युवा शायर #15 स्वप्निल तिवारी की ग़ज़लें

युवा शायर सीरीज में आज पेश है स्वप्निल तिवारी की ग़ज़लें – त्रिपुरारि  ======================================================

ग़ज़ल-1

मेरे चारों सिम्त पहले जमअ तन्हाई हुई
दिल-कचहरी में मिरी तब जा के सुनवाई हुई

रेत पर लेटी हुई थी शाम लड़की सी किसी
धूप से साहिल पे पूरे दिन की सँवलाई हुई

धीरे धीरे ख़ाब की सब मछलियाँ भी मर गयीं
रफ़्ता रफ़्ता कम मिरी नींदों की गहराई हुई

धूप के भीगे हुए टुकड़े हैं पैलेट* में फ़क़त
कैनवस पर इक धनक है रंग में आई हुई

कैमरे की इक पुरानी रील अचानक मिल गयी
पर जो तस्वीरें बनीं वो सब थीं धुँधलाई हुई

ग़ज़ल-2

जले हैं हाथ मिरे बिजलियाँ पकड़ते हुए
हुई है इन की शिफ़ा तितलियाँ पकड़ते हुए

अजब ख़ुशी थी न था ध्यान मेरा रस्ते पर
मैं गिर पड़ा था तिरी उंगलियाँ पकड़ते हुए

यहीं पे रिश्ता समंदर से मेरा ख़त्म हुआ
मुझे ख़ज़ाना मिला मछलियाँ पकड़ते हुए

तमाम खेल तिलिस्मी थे मेरे बचपन के
धनक धनक मैं हुआ तितलियाँ पकड़ते हुए

किसी पहाड़ पे जाऊँगा छुप के दुनिया से
कटेगा वक़्त वहाँ बदलियाँ पकड़ते हुए

ग़ज़ल-3

आँखें मूँदे, लेटे लेटे, नग़मा गाना सो जाना
नींद की लय पर आते आते ज़ेहन बुझाना सो जाना

अपने हिस्से की तारीकी आँख में लेकर चलना तुम
जब भी थकन हमवार मिले इक रात बिछाना सो जाना

ख़र्च भी हो गयी शब की सियाही, फिर भी अधूरा है किस्सा
मुमकिन है के नींद में पूरा हो अफ़साना सो जा ना

भूल भुलैया बेदारी की पागल भी कर सकती है
चाँद भी गर आवाज़ तुम्हें दे, कर के बहाना सो जाना

धीरे धीरे जा कर बैठना इक शब अपने पास कभी 
अपनी ज़ात की धुन पर कोई लोरी गाना सो जाना 

करवट करवट पूरे दिन की उलझन कर देना तक़सीम
बुनते बुनते अगले दिन का ताना बाना सो जाना  

ग़ज़ल-4

शदीद ग़म है गर उसे तो क्या हुआ
वो सोच के समझ के सब जुदा हुआ 

वो शख़्स खो रहा है अपनी सादगी
कहीं कहीं से रंग है उड़ा हुआ

ढंका हुआ हूं इक महीन नींद से
मैं रतजगे की गोद में पड़ा हुआ

उतार कर वो चांदनी में केंचुली
पुराना ग़म था रात जो नया हुआ

हरेक नींद को परख रहा हूं मैं
तुम्हारे एक ख़ाब का जला हुआ

बदन में लौट आया साया शाम तक
जहां तहां से धूप में सना हुआ

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