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  • वुदरिंग हाइट्स: उपन्यास और सिनेमा

    एमिली ब्रोंटे द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास ‘वुदरिंग हाइट्स’ पर फ़िल्म बन रही और हाल में ही उसका ट्रेलर रिलीज़ हुआ है। उसी के बहाने यह लेख लिखा है युवा लेखिका प्रज्ञा विश्नोई ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    बीते दिनों एमराल्ड फेनेल निर्देशित वुदरिंग हाइट्स का ट्रेलर रिलीज़ हुआ।  खैर उस ट्रेलर से जुड़े वाद विवाद पर न आते हुए, जिस बात ने मुझे विस्मित किया, वह थी पश्चिमी साहित्य में गोथिक शैली को मिली स्वीकृति, जिसे भारतीय साहित्य एवं विचार में बहुधा ‘लुगदी साहित्य’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यही कारण है कि लिखे जाने के १७८ वर्षों पश्चात भी एमिली ब्रोंटे द्वारा रचित वुदरिंग हाइट्स पर न केवल फिल्में बन रही हैं, वरन उस पर उत्साह सहित बहस और चर्चा भी हो रही है।  यही कारण है आज जो भारतीय युवा गर्व से ब्रेम स्टोकर की ड्रैकुला, मैरी शेली की फ्रैंकेंस्टीन, ऑस्कर वाइल्ड की द पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे को अपना पसंदीदा उपन्यास कह सकते हैं, पर वही युवा जयशंकर प्रसाद की कहानी खंडहर की लिपि, देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता संतति का ज़िक्र करने पर आपकी खिल्ली उड़ाने से नहीं चूकेंगे।

    चूंकि हम सभी का परिचय पश्चिमी गोथिक साहित्य से अधिक है, इसलिए मैं अपनी बात वहीं से शुरू करती हूँ।  हालांकि गोथिक शब्द का उद्भव यूरोप के पुनरुत्थान युग में वास्तुकला के परिप्रेक्ष्य में हुआ था, परन्तु पश्चिमी साहित्य में इसका चरम काल मध्य अठारहवीं शताब्दी था।  हालांकि यह औद्योगीकरण, मशीनीकरण एवं रेशनलाइजेशन का युग था, पर धर्म के घटते प्रभाव एवं प्रकृति से दूरी के कारण यूरोप में आध्यात्मिक रिक्तता बढ़ती जा रही थी। ऑक्सफ़ोर्ड आदि विश्वविद्यालयों के अध्येताओं के मध्य भी विज्ञान की लीनियर सीढ़ियों को अल्केमी, occult द्वारा लांघने (transcend) करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होने लगी थी।  (हालांकि 100 AD के पश्चात असंगठित pagan धर्मों को त्याग मध्य पूर्व के रेगिस्तान से निकले संगठित धर्मों की ओर निष्ठावान झुकाव जिसकी परिणति क्रूसेड युद्धों में हुई, उन युद्धों से हुए विध्वंस से ट्रस्ट होकर विज्ञान की शरण में जाना और वापिस फिर उन्हीं अलौकिक चीज़ों में अस्तित्व के उत्तर खोजना, यूरोप की जनता के लिए यह एक चक्र ही था। )

    परन्तु ऐसा भी नहीं था कि इन आठ शताब्दियों ने यूरोपीय जनमानस पर कोई छाप न छोड़ी है।  अठारहवीं शताब्दी के यूरोपीय पाठक और लेखक दोनों के मनोजगत में अब नस्लीय श्रेष्ठता, पुरुषवादी दम्भ, विज्ञान और मशीनीकरण के प्रति संदेह, पूर्व के प्रति मनोवैज्ञानिक उन्माद जिसमें पूर्वी देशों को लेकर घृणा, तुच्छता, भय के साथ ही एक अजीब उलझा हुआ खिंचाव भी शामिल था।  ड्रैकुला और वुदरिंग हाइट्स दोनों के खलनायक पूर्व से आये रहस्यमयी, अमीर, भयानक रूप से आकर्षक पुरुष थे।  (ड्रैकुला में हंगरी के पार के क्षेत्र को पूर्व कहा गया है, वहीं वुदरिंग हाइट्स में नेली हीथक्लिफ को भारत का राजकुमार तक कहती है। ) दोनों ही उपन्यासों में तथाकथित पूर्वी भयानक पुरुष द्वारा प्रांजल श्वेत नारी को यौनिक रूप से भ्रष्ट करना एक कथानक का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है (जहां ड्रैकुला लूसी को ‘भ्रष्ट’ कर उसे भी स्वयं कि भांति एक पिशाच बनाता है, वहीं हीथक्लिफ कैथरीन अर्नशॉ को मानसिक रूप से एवं इसाबेला लिंटन पर शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक एवं यौनिक हिंसा करता है। ) यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ऐसी कथाओं में श्वेत, अंग्रेज़ स्त्री के लिए एक चेतावनी छिपी होती थी।  हालांकि एमिली ब्रोंटे ने हीथक्लिफ को एक पूरी तरह से काला खलनायक न बनाकर, उसे एक अत्यंत सशक्त बैकस्टोरी भी दी थी और उसकी घृणा और प्रतिशोध के अत्यंत वाजिब कारण थे।  (इसका एक कारण यह भी हो सकता है एमिली ने स्वयं एक आउटकास्ट का जीवन जिया था, सो हीथक्लिफ के प्रति क्षीण ही सही थोड़ी सहानुभूति तो उन्हें कदाचित रही होगी। ) पर ड्रैकुला की भांति हीथक्लिफ को भी उसके खलनायक बनने से पूर्व ही उपन्यास में पशु जैसी उपमाएं दी गयी थीं और हीथक्लिफ और उसके पुत्र की मौत के साथ उसका वंश भी समाप्त हो गया जबकि श्वेत कैथरीन, लिंटन और हिन्डली की संतानों को आखिरकार सुखान्त मिल ही गया।  दिलचस्प बात है की हॉलीवुड की हॉरर फिल्मों में ब्लैक एंड गे dies फर्स्ट phenomenon पर तो विस्तृत चर्चा की गयी है, पर अंग्रेज़ी गोथिक उपन्यासों के इस नस्लीय विद्वेष की चर्चा भारत में भी काम ही होती है।

    यूरोप का इतिहास भी इस विषय में काम दिलचस्प नहीं है। ब्रिटेन में जहां सेल्टिक देवी ब्रिगिड, मॉरीगन आदि को पूजा जाता था, उसी देश में फोक हॉरर फिल्मों जैसे द विकर मैन आदि में उसी pagan संस्कृति को भयावह और पैशाचिक दर्शाया गया। यूरोप के संभ्रांत वर्ग को केवल पूर्व से भय नहीं था, वरन अपनी ही जन्मभूमि के इतिहास से भी भय एवं जुगुप्सा थी। अपनी मूल प्रवृत्ति और इतिहास से इसी जुगुप्सा से जो तनाव पैदा हुआ, उसी ने गोथिक शैली के उन्मादी किरदारों का रूप लिया।

    गोथिक शैली सदैव पॉलिटिकल ही रही है। पर इस बात को श्वेत लेखकों के सबसे प्रथम अफ़्रीकी अमेरिकनों ने समझा। नोबेल विजेता टोनी मॉरिसन द्वारा रचित दक्षिणी गोथिक उपन्यास बिलवेड से लेकर रयान कूगलर की फिल्म सिनर्स तक गोथिक शैली को अश्वेतों के प्रति सदियों से। किये जा रहे नस्लीय भेदभाव के प्रतिकार का माध्यम बनाया है।  इसके उलट पूर्वी देशों में जहां ऐतिहासिक काल से गोथिक साहित्य लेखन का प्रमुख अंग रहा है (लेडी शिकिबु द्वारा रचित टेल ऑफ़ गेंजी जिसे विश्व के सर्वप्रथम उपन्यास होने का दर्ज़ा प्राप्त है, उसमे तो प्रेतात्माओं आदि गोथिक तत्वों की भरमार है), वहां यह शैली बीसवीं शताब्दी से सदैव उपेक्षा की ही पात्र बनी रही।

    भारतीय सिनेमा में गोथिक शैली का एक अत्यंत श्रेष्ठ उदाहरण मुझे श्याम बेनेगल की फिल्म त्रिकाल में दिखाई देता है जहां लीला नायडू द्वारा अभिनीत डोना मारिया का किरदार मिलग्रीनिया के माध्यम से seance के द्वारा अपने दिवंगत पति से बात करना चाहता है पर पति की आत्मा के  स्थान पर उसे वे सभी आत्माएं दिखने लगती हैं जिनकी उनके पूर्वज ने पुर्तगालियों द्वारा ईनाम के लालच में हत्याएं करवायीं थीं।  अतीत के कुकर्मों का हिसाब किताब करने के लिए गोथिक शैली के इस्तेमाल का यह भारतीय सिनेमा में अत्यंत बेहतरीन उदाहरण था।  गुरुदेव रवींद्र बाबू की अनेक कहानियों जैसे मोनीहारा, एक कंकाल की कथा; जयशंकर प्रसाद जी की खँडहर की लिपि, फिल्म महल, मधुमती, वो कौन थी आदि भी इस शैली के बेहतरीन उदाहरण हैं।

    भारत जैसा देश जहां सामजिक एवं राजनैतिक उथल पुथल सदैव ही अतीत एवं वर्तमान का एक प्रमुख अंग रही है, जहां इतने विविध गोथिक तत्त्वों की भरमार है। कुमाऊँ की आछरी परियों द्वारा प्रकृति के दोहन की गोथिक कथा रची जा सकती है, अलेया और निशिडाक के रूपकों द्वारा बंगाल के भद्रलोक एवं आम लोक के मध्य संघर्ष, वहां होने वाले राजनैतिक कोलाहल और हिंसा को समझा जा सकता है, सतपुड़ा की पहाड़ियों पर बने डाक बंगलों में जहां उपनिवेशवाद के प्रेत दिखाई दे सकते हैं, यक्षी द्वारा केरल में उपनिवेशवाद, जातीय संघर्ष, आर्थिक विषमता को दर्शाया जा सकता है। भारत एक ऐसा देश है जहां बहुत कुछ नया जन्म रहा है, परन्तु भारत एक ऐसा देश भी है जहां बहुत कुछ सड़ रहा है और इस जन्म और सड़न के बीच अनेक नए पुराने प्रेत भी बन और मिट रहे है। । जहां एक पीढ़ी दुनिया मेरी मुट्ठी में की तर्ज़ पर फर्स्ट वर्ल्ड की ओर उड़ान भर रही है, वहीं एक पीढ़ी वृद्धाश्रम में अशक्त चींटियों को अपने पैर का अंगूठा काटते हुए महसूसकर जेठ की पूरी भरी दोपहर बिना पंखे कूलर के बिता रही है।  जहां एक वर्ग ब्लैक में कोल्डप्ले बैंड की टिकट खरीद रहा है, वहीं दिल्ली की सर्दियों में फुटपाथ पर कुत्तों की विष्ठा और आदमी की पेशाब की दुर्गन्ध के बीच नंगे उघारे बच्चे पत्थर को गेंद बनाकर खेल रहे है।   जिस देश में परित्यक्त हवेलियों, रक्तरंजित बीहड़ों, हिंसक सामजिक एवं वैयक्तिक इतिहास की प्रचुरता हो,।  वहां गोथिक शैली को यथोचित स्थान न मिलना एक भूल ही होगी।

    One thought on “वुदरिंग हाइट्स: उपन्यास और सिनेमा

    1. प्रज्ञा का लेख अच्छा है, लेकिन ऐसा लगता है लिखते लिखते अधूरा छोड़ दिया गया हो।
      भारत जहां बहुत कुछ अच्छा राजा रहा है, वहीं बहुत कुछ सड़ रहा है। इस लेख की बहुत महत्वपूर्ण पंक्ति है।
      लेकिन अच्छे रचे जाने और बहुत कुछ सड़ने की बात उचित विस्तार चाहती थी।
      वुदरिंग हाइट्स पर फिल्म बन रही है, लेकिन मेरी धुंधली याद में पहले भी बन चुकी हैं। अतः इस पुच्छले को लेकर बात शुरू करना समझ में नहीं आया। फिर भी पढ़ने लायक है, वास्तु का पहला संकेत देने वाला गोथिक रहस्य रोमांच भूत-प्रेत से जोड़ कर देखना एक दिलचस्प मोड़ भी देता है।
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