हबीब जालिब की नज़्म ‘लता’

यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘लता सुर गाथा’ पढ़ रहा था तो उसमें इस बात के ऊपर ध्यान गया कि इंकलाबी शायर हबीब जालिब जब 1976  में जेल में बंद थे तो वे लता मंगेशकर के गीत सुना करते थे. उन्होंने कहा है कि जेल में उनको जो रेडियो दिया जाता था उसके ऊपर वे रेडियो सीलोन लगाकर लता मंगेशकर के गीत सुना करते थे. और उस अँधेरी दुनिया में उन्हीं गीतों ने उनको जिन्दा रखा. बहरहाल, उन्होंने एक नज्म भी लता मंगेशकर के ऊपर लिखी थी. आज आपके लिए- मॉडरेटर

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तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रैन हमारे
तेरी अगर आवाज़ न होती
बुझ जाती जीवन की ज्योती
तेरे सच्चे सुर हैं ऐसे
जैसे सूरज चाँद सितारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रैन हमारे
क्या क्या तूने गीत हैं गाये
सुर जब लागे मन झुक जाए
तुमको सुनकर जी उठते हैं
हम जैसे दुःख दर्द के मारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रैन हमारे
मीरा तुझमें आन बसी है
अंग वही है, रंग वही है
जग में तेरे दास हैं इतने
जितने हैं आकाश में तारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे

 

बीते हैं दिन रैन हमारे 
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