प्रांजल धर की कुछ नई कविताएँ

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से अभी हाल में ही सम्मानित युवा कवि प्रांजल धर की कविता ‘कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं’ हम सब पढ़-सराह चुके हैं. आइये इस प्रतिभाशाली कवि की कुछ नई कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर.
1.
लम्बे सफर की हार
बहुत डर जाता है मन
बढ़ा रक्तचाप लेकर काँपने लगता हाथ,
मृतप्राय दिमाग़ और
थरथराती हुई उभरी नसें सीने की,
उजियारी रात में झील की सतह पर
हिल रहे चाँद की धुँधली तस्वीर-सी;
विदा हो जाती सारी उमंग
और निर्वात हो जाता है
चिन्तन की कोठरी में। बुरी तरह।
इन्द्रिय संवेदन सुन्न
गड़बड़ी बहुत बड़ी लेकिन
हड़बड़ी ज़रा भी नहीं;
दिखते सभी फूल एक-से
भावनात्मक वर्णान्धता के चलते
और फिर मिट जाता अन्तर
काँटों और फूलों का भी;
बराबर तोलता मन हिटलर और गांधी को,
झोंके और आँधी को…
जब देखता स्वप्न में कि बड़ा नुकसान उठाया
पूरी मानवता ने हड़प्पा के स्नानागार से
आज के स्विमिंग पूल तक के बहुत लम्बे सफर में
हर मोर्चे पर हारा इंसान
मन में, घर में, जीवन-समर में।
जागने पर पाता कि खुद हूँ पसीने-पसीने
और चीथड़े हो चुकी है मच्छरदानी !
  
2.
भूकम्पी हिंडोला
स्वार्थ का
ख़तरनाक
भूकम्पी हिंडोला
झकझोरता
भीतरी संसार को
हो जाता तबाह
भीतरी अफ़सानानिगार
चुक जाती किस्सागोई
खो जाती कहानी,
सिकुड़ता
आत्मा का आयतन
विचारों का ब्रह्माण्ड
और क्षीरसागर
सहज मानवीय इच्छाओं का;
समा जाती
इन्तज़ार की क्षीणकाय नदी
किसी भव्य रेगिस्तान में
कुछ ही दूर चलकर…।
3.
ख़ैरआफ़ियत
ख़ैरआफ़ियत पूछता हूँ
फूलों से,
पत्थरदिल तितलियों ने जोंक की तरह चूस डाला उन्हें
नदी पार करने के शौकीन मुसाफ़िरों से,
खेवैयों ने डुबोया है जिन्हें।
चौराहों से,
जहाँ आकर हर गुज़रने वाले ने निर्णय लिया
कि जाना किधर है आख़िर
लेकिन चौराहा न जा सका कहीं
एक इंच भी।
मोबाइल और लैपटॉप से लैस
वीतराग सन्तों से,
जिन्होंने आज तक केवल चोचले ही बघारे हैं।
हृदयज्ञ सरकार और व्यवस्था से,
जो सिर्फ़ और सिर्फ़ वादों से चलती है।
ब्राह्मी, खरोष्ठी और आरमेइक लिपियों से पिरोये हुए
मौर्यकालीन ऐतिहासिक अभिलेखों से
जो प्राकृत में लिखे जाते थे
जनता की ख़ैरआफ़ियत को बनाये-बचाए रखने के लिए।
4.
मन, स्वप्न और सूरज
दिमाग़ में खुलता
उबलती रोशनी का उबलता सूरज
जाग उठतीं
बर्फ़ पर लेटी साधारण कामनाएँ
जाग जाते मुर्दा स्वप्न अनेक,
सच होना था जिन्हें।
मन खोजता कहीं –
सुन्दर हरियाली को,
एक रात को, जो बारिश से भीगी हुई हो,
एक दोपहर को,
तपी हुई हो जो सूरज की आँच से।
कुछ न लगता हाथ
निगाहें बार-बार लौट आतीं
कंक्रीट के जंगलों से
बड़े-बड़े भवनों से टकराकर।
भटका नज़र आता हर आदमी
जाने क्यों !
भटक जाती हर राह जाने कैसे !
दिमाग़ी सूरज मार डालता सेंक-सेंककर
मन की कोंपल को;
सुप्त हो जातीं कामनाएँ,
मर जाते स्वप्न, रुक जाता मन।
5.
भूखा तोतला बच्चा और कविता
काव्य-पंक्तियों पर चीखता है
दो दिन से भूखा एक तोतला बच्चा
और बिलख उठतीं कितनी ही माँएँ
पंक्तियों के शब्दों पर।
जबकि शब्द भी इसी परिवेश के हैं,
यूरोप-अमरीका से नहीं आए हैं
किसी महासागरीय धारा की
पीठ पर सवार होकर।
शब्दों से परिचित हैं
तमाम तोतले बच्चों के आधे-अधूरे पिता
जो हालात और ईमानदारी की
दोहरी मार झेल रहे हैं,
सुबह-शाम करम का लेखा मिटाते हुए
भाग्य से खेल रहे हैं।
झाँकते कविता की लकीरों में से

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