शिरीष कुमार मौर्य की कविताएं

हिन्दी के समकालीन कवियों में कुछ कवि ऐसे हैं जिनकी कविताओं में मैं अपनी आवाज पाता हूँ। कई बार सोचता हूँ काश ऐसी कवितायें मैंने लिखी होती। हालांकि मैं कवि नहीं हूँ, लेकिन कई बार अपने इन प्रिय कवियों की तरह कवितायें लिखने की कोशिश करता हूँ। उन कवियों में शिरीष कुमार मौर्य भी एक हैं। उनका नया कविता संग्रह आया है ‘दंतकथा और अन्य कविताएं’ । प्रकाशक हैं दखल प्रकाशन। पुस्तक की भूमिका लिखी है मेरे एक अन्य प्रिय कवि गिरिराज किराड़ू ने। यहाँ प्रस्तुत है शिरीष की कवितायें गिरिराज की पसंद। टिप्पणी भी गिरिराज की ही हैं- प्रभात रंजन। 

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सम्पूर्ण जीवन और अस्तित्व का कवि हो जाना
शिरीष कुमार मौर्य की सारी कविता को संभवतः जितना उसका अभिव्यक्त उतना ही एक अव्यक्त प्रश्न, संदेह परिभाषित करता है. यह संदेह खुद उस कर्म की सार्थकता को लेकर है जो कि वह है – कवि कर्म. यह संदेह कहीं कहीं बहुत अस्पष्ट ढंग से किसी किसी कविता में झलकता भी है लेकिन वह कभी इतना व्यक्त नहीं होता कि हम उसका सीधा संज्ञान ले सकें – वह मानो समग्र के भीतर से समग्रता में झांकता हुआ, समग्र से ही उपलब्ध होता हुआ एक परिप्रेक्ष्य है जिसके ईशारे से हम न सिर्फ शिरीष के अपनेकवि कर्म का, उसकी सार्थकताका बल्कि ईसा की तीसरी सहस्त्राब्दी के इन शुरुआती दिनों में इस टुकड़ा टुकड़ा होती हिंदीमें कवि होने के अभिप्रायों और उसकी बेशुमार मुश्किलों का कुछ अंदाज़ा लगा सकते हैं. धीरे-धीरे अवसान को खिसक रही इस सुर्रियल-सी मालूम देती भाषा – हिंदी – और उसमें लिखी जा रही कविता के  वायुमंडल को एक बेमज़ा, पाठकहीन मेरिटोक्रेसी के क्षीण गुरुत्वाकर्षण से थामे हुए परिदृश्य में शिरीष की कविता कुछ इस तरह आ खड़ी होती है पाठकों के सम्मुख – आवारा, उदास, अड़ियल, आत्मीय – कि कवि/कविता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण‘,  ‘अति विशिष्ट‘ ‘विशिष्ट निजी स्वरआदि होने की एक समूची मायथोलॉजी को अपने एक फिकरे, एक आँसू, एक रूपक से चुपके से रास्ता दिखा देती है.
शिरीष, शमशेर की तरह, सम्पूर्ण जीवन और अस्तित्व के कवि हो जाने का कवि है – उससे अधिक उदास कम ही राजनितिक कवि होंगे, उससे अधिक राजनितिक कम ही उदास कवि होंगे. उससे अधिक अवसादमय भाषा कम ही प्रतिबद्धकवियों के पास होगी, उससे अधिक प्रतिबद्ध कम ही अवसादमय कवि होंगे. यहाँ राजनीति कविता नहीं करती, कविता राजनीति करती है और इस तरह अधिक अर्थपूर्ण कारवाई की तरह घटित होती है. इस कवि के जीवन में नींद उतनी नहीं जितने सपनेऔर ये सपने जिनकी मार्मिक बचकानी वास्तविकताइस कवि पर नींद में भी जाहिर है अक्सर हिंदी भाषा और उसके समाज के भविष्य के सपनों के साथ साथ उन महान, अतीत मान लिए गये सामूहिक स्वप्नों की भी प्रतिकृतियां हैं  जिन्हें अपने और अपने पाठकों के भीतर  जीवित रखने की कोशिश में ही इस कवि की कविता मुमकिन होती है.
शिरीष कुमार मौर्य पोस्टर लगाने वाला एक मामूली कार्यकर्ता है जो आपसे अपने सुक्खम-दुक्खमकी बात ऐसे करता है कि वह आपको अपना लगे और आपके सुक्खम-दुक्खमकी बात ऐसे करता है मानो वह उसका अपना हो – इसलिए हे पाठको, इस महादेश के हिंदी कविता पढ़ने वाले अज़ीज़ अल्पसंख्यको! इस कवि की यह मेरे दिल में बसने वाली किताब पढ़ने का अनुरोध मैं आपसे करता हूँ.
गिरिराज किराडू
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1.
एक दिन मैं मारा जाऊंगा
मरना नहीं चाहूंगा पर कोई चाकू घुस जाएगा
चुपचाप
मेरी टूटी और कमज़ोर बांयीं पसली के भीतर उसी प्यारभरे दिल को खोजता
जो हज़ार जुल्मों के बाद भी धड़कता है
कोई गोली तलाश लेगी मेरी कनपटी का रास्ता
मेरे दिमाग़ में
अचानक रुक जाएगा विचारों का आना
कल्पना का गढ़ना
स्मृतियों का रोना और सपनों का होना
सबकुछ अचानक रुक जाएगा
एक धमाके की आवाज़ के साथ
शायद कोई दोस्त ही मार देगा मुझे जैसे ही बात करके पीठ मोड़ूंगा मैं उससे
शायद प्रेम मार देगा मुझे
शायद मेरा अटूट विश्वास मार देगा मुझे
मुझे मार देगा शायद मेरा शामिल रहना
शायद कविता लिखना मार देगा मुझे एक दिन
लेकिन सिर्फ़ कविता लिखना नहीं,
बल्कि शामिल रह कर कविता लिखना मारेगा मुझे
एक दिन मैं मारा जाऊंगा
ऐसी ही
कुछ अनर्गल बातें सोचता हुआ
क्योंकि
आज के समय में सोचना भर काफी है
किसी को भी मार देने के लिए !
पर इतना याद रखा जाए ज़रूर
कि मरूंगा नहीं मैं
मुझे कोई मार देगा
मुझे
मृत्यु दिखाई नहीं देगी
सुनाई भी नहीं देगी
मुझे तो दिखाई देगा जीवन लहलहाता हुआ
मुझे सुनाई देगी एक आवाज़ ढाढ़स बंधाती हुई
जीवन और ढाढ़स के बीच ही कहीं
मारा जाऊंगा मैं
किसी अलग जगह पर नहीं
जहां मारे जाते हैं मनुष्य सभी एक-एक कर
मैं भी मारा जाऊंगा वहीं !
तुम बस याद करना मुझे कभी पर याद करने से पहले अभी रुकना
पहले रुक जाएं मेरी सांसे
थम जाए खून
मर जाऊं ठीक तरह से तब याद करना तुम मुझे
स्मृतियां ही व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती हैं
इसलिए
स्मृतियों के किसी द्वीप पर तुम याद करना मुझे


2.
मैं नैनीताल में लखनऊ के पड़ोस मे रहता हूँ
मैं उसे
एक बूढ़ी विधवा पड़ोसन भी कह सकता था
लेकिन मैं उसे सत्तर साल पुरानी देह में बसा एक पुरातन विचार कहूँगा
जो व्यक्त होता रहता है
गाहे-बगाहे
एक साफ़-सुथरी, कोमल और शीरीं ज़बान में
जिसे मैं लखनउआ अवधी कहता हूँ
इस तरह
मैं नैनीताल में लखनऊ के पड़ोस में रहता हूँ
मैं उसे देखता हूँ पूरे लखनऊ की तरह और वो बरसों पहले खप चुकी अपनी माँ को विलापती
रक़ाबगंज से दुगउआँ चली जाती है
और अपनी घोषित पीड़ा से भरी
मोतियाबिंदित
धुँधली आँखों में
एक गंदली झील का उजला अक्स बनाती है
अचानक
किंग्स इंग्लिश बोलने का फ़र्राटेदार अभ्यास करने लगता है
बग़ल के मकान में
शेरवुड से छुट्टी पर आया बारहवीं का एक होनहार छात्र
तो मुझे
फोर्ट विलियम कालेज
जार्ज ग्रियर्सन
और वर्नाक्यूलर जैसे शब्द याद आने लगते हैं
और भला हो भी क्या सकता है
विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ानेवाले एक अध्यापक के लगातार सूखते दिमाग़ में?
पहाड़ी चौमासे के दौरान
रसोई में खड़ी रोटी पकाती वह लगातार गाती है
विरहगीत
तो उसका बेहद साँवला दाग़दार चेहरा मुझे जायसी की तरह लगता है
और मैं खुद को बैठा पाता हूँ
लखनऊ से चली एक लद्धड़ ट्रेन की खुली हवादार खिड़की पर
इलाहाबाद पहुँचने की उम्मीद में
पीछे छूटता जाता है एक छोटा-सा स्टेशन
अमेठी
झरते पत्तों वाले पेड़ के साये में मूर्च्छित-सी पड़ी दीखती है
एक उजड़ती मज़ार
उसके पड़ोस में होने से लगातार प्रभावित होता है मेरा देशकाल
हर मंगलवार
ज़माने भर को पुकारती और कुछ अदेखे शत्रुओं को धिक्कारती हुई
वह पढ़ती है सुन्दरकांड
और मैं बिठाता हूँ
बनारसी विद्व जनों के सताए तुलसी को अपने अनगढ़ घर की सबसे आरामदेह कुर्सी पर
पिलाता हूँ नींबू की चाय
जैसे पिलाता था पन्द्रह बरस पहले नागार्जुन को किसी और शहर में
जब तक ख़त्म हो पड़ोस में चलता उनका कर्मकाण्ड
मैं गपियाता हूँ तुलसी बाबा से
जिनकी आँखों में दुनिया-जहान से ठुकराये जाने का ग़म है
और आवाज़ में
एक अजब-सी कड़क विनम्रता
ठीक वही
त्रिलोचन वाली
चौंककर देखता हूँ मैं
कहीं ये दाढ़ी-मूँछ मुँडाए त्रिलोचन ही तो नहीं !
क्यों?
क्यों इस तरह एक आदमी बदल जाता है दूसरे आदमीमें ?
एक काल बदल जाता है दूसरे कालमें?
एक लोक बदल जाता है दूसरे लोकमें?
यहाँ तक कि नैनीताल की इस ढलवाँ पहाड़ी पर बहुत तेज़ी से अपने अंत की तरफ़ बढ़ती
वह औरत भी बदल जाती है
एक
समूचे
सुन्दर
अनोखे
और अड़ियल अवध में
उसके इस कायान्तरण को जब-तब अपनी ठेठ कुमाऊँनी में दर्ज़ करती रहती है
मेरी पत्नी
और मैं भी पहचान ही जाता हूँ जिसे
अपने मूल इलाक़े को जानने-समझने के
आधे-अधूरे
सद्यःविकसित
होशंगाबादी किंवा बुन्देली जोश में !
इसी को हिंदी पट्टी कहते हैं शायद
जिसमें रहते हुए हम इतनी आसानी से
नैनीताल में रहकर भी
रह सकते हैं
दूर किसी लखनऊ के पड़ोस में !


3.
अगन बिंब जल भीतर निपजै!
एक क़स्बे में
बिग बाज़ार की भव्यतम उपस्थिति के बावजूद वह अब तक बची आटे की एक चक्की चलाता है
बारह सौ रुपए तनख़्वाह पर
लगातार उड़ते हुए आटे से ढँकी उसकी शक़्ल पहचान में नहीं आती
इस तरह
बिना किसी विशिष्ट शक़्लो-सूरत के वह चक्की चलाता है अपने फेफड़ों में ग़र्म आटे की गंध लिए
उसे बीच-बीच में खांसी आती है
छाती में जमा बलगम थूकने वह बाहर जाता है साफ़ हवा में
वहां उसके लायक कुछ भी नहीं है
कुछ लफंगे बीड़ी पीते और ससुराल से पहले प्रसव के लिए घर आयी उसकी बेटी के बारे में पूछते हैं
कुछ न कहता हुआ वह वापस
अपनी धड़धड़ाती हुई दुनिया में लौट जाता है
उसे जागते-सोते सपने आते हैं वो पुरखों की बेची दो बीघा ज़मीन ख़रीद रहा होता है वापस
गेंहू की फसलें उगाता है उन असम्भव छोटे-छोटे खेतों में
गल्लामंडी में बोली लगाता गुटके से काले पड़े होंटों से मुस्कुराता है
तो बुरा मान जाती है
गेंहू पिसाने आयी काछेंदार धोती पहनी साँवली औरतें
उन्हें पता ही नही चलता कि वह दरअसल दूसरी दुनिया में मुस्कुराता और रहता है
सिर्फ़ बलगम थूकने आता है इस दुनिया में थूकते ही वापस चला जाता है
वह दबी आवाज़ में गाली देती है उसे
तेरी ठठरी बंधे…”
उसका इलाज चल रहा है बताती है उसकी घरवाली
उसके सपनों और उम्मीदों को दिमाग़ी बीमारी करार दे चुका है नागपुर के बड़े अस्पताल का एक डॉक्टर
और इसी क्रम में
उसे काम से निकाल देना भी तय कर चुका है चक्की का मालिक
पीसते-पीसते वह आटा जला देता है
आटाचक्की के काम में उसकी लापता ज़मीनों और खेतों के हस्तक्षेप से ऐसा होना सम्भव है
पर आटे का जलना और पाटों का ख़राब होना
अक्षम्य अपराध है
बेटा इंटर में है अभी और उसके आगे बढ़ने की अच्छी सम्भावनाएं हैं
पर अपने पिता की इज़्ज़त नहीं करता वह उन्हें अधपगला ही समझता है दूसरे दुनियादारों की जगह
अकसर डाँट और झिड़क देता है बात बेबात ही
और उसकी आँसू भरी आंखों से विमुख याद करता है एक पुरानी और अमूमन उपेक्षा से पढ़ी जाने वाली किताब में
अपना सबसे ऊबाऊ सबक
किंचित लापरवाही से
– “अगन बिम्ब जल भीतर निपजै
अपनी तरह का अकेला आदमी नहीं है वह दुनिया में और भी हैं कई लाख उस जैसे अपनी अधूरी इच्छाओं से लड़ते
गहरी हरी उम्मीदों में भूरे पत्तों से झरते
सात सौ साल पुरानी आवाज़ में पुकारती होंगी उन सबकी भी सुलगती गीली आँखें
और मैं
हिंदी का एक अध्यापक
सोचता हूँ कवि का नाम तक पढ़ना नहीं आता जिन्हें
उन्हीं में क्यों समाता है कवि?
इस तरह अपने होने को बार-बार क्यों समझाता है कवि?

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