नवजागरणकालीन हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों का एक अध्ययन

जिनको यह लगता है कि हिंदी को लेकर अच्छा शोध या तो विदेश के विश्वविद्यालयों में हो रहा है या फॉरेन फंडिंग से इतिहास वाले कर रहे हैं, तो उनको आशुतोष पार्थेश्वर का यह शोध लेख पढना चाहिए. नवजागरणकालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों को लेकर है. इतना दिलचस्प और जानकारी से भरा यह आलेख ‘तद्भव’ के नए अंक में प्रकाशित हुआ है. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर.
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      भारत में विज्ञापनों का विधिवत सिलसिला उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ। तब से लेकर आज तक विज्ञापनों की रीतिनीति में बहुत बदलाव आ चुका है। सपाट, इकहरे, विवरणात्मक विज्ञापनों से बात अब बहुत आगे बढ़ चुकी है। इस बीच बाजार ने नएनए मुहावरे गढ़ लिए हैं और उसकी ताकत के सामने सभी लाचार नजर आते हैं। इस समूचे परिदृश्य में विज्ञापनों में ​स्त्रियों की उपस्थिति का आकलन भारतीय समाज को समझने के कर्इ सूत्र दे सकता है। बीसवीं सदी की आखिरी दहाइयों में जब भारतीय बाजार वैश्विक पूँजी के लिए खोला गया और जब दूरदर्शन भारतीय परिवारों की एक आवश्यकताके रूप में चिह्नित किया जाने लगा, तब से विज्ञापनों का सेंसुअलहोना भी अनिवार्य समझा जाने लगा। यह पूरा दौर कितना संवेदनशील और आक्रामक है इसकी पहचान इस बात से की जाने चाहिए कि अस्सी के दशक में सौंदर्योत्पादों के विज्ञापनों में दिखनेवाली स्त्रियाँ इक्कीसवीं सदी आतेआते पुरुषों के अंतर्वस्त्रों के विज्ञापनों में भी दिखार्इ पड़ने लगीं।

      ऐसे में नवजागरणकालीन प​त्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों में ​स्त्रियों की उपस्थिति को देखने पर कुछ अलग और स्वतंत्र निष्कर्ष प्राप्त होते हैं तो कुछ वत्तर्मान अभिलक्षणों के बीजरूप। इन विज्ञापनों के तीन समूह बनाए जा सकते हैं – पहला- वैसे विज्ञापन जो स्त्रीस्वास्थ्य से संबंधित दवाओं और पुस्तकों के हैं, दूसरा- वैसे विज्ञापन जो सौंदर्योत्पादों के हैं, तीसरा – उन उत्पादों के विज्ञापन जिनमें पुरुषों की मर्दानगी, शक्तिवर्धक दवाएँ एवं पुत्रोत्पत्ति के उपायों का उल्लेख है। इस तीसरी कोटि के विज्ञापनों में स्त्रियाँ प्रत्यक्षतः उपस्थित नहीं हैं परन्तु इन विज्ञापनों का सन्दर्भ अनिवार्यतः उनसे ही जुड़ा है।

      विज्ञापनों की इस दुनिया में स्त्रियों का प्रवेश भी कम गौरतलब नहीं है। उनका प्रवेश गर्भधारण और पुत्रोत्पत्ति से जुड़े हुए उत्पादों के विज्ञापनों के रास्ते होता है। भारतीय समाज के लिए यह सनातन चिंता का प्रश्न है! हिंदी प्रदीपमें इस विषय की एक पुस्तक का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। विज्ञापन के अनुसार डॉक्टर प्रसादीलाल झा ने गर्भवती की रक्षा के लिए आयुर्वेदिक और डॉक्टरी (अंग्रेजी) उपायों का वर्णन इस पुस्तक में किया है। इसी अंक में ​स्त्रियों की पत्रिका स्त्री दर्पणका विज्ञापन भी प्रकाशित है। प्रयाग से निकलनेवाली इस पत्रिका की संपादिका श्रीमती रामेश्वरी देवी और मैनेजर श्रीमती कमला देवी हैं। विज्ञापन साफसाफ कहता है-
      “स्त्री दर्पण/​ स्त्रियों और लड़कियों के पढ़ने योग्य हिंदी भाषा में पहिला मासिक पत्र। धर्म, साहित्य, सामाजिक सुधार, राजनीति आदि विषयों पर अधिकतर स्त्रियों के ही लेख इस पत्र में लिखे रहते हैं।” 1
     
      विज्ञापन में इस पत्रिका पर श्री वेंकटेश्वर समाचारकी सम्मति भी सम्मिलित है-
      कन्याओं और महिलाओं के लिए यह पत्र अत्युत्तम है और उपयोगी है। हम बड़े आदर से इसका स्वागत करते हैं। समस्त शिक्षित घरानों में इसको जगह मिलनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि यदि यह पत्र  चलता रहा तो स्त्री शिक्षा की बहुत बड़ी उन्नति होगी।” 2
     
      स्त्री शिक्षा की दृष्टि से ऐसे साहित्य की ऐतिहासिक भूमिका रही है। हालाँकि, इस भूमिका का एक दूसरा रूप भी है। कुछ खास साहित्य स्त्रियों को सुगृहिणी’, ‘सुचरित्र’, ‘सुशीलाबनानेवाले थे। यह साहित्य नारी, तुम केवल श्रद्धा होके भाव और लक्ष्य से संचालित था। समाज में स्त्रियों के लिए निश्चित दोयम दर्जे में कोर्इ परिवर्तन हो, यथास्थिति खत्म हो, वे बराबरी की भागीदार बनें, आदि उनका लक्ष्य न था। स्त्रियों को मर्यादा, शील एवं परंपराओं के घेरे में कैद करने के लिए इनमें वेद, पुराण, स्मृतियों और न जाने कहाँकहाँ से संदर्भ भरे जाते थे। ये पुस्तकें स्त्रियों की दुनिया को विस्तार देनेवाले नहीं बल्कि समेटनेवाले थे। ऐसे पुस्तकों का प्रकाशन सार्वदेशिक होता था। प्रतापमें प्रकाशित गृहिणी कर्त्तव्यका एक ऐसा ही विज्ञापन द्रष्टव्य है-
      “गृहिणी कर्त्तव्य / स्त्री शिक्षा की अद्वितीय पुस्तक / …… यदि आप अपनी बहिनों, कन्याओं तथा बहुओं को गृह संबंधनीय सब कर्त्तव्यों की शिक्षा देकर सच्ची गृहिणी बनाना चाहते हैं, तो उन्हें गृहिणी कर्त्तव्य अवश्य पढ़ाइए। श्रुतिस्मृतिपुराण तथा विविध भाषाओं की विविध पुस्तकों के आधार पर बड़े परिश्रम से इस ग्रंथ की रचना हुर्इ है। इस एक ही पुस्तक को पढ़कर स्त्रियां बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक के सब कर्त्तव्यों की समुचित शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं।……3 
     
      एक अन्य पुस्तक का विज्ञापन भी द्रष्टव्य है-
      “गृहस्थी में रहते हुए दाम्पत्य जीवन का सच्चा उपदेश देनेवाली यह एक अपूर्व पुस्तक है। वार्त्तारूप में ऐसे मनोरम और सुशील ढंग से लिखी गर्इ है कि कम पढ़ीलिखी नववधुएँ और कन्याएँ तुरत ही इसे पढ़ डालती हैं। इसका पाठ करने से उनके जीवन की निराशा, अशांति और क्लेश भाग जाते हैं। उन्हें आनंद ही आनंद भास होने लगता है।” 4
     
       
     
      इस दौर के कुछ विज्ञापनों को देखकर यह सोचने को बाध्य होना पड़ता है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर देश के पुरुषों के समक्ष अपनी मर्दानगी और शक्ति को सिद्ध और प्रदर्शित करने के अतिरिक्त क्या कोर्इ और कार्य न था! क्या कामेच्छा की संतुष्टि ही सबसे बड़ा विषय था! ये विज्ञापन जितनी अधिकता और निरंतरता के साथ विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं, उसके कारण क्या हैं? भारत की परम्परित आयुर्वेद या यूनानी चिकित्सा पद्धति का क्या एक मात्र लक्ष्य ऐसी दवाओं का ही उत्पादन रह गया था । यक़ीनन दवाएं तो दूसरी भी रही होंगी, पर विज्ञापन सर्वाधिक इनका ही मिलता है । यह समूचा ताना-बाना इकहरा नहीं है। बहरहाल, एक विज्ञापन देखें-
      अस्ली कोकशास्त्र / तस्वीरोंवाला स्त्रीपुरुषों के जाति, भेद और लक्षण सहित गर्भधारण के नियम / 84 आसनों के नाम / मनचाही संतान पैदा करने की विधि…..5

      पुरुष केंद्रित समाज व्यवस्था में स्त्री के इर्दगिर्द कायम छद्मों को समझने के लिए यह एक अच्छा उदाहरण है। पहले वह भोग्या बने और पुन: संतानोत्पत्ति की मशीन! असल सत्य तो इसके बाद खुलता है, वह है मनचाही संतान। यह मनचाही संतान क्या हो सकती है, यह यहाँ पर नहीं कहा गया है, पर वह उतना भी अप्रकट नहीं है। कुछ अन्य विज्ञापनों में उसका सीधासीधा उल्लेख है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-
      “जैसे गंध बिन फूल, नमक बिन भोजन नीरस होता है, वैसे ही जिनकी गोद में लाड़ले लाल नहीं उनके लिए – औलाद बिन घर नहीं जग सूना है इसलिए मुफ्त पुत्र दावटी (शर्तिया लड़का ही हो) सेवन करो। बहनो व भाइयो! इस वटी के गुण में तो शायद ही किसी को शक हो क्योंकि अनजान से अनजान व्यक्ति भी जनता है कि इस पुत्र दावटी के सहारे ही कौशल्या महाराणी की गोद रामचंद्र जैसे सुपुत्र  से भरी थी, साथ ही यह भी सब जानते हैं कि इसी की खोज में आज सैंकड़ों बहनें सच्चे साधू न पाकर लफंगों के फंदे में फँसकर क्या कुछ नहीं खो बैठतीं। हाँ अलबत्ता यह एक संदेह हो सकता है कि यह वटी ऐसे गुणोंवाली है, इसमें क्या प्रमाण, सो इसके लिए इसकी असलियत इस प्रकार है कि – मेरी सास (जो करीब70 वर्ष की वृद्धा होंगी) को किसी साधु ने यह वटी मुफ्त बाँटने के लिए दी थी, सो अपने जीवनकाल में उन्होंने सैंकड़ों बहिनों को इसका सेवन कराया और आज उस ही के फलस्वरूप अनेकों बहिनें कर्इकर्इ पुत्रों की माता हो रही हैं, मरते समय वे इस वटी को मुझे बतला गर्इं और आज कर्इ वर्षों से मैं भी इसका अनुभव कर रही हूँ। इतना फल देख मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि अपने पठित भार्इ बहनों के कानों तक भी इस के गुण पहुंचाऊं, अब लाभ उठाना न उठाना आपलोगों के हाथ है, इसके गुण इस प्रकार हैं। पुत्र दावटी नं 1– जिनके प्रदर, प्रसूत तथा अस्वाभाविक बाँझपन आदि दोषों से गर्भ स्थित ही न होता हो, जो लाखों रु. जादूटोना आदि में स्वाहा कर चुके हों और फिर भी पुत्र रत्न न पाकर दुखी हों, वे दोनों नंबर की वटीका मँगाएँ। साथ ही अपनी अवस्था, प्रदरादिदोष  का पूरा हाल (यदि कोर्इ हो), पति की अवस्था आदि सब खुलासा हाल भेजें ताकि वटी के सेवन में सुविधा हो। पुत्र दावटी नं. 2– जिनके लड़कियाँ ही लड़कियाँ होती हों, संतान जीवित न रहना, दुर्बल होना, गर्भस्राव आदि दोषों के कारण पुत्र  रत्न से वंचित हों और अब गर्भवती हों इसका सेवन करे साथ ही गर्भ के दिन मास आदि सब खुलासा लिखें………6

      समाज में किस्से राम और कृष्ण के ही सुनाए जाते हैं, बेटियों की कहानियाँ न लिखी गर्इं, न कही गर्इं, न सुनी गर्इं। बेटियाँ भारतीय समाज में अनचाही होती हैं! ये पहले भी अनचाही थीं और आज भी। इनकी बारी आती भी है तो बेटों के बाद ही। इतने विस्तार से इन विज्ञापनों के उल्लेख के बाद तत्कालीन समाज पर कुछ विशेष  टिप्पणी की आवश्यकता नहीं रह जाती। 

      इन पत्रिकाओं में स्त्रियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और उनकी आयुर्वेदिक दवाओं के विज्ञापन भी खूब छपे। इन विज्ञापनों में विभिन्न सम्मतियाँ भी छपती थीं। पत्रिकाओं में स्त्रियों को एक विशेष  प्रकार की देह यष्टि  प्रदान करनेवाली आयुर्वेदिक दवाओं के विज्ञापन भी छपते थे। ​स्त्रियों के इस हक से कौन इंकार करना चाहेगा, पर इन विज्ञापनों का सच इतना सपाट नहीं है। इन विज्ञापनों के साथ एक दूसरा विज्ञापन भी चस्पां मिलेगा, या आसपास दिखार्इ दे जाएगा, और वे विज्ञापन होते थे पुरुषों की कामशक्तियौवनेच्छा बढ़ानेवाले । इन विज्ञापनों को साथसाथ देखने पर ही स्त्रियों को विशेष देह यष्टि  प्रदान करनेवाले विज्ञापनों का सच उद्घाटित होता है। यह बीसवींइक्कीसवीं सदी के उन विज्ञापनों की तरह है जिसमें कोर्इ स्त्री गोरा होकर पुरुषों को आकर्षित करने में ही अपने रूप की सार्थकता समझती है। एक साथ प्रकाशित ये विज्ञापन द्रष्टव्य हैं, विज्ञापक है – मनस्वी औषधा लय, 7910 लाटूश रोड, कानपुर
      “मुफ्त तिलस्मी जड़ी/बचपन की कुचालों से नामर्द से नामर्द भार्इ वैसी ही ताकत प्राप्त करने के लिए विषैली तिलाओं व स्तंभन (इमसाक) के लिए नशीली चीजों से बचेखुचे स्वास्थ्य को भी न खोएँ, क्योंकि इस जड़ी के सिर्फ मुँह में डाले रखने से तब तक बदन में ऐसी फुर्ती व शक्ति पैदा होती है कि आप घंटों आनंद में मग्न रहेंगे और अंत तक शिथिल भी न होंगे न विषैली और न नशीली।………….उरुजे पिस्तान तैल भी/यह सुगंधित तेल समस्त स्तन रोगों को नष्ट कर 7 रोजों में स्तनों को पुष्ट व कठोर बनाता है कि फिर जन्मभर एकसां रहते हैं, तथा सिरदर्द, थकावट दूर कर दिमाग को तर व सुगंधिमय बनाता है। हमारे जगत्प्रसिद्ध धातुपुष्ट चूर्ण (मू. 2 रु.) साथ लेने पर जड़ी या तैल मुफ्त……..7

      कश्मीरी कोकशास्त्र8 के वे विज्ञापन जो स्त्रियों को पद्मिनी’, ‘चित्रनी’, ‘शंखनी’, ‘हस्तनीआदि वर्गों में विभाजित कर अंतत: उसकी समूची इयत्ता को  भोग्यारूप में स्खलित करने पर केंद्रित होते हैं, इस दौर में निरंतर प्रकाशित होते हैं। बूढ़े को जवान बनाने का दावा करनेवाले वैद्यकहकीमी 9 के विज्ञापन भी इसी गोत्र  के हैं और इस दौर में इतनी ही बारंबारता से मिलते हैं .
      विज्ञापनों में स्त्रियों के चित्र  का आरंभिक उपयोग डोंगरे का बालामृत10, ‘चंद्रामृत11, ‘शिररोगनाशक 12 आदि के विज्ञापनों में मिलते हैं। आगे चलकर सौंदर्योत्पादों और वस्त्रों के विज्ञापनों में भी उनका उपयोग हुआ। कामिनिया ऑइल13,  कामिनिया स्नो14, कामिनिया ह्वाइट सोप15, सुंदरी स्नो16, हिमानी स्नो17, कोकोला साबून18, क्यूटीकूरा मलहम19, क्यूटीकुरा साबुन20, अफगान स्नो21, बनारसी साड़ी22 आदि के विज्ञापनों में स्त्रीछवि का इस्तेमाल किया जाता है। यह सही है कि इन उत्पादों में स्त्री छवि का उपयोग आज के उदारवादी दौर के विज्ञापनों की तरह आक्रामक और द्वयर्थी नहीं है और इनकी तुलना यदि उस दौर के शक्तिवर्धक या विशेष  देह यष्टि  वाली दवाओं के विज्ञापनों में उपस्थितअनुपस्थित स्त्रीसे की जाए, तो शक्तिवर्धक दवाओं वाले विज्ञापन ही अशालीन जान पड़ेंगे।

      स्त्री स्वास्थ्य पर केंद्रित विज्ञापनों को देखें तो यह सवाल उठता है कि क्या स्वस्थ स्त्री का सबसे बड़ा लक्ष्य गर्भधारण एवं संतानोत्पत्ति मात्र है। स्त्रीस्वास्थ्य की इतनी चिंता क्या मात्र इसी कारण है! ‘चाँदमें प्रकाशित एक ऐसे ही विज्ञापन में, जिसमें भारत की राष्ट्र पताका श्रीमती सरोजिनी नायडू की बहुमूल्य सम्मति’  प्रकाशित है, यह कहा जाता है-
      “वीर प्रसविनी (माँ) के बिना देश का कल्याण नहीं! पर रोगी शरीर में वीरता कहाँ? अत: रोगी शरीर को स्त्रीरोग की दवा अवश्य खानी चाहिए।” 23
     
      स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर समाज में स्त्रियों की भूमिका को पहचानने का सिलसिला भी शुरू हुआ। गाँधी ने अपनी राजनीति में ​ स्त्रियों को स्थान देकर उसे ठोस और व्यापक रूप दिया। स्त्रियों की स्थिति में बदलाव की शुरुआत यहीं से होती है। उनकी शिक्षारोजगार 24 की चिंता की जा रही थी, उनकी पहचान के प्रति सम्मान की इस पहली आहट का पता उस दौर के विज्ञापनों से भी चलता है।

      यह संदर्भ वैवाहिक विज्ञापनों के उल्लेख के बिना अधूरा रहेगा। वैवाहिक विज्ञापन दो प्रकार के हैं- वर की आवश्यकता, वधू की आवश्यकता। डॉक्टर वर के लिए वधू की आवश्यकता का एक विज्ञापन देखें-
      एक नवयुवक डॉक्टर के लिए, जो एम.बी.बी.एस. है और यू.पी. के मेडिकल सर्विस में है एक सुशिक्षिता, सुंदर और स्वस्थ्य हिंदू कन्या की आवश्यकता है। कन्या की आयु 18 से 20 वर्ष तक होनी चाहिए। जातिपाँति का कोर्इ ख्याल नहीं है केवल कन्या सुयोग्य होना चाहिए। अन्य आवश्यक बातें जानने के लिए निम्नलिखित पते से पत्रव्यवहार करना चाहिए।” 25

      जातपाँतका भेद न होना अच्छी बात है, पर अन्य आवश्यक बातेंका खतरा भी इस विज्ञापन में उपस्थित है। लेकिन इससे भी बड़ा रहस्य कन्या के सुयोग्यहोने में है। इसकी कसौटी क्या होगी, इसका खुलासा इस विज्ञापन में नहीं है। वर की आवश्यकतावाला विज्ञापन इससे इतर समाज की दूसरी सच्चार्इ व्यक्त करता है-
      “मुझे अपनी दो कन्याओं के लिए जिनमें एक की उम्र 11 वर्ष है और सातवें क्लास तक अंग्रेजी, हिंदी और संस्कृत पढ़ी है और दूसरी की उम्र 10 वर्ष की है जो छठवें क्लास में पढ़ रही है, स्वजातीय वरों की आवश्यकता है। लड़कियाँ अभी पढ़ रही हैं और भी पढ़ाने की इच्छा है। वर उच्च कोटि का शिक्षित और अच्छे घराने का धनाढ्य होना चाहिए। विशेष  बातों के लिए पत्रव्यवहार करें।” 26     
      एक सुप्रसिद्ध खत्री घराने की 16 वर्ष की लिखी पढ़ी कन्या के लिए योग्य, स्वरूप और उच्च घराने के वर की आवश्यकता है। लड़की घर के काम काज में निपुण है। सीना, पिरोना बहुत अच्छा जानती है। मध्यमा तक संस्कृत पढ़ी है। अंग्रेजी पढ़ रही है। लड़के की आयु 22-24 वर्ष की और कम से कम बी.ए. पास होना चाहिए। साहित्य प्रेमी वर को विशेष तरजीह दी जाएगी। वर कोर्इ खत्री हो, ऊंचनीच का विचार नहीं है, किंतु खत्री होना जरूरी है। साथ ही जायदाद और रुपयों की भी जरूरत नहीं है केवल वर अच्छा होना चाहिए।” 27

      पहले विज्ञापन में बच्चियाँ 11  और 10 वर्ष की हैं तो दूसरे विज्ञापन में 16 वर्ष की। बाल विवाह और लड़कियों की कम उम्र में शादी से हम आज भी मुक्त नहीं हुए हैं और उस समय के लिए तो यह एक बेहद आम बात है। उल्लेखनीय बात यह है कि पहले विज्ञापन में और भी पढ़ाने की इच्छाहै। दोनों ही विज्ञापनों में अंग्रेजीके प्रति आकर्षण और जाति का बंधन समान रूप से उपस्थित है। पहले विज्ञापन में वर के धनाढ्य होने पर बल है तो दूसरे में यह महत्त्वहीन है। 1925 में प्रकाशित ये विज्ञापन स्त्री शिक्षा के प्रसार का परिचय तो देते हैं पर अभी भी वह स्त्री के लिए एक अलंकरण है, उसकी इयत्ता से जुड़ा हुआ प्रश्न नहीं बन पाया है, इसे भी स्पष्ट कर देते हैं। आज के वैवाहिक विज्ञापनों में कान्वेंट गोइंग लड़की की मांग का बीज रूप इस विज्ञापन में लड़कियों के ‘अंग्रेजी-ज्ञान’  के उल्लेख में देखना चाहिए।

      इसी प्रसंग में विधवाविवाह और वेश्याविवाह से संबंधित सूचनाओंविज्ञापनों को भी देखना चाहिए। उन्नीसवीं सदी में हुए समाज सुधार आंदोलनों और तत्कालीन राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन ने समाज में ऐसे उत्साही माहौल को बनाने में भूमिका निभार्इ थी। विधवाविवाह जैसे आयोजन व्यक्तिगत प्रेरणा और सामूहिक प्रयास – दोनों से संपन्न होते थे। प्रेमचंद ने भी1907 में बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया था। इस राह की अपनी मुश्किलें थीं। समाज इन चीजों के लिए सहर्ष तैयार न था। प्रतापमें 1922 में विधवा-विवाह से संबंधित एक विज्ञापन से इसका जायजा लिया जा सकता है-
      “देश में दो क

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