आज पढ़िए केशव भारद्वाज की कहानी- रेडलाईट। केशव भारद्वाज डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी फ़ोर्स में अधिकारी हैं। लम्बे समय तक अलग अलग देशों में रहे हैं। उनकी कहानियों में उन अनुभवों की छाप दिखाई देती है। लेकिन दिलचस्प है-
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उस दिन बूँदाबाँदी दोपहर से ही हो रहा था। मेरे गांव में इसको ” लधने” कहा जाता है। ऐसा ही उस दिन कुछ मौसम के हालात थे।वैसे कम्पाला में ऐसा लधनाई पहले कभी देखा नहीं था। यहां तो घंटे- घंटा मौसम बदलता रहता है। वैसे शाम में यहां बारिश होने की संभावना न के बराबर रहती है। रातवाली ज्यादातर पार्टियां यहां खुले में ही होती है। जैसा खुला मौसम, वैसा ही खुला स्थानीय समाज। उम्मीद था, शाम होने तक उबेर हो जायेगा। उस शाम ऐसा कुछ नहीं हुआ।
कम्पाला का ट्रैफ़िक जाम दुनिया भर में बदनाम है। इससे पहले मैं प्रिटोरिया में पदस्थापित था। जैसा ही प्रिटोरिया में ट्रैफ़िक व्यवस्था व्यवस्थित, वैसा ही कम्पाला में अव्यवस्थित। इसके पीछे कई कारण हैं। इसकी विवेचन कभी और।
बारिश हो गई, तो समझ जाइये आज महाजाम ।उपर से आज यहां बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। वैसे बारिश यहां होती ही रहती है। इक्वेटर पर रहने का यह प्रतिफल है। इतना असर तो होना ही था।
मेरे आफिस और घर के बीच के रास्ते में मुलागो अस्पताल पड़ता था।मुलागो अस्पताल कमोबेश आज के दिल्ली का एम्स हुआ।
जब तक युगांडा, ब्रिटिश उपनिवेश था, इस अस्पताल में राजनैतिक कैदी कोई न कोई भर्ती रहता ही था। उस समय बीमार होने का सबसे बड़ा कारण मलेरिया ज्वर था। यह मलेरिया तब क्या, अभी भी अपना असर रखे हुये है।
भारत में मलेरिया नियंत्रण केंद्र का एक समय में चारो तरफ जाल बिछाया गया था। यह कह सकते हैं कि आज के तारीख में भारत में इस बीमारी पर काफी हद तक काबू कर लिया गया है। अफ्रीका में अभी भी इस बीमारी का प्रकोप बदस्तूर जारी है।
मैं घंटों इस मुलागो रेडलाईट पर जाम में बेबस सा गाड़ी में फंसा खड़ा रहा हुं। खुद ड्राईव करता था। गाड़ी छोड़कर जा भी नहीं सकता था। सुकून तब रहता था, जब भारतीय मूल के युगांडन सहकर्मी अमित मेरे साथ ही गाड़ी में रहते।
मेरे निवास आर्क अपार्टमेंट के साथ ही कम्पाला का प्राचीन गणेश मंदिर था। इसी के बगल से एक गली अंदर की तरफ जाती थी। उसी में दो- तीन घर छोड़कर उनका अपना मकान था। ओ जब साथ रहते, बातचीत में जाम का समय कट जाता। उनके पास मुलागो अस्पताल की कई कहानियां थी। वहां के स्थानीय लोगों को इतिहास में दिलचस्पी नहीं थी। जो अप्रवासी भारतीय वहां हैं, वो अपने आप को नोट छापने की मशीन बना लिये हैं। दिन-रात दो का चार करने में जुटे रहते हैं।अमित को भी एक सुननेवाला मिल गया था। मुझे तो सच पूछिये , अमित को सुनने में आनंद आने लगा था।
जिस दिन जाम नहीं मिलता, हम पन्द्रह मिनट में घर आ जाते। उस शाम अजीब सा खालीपन महसूस होता। शाम में रेडलाईट पर लंबा रुकना, मैंने स्वीकार कर लिया था।
अमित आफिस बोडा- बोडा से जाते थे।भारे की मोटरसाइकिल सवारी को वहां बोडा- बोडा कहा जाता है। दिन के समय अपराध कम होता था। अंधेरा होने के बाद अपराध की संभावना बढ जाती थी।आते समय दो भारतीय साथ रहने से एक तो आत्मविश्वास भी बढा रहता था। दूसरे , बातचीत में जाम में बिता समय का पता भी नहीं चलता।
मुलागो अस्पताल रेडलाईट पर जाम में गाड़ी खड़ी होते ही अमित शुरु हो जाते थे।
आपको तो पता ही होगा कि 11 बजे 11/11/1918 को प्रथम विश्व युद्ध में शांति समझौता पर हस्ताक्षर हुआ था। तब से सारे कामनवेल्थ और मित्र देश युद्ध के सारे हीरो को याद करते हुए दो मिनट का मौन उनके सम्मान में रखते हैं।
युगांडा का हाल भी भारत जैसा ही है। यहां के लोग भी विश्व युद्ध के हीरो के बारे में न के बराबर जानते हैं।
भारत और युगांडा दोनों ब्रिटेन का उपनिवेश था। दोनों देश के स्थानीय लोग विश्व युद्ध में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिये। युगांडा में किंग्स अफ्रिकन राईफल और भारत में ब्रिटिश इंडियन आर्मी था।
सबसे कमाल की बात देखिये। भारतीय ब्रिटिश इंडियन आर्मी
पूर्वी अफ्रीका में आ कर के लड़ी और युगांडा की किंग्स अफ्रिकन राईफल तब की सीलोन, जो अब श्रीलंका है , बर्मा अब मयन्मार और उसके आस पास के जगह के युद्ध में भाग लिया।
युगांडा का बाम्बो बैरक का यहां के युद्ध के इतिहास में प्रमुख स्थान है।”
जैसे ही बाम्बो नाम सुना। मेरी उत्सुकता इसके बारे में जानने की बढ़ गई।
भारत का बाम्बे और यहां की बाम्बो में क्या कोई कनेक्शन?
अमित बता रहा था-
” युगांडा के बाम्बो बैरक में उस समय युद्धबंदी को रखा जाता था। 1942 में माल्टा, ब्रिटेन का संरक्षित राज्य था। वहां के 47 युद्धबंदियों को युगांडा के लिए निर्वासित किया गया था। ये सब इटालियन मूल के लोग थे। इन सब पर माल्टा की गुप्त बात को दुश्मन देश को बताने का अभियोग था।
माल्टा के तत्कालीन संसद में इस विषय पर बहुत गर्मा-गर्मी के साथ बहस हुई थी। माल्टा के पूर्व प्रधानमंत्री सर युगो मिफसुद इस निर्वासन के खिलाफ वहां के संसद में एतिहासिक और भावनात्मक भाषण दिये थे। अपने उस भाषण के दौरान वो इतने भावुक हो गये थे कि वहीं संसद के फ्लोर पर ही उनका ह्रदयाघात हो गया था। ”
इतना सुनते – सुनते मेरा अपार्टमेंट आ गया था। ह्रदयाघात आने के बाद क्या हुआ, यह जानने के लिये मैं रुक गया।
– ” आगे बताओ। फिर क्या हुआ?”
-अगले दिन ही उनकी मृत्यु हो गई थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र थी।
इस घटना का तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर कोई असर नहीं हुआ था।इन सभी सैतालिसो निर्वासित को जहाज से अलेक्जिंड्रिया भेज दिया गया था। वहां से ट्रेन से ये सारे कैरो, ईजिप्ट आये। फिर नील नदी के रास्ता से होते हुए महीनो बाद युगांडा पहुंचे थे। यहां इन सब को बाम्बो बैरक में रखा गया था। “
इतना कहकर अमित मेरे गाड़ी से उतर अपने घर की ओर चले गये थे।
मैं सोचता रहा।भारत में भी स्वतंत्रता सेनानियों को अंडमान और रंगुन ऐसे ही भेजा जाता था। अंडमान और रंगुन के निर्वासन को बहुत कठोर सजा माना जाता था।
दुसरे दिन फिर जब हमलोग आफिस से वापस अपने घर आ रहे थे, मेरी जिज्ञासा आगे जानने की बढी हुई थी।
अमित ने बताया-
” ये सारे माल्टा के युद्धबंदी बाम्बो बैरक में आते ही मलेरिया ज्वर स़े ग्रसित हो गये।तब ईन सब को इसी “मुलागो अस्पताल” में भर्ती कराया गया था।”
उस समय हमलोग इसी मुलागो रेडलाईट पर खड़े थे। अभी कितना देर और रुकना पड़े, यह कोई कहने की स्थिति में नहीं था।
अमित का बताना जारी था
-” इन युद्धबंदियों में एक और प्रमुख नाम जुड़ गया था। वो थे – बर्मा के पूर्व प्रधानमंत्री युसाव। ईनको ईजीप्ट से पकड़ा गया था। जापान के संपर्क में रहने का अभियोग इनपर लगा था।ये सारे युद्धबंदी मलेरिया के प्रकोप के कारण एक जगह से दूसरी जगह स्थानान्तरित होते रहे थे। बाद में सीरिया और अन्य कई देशों से युद्धबंदी यहां लाये गये थे।
जब 1945 में विश्व युद्ध खत्म हुआ, तब जाकर सारे युद्धबंदी अपने – अपने देशों को वापस गये थे।”
यह मुलागो अस्पताल मेरे घर और आफिस जाने के बीच में पड़ता था। आते जाते मुलागो अस्पताल देखते ही उस समय की परिकल्पना घूमने लगती थी। साथ ही अमित के ज्ञान पर फख्र होता कि देखिये एक नये देश के बारे में कितनी जानकारी रखता है?
इस मुलागो अस्पताल में प्रमुख राजनैतिक बंदी के रूप में बर्मा के पूर्व प्रधानमंत्री यु शाॅ का नाम आता है। जैसे ही मेरी गाड़ी मुलागो अस्पताल के बगल से निकलती है, पता नहीं क्युं यु शाॅ मेरी स्मृति में आ जाते हैं। यु शाॅ पर जैसे ही ध्यान करता हूँ , अपने देश के एक स्वतंत्रता सेनानी सामने आ खड़े हो जाते हैं।इन दोनों के संघर्ष में एक बड़ी समानता थी। ये दोनों ब्रिटिश आधिपत्य को खत्म करने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के घटनाक्रम के आधार पर आगे की निर्णय ले रहे थे। दोनों का जीवनकाल भी मात्र 48 वर्ष का ही रहा। दोनों की अकाल मृत्यु भी हुई।
अमित ने यु शाॅ के बारे में ढेर सारी सुनी – सुनाई बातें इस रेडलाईट के जाम में सुना रखी थी।जैसे-
” यु शाॅ के विद्वता के बारे में बहुत तरह की कहानियां गढ़ी हुई है।पांच क्लास तक ही उन्होंने पढाई की थी। उसके बाद सीधा वकालत ही किया। बर्मा के प्रमुख दैनिक अखबार के सम्पादक और स्वामी दोनों थे। यु शाॅ को बिना कानुन की डिग्री लेने के बाद भी , बर्मा के कोर्ट – कचहरी में केश लड़ने की अनुमति थी। वर्मा के तत्कालीन मंत्रिमंडल के सदस्य रहे। बाद में 1940-42 के बीच में वहां के प्रधानमंत्री पद को भी सुशोभित किया।
1941 में द्वितीय विश्व युद्ध हो रहा था ।ब्रिटिश बर्मा के प्रधानमंत्री के रूप में यु शाॅ लंदन जा कर वहां के प्रधानमंत्री चर्चिल से कुछ विशेष अधिकार की मांग किये थे। यह कमोबेश वैसा ही था, जैसे कनाडा के ब्रिटिश सरकार से मिला डोमिनियन था। करीब दो घंटा चर्चिल और यु शाॅ के बीच वार्ता चला था। चर्चिल ने अंत में आश्वासन दिया था-‘विश्वयुद्ध जीतने के बाद देखेंगे?’
यु शाॅ इस महज आश्वासन से बहुत निराश हुये थे। वहीं से सीधा वे अमेरिका चले गये थे। अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट से चर्चिल को समझाने का आग्रह किया था। रूजवेल्ट इस सब बखेड़ा में पड़ने से साफ मना कर दिया था। वहां से यु शाॅ लिस्बन,पुर्तगाल गये। वहीं जापानी राजदूत से उनकी बर्मा के विषय में बातचीत भी हुई थी। इस बातचीत में युद्ध के दौरान जापान को मदद पहुंचाने की बात थी।
वहीं से लौटते समय हईफा में यु शाॅ को ब्रिटिश सेना द्वारा बंदी बना लिया गया था। हईफा अब इजरायल का हिस्सा है। यहीं से यु शाॅ को युगांडा में युद्ध बंदी के रूप में रखा गया था।
विश्व युद्ध के बाद यु शाॅ रिहा कर दिये गये थे। वे वापस बर्मा चले गये थे। वहां की राजनीति में फिर से सक्रिय हो गए थे।इसी क्रम में एक समझौते के लिए फिर 1947 में लंदन गये थे। वहां समझौता का शर्त उनको अनुकूल नहीं लगा था । उस पर हस्ताक्षर करने से साफ – साफ मना कर दिया। वहां से वापस वर्मा आकर फिर से संघर्ष में लग गये थे।
कुछ दिनों बाद उन पर एक राजनीतिक हत्या में शामिल होने का आरोप लगा था। 1948 में उनको मात्र 48 वर्ष की उम्र में फांसी पर लटका दिया गया था। “
यु शाॅ के देशभक्ति के बारे में जानने के बाद मुझे उनके व्यक्तित्व के बारे में जानने के लिये आकर्षित किया। युगांडा में युद्ध बंदी के रुप में रहने के बावजूद भी अपने मिशन को कमजोर नहीं होने दिया। बर्मा की अस्मिता और स्वतंत्रताक लिए दुनिया के अन्य देशों से समझौता का प्रयास देख कर मुझे भारत के वह स्वतंत्रता सेनानी याद आ जाते थे। ऐसा संभव लगता है कि उनको भी विश्व युद्ध के समय पकडे़ जाने पर युद्ध बंदी के रूप में इसी अफ्रीकी भूभाग में जरूर भेजा जाता। वह स्वतंत्रता सेनानी और कोई नहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही होते।
विश्व युद्ध में निर्णय अंततः तो ब्रिटेनक पक्ष में ही हुआ था।
क्या सही, क्या गलत – मैं इस पर नहीं जा रहा हुं।रेडलाईट के जाम में खड़े- खड़े मेरी दिलचस्पी मुलागो अस्पताल के बारे में बढती जा रही थी। मुलागो अस्पताल में कोई ना कोई भारतीय युद्धबंदी जरूर रखा गया होगा? मैं वहां के इतिहासविदों और पुस्तकों में भारतीयता को खोजता रहता था, पर सटीक जानकारी नहीं मिली।
बाद में अमित के आफिस से लौटने का समय बदल गया था। मैं अब अकेला ही आता था। मुलागो का इतिहास जानने के बाद निडर हो रहा था। अब मुझे इतिहास से इत्तर
रेडलाईट के जाम में बदले में कुछ और मिल गया। इसे साझा करना जरुरी सा लगा।
कम्पाला के महाजाम में रेडलाईट की दुनिया अलबेला हो जाती है।
“रेडलाईट” शब्द सुनिते ही आम भारतीय को सबसे पहले “वेश्या ” स्मृति में आती है। यहां रेडलाईट पर चारो तरफ पसरे युवक- युवती सब। वेश्यालय में तो शरीर की खरीद- बिक्री होती है, यहां इस रेडलाईट पर समान की। ओ भी खुल के , मोल- जोल भी होता है।इसका यह मतलब मत निकालना, सड़क पर समान बेचना वैद्ध है।भारत की तरह यहां भी इस तरह की खरीद- बिक्री गैरकानुनी है।
क्या समानता मुझे दिखता?
हां, भारते जैसे रेडलाईट पर बजार यहां भी चल रहा है। यहां भी सिविल विभाग छापा मारता है। धर- पकड़ होती है। समान जब्त किया जाता है। परिणाम – वही ढाक के तीन पात।
जब छापा पड़ने को होता वा पड़ा होता, उस दिन की गहमागहमी अलग से ही पता चल जाता। भारत के जैसे यहां भी छापा की सुचना अग्रिम पहुँच जाता है।भारतीय रेल हो वा चौक- चौराहा, सब जगह यह ध॔धा जीवंत मिला। ठीक वैसा ही कम्पाला में आने के बाद अनुभव हुआ।
मैं साउथ अफ्रीका से पुर्वी अफ्रीका आया था। इस लिए सुरक्षा खातिर ज्यादा सशंकित रहता था।उपर से अमित ने ज्यादा ही डरा दिया था।अमित के कारण, पहला एक वर्ष तो मैं कम्पाला में रेडलाईट पर गाड़ी का न शीशा खोला और न कुछ खरीदा ही। मुलागो रेडलाईट पर धीरे धीरे सारा चेहरा जाना – पहचाना लगने लगा था।
कनीय कर्मचारी अमित के साथ रहने के कारण रास्ते में, मैं थोड़ा रिजर्व रहता था।आकर्षक युवती की तरफ देखने में भी झेपता था।अब जब अकेला था, लोगों को देखकर मुस्का- मुस्की होने लगा था। घंटा के करीब इस रेडलाईट पर समय बिताना पड़ता था। मनुष्यों के बीच गाड़ी का शीशा आखिरकार कब तक बाधक बनता। मुझे भी सारे चेहरे पहचाने लगने लगे थे। इस रेडलाईट पर भारत के सुदूर वर्ती गांव के हाट- बजार जैसे सारे घरेलु समान बिकते थे। जैसे कपड़ा, जुता – चप्पल, बिजली इलेक्ट्रॉनिक समान, बर्तन, लकड़ी की कलाकृति, सब्जी, तमाम तरह के फल, मोटर पार्ट्स, मसाला , खाने- पीने की विभिन्न सामग्री आदि- आदि।
मेरा मन भी टोकड़ी में रखे पके हुये आम को देख कर ललचाने लगा था। एक शाम डरते- डरते एक हाॅकर महिला से पुरे टोकड़ी आम का दाम पुछ ही लिया?
आम बेचनेवाली नवयुवती मेरे सवाल सुन कर अकबका गई। उसको तो एक या दो आम बेचने की आदत पड़ी हुई थी।
उसने मुझसे फिर स्पष्ट करवाया कि मैंने उससे पुछा क्या था?
मैंने उसको दुबारा अपने सवाल के बारे में आश्वस्त किया । तब वो कुछ देर सोचने लगी।
युगांडा वालों का गणित बहुत कमज़ोर होता है। उनका हिसाब लगाने का एक अलग ढंग है।कुछ देर अपने अंगुली का इस्तेमाल करके उसने पुरे टोकड़ी आम का हिसाब लगाकर मुझे बताया।
मैं वहीं के अकाशिया माॅल से आम खरीदता था।इससे तो बहुत ही ज्यादा सस्ता मुझे लगा। सस्ता क्या, मुफ्त के जैसे अनुभव हुआ। अब सवाल यह मन में आ रहा था कि आखिरकार यह कौन सा आम है?
इसका स्वाद कैसा होगा?
यह सब तो खाने के बाद ही पता चलेगा।
मुझे तो सारे आम पसंद हैं। यहां तक की कलकतिया और भदई आम भी स्वादिष्ट लगता है।भारत में ये दोनों आम अचार के लिए ज्यादा उपयोग किये जाते हैं। पकने के बाद इन आमों का स्वाद कई लोगों को पसंद नहीं है।इसी आत्म विश्वास पर कि जो भी और जैसा भी स्वाद होगा हम आखिर सधा देंगे।
उस शाम उस युवती का सारा आम मैंने खरीद लिया। घर पहुंचने पर इतने आम एक साथ देखने पर श्रीमतीजी पहले तो नाराज हुई। जब मैंने इतने आम की ” कीमत” बताई, उन्हे भी थोड़ा आश्चर्य सा हुआ। परंतु अपने जज्बात पर काबु पा लिया।
कुछ बोली नहीं। आम खाने के बाद सम भाव में आ गई थी।न बराई और न बुराई । पति के खरीददारी का प्रशंसा हो, यह असंभव जैसा है।आलोचना या नहीं भुनभुनाना भी प्रशंसा के श्रेणी में ही माना जाता है।
इस तरह से मेरा रेडलाईट पर खरीदारी की शुरुआत हो गई थी।अब दिमाग इतिहास के जंजाल से बाहर विचरण करने लगा था।
अब खुद अपने-आप पर अफसोस हो रहा था।इतना महंगा आम अब तक अकाशिया माॅल से क्युं खरीद रहा था?
एक दिन और ऐसे ही शाम में घर वापस जाते समय रेडलाईट पर रुका था। मुझे तो यह रेडलाईट कृत्रिम लगता था। ये सारे हाॅकरों का ट्रैफ़िक पुलिस से पक्का सांठ- गांठ था। जान बुझ कर मैनुअल ट्रैफ़िक चलाता था। वहां के स्थानीय निवासियों के पास समय ही समय था। ओ सारे बड़े आराम से इंतजार करते रहते। दुसरा यह बात भी है कि जिस देश में तानाशाह हुये होते हैं,वहां के लोगों का आदेश मानने की आदत हो जाती है।
अब तो और सब के हाथ में मोबाइल आ गया है। इसी में सभी लगे रहते थे।
भारत में अगर ऐसा हालात हो, इतना ना पब्लिक हार्न बजायेगी कि थक हार कर ट्रैफ़िक चलाना ही पड़ेगा। उपर से आजकल वीडियो बनाने का भी चलन हो गया है। पुलिस की कोई गलती हो। इसकी वीडियो बने। सोशल मीडिया में इसको वायरल होना ही होना है। आम लोग अभी भी पुलिस की वाट लगते हुये देखकर खुश होती है।
रोज की तरह अगले शाम फिर उसी समय मुलागो रेडलाईट पर खड़ा था। देख रहा हुं कि एक पच्चीस -तीस वर्ष की स्वस्थ, आकर्षक बड़े – बड़े वक्ष वाली अनचिन्हार युवती मेरे गाड़ी के आगे मुस्कुराते हुये खड़ी है। पहले तो लगा कि कहीं कोई हाई – प्रोफाइल कालगर्ल तो नहीं है?फिर गौर से देखा, उसके होंठ फरफरा रहे थे, मानो कुछ बुदबुदा रही थी। जरा और ध्यान से देखा तो लग गया कि कुछ बोल रही थी। शीशा बंद होने के कारण कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मैंने अपनी गाड़ी का शीशा थोड़ा नीचे किया। उसका बेपरवाह वक्ष शीशा पर दबने के बाद बाहर की ओर हुल्की मार रहा था।मैं घोर समस्या में पड़ गया था। उस उन्मुक्त वक्ष को निहारु या उसकी बात सुनु। दोनों काम साथ – साथ करना चाहा। आंख और कान अपने – अपने ड्युटी में लग गये। कान ने जो सुना, वह था-
” उस दिन का आम का स्वाद कैसा लगा? आपने मुझसे ही पुरा टोकड़ी आम खरीदा था।”
अब मैं उसके चेहरे की ओर देखा। अभी तक हमारी नजर कहीं और टिकी थी। बेपरवाह स्त्री को निहारने का सुख एक अलग ही है। ओ भी ऐसे जगह जहां आपकी शराफत की चादर शरीर पर हो या नहीं हो, कोई देखने वाला नहीं है। कोई सुन्दर स्त्री आपके सामने खड़ी हो जाय तो क्या आप अपनी आंखें मुंद लेंगे?
उसके चेहरे की ओर देखने के बाद भी मैं उसको जरा भी पहचान नहीं सका था।
उसके बात करने के ढंग से ये लग रहा था की वो मेरे ही बारे में कह रही है।
यही अंतर होता है देश- विदेश में । छह महिना बाद भी विदेश में किसी दुकान पर जाने पर वो आपको पहचान जाएगा।यह एक तरह से ऐसा ही है जैसे भारत में कोई अंग्रेज किसी गांव के दुकान पर चला जाये।सारे गांव वाले मुरकेरिया डाले दिखेंगे। दुकानदार तो जी भरकर देखेगा ही।
अब पुरी बातें मेरी समझ में आ गई थी। उस दिन तो मेरी नजर टोकड़ी भरी आम पर ही थी। उसमें भी इतना सस्ता पका हुआ आम। अब मैं उसके चेहरे के तरफ नजर स्थिर कर देखा।उसके आंखों से मेरी आंख मिलते ही बहुत ही सहज और स्वाभाविक मुस्कान उसके चेहरे पर छा गई। अन्जान देश में ऐसा अपनापन से भरा आम खरीदने का आग्रह उसके तरफ से आया था।मुझसे ना , नही कहा गया।
इसी तरह अब धीरे – धीरे उससे मैं गाहे -बेगाहे आम खरीदने लगा था। आम की इस वेरायटी को युगांडन युवती ” एपल मैंगो” कहती थी। यह आम देखने और खाने, दोनों में अच्छा लगने लगा था।
जहां विकल्प हो, वहां भारतीय खरीदारी के समय बार्गेनिंग नहीं करे, असंभव है।
यहां भी ऐसा ही था। मैं मोल- मोलई खुब करता।रेडलाईट पर समय भी काटना था।
ऐसा कई एक बार हुआ था। पहले वह मेरे दाम पर मना करती, बाद में मेरे ही भाव पर राजी हो जाती। कभी भी दाम के कारण खाली हाथ नहीं जाने दिया। कभी आम घर में काफी जमा हो जाता, तो नहीं खरीदता। फिर भी रेडलाईट पर मेरे गाङ़ी को देखते ही खींची सी चली आती थी। हाय- हेलो और हैप्पी विशेश का आदान -प्रदान होता ही था। वो कभी – कभी अपनी साथी हाॅकर युवतियों से भी मिलाती थी।ये सारी स्थानीय अफ्रीकी युवतियां बड़ी ही हंसमुख और बिंदास थी।
यह सारा खेल इतने देर के लिए ही होता था, जितना समय मैं रेड लाईट पर रुकता था।
अब रेडलाईट मुझे बोझ नहीं लगता था। मुलागो के इतिहास के ज्ञान की मेरी जिजिग्शा खत्म हो गई थी। पहले की तरह मैं अब अंदर ही अंदर यहां की ट्रैफ़िक व्यवस्था को गाली नहीं पढता था। सब कुछ सामान्य चलने लगा था।कभी – कभी पुरा ट्रैफिक निर्बाद्ध भी चलता था।
ऐसा सिलसिला कई महिनों से चल रहा था। ईधर दो – तीन दिन से वो आमवाली मुझे रेडलाईट पर नहीं दीख रही थी।
एक दिन अनायास मुझे ट्रैफ़िक जाम के शुरू वाले जगह में ही मील गई।
उस दिन उसने अपने आम की कीमत ज्यादा बताई।
मैं जिस रेट में इससे पहले आम खरीदता था, वही दाम लगाने के लिए उसको कहा।
वो इस कीमत पर राजी नहीं हुई।उसने आग्रह करते हुये मुझे कहा’
– ” यह रेट मुनासिब नहीं है। आप दुसरी आमवाली युवती से पुछ कर देख लीजिए। मुझसे कम रेट पर कोई नहीं देगा।”
मैंने जवाब दिया-
” तुम पहले भी ऐसे ही ज्यादा दाम बताती थी। बाद में मेरे ही दाम पर मान गई थी।”
उसने हंसते हुए चुहल करने के अंदाज में कहा-
तुम मेरे डियर फ्रेंड हो। पुराना ग्राहक हो। मैं तुम्हारी खुशी के लिए तुम्हे दे देती थी। विशेष छुट मैं अपनी तरफ से तुम्हे देती थी। मेरे पास पैसा हो जाये तो तुम्हे मुफ्त में ही ढेर सारा आम दे दुंगी।
मैं आश्वस्त था। मेरे भाव में अंततोगत्वा यह मान ही जायेगी?
जब यह नहीं मानी, मैंने कुछ और रेट बढाया। तब भी वह नहीं मानी।
अब उसने कहा-
” देखो। पहले मैं तुमको दे देती थी।आज मेरा रेट कम नहीं होयेगा। मेरा हाथ देखो। तीन दिन पहले घर जाते समय दुर्घटना में चोटिल हो गया है। मैं यहां कई दिनों से आम बेचने नहीं आ पा रही थी। आज एक्सीडेंट के बाद पहला दिन आई हुं। देखो। मेरे हाथ में कितना चोट है,” यह कहते हुए उसने अपने कमीज की बांह को उपर कर लिया।
मुझे देखिए।
मैं उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा हुं। मेरी नजर उसकी चोटिल बांह की तरफ न जाकर, झांकती उन्नत वक्षों पर एकबारगी चला गया।
तब तक ट्रैफ़िक आगे की ओर खिसका।
मुझे हुआ कि वो पीछे से आयेगी ही।
मैं गाड़ी के साईड मिरर में उसको खोज रहा था। वो नहीं आई।
अब मेरे पास पुरा समय था। उसकी बात की जांच के लिए दुसरी आमवाली से भाव पुछा।
इसका भाव तो और भी महंगा।
अब मुझे अपनी आमवाली की कही बात याद आने लगी।
” मुझसे सस्ता कोई नहीं देगा। आप पूछ के देखो?”
मेरे जैसा अविश्वासी को देखिये। चोरी से आम का भाव पता भी कर लिया।उसके बात पर विश्वास नहीं किया।
अब अपने व्यवहार पर मुझे पश्चाताप होने लगा था। वो अपना समझ कर एक्सीडेंट की बात कही और मैं दाम कम करवाने में लगा रहा।उसके चोट की तरफ ध्यान न देकर, उसके उन्नत उरोज को देखने लगा।
लग रहा है वो दुखी हो गई? मेरे व्यवहार से वो आहत हो गई है?इसी लिए वापस नहीं आई।
आज तक ऐसा नहीं हुआ था। वो कई बार मेरे पास आती थी। मैं कुछ मजाक में कह देता था। वो हंसती ही रहती थी। अंत में मुझे आम पकड़ा ही देती थी।
मेरी नजर बार- बार घूम फिर कर साईड मिरर में उसको खोज रहा था। उस युवती का कोई पता नहीं था।
मैंने मन ही मन निर्णय ले लिया था। जैसे ही वह मिलेगी, मैं पहले अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगुंगा। आम उसी के दाम पर खरीद लुंगा।
हो सकता हो, उसको भरी टोकड़ी आम ऊठाने में तकलीफ होती हो , घर में चुल्हा नहीं जला हो, उसी लिए आम बेचने आई हो।मुझे यह दो पैसा बचाने से क्या होगा? अब कभी मोल मोलई नहीं करुंगा।
पहले वो आये तो सही।एक मन हुआ,दुसरे हाॅकरों को बोलुं कि उसको बुला दे।आज पता चला, मुझे तो उसका नाम- गाम कुछ नहीं पता। वैसे लंबा कद,उन्नत वक्ष और निश्छल हंसी उसकी पहचान थी। मैं तो इसी से उसको पहचानता। उसकी हंसी सबसे अलग थी। इतना कहने पर तो उस तक मेरा संवाद चला ही जायेगा। फिर लोकलाज यह सब कुछ करने से रोक दिया।
यही समय मेरे और सहकर्मियों के लौटने का होता है। पता नहीं, कोई और मुझे देख रहा हो
इसी उधेरबुन में फंसा रहा।
उस शाम का ट्रैफ़िक जाम और दिन से ज्यादा था। फिर भी मन परेशान नहीं लगा। उसके इंतजार में था कि वो आ जाय और मैं आम उसके बताये कीमत पर खरीद लुं।
आखिरकार शो नहीं ही आई। ट्रैफ़िक चल पड़ा था। मैं भी दुखी मन से सिग्नल पार कर ही रहा था। तभी कही॔ से एक पुलिस वाला सामने आकर मुझे रुकने का इशारा किया। जैसे ही मैंने गाड़ी में ब्रेक लगाई, ऊधर से वो आमवाली आ रही थी। यह सब फिल्मी स्क्रिप्ट की तरह घटित हुई थी।
वो चलकर सीधा मेरी गाड़ी के पास आई- ” आप अभी तक यहीं हो
। आज का जाम सच में भयानक। मुझे हुआ था कि आप चले गये होगे।”
मैंने कहा- ” मै आपके एक्सीडेंट के बारे में नहीं कुछ पुछा? इस लिए साॅरी फील कर रहा हुं। आप जल्दी से आम मुझे दे दो। ये लो पैसा। आज कोई बार्गेनिंग नहीं।आज आम आपके बताये दाम पर लूँगा।”
मेरी बात सुनकर वो हंसने लगी थी। बोली- ” आप बहुत भले हो । अपना देश मुझे ले चलो ”
मैंने भी मुस्कुराते हुये अपनापन से भरे लहजे में कहा-
” ठीक है। आप को मैं ले चलूँगा।अभी आम तो दे दो?”
उसने हंसते हुये गाड़ी के डिक्की में आम रख दिया । ट्रैफ़िक पुलिस मुझे गाड़ी आगे बढाने का इशारा कर रहा था।
मेरी गाड़ी रेडलाईट से आगे बढ़ चुकी थी। मेरे माथे पर का पश्चाताप कि बोझ उतर चुका था। ऐसा लग रहा था, मानो कोई पूर्व जन्म के ऋण से उऋण हुआ आज।

