मई महीने से तरक्की की चिड़िया ने पंख फड़फड़ाए

सदफ नाज़ फिर हाज़िर हैं. समकालीन राजनीतिक हालात पर इतना गहरा व्यंग्य शायद ही कोई लिखता हो. आम तौर पर लेखिकाओं के बारे में यह माना जाता है कि उनको राजनीति की समझ जरा कम होती है, तो मेरा कहना है कि उनको सदफ नाज़ के व्यंग्य पढने चाहिए- प्रभात रंजन 
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कल बटेसर भैया और मियां बुकरात से मुठभेड़  हो गई। मिलते ही बटेसर भईय्या कहने लगे जनाब जब से मज़बूत तकरीर (भाषण) सुना है, बड़ा कन्फयूज़ सा हूं,  कुछ पेंच रह गएं हैं मन में!  मैने कहा माशाल्लाह! इतनी मज़बूत तकरीर थी। पूरी कायनात अश-अश कर रही है और आप हैं कि ……! एनआरआईयों ने सुन लिया तो आपकी ख़बर लेने पहली फ्लईट से आ धमकेंगे। कान पकड़ किसी एनआरआई स्कूल में देश हित का पाठ पढ़ाने लिए आपका दाखिला करवा देंगे। वैसे हम तो मज़बूत तकरीर सुन कर बड़े मसरूर(खुश) हैं! आईफा अवार्ड टाईप शानदार इंटरटेंमेंट उस पर मजबूत तकरीर। लेकिन आप बताएं कि आप के मन में हुड़क क्यों मच गई, कहीं आप सेक्युलर  तो नहीं हो गए हैं ? बिचारे बटेसर भईया ऐसा सुनते ही घबड़ा गए। कहने लगे नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है। दरअसल मज़बूत तकरीर में हमने सुना कि हमारे पास ये है, वो है, हम टेक्नो फ्रेंडली हैं, हमारे देश के नौजवान तकनीक को उंगलियों पर नचाते हैं वगैरह। ऐसी बातें सुनकर लगा कि हमारे देश में भी पहले से तरक्की मौजूद है। वरना पिछले कुछ महीनों से हम यही सुनते आ रहे थे कि हमारे मुल्क का तो पूरी तरह से डिब्बा गोल है। कईयों ने यहां तक कहा कि भारत वर्ष की जो शान थी उसे पहले तातरियों-मुगलों ने खत्म किया,फिर लाट साहबों ने कबाड़ा किया और सन 47 के बाद कांग्रेस ने लुटिया डुबोई। तरक्की की चिड़िया बिचारी देश में कभी पंख फड़फड़ा ही नहीं सकी। देश तो भ्रष्टाचार-पिछड़ेपन का जखीरा बन के रह गया है।

मियां बुकरात भी हमारी गुफ्तगु सुन रहे थेवो भी इसमें कूद पड़े। बुकरात कहने लगे कि ये सियासी दाँव-पेंच की बातें हैं आप जैसे कन्फ्यूज और कुढ़मगज़ों को कहां समझ में आएगी। दरअसल, पिछले कुछ महीनों से जो आबो-हवा तैयार की गई थी। हमें जो समझाया जा रहा था वो तो बस समझ-समझ का फेर था !’  हमने कहा कि मियां बुकरात, आप तो पूरे सिनिकल सेकुलर लगते हैं, उन जैसी बातें कर रहे हैं। मेरी बात सुन कर बुकरात भड़क गए। कहने लगे, मोहतरमा आप क्या समझती हैं, आप लोगों की पालिश्ड बातों से सच्चाई लोगों को नहीं दिखेगी ? लोगों को गंजसराय का समझना छोड़िए, अच्छा आप यह बताइए कि अगर हमारा मुल्क इतनी ही तबाहकुन हालत में था तो जो मंगल पर हमने परचम लहराया वो क्या है ? मैंने कहा मंगल पर जाना कौन सी तरक्की वाली बात हुई ? दरअसल, चंद्रयान ने भी पिछले चार-पांच महीने की मज़बूती की पॉज़िटिव एनर्जी से इंस्पायर्ड होकर सोचा होगा कि अतंरीक्ष में टहलने से क्या फायदा, मार्स में चल के खैरखूबी से औरों की तरह ही मज़बूत काम करते हैं। बुकरात मेरी बात से जलाल में आ गए कहने लगे बटेसर भाई इन मोहतरमा पर जो रंग चढ़ा है उसपर दुनिया की कोई  दलील काम नहीं करेगी। लेकिन ख़ैर आप ही बताएं आपने भी सुना होगा कि लोग मुनादी करवा रहे थे कि हमारे देश का बंटाढार हो चुका है?

बिचारे बटेसर भईया कहने लगे कि हां बुकरात भाई हमें भी ऐसा ही लगने लगा है कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गई और हम तो जी जंगल राज में पड़े हैं आज तक। मैंने कहा कि तो इसमें झूठ क्या है ?  लेकिन मिंया बुकरात मुझे फटकारते हुए कहने लगे, मोहतरमा आप तो चुप ही रहिए आपकी ना कोई सोच है, ना अपना मुशाहदा (ऑब्जरवेशन)। न्यूज चैनलों को देखदेख अपनी राय बनाती हैं, अरे ऐसा ही पिछड़ा हुआ है मुल्क तो फिर आपके दादा जान जिन्होंने रेडियो से लेकर इंटरनेट का सफर तय किया वो क्या है? अच्छा ये रहने दीजिए हम कई बरस पहले परमाणु शक्ति बने वो क्या था, और जो हमारी रॉकेट आसमान में उड़ती-फिरती हैं, कल-कारखाने और डिजिटल क्रांति की बातें, नब्बे की दहाई की उदारीकरण की पॉलिसी और फॉरेन इंवेस्टमेंट की कवायद?

लेकिन खैर छोड़िए आप जैसे लोग पिछले दिनों जिस तरह की बातें फैला रहे थे मालूम हो रहा था कि अब तक हम अठारहवीं सदी से भी पहले के युग में जी रहे हैं। और हमारे मुल्क की जो दुनिया भर में सबसे बड़े डेमोक्रेटिक-तरक्कीयाफ्ता और खुदमुख़्तार (आत्मनिर्भर) देश की पहचान है वो तो बस कमज़ोर लोगों का तैयारकरदा फरेब था!  तरक्की के कारपेट बिछाने का काम तो बस पिछले पांच महीने से ही शुरू हुआ है, नॉनसेंस! मैंने भी कह दिया कि मिंया बुकरात! आप चाहे जितनी उछल-कूद मचाएं यही सच्चाई है कि ख़ुदा के फज़लोकरम से तरक्की की चिड़िया ने मई महीने से अपने पंख फड़फड़ाने शुरू किए हैं। देखिएगा ये कुछ दिनों में कैसे फर्राटे भरेगी। यूं ज़ूं-ज़पाट, शन्न ज़ट्ट करती आपके सरों के ऊपर से गुज़रेगी कि आप हैरत से देखते रह जाएंगे। और जो आपको न दिखे तो आप ठहरे सेक्युलर बेवकूफ !!

बुकरात कहने लगे- वाह! और जनाबा जो तरक्की है क्या वो बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर के आसमान से टपकेगी ? मोहतरमा ख़ामख्याली में मत रहिए, तरक्की के लिए मज़बूत इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से ही मौजूद है। यानी कि गुदाज गद्दा और उस पर महीन कढ़ाई की चादर तो बिछी ही थी। बस अब उस पर मखमली चद्दर उढ़ाने के ख्वाब दिखाए गए हैं। मैने कहा मियां बुकरात और भईया बटेसर ऐसी बातें धीरे-धीरे कहें कहीं कोई सुन लेगा तो आप भी सेक्युलरों की जमात में शामिल कर दिए जाएंगे और खुदा न खस्ता एनआरआईयों को भनक पड़ी तो आप की सेहत का तो अल्लाह ही हाफ़िज़ !!

शुभ-शुभ

संपर्क: sadafmoazzam@yahoo.in

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