोखर के किनारे उगे पेड़ों की पीठ पर
जिसे वह भूल जाया करती थी
ती-ती खेलते हुए। 
वह जानती है कि एक चेहरे में
सिर्फ़ दो आँखें नहीं होतीं
सिर्फ़ एक मुँह नहीं होता आदमी के पास
उसके पास होता है झूठ बोलने का
लाइसेंस
दस हज़ार जानवरों का वहशीपन और 
पलकों की ज़मीन पर सपने बनाने के कई नुस्ख़े।
वह जानती है कि मुस्काती हुई मुलायम हवा
समंदर के जिस्म में सिहरन पैदा करती है
एक जादू जगा देती है धूप
अगर घास के होंठों पर ओस की प्यास मौजूद हो
एक मौसम उतर सकता है जंगल में
अगर पत्तियों के झुरमुट में कोई घोंसला बुना जा रहा हो।
वह जानती है कि अकेलापन कोई फर्नीचर नहीं है
जिसे फेंका जा सके घर के बाहर
और धीमी बारिश एक ऐसी चीज़ है
जो ज़ख़्म जगाती भी है और सुलाती भी।
वह सभाओं के समाप्त होने पर पहुंचती है
सारे गिरे हुए चेहरे चुनती है
सारे मुखौटे बुहार कर साफ़ कर देती है ज़मीन
और कहती है— “मुखौटा इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत है।”


सहारा
मैं हर रोज़ सुबह घर से निकल पड़ता हूँ
और रोज़गार की ख़ातिर भटकता रहता हूँ
और नसीब के टुकड़ों को चुनता हूँ दिन भर
(शाम किस तरह गुज़रती है कुछ पता ही नहीं)

और जब लौटता हूँ देर रात कमरे में
मेरे क़दमों से लिपट जाती है इक तन्हाई
मैं उसकी बाँह पकड़ कर उसे उठाता हूँ
और सीने से उस बिरहन को लगा लेता हूँ
और फिर सोचने लगता हूँ बेवजह यूँ ही
वो एक रात कि जब मैं न लौटूँगा वापस
मेरी तन्हाइयों को कौन सहारा देगा
?


बारिश @ मरीन ड्राइव
बस दो-चार मिनट बरसा था प्यासा पानी
अपनी तन्हाई अपने जिस्म में समेटे हुए
किसी की याद अपनी रूह में लपेटे हुए
मरीन ड्राइव पर बेवजह यूँ ही लेटे हुए
मैं बहुत देर तलक़ भीगता रहा था वहाँ
एक एक बूँद जो गिरती थी मेरे चेहरे पर
तो सदा छन्न् से उठती थी
, बिखर जाती थी
हज़ारों ज़ख़्म उभरते थे दिल के दामन पर
तुम कहीं दूर बहुत दूर नज़र आई मगर
सफ़ेदो-सियाह से मंज़र में आँख टाँके हुए
हज़ार हिस्सों में ख़ुद को जैसे बाँटे हुए
तमाम सूखे हुए दुख को जैसे छाँटे हुए
तुम कहीं दूर बहुत दूर नज़र आई मगर
हज़ारों ज़ख़्म उभरते थे दिल के दामन पर
मैं चाहता हूँ उन ज़ख़्मों के दाग़ देखो तुम
मैं चाहता हूँ कि सीने की आग देखो तुम
मैं जिसकी लपटों में रोज़ जला करता हूँ
न जाने कौन
सी है राह, तका करता हूँ
हाय! उस राह की उम्मीद किए ज़िंदा हूँ
मरती आँखों में कोई दीद लिए ज़िंदा हूँ


सरमाया
उस तरफ, दूर, बहुत दूर तक समंदर है
इस तरफ
, तू है और तू ही मेरे अंदर है
उस तरफ
, पानी के माथे पे लहर उठती है
इस तरफ
, धड़कन सीने में सिर पटकती है
उस तरफ
, शोर है, हुज़ूम है आवाज़ों का
इस तरफ
, ख़ामोशी है, चुप्पियाँ हैं साज़ों का
उस तरफ
, कश्तियाँ बहती हैं बीच तूफ़ां में
इस तरफ
, आगसी लग जाती है हर अरमां में
उस तरफ
, सीली सी, नमकीन सी हवाएँ हैं
इस तरफ
, प्यास की मारी हुई घटाएँ हैं
उस तरफ
, टूट कर साहिल भी बिखर जाते हैं
इस तरफ
, रेत छू के पाँव मुस्कुराते हैं
उस तरफ
, लोग ये कहते हैं अरब सागर है
इस तरफ
, पुतलियों पे लिखा ढाई आखर है
ये ढाई आखर ही ज़ीस्त है
, सरमाया है
इन्हीं से रोनकें हैं
, रोशनी है, साया है
अपनी आँखों पे तेरी पलकें झुका लेता हूँ
और इस तरह तुझे सबसे छुपा लेता हूँ
अब मुझे हर तरफ तू ही दिखाई देती है।  


हैरानी
मेरी आँखें हैं या हैरानगी का आलम है?

…कि मेरी नींद की बंजर ज़मीं पर
गीले ख़्वाब की हल्की-सी बूँद की तरह
तुम जब भी अदाओं-सी उतर आती हो
हर चिराग़ जल उठता है दिल-कॉलोनी का
और सोच की शिरयानों में ठहरा लहू
शहर की गलियों में बहने लगता है
मैं बहुत दूर खड़ा देखता हूँ देर तलक़
एक मासूम
सी लड़की ने नन्हे हाथों से
एक नाव बनाई है सादे काग़ज़ की
और उतार दिया है चलते धारे में
मैं बहुत दूर खड़ा देखता हूँ देर तलक़
वो नाव बहती ही जाती है
, बहती जाती है
और फिर डूब ही जाती है उभरकर इक बार
वो लड़की चीख़ने लगती है बहुत जोरों से
उसकी आहों से आसमान फटने लगता है
एक टूटा हुआ टुकड़ा जो मुझपे गिरता है
मेरे बदन का हर हिस्सा बिखर जाता है
हवा-ए-सब्ज़ में उड़ते हैं एक-एक पुर्ज़े
मैं लम्हा लम्हा उन पुर्ज़ों को जमा करता हूँ 

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