गोंधल: भक्ति, संगीत और किस्सागोई की परंपरा

इस बार ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारत से आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में मराठी फ़िल्म गोंधल का चयन हुआ है। इसके महत्त्व को लेकर यह लेख लिखा है वाणी त्रिपाठी ने। वाणी त्रिपाठी टिक्कू भारतीय सिनेमा और रंगमंच की एक बहुआयामी हस्ती हैं। वह एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री, फिल्म निर्माता, रंगकर्मी, लेखिका और सांस्कृतिक विचारक हैं। उन्होंने भारतीय रंगमंच और सिनेमा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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इस बात में एक खास अहमियत है कि 99वें अकादमी पुरस्कारों यानी ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि कोई बड़े बजट की हिंदी फिल्म, सितारों से सजी व्यावसायिक मनोरंजक फिल्म या बॉलीवुड के पारंपरिक ढांचे में बनी कोई फिल्म नहीं है। यह फिल्म है गोंधल, संतोष दावखर के निर्देशन में बनी एक मराठी फिल्म, जिसकी जड़ें ग्रामीण महाराष्ट्र की लोक परंपराओं में हैं। शायद यही वजह है कि इसका चयन केवल ऑस्कर से जुड़ी एक और खबर भर नहीं है। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और सिनेमाई घटना है।
फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा 33 फिल्मों में से चुनी गई गोंधल 2027 के अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। लेकिन इसका महत्व केवल ऑस्कर की दौड़ तक सीमित नहीं है। इसका चयन एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: जब भारत अपनी कहानी दुनिया को सुनाना चाहता है, तो वह दुनिया को क्या दिखाना चाहता है? और इस बार इसका जवाब बॉलीवुड की जानी-पहचानी दुनिया से बहुत दूर, महाराष्ट्र की मिट्टी और उसकी लोक संस्कृति से निकलकर आया है।
फिल्म को समझने के लिए सबसे पहले उस परंपरा को समझना जरूरी है, जिसके नाम पर इसका शीर्षक रखा गया है। गोंधल महाराष्ट्र की एक प्राचीन लोक-धार्मिक प्रदर्शन परंपरा है, जिसका संबंध विशेष रूप से देवी भवानी और खंडोबा की आराधना से है। परंपरागत रूप से गोंधली कहलाने वाले कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला यह अनुष्ठान विवाह और परिवार के अन्य शुभ अवसरों पर आयोजित किया जाता है।
इसमें भक्ति संगीत, गायन, नृत्य, नाटकीय प्रस्तुति और कथा-वाचन का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। परिवार गोंधली कलाकारों को आमंत्रित करते हैं ताकि देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हो, परिवार की रक्षा हो और जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को शुभ बनाया जा सके। लेकिन गोंधल केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह सामुदायिक कहानी कहने की एक जीवंत परंपरा भी है। इसके माध्यम से पौराणिक कथाएं, लोक इतिहास, सांस्कृतिक स्मृतियां और सामाजिक मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।
खंडोबा की भक्ति परंपरा में वाघ्या और मुरली जैसे पात्रों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। गोंधल का आयोजन अक्सर रातभर चलता है। इसमें पारंपरिक वाद्ययंत्रों, ढोल, दीपों और नाटकीय प्रस्तुतियों का इस्तेमाल होता है। इस परंपरा की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें पवित्रता और नाटकीयता, आस्था और प्रदर्शन, पौराणिक कथाएं और रोजमर्रा का जीवन एक साथ दिखाई देते हैं। निर्देशक संतोष दावखर ने अपनी फिल्म के लिए इसी दुनिया को चुना है। और यह एक बेहद दिलचस्प सिनेमाई चुनाव है।

गोंधल की कहानी के केंद्र में है सुमन, जिसका किरदार इशिता देशमुख ने निभाया है। सुमन एक ऐसी युवती है जो एक दमनकारी विवाह में फंसी हुई है। उसकी शादी आनंद नाम के एक धनी व्यक्ति से हुई है, लेकिन उसका भावनात्मक जुड़ाव कहीं और है। वह साहेबा से प्रेम करती है, जो एक आकर्षक गोंधली कलाकार है और जिसकी मौजूदगी कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कहानी तब और उलझ जाती है जब आनंद का चचेरा भाई सरजेराव सुमन के प्रति आकर्षित हो जाता है, कह सकते हैं उसके प्यार के जुनून में आ जाता है। सुमन सरजेराव के इस जुनून को समझती है और उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने का फैसला करती है। वह उसे अपने छल और चालाकी के एक खतरनाक खेल में खींच लेती है और अंततः एक हत्या की साजिश में शामिल कर देती है।
इसी बीच गोंधल की प्रस्तुति में साहेबा की मौजूदगी कहानी को एक और रहस्यमय आयाम देती है। जैसे-जैसे अनुष्ठान आगे बढ़ता है, प्रदर्शन और वास्तविकता, भक्ति और धोखे तथा नैतिकता और इच्छा के बीच की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं। यह कोई पारंपरिक प्रेम कहानी नहीं है। यह सत्ता, शारीरिक आकर्षण, सामाजिक नियंत्रण, जुनून और उन हदों की कहानी है, जिन्हें इंसान अपनी निजी इच्छाओं और सामाजिक नैतिकता के बीच टकराव में पार कर सकता है।
सुमन का किरदार इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वह केवल एक असहाय महिला नहीं है, जो किसी के आकर उसे बचाने का इंतजार कर रही है। वह सोच-समझकर फैसले लेती है, रिश्तों का इस्तेमाल करती है और अपनी जिंदगी पर दोबारा नियंत्रण पाने के लिए बड़े जोखिम उठाती है। उसके फैसले हमेशा नैतिक रूप से सही हों, यह जरूरी नहीं। लेकिन यही बात उसके चरित्र को जटिल और दिलचस्प बनाती है। भारतीय सिनेमा में महिलाओं को अक्सर या तो परिस्थितियों की शिकार के रूप में दिखाया जाता है या फिर आदर्श और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में। सुमन इन दोनों खांचों में फिट नहीं बैठती। वह न पूरी तरह निर्दोष है और न ही पूरी तरह खलनायिका। वह ऐसी दुनिया में अपनी जगह तलाश रही है, जहां उसके सामने विकल्प बेहद सीमित हैं।

दावखर की कहानी कहने की शैली का सबसे दिलचस्प पहलू शायद गोंधल की परंपरा और फिल्म की कथा के बीच का रिश्ता है। यह अनुष्ठान केवल फिल्म की रंगीन पृष्ठभूमि नहीं है। इसका संगीत, गीत, कलाकार और नाटकीय प्रस्तुतियां कहानी के अभिन्न हिस्से बन जाते हैं। परंपरागत रूप से गोंधल विवाह जैसे शुभ अवसरों पर देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। लेकिन फिल्म में नए जीवन की शुरुआत से जुड़े इस अनुष्ठान को छल, हेरफेर, जुनून और हिंसा की घटनाओं का मंच बना दिया गया है।
इसमें एक असाधारण विरोधाभास है। जिस अनुष्ठान का उद्देश्य विवाह को आशीर्वाद देना है, वही विवाह और मानवीय संबंधों की अंधेरी सच्चाइयों को उजागर करने का माध्यम बन जाता है। फिल्म के भीतर गोंधल की प्रस्तुति अपने आप में कहानी कहने का एक माध्यम बनती है। गांव के लोग केवल धार्मिक आयोजन के दर्शक नहीं हैं, बल्कि अपने ही समुदाय में चल रहे सत्ता संघर्षों के गवाह भी हैं। जैसे-जैसे फिल्म का कथानक आगे बढ़ता है, अनुष्ठान का संगीत और नाटकीयता भी तीव्र होती जाती है। प्रदर्शन और वास्तविक घटनाएं एक-दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं।
इससे एक दिलचस्प सिनेमाई स्थिति पैदा होती है। एक ही स्थान पर पवित्र और अपवित्र, आस्था और अपराध साथ-साथ मौजूद हैं। दर्शक यह सोचने पर मजबूर होता है कि समाज जिस नैतिकता का सार्वजनिक रूप से उत्सव मनाता है, उसके पीछे निजी जीवन में कितने विरोधाभास छिपे हो सकते हैं।
क्या कोई धार्मिक अनुष्ठान इंसान को उसके अपने कर्मों के परिणामों से बचा सकता है? क्या आस्था मुक्ति का रास्ता देती है या वह भी इंसानी महत्वाकांक्षाओं का एक और मंच बन जाती है? यही सवाल गोंधल को केवल एक क्षेत्रीय थ्रिलर से कहीं आगे ले जाते हैं।
फिल्म का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है ग्रामीण समाज की सत्ता संरचना का चित्रण। पाटिल परिवार उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है, जहां धन, प्रभाव और पुरुष सत्ता यह तय करते हैं कि नियंत्रण किसके हाथ में होगा। आबासाहेब पाटिल सामंती मानसिकता और सत्ता की उस सोच का प्रतीक हैं, जिसमें जमीन, लोग और यहां तक कि महिलाएं भी अपनी संपत्ति समझी जाती हैं। उनके बेटे सरजेराव ने भी काफी हद तक यही मानसिकता विरासत में पाई है।
इसलिए फिल्म का संघर्ष कई स्तरों पर चलता है। एक ओर सुमन का अपने विवाह के भीतर संघर्ष है, दूसरी ओर साहेबा के साथ उसका रिश्ता है। इसके साथ सरजेराव का जुनून और पाटिल परिवार द्वारा प्रतिनिधित्व की जाने वाली पुरुष वर्चस्व की संस्कृति भी है। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक टिप्पणी है, क्योंकि पितृसत्ता केवल कुछ व्यक्तियों के व्यवहार से कायम नहीं रहती। इसे सामाजिक पदानुक्रम, आर्थिक निर्भरता, पारिवारिक ढांचे और प्रभावशाली परिवारों की निर्विवाद सत्ता लगातार मजबूत करती है। फिल्म इस बात की पड़ताल करती दिखाई देती है कि ऐसी व्यवस्था में महिलाएं अपने अस्तित्व और स्वतंत्रता के लिए किस तरह रास्ते तलाशती हैं।
सुमन की अपनी जिंदगी पर अधिकार पाने की कोशिश जटिल है और नैतिक रूप से भी कई सवाल खड़े करती है। लेकिन शायद यही बात उसके किरदार को समझने लायक बनाती है। आजादी की राह हमेशा सीधी और सरल नहीं होती, खासकर तब जब किसी व्यक्ति के चारों ओर मौजूद सामाजिक ढांचा गहरी असमानताओं पर आधारित हो।
फिल्म धार्मिक आस्था और सामाजिक व्यवहार के बीच के विरोधाभास पर भी सवाल उठाती है। एक समाज भक्ति का उत्सव मना सकता है, बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान कर सकता है और देवी-देवताओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर सकता है, लेकिन इसके बावजूद शोषण और अन्याय को सहन कर सकता है।
यह विरोधाभास केवल ग्रामीण महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक वास्तविकता है।
गोंधल का चयन मराठी सिनेमा के लिए भी एक महत्वपूर्ण क्षण है। मराठी फिल्मों ने लगातार यह साबित किया है कि प्रभावशाली सिनेमा बनाने के लिए बहुत बड़े बजट या मुख्यधारा के व्यावसायिक मनोरंजन की पूरी मशीनरी की जरूरत नहीं होती। मराठी फिल्म उद्योग में सामाजिक सरोकारों वाली कहानियों, साहित्यिक रूपांतरणों, प्रयोगधर्मी कथाओं और क्षेत्रीय जीवन पर आधारित फिल्मों की समृद्ध परंपरा रही है।
श्वास, हरिश्चंद्राची फैक्टरी और कोर्ट जैसी फिल्मों ने मराठी सिनेमा की रचनात्मक क्षमता और भाषाई सीमाओं से बाहर दर्शकों तक पहुंचने की ताकत को साबित किया है। इन तीन फिल्मों के बाद गोंधल भारत की आधिकारिक ऑस्कर प्रविष्टि के रूप में चुनी जाने वाली चौथी मराठी फिल्म है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। राष्ट्रीय पहचान, वितरण, प्रचार और मुख्यधारा के मीडिया में जगह के मामले में मराठी सिनेमा अक्सर हिंदी सिनेमा की छाया में रहा है। इसके बावजूद भारतीय सिनेमा में उसका रचनात्मक योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
गोंधल का चयन इस धारणा को चुनौती देता है कि भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी फिल्म का हिंदी में बनना, उसमें राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले सितारों का होना या उसका देश के सबसे बड़े दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर बनाया जाना जरूरी है।
यह अन्य भारतीय भाषाओं में काम कर रहे फिल्मकारों को भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है: आपकी भाषा आपकी सीमा नहीं है। आपका भूगोल आपकी सीमा नहीं है। आपकी सांस्कृतिक पहचान ऐसी चीज नहीं है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक बनने के लिए कमजोर या बदलने की जरूरत हो।
बल्कि यही आपकी सबसे बड़ी ताकत हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय सिनेमा को लेकर एक आम गलतफहमी यह है कि फिल्मों को विदेशी दर्शकों के लिए जान-बूझकर आसान और समझने योग्य बनाना जरूरी है।
अक्सर फिल्मकार हर चीज समझाने की कोशिश करते हैं- रीति-रिवाज, धार्मिक संदर्भ, सामाजिक संरचनाएं, भाषा और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि। ऐसा करते हुए कई बार फिल्में सिनेमा की रचना होने के बजाय किसी संस्कृति का परिचय बनकर रह जाती हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर याद रखी जाने वाली कई बेहतरीन फिल्में बेहद स्थानीय कहानियों से निकलती हैं।
जापान का कोई फिल्मकार परिवार पर एक प्रभावशाली कहानी सुनाने के लिए जापानी समाज की हर बात समझाने के लिए बाध्य नहीं है। इसी तरह ईरान का कोई फिल्मकार नैतिकता पर बात करने के लिए ईरानी जीवन की जटिलताओं को सरल बनाने की जरूरत नहीं समझता। भारतीय फिल्मकारों को भी यह महसूस नहीं करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए अपनी संस्कृति की हर बारीकी को किसी परिचित भाषा में अनुवाद करना जरूरी है।
आखिरकार, भावनाएं ही सीमाओं के पार जाती हैं।
एक दुखी विवाह में फंसी महिला, अपने जीवन पर अधिकार पाने की इच्छा, जुनून के खतरे, सामाजिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संघर्ष- ये ऐसे अनुभव हैं जिन्हें अलग-अलग संस्कृतियों के दर्शक भी समझ सकते हैं। लॉस एंजिलिस, लंदन या बर्लिन में फिल्म देखने वाले किसी दर्शक के लिए गोंधल की परंपरा अपरिचित हो सकती है। लेकिन उस अनुष्ठान के भीतर घटने वाली मानवीय भावनाएं अपरिचित नहीं हैं।
यहीं फिल्म की अंतरराष्ट्रीय अपील की संभावना छिपी है। उसकी सांस्कृतिक विशिष्टता ही उसका पासपोर्ट बन सकती है, बशर्ते उसकी कहानी इतनी प्रभावशाली हो कि दर्शक केवल रीति-रिवाजों के प्रति उत्सुक न रहें, बल्कि पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ें।
हालांकि, भारत की ऑस्कर प्रविष्टियों के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा रहता है। जब भी किसी भारतीय फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना जाता है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह किसी तरह पूरे भारत को समेटकर प्रस्तुत करे। यह एक असंभव जिम्मेदारी है।
भारत न तो एक संस्कृति है, न एक भाषा, न एक धर्म और न ही एक सिनेमाई परंपरा। यह असंख्य पहचानों, इतिहासों और जीवन के अनुभवों का अद्भुत संगम है। कोई एक फिल्म इस पूरी विविधता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। इसके साथ सांस्कृतिक आकर्षण को ही फिल्म की सबसे बड़ी खूबी मान लेने का खतरा भी है। जब लोक परंपराओं पर आधारित फिल्में अंतरराष्ट्रीय समारोहों में पहुंचती हैं, तो कई बार उनकी सराहना मुख्य रूप से इस बात के लिए होती है कि उनकी संस्कृति विदेशी दर्शकों के लिए कितनी अनोखी है। उनके पहनावे, संगीत, अनुष्ठान और दृश्य चर्चा का विषय बन जाते हैं, जबकि फिल्म निर्माण की वास्तविक गुणवत्ता पीछे छूट जाती है।
हमें गोंधल को केवल ऐसी फिल्म के रूप में नहीं देखना चाहिए, जो दुनिया को महाराष्ट्र की एक दिलचस्प लोक परंपरा से परिचित करा रही है।
इसका मूल्यांकन सबसे पहले एक सिनेमा के रूप में होना चाहिए। इसकी पटकथा, अभिनय, संपादन, छायांकन, ध्वनि संयोजन और भावनात्मक प्रभाव अपने दम पर प्रभावशाली होने चाहिए। इसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि फिल्म के अनुभव को समृद्ध करे, न कि कहानी कहने की कमी को ढकने का माध्यम बने। प्रसिद्ध संगीतकार इलैयाराजा की भागीदारी फिल्म को एक और दिलचस्प आयाम देती है। उनकी संगीत संवेदना का मेल एक ऐसी फिल्म से हुआ है, जिसकी जड़ें पारंपरिक लोक प्रदर्शन में हैं। संगीत की इन अलग-अलग परंपराओं और सिनेमाई अभिव्यक्ति का मेल फिल्म की विशिष्ट खूबियों में से एक हो सकता है। लेकिन अंततः सवाल यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को गोंधल का अनुष्ठान कितना आकर्षक लगता है। सवाल यह है कि फिल्म समाप्त होने के बाद क्या वे उसके पात्रों और उनकी कहानी को याद रखेंगे?
यह समझना जरूरी है कि भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना जाना और वास्तव में ऑस्कर के लिए नामांकन मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।
गोंधल को अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। लेकिन उसे अभी अकादमी की चयन प्रक्रिया से गुजरना है।
इस श्रेणी में भारत का इतिहास जटिल रहा है। मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे! और लगान जैसी फिल्मों को ऑस्कर नामांकन मिला था, लेकिन भारत अभी तक सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म का अकादमी पुरस्कार नहीं जीत पाया है। इसलिए गोंधल के चयन का जश्न मनाना चाहिए, लेकिन इसे समय से पहले राष्ट्रीय जीत घोषित करना उचित नहीं होगा। असली जीत शायद इस घोषणा के बाद होने वाली गतिविधियों में छिपी है।
क्या फिल्म को पर्याप्त वितरण मिलेगा? क्या देशभर के दर्शकों को इसे देखने का अवसर मिलेगा? क्या अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में इसे आगे बढ़ाने के लिए जरूरी प्रचार और समर्थन मिलेगा? क्या फिल्म उद्योग क्षेत्रीय सिनेमा को उसके पारंपरिक बाजारों से बाहर पहुंचाने में निवेश करेगा?
ऑस्कर अभियान एक महंगी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है। इसके लिए लगातार प्रचार, विशेष स्क्रीनिंग, नेटवर्किंग, मीडिया में उपस्थिति और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समुदाय के साथ रणनीतिक संपर्क की जरूरत होती है।
अगर भारत वास्तव में अपने सिनेमा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना चाहता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल किसी फिल्म का चयन करने तक सीमित नहीं रह सकती। उसे उस फिल्म का साथ भी देना होगा। इस चयन का शायद सबसे उत्साहजनक पहलू यह है कि यह भारतीय सिनेमाई पहचान को देखने का एक वैकल्पिक नजरिया प्रस्तुत करता है। दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा की पहचान पर बॉलीवुड का असमान रूप से बड़ा प्रभाव रहा है। हिंदी फिल्मों ने निश्चित रूप से भारतीय जीवन के अलग-अलग पहलुओं से दुनिया को परिचित कराया है, लेकिन वे एक बहुत बड़े सिनेमाई संसार का केवल एक हिस्सा हैं।
महाराष्ट्र, केरल, असम, मणिपुर, तमिलनाडु, बंगाल, गुजरात, कर्नाटक और देश के अनगिनत दूसरे क्षेत्रों की कहानियां भी उतनी ही अंतरराष्ट्रीय जिज्ञासा और पहचान की हकदार हैं। इतने सांस्कृतिक रूप से विविध देश को बार-बार केवल एक भाषा या एक फिल्म उद्योग के माध्यम से अपनी पहचान समझाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
गोंधल का चयन इस बढ़ती हुई समझ का हिस्सा है कि क्षेत्रीय सिनेमा ऐसी कहानियां कह सकता है जिनमें वास्तविक अंतरराष्ट्रीय आकर्षण हो। यह उस बड़े बदलाव का भी संकेत है, जिसमें फिल्मकार अपनी भाषाओं में कहानियां कहने, अपने इतिहास और संस्कृति से प्रेरणा लेने तथा यह भरोसा रखने लगे हैं कि दर्शक अपने से अलग परिवेश की कहानियों से भी जुड़ सकते हैं।
इस ऑस्कर चयन का सबसे बड़ा योगदान शायद नामांकन या ट्रॉफी नहीं होगा। असली योगदान यह हो सकता है कि किसी छोटे शहर में अपनी भाषा में काम कर रहे युवा फिल्मकार को यह विश्वास मिले कि उसकी कहानी भी दुनिया तक पहुंच सकती है। यह संभावना अपने आप में उत्सव मनाने लायक है।

मेरे विचार से गोंधल का चयन केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि यह एक मराठी फिल्म है या इसमें एक पारंपरिक लोक अनुष्ठान को दिखाया गया है। इसका महत्व इस बात में है कि यह हमें भारतीय सिनेमा की परिभाषा पर नए सिरे से सोचने का अवसर देती है। हम अक्सर भारतीय सिनेमा को दुनिया तक पहुंचाने की बात करते हैं। शायद अब इस सोच को उलटने का समय आ गया है। हमें लगातार यह पूछने के बजाय कि भारतीय फिल्में दुनिया को कैसे आकर्षित कर सकती हैं, यह पूछना चाहिए कि क्या हम अपने समाज से निकलने वाली वास्तविक कहानियों को पर्याप्त ईमानदारी और साहस के साथ कह रहे हैं? अगर वे कहानियां ईमानदारी, रचनात्मक प्रतिबद्धता और सिनेमाई उत्कृष्टता के साथ कही जाएंगी, तो दुनिया खुद उन्हें देखने का रास्ता खोज लेगी। यह बात अपने आप में बेहद अर्थपूर्ण है कि एक पारंपरिक अनुष्ठान पर आधारित फिल्म अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रही है। गोंधळ स्वयं एक ऐसी प्रस्तुति है, जो संगीत, कहानी और सामूहिक स्मृतियों के माध्यम से समुदाय को जोड़ती है। सिनेमा भी अपने तरीके से यही काम करता है। वह अनजान लोगों को एक कहानी के इर्द-गिर्द एक साथ लाता है।
और शायद यही वह चीज है जिसे भारत को ऑस्कर तक लेकर जाना चाहिए, अपनी संस्कृति की कोई बनावटी और सलीके से पैक की गई छवि नहीं, न ही विदेशी दर्शकों को आकर्षित करने के लिए खुद को अनोखा या सर्वमान्य दिखाने की कोशिश, बल्कि अपनी अनेक आवाजों और पहचानों को बिना किसी संकोच के दुनिया के सामने रखने का आत्मविश्वास।
यह देखना अभी बाकी है कि गोंधल ऑस्कर के अंतिम नामांकनों तक पहुंचती है या नहीं। लेकिन इसके चयन ने पहले ही मराठी सिनेमा का उत्सव मनाने, क्षेत्रीय कहानी कहने की समृद्ध परंपरा को पहचानने और भारतीय सिनेमा को देखने के सीमित नजरिये पर सवाल उठाने का अवसर पैदा कर दिया है।
गोंधळ का वास्तविक महत्व यही है कि यह हमें याद दिलाती है कि दुनिया द्वारा समझे जाने के लिए भारत को बॉलीवुड जैसा दिखने की जरूरत नहीं है। कई बार सबसे सार्वभौमिक कहानियां वही होती हैं, जो सबसे स्थानीय आवाजों में कही

जाती हैं। और शायद यही वह सबसे महत्वपूर्ण संदेश है, जिसे गोंधल ऑस्कर की इस पूरी चर्चा के बीच हमारे सामने रखती है।

वाणी त्रिपाठी टिक्कू भारतीय सिनेमा और रंगमंच की एक बहुआयामी हस्ती हैं। वह एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री, फिल्म निर्माता, रंगकर्मी, लेखिका और सांस्कृतिक विचारक हैं। उन्होंने भारतीय रंगमंच और सिनेमा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

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