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    संगीत का कुंदन
    कुंदनलाल सहगल हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहे जा सकते हैं। १९३० और ४० के दशक की संगीतमयी फिल्मों की ओर दर्शक उनके भावप्रवण अभिनय और दिलकश प्लेबैक के कारण खिंचे चले आते थे। शरद दत्त की पुस्तक कुंदन उसी गायक-अभिनेता की जीवनी है। उस के. एल. सहगल की जिनका फिल्मी सफर महज सोलह सालों का रहा। इन सोलह सालों के दौरान उन्होंने हिंदी की २७ और बांग्ला की ७ फिल्मों में काम किया। और करीब १७६ गाने गाए। जीवनीकार ने सही लिखा है कि इतनी कम फिल्मों में काम करके और इतने कम गाने गाकर जो प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की वह शाायद ही किसी को नसीब हुई है। लेखक ने पुस्तक में सहगल के जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पड़ावों को रेखांकित किया है। इस नैसर्गिक गायक के संघर्षों के अंधेरों और लोकप्रियता के उजालों की कथा से जुडे पडावों को। जीवन-कथा को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए लेखक ने पर्याप्त शोध तो किया ही है अनेक ऐसे लोगों से बातचीत भी की है जिन्होंने उनके जीवन के उस दौर को करीब से देखा था जब कुंदन के. एल. के नाम से विख्यात नहीं हुआ था।
    सहगल को संगीत की आरंभिक शिक्षा जम्मू के सूफी पीर सलमान युसुफ से मिली। माँ ने उनको भजनों की तालीम दी तथा तवायफों के कोठों पर उन्होंने ठुमरी-दादरा सीखा। व्यवस्थित रूप से संगीत की शिाक्षा प्राप्त नहीं करने के बावजूद उनके गायन का शास्त्रीय पक्ष इतना मजबूत था कि इस बात पर विद्गवास करना कठिन हो जाता है कि उन्होंने किसी उस्ताद से तालीम नहीं ली थी। अपने जीवन में ही किंवदंती बन चुके सहगल के संगीत ज्ञान के बारे में लेखक ने पुस्तक में एक प्रसंग का उल्लेख किया है। कहते हैं कि वे एक बार उस्ताद फैयाज खां के पास तालीम हासिल करने की गरज से गए, तो उस्ताद ने उनसे कुछ गाने के लिए कहा। उन्होंने राग दरबारी में खयाल गाया, जिसे सुनकर उस्ताद ने गद्‌गद्‌ भाव से कहा कि बेटे मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि जिसे सीखकर तुम और बड़े गायक बन सको। गुणीजनों से सुन-सुनकर संगीत सीखनेवाले इस गायक के बारे में शरद दत्त ने सही लिखा है कि शास्त्रीय गायन तथा उनके कंठ में बसे दर्द ने मिलकर जिस संगीत को जन्म दिया वह लोकप्रियता की मिसाल बन गया।
    जम्मू में जन्मे कुंदनलाल सहगल बचपन से ही अपने गायन से सबको सहज ही प्रभावित कर लेते थे। लेकिन एक सफल गायक के रूप में लोकप्रिय होने से पहले उनको जीवन के सुर साधने के लिए अनेक प्रकार के रियाज करने पड़े। इलेक्ट्रिशियन, रेलवे में टाईमकीपर, टाईपराइटर बनाने वाली कंपनी रैमिंगटन में सेल्समैन की नौकरियां करते हुए वे दिल्ली, मुरादाबाद, कानपुर, शिामला आदि शहरों में भटकते रहे। लेकिन इस दौरान एक बडे गायक के रूप में अपनी पहचान बनाने का उनका जज्बा कमजोर नहीं पडा। लेकिन उस मौके के लिए उनको लंबा इंतजार करना पडा। लेखक ने इस जीवनी में उसका एक कारण तो यह बताया है कि उस समय तक सवाक फिल्मों का निर्माण नहीं शुरु हुआ था तथा मूक फिल्मों में सहगल की गायन प्रतिभा का इस्तेमाल नहीं हो सकता था। जीवन के इन उतार-चढावों ने शाायद सहगल की आवाज में दर्द का एक अव्यक्त भाव पैदा कर दिया तथा जीवन में फक्कडपन का। जिसके बारे में लेखक ने न्यू थियेटर्स के मालिक के हवाले से लिखा है, उसके जीवन में एक ही बात थी जो जो उसे रास नहीं आती थी वह थी अपने प्रति बहुत गंभीर होना। वह सिर्फ उन्हीं लोगों के प्रति गंभीर होता था, जो उससे कम भाग्यशााली थे। लेखक ने पुस्तक में उनके मानवीय पहलू से जुडे अनेक प्रसंग दिए हैं।
    यह महज संयोग था कि १९३१ में कोलकाता की गलियों की खाक छानते के. एल. सहगल की मुलाकात वहां के प्रसिद्ध न्यू थियेटर्स के संगीत निर्देशक आर. सी. बोराल से हुई। उन्होंने उनकी नियुक्ति उस न्यू थियेटर्स में गायक-अभिनेता के रूप में करवा दी जिसने सिनेमा में गायन की शुुरूआत की थी। इसी कंपनी की १९३२ में रिलीज हुई फिल्म मोहब्बत के आँसू में वे पहली बार नायक बने तो इसी न्यू थियेटर्स के लिए पी. सी बरुआ निर्देशिात फिल्म देवदास ने उनको महानायक बना दिया। वे हिंदी सिनेमा के पहले ट्रेजेडी किंग बन गए। देवदास के इस नायक का कैसा देशव्यापी प्रभाव था इसको लक्षित करते हुए कुंदनलाल सहगल के एक अन्य जीवनीकार प्राण नेविल ने लिखा है कि उस दौर में देवदास का ऐसा प्रभाव था कि कॉलेजिया लड़के ओवरकोट पहनकर चलने लगे थे और चलते-चलते रुककर छाती पर हाथ रखकर सहगल की तरह खांसने लगते थे। बाद में सहगल की शराबनोसी के किस्सों ने उनको देवदास की इस छवि से एकाकार कर दिया। बहरहाल, देवदास की सफलता के बाद उन्होंने पीछे मुड कर नहीं देखा।
    बाद में वे मुंबई गए और वहां भी उनके अभिनय और गायन की धूम मच गई। वहां संगीतकार खेमचंद्र प्रकाश, नौशााद जैसे संगीतकारों के लिए भी उन्होंने कई यादगार गीत गाए। प्रसंगवश, फिल्म शााहजहां का गीत जब दिल ही टूट गया उनका सबसे प्रिय गीत था और इसके बारे में उन्होंने वसीयत की थी कि इसे उनकी अर्थी के साथ बजाया जाए। जब उनका इंतकाल हुआ तो यह गीत उनकी अर्थी के साथ बजाया भी गया। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में उनकी शैली में गाना अपने आपमें सफलता की कुंजी मानी जाती थी। मुकेश और किशोोर कुमार ने अपने कैरियर के आरंभ में सहगल की शैली में गायन किया भी था। कुंदन के बारे में कहा जाता है कि पीढ़ी दर पीढी इस्तेमाल करने के बाद भी उसकी आभा कम नहीं पडती। सहगल सचमुच संगीत के कुंदन थे। मृत्यु के छह दशक बाद भी उनकी आवाज का जादू कम नहीं हुआ है।
    शरद दत्त ने कुंदनलाल सहगल पर अनेक वृत्तचित्रों का निर्माण किया है तथा वे पहले भी उनकी कला के ऊपर एक पुस्तक लिख चुके हैं। लेकिन यह पुस्तक उससे भिन्न है। इसमें सहगल का जीवन अधिक गहराई से उभरकर आया है। पुस्तक पठनीय शैली में लिखी गई है जो सहगल के गीतों की ही तरह उस्तादों तथा सामान्य जन को समान रूप से प्रभावित करने में समर्थ है।
    समीक्षित पुस्तकः कुंदनः सहगल का जीवन और संगीत
    लेखकः शरद दत्त
    प्रकाशकः पेंगुइन बुक्स, मूल्य-१५० रुपए।

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    संगीत का कुंदन
    कुंदनलाल सहगल हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहे जा सकते हैं। १९३० और ४० के दशक की संगीतमयी फिल्मों की ओर दर्शक उनके भावप्रवण अभिनय और दिलकश प्लेबैक के कारण खिंचे चले आते थे। शरद दत्त की पुस्तक कुंदन उसी गायक-अभिनेता की जीवनी है। उस के. एल. सहगल की जिनका फिल्मी सफर महज सोलह सालों का रहा। इन सोलह सालों के दौरान उन्होंने हिंदी की २७ और बांग्ला की ७ फिल्मों में काम किया। और करीब १७६ गाने गाए। जीवनीकार ने सही लिखा है कि इतनी कम फिल्मों में काम करके और इतने कम गाने गाकर जो प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की वह शाायद ही किसी को नसीब हुई है। लेखक ने पुस्तक में सहगल के जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पड़ावों को रेखांकित किया है। इस नैसर्गिक गायक के संघर्षों के अंधेरों और लोकप्रियता के उजालों की कथा से जुडे पडावों को। जीवन-कथा को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए लेखक ने पर्याप्त शोध तो किया ही है अनेक ऐसे लोगों से बातचीत भी की है जिन्होंने उनके जीवन के उस दौर को करीब से देखा था जब कुंदन के. एल. के नाम से विख्यात नहीं हुआ था।
    सहगल को संगीत की आरंभिक शिक्षा जम्मू के सूफी पीर सलमान युसुफ से मिली। माँ ने उनको भजनों की तालीम दी तथा तवायफों के कोठों पर उन्होंने ठुमरी-दादरा सीखा। व्यवस्थित रूप से संगीत की शिाक्षा प्राप्त नहीं करने के बावजूद उनके गायन का शास्त्रीय पक्ष इतना मजबूत था कि इस बात पर विद्गवास करना कठिन हो जाता है कि उन्होंने किसी उस्ताद से तालीम नहीं ली थी। अपने जीवन में ही किंवदंती बन चुके सहगल के संगीत ज्ञान के बारे में लेखक ने पुस्तक में एक प्रसंग का उल्लेख किया है। कहते हैं कि वे एक बार उस्ताद फैयाज खां के पास तालीम हासिल करने की गरज से गए, तो उस्ताद ने उनसे कुछ गाने के लिए कहा। उन्होंने राग दरबारी में खयाल गाया, जिसे सुनकर उस्ताद ने गद्‌गद्‌ भाव से कहा कि बेटे मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि जिसे सीखकर तुम और बड़े गायक बन सको। गुणीजनों से सुन-सुनकर संगीत सीखनेवाले इस गायक के बारे में शरद दत्त ने सही लिखा है कि शास्त्रीय गायन तथा उनके कंठ में बसे दर्द ने मिलकर जिस संगीत को जन्म दिया वह लोकप्रियता की मिसाल बन गया।
    जम्मू में जन्मे कुंदनलाल सहगल बचपन से ही अपने गायन से सबको सहज ही प्रभावित कर लेते थे। लेकिन एक सफल गायक के रूप में लोकप्रिय होने से पहले उनको जीवन के सुर साधने के लिए अनेक प्रकार के रियाज करने पड़े। इलेक्ट्रिशियन, रेलवे में टाईमकीपर, टाईपराइटर बनाने वाली कंपनी रैमिंगटन में सेल्समैन की नौकरियां करते हुए वे दिल्ली, मुरादाबाद, कानपुर, शिामला आदि शहरों में भटकते रहे। लेकिन इस दौरान एक बडे गायक के रूप में अपनी पहचान बनाने का उनका जज्बा कमजोर नहीं पडा। लेकिन उस मौके के लिए उनको लंबा इंतजार करना पडा। लेखक ने इस जीवनी में उसका एक कारण तो यह बताया है कि उस समय तक सवाक फिल्मों का निर्माण नहीं शुरु हुआ था तथा मूक फिल्मों में सहगल की गायन प्रतिभा का इस्तेमाल नहीं हो सकता था। जीवन के इन उतार-चढावों ने शाायद सहगल की आवाज में दर्द का एक अव्यक्त भाव पैदा कर दिया तथा जीवन में फक्कडपन का। जिसके बारे में लेखक ने न्यू थियेटर्स के मालिक के हवाले से लिखा है, उसके जीवन में एक ही बात थी जो जो उसे रास नहीं आती थी वह थी अपने प्रति बहुत गंभीर होना। वह सिर्फ उन्हीं लोगों के प्रति गंभीर होता था, जो उससे कम भाग्यशााली थे। लेखक ने पुस्तक में उनके मानवीय पहलू से जुडे अनेक प्रसंग दिए हैं।
    यह महज संयोग था कि १९३१ में कोलकाता की गलियों की खाक छानते के. एल. सहगल की मुलाकात वहां के प्रसिद्ध न्यू थियेटर्स के संगीत निर्देशक आर. सी. बोराल से हुई। उन्होंने उनकी नियुक्ति उस न्यू थियेट
    र्स में गायक-अभिनेता के रूप में करवा दी जिसने सिनेमा में गायन की शुुरूआत की थी। इसी कंपनी की १९३२ में रिलीज हुई फिल्म मोहब्बत के आँसू में वे पहली बार नायक बने तो इसी न्यू थियेटर्स के लिए पी. सी बरुआ निर्देशिात फिल्म देवदास ने उनको महानायक बना दिया। वे हिंदी सिनेमा के पहले ट्रेजेडी किंग बन गए। देवदास के इस नायक का कैसा देशव्यापी प्रभाव था इसको लक्षित करते हुए कुंदनलाल सहगल के एक अन्य जीवनीकार प्राण नेविल ने लिखा है कि उस दौर में देवदास का ऐसा प्रभाव था कि कॉलेजिया लड़के ओवरकोट पहनकर चलने लगे थे और चलते-चलते रुककर छाती पर हाथ रखकर सहगल की तरह खांसने लगते थे। बाद में सहगल की शराबनोसी के किस्सों ने उनको देवदास की इस छवि से एकाकार कर दिया। बहरहाल, देवदास की सफलता के बाद उन्होंने पीछे मुड कर नहीं देखा।
    बाद में वे मुंबई गए और वहां भी उनके अभिनय और गायन की धूम मच गई। वहां संगीतकार खेमचंद्र प्रकाश, नौशााद जैसे संगीतकारों के लिए भी उन्होंने कई यादगार गीत गाए। प्रसंगवश, फिल्म शााहजहां का गीत जब दिल ही टूट गया उनका सबसे प्रिय गीत था और इसके बारे में उन्होंने वसीयत की थी कि इसे उनकी अर्थी के साथ बजाया जाए। जब उनका इंतकाल हुआ तो यह गीत उनकी अर्थी के साथ बजाया भी गया। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में उनकी शैली में गाना अपने आपमें सफलता की कुंजी मानी जाती थी। मुकेश और किशोोर कुमार ने अपने कैरियर के आरंभ में सहगल की शैली में गायन किया भी था। कुंदन के बारे में कहा जाता है कि पीढ़ी दर पीढी इस्तेमाल करने के बाद भी उसकी आभा कम नहीं पडती। सहगल सचमुच संगीत के कुंदन थे। मृत्यु के छह दशक बाद भी उनकी आवाज का जादू कम नहीं हुआ है।
    शरद दत्त ने कुंदनलाल सहगल पर अनेक वृत्तचित्रों का निर्माण किया है तथा वे पहले भी उनकी कला के ऊपर एक पुस्तक लिख चुके हैं। लेकिन यह पुस्तक उससे भिन्न है। इसमें सहगल का जीवन अधिक गहराई से उभरकर आया है। पुस्तक पठनीय शैली में लिखी गई है जो सहगल के गीतों की ही तरह उस्तादों तथा सामान्य जन को समान रूप से प्रभावित करने में समर्थ है।
    समीक्षित पुस्तकः कुंदनः सहगल का जीवन और संगीत
    लेखकः शरद दत्त
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