बाइयों का ज़माना और हिंदी सिनेमा का आरंभिक दौर

युवा कवि और संगीत पर लिखने के लिए अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने वाले लेखक यतीन्द्र मिश्र को संगीत पर लेखन के लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी ने पुरस्कृत किये जाने की घोषणा की है. यतीन्द्र उन लेखकों में हैं जिन्होंने संगीत लेखन एक माध्यम से आम लोगों को संगीत से जोड़ने का काम किया है, उनको संगीत को लेकर लिटरेट करने का काम किया है. उनको बधाई देते हुए पेश है उनका एक लेख जो उनकी पुस्तक ‘विस्मय का बखान’ से लिया गया है- जानकी पुल 
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हिन्दी फिल्म इतिहास में संगीत का आगमन या फिल्म संगीत का आरम्भ एक महत्त्वपूर्ण घटना रही है। पिछले लगभग सौ सालों में इस बात पर ढेरों बहस-मुबाहिसों और विमर्श के दौर चले कि मूलतः फिल्म संगीत किस ढंग से अपना स्वरूप यहाँ अख्तियार कर सका। बहुत सारी प्रचलित धारणाओं के साथ-साथ, जिस तथ्य की ओर हमारा ध्यान बरबस जाता है, उसमें सर्वाधिक प्रासंगिक वह दौर है, जब भारतीय समाज में बाईयों और तवायफों का दबदबा कायम था। एक प्रकार से यह हिन्दुस्तानी संगीत का वह आरम्भिक दौर है, जब तवायफों का संगीत राजदरबारों, बड़े नवाबी घरानों, महफिलों-मजलिसों एवं कोठों में रचा-बसा था और अपने शिखर पर था। हिन्दी फिल्म संगीत का आरम्भ भी आश्चर्यजनक ढंग से इसी दौर की देन है, जिसे हम सन् 1925 से 1945 के मध्य बीस वर्षीय लम्बे कालखण्ड में पसरा हुआ देख सकते हैं। इस बात को स्वीकारने में मुझे जरा भी सन्देह नहीं है कि भारतीय फिल्म संगीत, खासकर हिन्दी फिल्म संगीत का आरम्भ मुख्यतः बाईयों, तवायफों, नॉच गर्ल्स और नौटंकी के द्वारा हुआ है। ये स्वतंत्रता आन्दोलन के पूर्व (1925-45) का समय है, जिस समय भारतीय समाज में आमोद-प्रमोद के ढेरों प्रदर्शनकारी अभिव्यक्तियों में इन बाईयों का वर्चस्व रहा।

इस अवधारणा को समझने के जतन में उस समय की प्रमुख बाईयों का वर्गीकरण हम मुख्यतः तीन कोटियों में कर सकते हैं, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समय सामाजिक-राजनैतिक स्तर पर जिस तरह बन-बिगड़ रहा था, जिनसे गुज़रकर हिन्दी फिल्म संगीत का बिल्कुल आरम्भिक चेहरा विकसित हो सका। इस वर्गीकरण में जो सबसे दिलचस्प तथ्य है, वह यह है कि बाईयों का एक लगभग बड़ा समुदाय ही अस्तित्व में मौजूद न रहा, जिनमें से अधिकांश तवायफें न जाने किन वजहों से बाद के वर्षों में अन्धेरों में चली गयीं। कुछ के हिस्से में जो थोड़ी बहुत रोशनी हाथ आयी भी, वह भी धीरे-धीरे हमारे सांस्कृतिक समाज की विस्मृति का अंग बन गयी। बाईयों के व्यवहार और उनका विभिन्न प्रकार की कलाओं में संलग्न रहने की पड़ताल को परखने से पहले इतिहासकार सलीम किदवई के एक दुर्लभ और इतिइाससम्मत तर्क पर ध्यान देना लाजिमी है- तवायफों, बाईयों व राजदरबारों एवं नवाबों के यहाँ आसरा पाने वाली गायिकाओं के बारे में कुछ भी ढूँढ़ने से पहले हमें इस बात का खासा ध्यान रखना चाहिए कि इनमें से अधिकांश औरतों को अपने इतिहास को दोबारा से गढ़ना पड़ा है। इन औरतों को अपनी जाती जि़न्दगी में इतने झूठ बोलने पड़े हैं कि आसानी से इनकी बातों से यह निकालना बेहद मुश्किल है कि इनकी जि़न्दगी में जो कुछ हुआ और घटा है, वह कितना सही और कितना गलत है।

                किदवई इन अर्थों में इस पूरी परम्परा पर ऐसी पैनी नज़र डालते हैं कि आपको अपने व्यक्तिगत पसन्द की किसी भी बाई या गायिका को जानने समझने के लिए कम से कम एक मज़बूत सिरा पकड़ में आ जाता है। हाँ, यहाँ यह बताना उतना ही प्रासंगिक है कि जब वे इस तरह का सार्वजनिक बयान इन गानेवालियों के बारे में जारी करते हैं, तो उनका इशारा हमें उस परम्परा के प्रति भी मिलता हुआ नज़र आता है, जो बाद में जाकर सिनेमा में पूरी तरह दृश्यगत हो सका।

                सलीम किदवई के बयान को ध्यान में रखते हुए हमें उस समय की बाईयों की पड़ताल में कुछ दुर्लभ तथ्य हाथ आते हैं। मसलन एक कोटि उन बाईयों की है, जो कभी भी फिल्मों में नहीं गयीं; और जिनको कभी भी हिन्दी या किसी अन्य सिनेमा के खाते में डालकर आँका नहीं जा सकता। इसमें मुख्य रूप से जानकीबाई, छप्पनछुरी, मलका जान, अनवरबाई लखनवी, काशीबाई, रसूलनबाई और मलका पुखराज जैसी धुरन्धर तवायफें शामिल रही हैं। दूसरी श्रेणी उन बाईयों की थी, जिन्होंने फिल्मों में कम और महफिलों में बराबर से अपना दबदबा बनाये रखा। मुझे लगता है, इन गायिकाओं को फिल्मी दुनिया का सुनहला पर्दा रास नहीं आया होगा अथवा उन्हें अपना पेशेवर गायिकी का घराना उस समय ज्यादा महफूज़ लगा होगा, जिसके चलते उन लोगों ने अपना परम्परागत गायन समाप्त नहीं किया। उदाहरण के तौर पर जम्मू कश्मीर की कमला झरिया, बंगाल की अंगूरबाला और अनारबाला, गौहर जान, राजकुमारी, सितारा कानपुरी, अमीरजान और अख़्तरीबाई फैजाबादी।

तीसरी कोटि उन बाईयों की थी, जिन्होंने मुख्य रूप से फिल्मों को ही अभिनय व गायिकी के लिये अपना पसन्दीदा क्षेत्र चुना। सन् 1931 से 1940 के मध्य में प्रचलित इन बाईयों का दबदबा फिल्मी दुनिया में सर्वाधिक था। एक लम्बी फेहरिस्त है ऐसी बाईयों-गायिकाओं की, जो लगातार दस-पन्द्रह वर्षों तक फिल्म और उसके संगीत, दोनों ही परिदृश्यों पर सक्रिय थीं। पर आज लगभग अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद इस तथ्य को आँकना कम दिलचस्प नहीं कि धीरे-धीरे वे सब की सब गुमनामी के अन्धेरे में चली गयीं। इनमें प्रमुख तवायफें हैं- जहाँआरा कज्जन, जिल्लू, मुश्तरी, चन्दा, मिस गुलाब, मिस मोती, शान्ताकुमारी, शकीरा, मोहिनी, खुर्शीद, हीरा, फूलकुमारी, पन्नाबाई, मिस अनुसूर्या, बिब्बो, कमलाबाई, मिस शैला, मिस बदामी, तारा, पुष्पा, सुन्दरबाई, बिमला, मिस अनवरी, माधुरी, रामप्यारी, मिस इकबाल, शिरीन बानो, ललिता, रतनबाई, मिस लोबो, लीलादेवी, हमीदा, शाहजादी, कश्मीरा देवी, चम्पा, मिस पर्ल, शिवरानी, पीरजान, राजकुमारी बनारस वाली, राजकुमारी कलकत्तावाली उर्फ उल्लो बाई, चाँदकुमारी, अमीना, खातून, इन्दूबाला, निहारबाला, राधाबाई, सुलताना बानो, मिस शाहजहाँन, श्यामकुमारी, जरीना, मिस गुलजार, प्रेमकुमारी, अरुणा देवी, हुस्नबानो, इन्दूरानी, मणिबाई, जिल्लूबाई, बृजमाला, शकुन्तला, कान्ताबाई, पुतली, दुर्गाबाई, अजूरी एवं दुलारी आदि।

                यह फेहरिस्त देखते हुए सलीम किदवई का बयान याद आता है कि इनमें से अधिकांश औरतों को अपने इतिहास को दोबारा से गढ़ना पड़ा है। हो सकता है कि जाती जि़न्दगी में इन गायिकाओं के कुछ दूसरे प्रचलित नाम रहे होंजिनके अनुसार वे अपने समय की महफिलें लूटती रहीं, मगर हो सकता है जब उन्हें एक ज्यादा बड़ा प्रभावी क्षेत्र फिल्मी पर्दा नज़र आया, तो कुछ असमंजस में अपनी सही पहचान को छुपाने तथा फिल्म के ग्लैमर भरे जीवन को थोड़ी इज्जत से जीने की चाहत के चलते नाम बदल लिया हो। यह अकारण नहीं है कि ऐसी बाईयों तवायफों की लिस्ट में अधिकांश नाम कुछ गढ़े या नकली से लगते हैं मसलन- मिस लोबो, मिस बदामी, मिस पर्ल, मिस शैला, मिस गुलाब, मिस मोती। ठीक इसी तरह कुछ ठेठ पेशेवर नाम, जो अन्य सन्दर्भों से इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि बीत चुके इतिहास में फिल्मों के अलावा भी इनका कुछ अतीत रहा होगा, जिसकी निशानदेही कोठों तक अवश्य ही मौजूद रही होगी। मसलन चाँद कुमारी, हुस्नबानो, रतनबाई, हमीदा, जिल्लूबाई, पदमाबाई आदि।

                यह वो समय था, जब अंग्रेजों ने सोशल वैल्यूज़ प्रोग्राम बन्द करा दिये थे। किसी भी प्रकार की कुरीति या सामाजिक समस्या पर फिल्म बनाना उस दौर में जोखिम भरा काम था। हर एक फिल्म सघन सेंसरशिप के द्वारा आँकी जाती थी, जिसका असर यह रहा कि अधिकांश फिल्मवालों ने सेंसर से बचने के लिये पौराणिक, मिथकीय और ऐतिहासिक कथानकों में जाकर पनाह ली। मायामच्छिन्द्र, राजा हरिश्चन्द्र, रामशास्त्री, हनुमान पाताल विजय, बिल्वमंगल, सिंहलद्वीप की सुन्दरी, जादूगर डाकू और पृथ्वी वल्लभ जैसी फ़िल्में इस ख़ास परस्थिति को रेखांकित करती हैं। बाईयों के आगमन से एक अतिरिक्त उत्साह फिल्मवालों को यह भी मिला कि फ़िल्मी पर्दे पर उनकी अदायगी का इस्तेमाल वे लोग बखूबी करने लगे, जिसके पहले संगीत देने के लिये पर्दे के बाहर अलग से साजिन्दों सहित फनकारों को बिठाना पड़ता था।

                इस प्रक्रिया में कुछ तवायफों का जिक्र भी यहाँ फिल्म संगीत में विकास के मद्देनजर अवश्यंभावी लगता है। उस लिहाज से तवायफों की जो समृद्ध परम्परा रही, उसमें गौहरजान का विशेष नाम है। यह जानना दिलचस्प है कि हिन्दी फिल्म के आरम्भिक दौर में गौहर जान नाम से मुख्यतः तीन महत्त्वपूर्ण  गायिकाओं,

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