समकालीन कथाकारों में अनघ शर्मा का स्वर सबसे जुदा है। भाषा, कहन, कथ्य सबमें अलग। उनकी यह कहानी पढ़ते हैं जो काफ़ी समय पहले वनमाली में छपी थी। यह कहानी एक युवा कथाकार की तरफ़ से लेखक स्वदेश दीपक को श्रद्धांजलि स्वरूप भी है- मॉडरेटर
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“प्रिय लेखक ‘स्वदेश दीपक’ को अकीदत के साथ याद करते हुए उनकी कहानी ‘अश्वारोही’ के पात्रों के बाद के जीवन और कथा को अपनी तरह से दिखाने की कोशिश भर है ये कहानी|”
१:
“क्या तुम अब तक उससे प्यार करती हो?”
उनका ये सवाल अचानक से आया और मुझे चौंका गया| मुझे अंदेशा तो था कि संयोग से इतने सालों बाद मुलाक़ात हुई है तो वह कुछ पूछ सकते हैं, पर वह सीधे यह पूछ बैठेंगे इसका मुझे रत्ती भर भी अनुमान नहीं था| मैंने बात बदलने की गरज़ से कहा|
“देखिये आज यहाँ इस छोटे से रेस्टोरेंट में बैठ के खाना खाते हुए मुझे आपका होटल बरबस ही याद आ गया|”
वह समझ गए थे कि मैंने उनके प्रश्न को सुन कर अनसुना कर दिया, बदले में वह भी मेरी ही तरह का एक कामचलाऊ जवाब दे बैठे|
वो तो अब रिनोवेशन के बाद काफ़ी बेहतर हो गया है| कुछ हिस्सा तो डैडी की डेथ के बाद बेच दिया था फिर भी आधे से ज़्यादा हम लोगों के पास ही है|”
“हम लोगों” ये शब्द सुन कर मेरे मन में हूक उठी, एक नाम बाहर आने को मचला पर मैं बस यही पूछ सकी|
“क्या हुआ था?”
“जिस बरस राधा के बेटी हुई ये उसी साल की बात थी, एक रात सोये तो उठे ही नहीं, डॉक्टर का कहना था कि बहुत पीने की वजह से नींद और नशे में जो उलटी हुई उसके बाहर न आ पाने की वजह से दम घुट गया था|” वह बोले|
“राधा के बेटी है ये कितनी प्यारी बात है| कितनी बड़ी है?”
“चौदह साल की| तुम्हें नहीं पता था उसकी बेटी के बारे में, मैं सोचता रहा कि तुम दोनों में राब्ता बना रहा होगा, कितना कुछ तो होता है जानने के लिए|”
एक पल को मुझे लगा कि ये बात उन्होंने कोई टोह लेने के लिए कही है, फिर सोचा शायद ऐसा नहीं है| मैंने चतुराई से बात घुमा दी|
“समय बताइए तो, अब निकलना चाहिए, मेरी कल दोपहर की गाड़ी से वापसी है | फिर पहुँच कर अभी तो पैकिंग भी करनी है|” मैंने उठने की गरज से कहा|
“तुम्हें तो डिनर के बाद चाय पीने की आदत है| एक-एक चाय और हो जाए फिर निकलते हैं| अच्छा, कलकत्ते कैसे आना हुआ? आज काली मंदिर पर तुम्हारी झलक नहीं दिखती और आगे बढ़ कर तुम्हें ठीक से देखने-पहचानने की लालसा न होती तो कहाँ मिल पाते|” उन्होंने अपने स्वभाव के उलट ज़रा तेज़ी से यह बात कही|
“मेरी एक रिश्ते की भांजी है उसका विवाह था उसी में आना हुआ, विवाह बाद का कुछ कार्यक्रम था मंदिर में तो इसी कारण वहां थी|” मैंने एक संछिप्त सा उत्तर उनकी तरफ़ उछाल दिया| क्या बतलाती कि एक बार आपके ही शहर में आपकी माँ और मैं एक साथ खड़े होकर उनकी देवी से अपनी-अपनी मन्नत मांग रहे थे और अपनी उसी न पूरी हुई मन्नत बारे में आज आपकी माँ की देवी से दरयाफ़्त करने आई थी|
चाय खत्म हुई तो उन्होंने चलने से पहले मेरे घर का पता लिया फिर लम्बे-लम्बे डग भरते हुए बाहर निकल गए| मैंने अनुभव किया कि उनकी चाल में एक लहक तो है पर पहले जैसी नकली टांग वाली लंगडाहट नहीं है, यूँ भी पिछले कुछ सालों में चिकित्सा के क्षेत्र में कितने नए-नए बदलाव हो गए हैं| उनके जाने के बाद लगा कि कम से कम मुझे औपचारिकतावश उनका टेलीफोन नम्बर तो ले ही लेना चाहिए था| मुझे इस बात की शर्म भी थी कि उनके बताने के बाद भी मैं न तो राधा के बारे में कुछ पूछ पाई और न ही माँ के बारे में कुछ ज़िक्र किया, खैर मुझे भी हड़बड़ी थी वहां से चले आने की|
हम किसी से मिलते हैं तो वापसी में उसे कुछ अपने मन में लिए आते हैं, फिर सालों के अंतराल बाद उसी से दुबारा मिलने पर उसकी नयी छवि से पुरानी वाली को टूटते देख बड़ी थकान लगती है| उस दिन रेस्टोरेंट में मैंने महसूस किया कि मुझ से बात करते हुए उनमें वह पहली बार जैसी तल्खी नहीं थी, बिना कारण ही मुझे इस बदलाव का दुःख लगा| उनसे यूँ तो कोई लगाव नहीं था पर उनकी सहृदयता से मुझे उलझन हुई| क्या समय के साथ आदमी इतना बदल जाता है कि उसमें जीवन का कोई पुराना तत्व खोजने पर पाया ही न जा सके| उनसे मिलने के बाद मैं सबके बारे में जानना तो चाह रही थी पर एक सुकांत का ही नाम था जो बार-बार आके फिसला जा रहा था|
मुझे कलकत्ते से लौटे कोई आठ नौ महीने हुए पर उनकी चिठ्ठी अब आई जिसमें इतना ही लिखा था कि ‘वे किसी काम के चलते दिल्ली आ रहे हैं| क्या मिलना हो पायेगा?’ जवाब भेजने के लिए उन्होंने कोई नया पता लिख छोड़ा था जो कि उस घर का नहीं था जहाँ मैं सालों पहले उनसे मिली थी|
ये भी कैसा संयोग है कि इन दिनों दिल्ली सर्द थी, वैसा ही मौसम था जिसकी बिसात पर एक वक़्त मेरे जीवन की घटनाएं दुर्घटनाओं में बदलने को आतुर थीं| उनके नए पते को देखते हुए बार-बार मैंने कल्पना की, कि एक छोटा सुंदर घर होगा जिसमें सादा सी बाहर को खुलने वाली खिड़कियाँ होंगी और जिनकी छाया लॉन की हरी घास पर गिर के एक नया दृश्य बनाती होंगी, इस दृश्य के अंदर एक संभ्रांत महिला होगी कुछ प्यारे बच्चे होंगे| ऐसे ही किसी दूसरे दृश्य में सुकांत भी होगा जहाँ घास पर बच्चे खेल रहे होंगे और एक स्त्री उसके कंधे से लग कविता सुन रही होगी, या उसकी खोई-खोई आँखों में प्यार की ऊष्मा का अनुभव कर रही होगी| मुझे इस दृश्य की कल्पना करने पर खेद हुआ, क्यों हुआ ये भी मालूम था, इस की छाया में मेजर साहब का पूछा हुआ प्रश्न भी शामिल था|
2:
वह जब दिल्ली आये तब तक हवा में हरसिंगार की खुशबू के साथ धुंध भी उतरने लगी थी| प्लेटफॉर्म पर भीड़ के बीच वह एक उलझन से भरे छोटे बच्चे जैसे लग रहे थे जिसके चेहरे पर लम्बी यात्रा की नींद और इसी नींद में कहीं छूट जाने का भय हो| मैंने सोचा क्या यह वही आदमी है जिसने कभी चीन के विरुद्ध युद्ध में अपना एक पाँव गँवाया था| वह मेरे सामने खड़े थे, चारखाने का कोट पहन और गले में मफलर लपेटे| वह मुझे वहां देख चौंके थे|
“अरे! तुम यहाँ, कैसी हो? उन्होंने हाथ में पकड़ी अटैची ज़मीन पर रखते हुए कहा|
“मैं ठीक हूँ, फिर गाड़ी का समय पता ही था मुझे तो सोचा कि आपको रिसीव ही करने आ जाऊं| कहाँ ठहरेंगे?|”
“यहीं पहाड़गंज में एक छोटा होटल है, अच्छा है पहले भी एक दो बार रुका हूँ वहां|”
“क्या कमरा मिलेगा ऐसे अचानक?”
“कुछ कमरे तो होटलों में हमेशा ख़ाली ही रहते हैं वॉक इन गेस्ट्स के लिए पर मैंने चलने से पहले फ़ोन कर के एक कमरा बुक करवा लिया है|” वह बोले|
“फिर भी अगर आपको ठीक लगे तो मेरे डी.डी.ए फ्लैट्स के पास ही एक बड़ा कम्युनिटी सेंटर है उनके पास कोई दस बारह साफ़ सुथरे कमरे हैं कुछ कमरे वहाँ भी हमेशा ख़ाली रहते हैं, चाहें तो वहीं शिफ्ट हो जाइये|”
उन्होंने मुझे मुस्कुरा कर देखा, एक ऐसी मुस्कान जिसमें स्नेह की छाया घुली रहती है| हम अब स्टेशन से बाहर निकल आये थे, कल की अपेक्षाकृत आज धुंध हल्की थी और रात के पौने नौ बजे भी सवारी वाहन और डी.टी.सी. की बसों के कारण सड़क पर अभी चहल पहल बनी हुई थी|
“क्या अकेले जा पाओगी?”
“हाँ इतना सुनसान नहीं है, रिक्शे से देर भी नहीं लगती घर तक|” मैंने रिक्शे में बैठते हुए कहा|
उस रात मुझे सालों बाद कोई सपना आया| सब गड्डमड्ड कहीं कोई सिरा नहीं, कहीं कोई तरतीब नहीं कि सपने में जो भी दिखता रहा है उसे एक सीध में रख के परख सकूं| कभी कोई पहाड़ दिखता, कभी अपने एम.एस.सी. के दिनों में पहने हुए कपडे दिखते, कभी पापा दिखते जैसे वह अपने आख़िरी वक़्त में थे, कभी किसी के मुझे कविता सुनाने पर राधा की आँखों में उतर आई अवहेलना दिखती, कभी एक दीवार पर टंगी पेंटिंग जिसमें बंद एक अश्वारोही फ़्रेम से बाहर भागने की चेष्टा करता हुआ दिखता तो कभी किसी का दाहिनी तरफ़ गले की हड्डी के पास का लम्बा घाव दिखता|और कभी कुछ घंटों पहले किसी की मेरी ओर आती स्नेहिल मुस्कान दीखती|
स्मृति साँप की लपलपाती जीभ की तरह हमारे अचेत होते ही हमारे अवचेतन को दो हिस्सों में चीरती चली जाती है जैसे मानो इसी घात में हो कि हमारे ज़रा चूकने पर डस कर हमारे भीतर अपना ज़हर उतार सके और हमें लकवे के मरीज़ सा अवश कर जाए| हम जीवन भर स्मृति के कितने ही पहाड़ों पर पर्वतारोही से चढ़ते रहते हैं फिर कई-कई बार इन पहाड़ों से फिसल कर इनकी नुकीली चट्टानों से घायल हो अपने रिसते घाव को देखते हैं|
उस सुबह मौसम का पहला घना कोहरा पड़ा था, तेज़ ठंडी हवा के साथ परतदार गहरा सफ़ेद कोहरा यूँ लगता था कि बिना चाक़ू के उसे काटा नहीं जा सकेगा| रोज़ छाई रहने वाली हल्की धुंध ऐसे बिला गई थी मानो उसकी ही केंचुल उतार अचानक उसके अंदर से ये कोहरा निकल आया हो| बंद खिडकियों पर हवा सर पटक कर उन्हें खोलने की कोशिश में थी| सुबह के साढ़े-सात बजने वाले थे जब उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई| बत्ती जला उसने दरवाज़ा खोला, देखा कि सामने मेजर साहब खड़े थे एक ऊँचे गले वाली पीली जर्सी पहने| उसे सुकांत की याद आ गई| मेजर साहब के अन्दर आते ही बत्ती चली गई, उसने दराज़ में से निकाल दो मोमबत्तियां जला कर मेज़ पर रख दीं जिनका हल्का उजाला ऊपर की तरफ़ उठने की कोशिश में था, आज ये दृश्य उसे कितना जाना-पहचाना लग रहा है जैसे कल ही उसकी आँखों के सामने से गुज़रा हो| जीवन कितना निराला है अक्सर ही अतीत की पुनरावृत्ति करता है| किस कारण उसकी मेजर साहब के ज़रिये अतीत से मुठभेड़ हुई है, सोचते हुए उसने चाय चढ़ा दी|
3
वे दोनों चाय की मेज़ पर चुप बैठे रहे| उसने गहरे नीले रंग का शॉल लपेट रखा था, जैसे कन्धों को किसी जाल में कस के बांध रखा हो और चाय के प्याले को हथेलियों में| उसने मेजर को देखा देह एक सीध में थी, सर्दी का कहीं कोई असर नहीं पर चेहरे पे नींद की एक छाया सी रुकी हुई थी|
“यहाँ तो अचानक बहुत ठण्ड बढ़ गयी आप बस एक जर्सी ही पहने हैं|” सुनीता ने कहा|
“घर के मुकाबले तो कम ही है यहाँ|” उन्होंने जवाब दिया|
“माँ कैसी हैं?” उसने पूछा|
“अम्मा तो अब रहीं नहीं|” वह बड़े निर्विकार भाव से बोले|
सुनीता के हाथ से प्याला ज़रा सरका, चाय छलक के शॉल के नीले रंग में खो गई| उसने कुर्सी आगे उनकी तरफ़ खिसका ली मानो उसके नज़दीक बढ़ने से इस दुःख की पीड़ा हल्की हो जाएगी| मेजर कुछ क्षण रुके और फिर ख़ुद ही बोलने लगे जैसे इस बात को कहने की हिम्मत जुटाने को रुके हुए थे|
“याद है तुम्हें जिस रात वह हादसा हुआ था, सुकांत ने किस झोंक में आ कर पापा की मिस्ट्रेस वाली बात सबके सामने कह दी थी| अम्मा के मन में पापा को ले कर तभी दूरी आ गई थी| वह शायद इस बात को जानती होंगी पर इतने लोगों के सामने अपने ही बेटे के मुंह से ये बात सुन उन्हें गहरी चोट लगी होगी, फिर उन्हें कुछ कहने करने का मौका मिलता उससे पहले ही सुकांत ने ख़ुद को घायल कर लिया|”
“क्या उसका वह घाव भी गले के घाव की तरह दीखता था|” सुनीता के मुंह से निकल गया|
“तुम जानती हो उस बात को?”
“हाँ, माँ ने बताया था|” उसने जवाब दिया|
मेजर ने रुकी हुई बात को फिर थामा और कहना शुरू किया|
“वे उसे वहीं वापस ले गए थे जहाँ से वह हमारे पास इस उम्मीद को लिए आया था कि इस बार वह उन अंधेरों में नहीं भटकेगा, देर ही से सही वापस एक नॉर्मल लाइफ़ की तरफ लौटेगा| फिर तुम सुकांत के जीवन में आईं और उसके उस हिस्से की तरफ़ बढती चली गईं जहाँ सिर्फ़ खाई थी, जहाँ से गिरकर उसका वापस आना सहज नहीं था| अम्मा को जीवन भर तुमसे मलाल रहा कि अगर तुम उसकी तरफ़ यूँ आकर्षित नहीं होतीं और उस दिन अपने लड़कपन में उससे मरे हुए पक्षी को लाने का आग्रह न करती तो उसके भीतर का थमा हुआ विचलन यूँ बाहर नहीं आता| जिस अदृश्य विचलन को उसने दबा दिया था वह यूँ खुल कर उसके बचे हुए अस्तित्व पर कब्ज़ा नहीं कर पाता|”
“मेरी उम्र ही कितनी थी तब, लगता था कि आप सब उससे द्वेष रखे हुए हैं और एक मैं ही हूँ जो उसके आहत मन पर ठंडा हाथ रख सकती हूँ| सुनीता ने कहा|
“अम्मा तुम्हारे लिए कहती थीं कि एक भावनात्मक रूप से कच्ची ज़मीन का व्यक्ति दूसरे कमज़ोर को कैसे सहारा दे सकता है, जो उसके कविता भर सुनाने पर फफक-फफक के रो दे उसके साथ उसका विनाश निश्चित था|” एक लम्बी साँस छोड़ मेजर ने चाय का बचा हुआ घूँट भर कप मेज़ पर रख दिया|
बिजली आ गई थी, सुनीता ने मोमबत्तियां बुझाईं और उनकी तरफ देखा, सुबह मोमबत्ती के उजाले में जिसे वह नींद की छाया समझ रही थी दरअसल वह किसी गहरी पीड़ा के रुके होने का निशान था|
“फिर क्या हुआ|” उसने पूछा|
“तुम्हारे वापस चले आने के तीसरे दिन डॉक्टर उसे पागलखाने ले गया, इस बार वह आठ महीने से कुछ ऊपर रह कर घर वापस आया, एक दम शांत, अम्मा के अलावा किसी से बात नहीं करता था| पापा की ओर तो देखता भी नहीं था| मुझे से भी कई-कई दिन में दो चार शब्द ही कहता था| उसने ख़ुद को माँ और किताबों के बीच समेट लिया था| वह अम्मा के साथ ही उनके कमरे में सोने लगा| अम्मा पापा यूँ भी अब अलग-अलग कमरों के रहवासी थे| एक रोज़ उसने कहा कि वह अपने कमरे में शिफ्ट होना चाहता है अम्मा ने डरते हुए हाँ कर दी पर अम्मा उसे हर दम आँख के पहरे में रखतीं कि कहीं उस पर से नज़र चूक न जाए| फिर एक दिन नज़र चूक ही गई| वापसी के छह महीने बाद वह गायब हो गया, कोई कहता पैदल स्टेशन की तरफ जाते देखा था, कोई कहता कि पर्वतारोहियों के कैंप की ओर नीचे तराई में उतरते देखा था, कोई कहता कि शहर से बाहर जाने वाली सड़क पर दिखा था उसने मुस्कुरा के हाथ भी हिलाया था| ढूंढने पर भी जब कई दिनों तक तक उसका पता नहीं चला तो अम्मा ने प्रण किया कि जब तक सुकांत वापस नहीं मिल जाता रोज़ नंगे पैर माँ काली के मंदिर जायेंगी| ऐसे ही जाने कब उनके तलवे में अंगूठे के पास छोटा सा घाव हुआ जो भरा ही नहीं और गैंग्रीन का कारण बना| देह में बहुत जल्दी और तेज़ी से जहर फ़ैल गया था| कभी कभी लगता है कि दुर्घटनाएं हमारे जीवन में हमसे भी अधिक महत्व रखती हैं|”
सुनीता ने देखा कि दुःख मेजर की आँखों के पानी में बल्ब की रोशनी सा जलबुझ रहा था, जैसे पानी पर तैरते दिए की लौ जो एक लहर चमके तो दूसरी लहर खो जाये|
“आपके परिवार में कौन-कौन है?” उसने पूछा|
“कोई नहीं, बस मैं हूँ|” मेजर ने जवाब दिया|
4
सुनीता को लगता था कि जिस एक दुर्घटना ने उसके जीवन की सड़क ही बदल दी वैसा बदलाव तो कई दुर्घटनाएं मिल कर भी मेजर के जीवन में नहीं लाई होंगी| उसे मेजर के एक पाँव गँवाने का दुःख तो था, फिर युद्ध में सैनिक मानसिक रूप से दुर्घटना के लिए तैयार होता ही है पर एक नई उम्र के मन में प्रेम के आने और उसके बिना किसी परिणति के बिखर जाने से बड़ी क्या ही दुर्घटना होगी| उसे मेजर से सहानुभूति थी|
पिछले सात-आठ महीने के कई छोटे-छोटे प्रवासों के बाद इस बार मेजर दिल्ली लम्बे समय के लिए आया था और सुनीता के घर के पास वाले कम्युनिटी सेंटर में ठहरा था| उसने मेजर के उससे कुछ दूर आ कर रहने से एक ख़ुशी का अनुभव तो किया पर वह इसे मानने से कतरा रही थी| यूँ तो उसके हर प्रवास के साथ अनजाने ही सुनीता का मन उसकी तरफ़ कुछ कदम बढ़ाना चाहता था और वह हर बार इसे अनदेखा कर देती थी पर अब उसका मन अपने लम्बे एकाकी जीवन से ऊबने लगा था| उसका मन चाहने लगा था कि इस बीहड़ जीवन की मिट्टी पर किसी पेड़ की घनी छाँव पड़े| इस प्रवास पर मेजर जाने किस कारण दिन भर यहाँ वहाँ निरुद्देश्य घूमता, और शाम को बिना नागा सुनीता को यूनिवर्सिटी के बाहर मिलता, कभी वे वहीं से घर चले जाते या कभी कहीं और| उस रोज़ ढलती शाम की परछाईं में दोनों पैदल ही घर की तरफ़ चल निकले थे|
“आप किस कारण इतनी जल्दी-जल्दी दिल्ली आ रहे हैं? पीछे वहाँ काम कौन देखता होगा?”
“लोग हैं होटल की देखभाल करने को, फिर अब यहाँ भी काम जल्दी ही निबट जायेगा| दरअसल मैं यहाँ एक छोटा बजट होटल खोलना चाहता हूँ उसी के लाइसेंस की भागदौड़ रही इधर|
उसे मेजर के जवाब से कुछ निराशा हुई पर उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया|
क्या तुम मेरे आने से ख़ुश नहीं होतीं?” मेजर ने उसको देखते हुए पूछा|
“अपने परिचितों से मिलना भला किसे खुश नहीं करेगा|” सुनीता कहा और फिर एक झिझक के साथ उससे प्रश्न किया|
“आपने विवाह क्यों नहीं किया?”
“पता नहीं, समय मनमाफ़िक नहीं रहा होगा| तुम क्या कहती हो डेस्टिनी…… शायद डेस्टिनी में ही नहीं था| तुमने क्यों नहीं किया अभी तक?”
“मेरी भी डेस्टिनी में नहीं था| संभवतः अशोक वृक्ष के नीचे सोया मेरे दुर्भाग्य का सफ़ेद चीता भी जाग गया था, उसे दूर रखने और फिर सुलाने के लिए मैंने विवाह की खिड़की बंद कर ली थी| सुनीता ने जवाब दिया|
“तुम्हारे पिता जी?”
“उन्हें तो गुज़रे ग्यारह बरस हुए|”
“कैसे?”
“हार्ट में स्टंट पड़ा था रिएक्शन कर गया| सैकड़ों मरीज़ों में से किसी एक के साथ ऐसा होता है| उनके साथ हो गया| नौकरी तो उनके सामने ही ज्वाइन कर ली थी उनके जाने के बाद मैंने नौकरी के साथ पी एच डी भी जैसे तैसे कर ही ली|”
“खिड़की बंद करने से हमारे जीवन पर घात लगाये हुआ चीता तो वापस लौट जायेगा पर उसके साथ सुंदर मौसम और प्रतीक्षा में खड़ा समय भी लौट जाता है| कभी बंद खिड़की खोल के झांक लेना चाहिए, क्या पता कहीं दूर जाता बसंत रुक ही जाये|”
इस बात पर वह चुप रही तो मेजर ने थोड़ा रुक कर कहा|
“मैं कल यहां से पहाड़गंज चला जाऊंगा, परसों शाम की ट्रेन से वापसी है| तुम अब के दिवाली की छुट्टियों में हमारे पास क्यों नहीं आ जाती हो, बदलाव भी हो जायेगा और मन को भी अच्छा लगेगा|”
मेजर सुनीता के घर के बाहर तक आ कर ठिठका, सड़क के लैंप से गिरती रौशनी में उसकी छाया सुनीता को घेरे हुई थी| उसने विदा ली और लौट गया, ज़रा दूर जा कर वह पलटा, वापस लौटा और बिना संकोच के उसके कंधे पर हाथ रख कहा|
“मुझसे विवाह करोगी सुनीता?”
फिर बिना कोई जवाब सुने, बिना उसकी प्रतिक्रिया जाने वह वैसे ही लम्बे क़दम रखता हुआ फौजी चुस्ती में गली के बाहर निकल गया| सुनीता ने देखा इस वक़्त उसकी चाल में सब से कम कम्पन था| उसने घर के अन्दर आ, दरवाज़ा बंद कर उस पर ताला लगा दिया जैसे ये उस भावना को बाहर आने से रोकने कि कोशिश हो जिसकी चाह उसे इनदिनों होने लगी थी और जिसके बाहर आते ही सब बह जायेगा| जिन आकांक्षाओं के घेरे से उसने अपने को बाहर खींच लिया था क्या अब उसे ये डर था कि वे पुकार न लें और कहीं वह उनकी दिशा में ख़ुद ही न बढ़ जाए| पिछले डेढ़ साल में मेजर से मिलते रहने पर कोई नया बदलाव उसमें बढ़ चला है जिसने सुकांत की याद को कुछ पीछे कर दिया है, फिर भी कहीं हल्की-धुँधली सी सुकांत की याद काँपती रहती है|
“ओह! सुकांत तुम जीवन भर मिस्ट्री ही रहे|” उसने ख़ुद से कहा|
***
पहाड़ अब पहले जैसा नहीं रहा था, यात्रा में उसे पहाड़ के साथ लगे हुए जंगल जगह-जगह से काटे हुए, ख़ाली से लगे| पहाड़ों से लग कर बहती जल धाराएं कितनी पतली हो गई थीं, अपने दोनों किनारों से दूर बीच में बहती हुई जैसे कि वह ख़ुद| उसे याद आया जब वह पहली बार राधा के साथ आई थी तब सब कितना घना-घना था, डरावना कलछोंहा हरा| उसने अपने आने की ख़बर मेजर को दे दी थी और ये भी कि वह उसे स्टेशन पर लेने पहुँच जाए| उसने भीड़ में उसकी पीठ को देखा| वह मेजर की तरफ बढ़ चली, नज़दीक पहुँच ऊँगली से उसकी कोहनी को छुआ, आधी बाँह की कमीज़ के नीचे हाथ में हलचल हुई वह उसकी तरफ़ मुड़ गया| ये मेजर नहीं था|
“सुकांत|”
वह उसे एक पल के बाद पहचान पाई थी, कुछ बदल गया था उसमें, चेहरा तो कुछ पहले जैसा ही था पर आँखों की जो चमक थी वह कहीं गुम हो गई थी| उसे याद आया एकबार होटल में उसने ऐसे ही सुकांत की बाँह छूई थी, उस दिन भी उसकी आँखें ऐसे ही ख़ाली थीं| जिसके साथ कभी शताब्दियों से जुड़ा सम्बन्ध माना था उसे पहचानने में उसे देर ही नहीं लगी बल्कि वह उसे कोई और समझी इस बात से उसे ग्लानि हुई| क्या अठारह वर्षों में सब कुछ इतना बदल गया है| उसे इस संभावित मुलाक़ात का कोई अनुमान नहीं था| वे दोनों रास्ते भर ख़ामोश रहे|
5.
सुकांत उसे होटल की लॉबी में छोड़ कर जाने कहाँ गायब हो गया था| कुछ देर बाद मेजर उससे आ कर मिला|
“तुम्हारे लिए कमरा यहीं बुक कर रखा है, वैसे घर पर भी रुका जा सकता है|”
“नहीं यहीं ठीक है| आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि वह भी यहाँ है|”
“वह तो अब एकदम ही बंद हो गया है, ख़ुद में खोया हुआ, किताबों में ही रहता है| दिनोंदिन हम मिल ही नहीं पाते| वह हमेशा कमरे के अन्दर ही रहता है, बहुत ऊब जाने पर ही बाहर निकलता है| बस थोड़ा बहुत बगीचे में टहल कर फिर वापस कमरे में लौट जाता है|”
“एक ही घर में रहते हुए इतनी दूरी?”
“वह तो ज़्यादातर होटल में ही रहता है| उसका एक परमानेंट कमरा यहीं है, मेरे पास घर कभी कभार ही रुकता है| अब तुम जब तक हो वह घर पर ही रह लेगा|” मेजर ने झिझकते हुए कहा|
“कैसे वापस लाये इसे?” सुनीता ने पूछा, उसकी आवाज़ में उदासी थी ये बात मेजर से छुपी न रह सकी|
“उस शाम बहुत बर्फ़ गिरी थी| दरवाज़े के सामने टखनों तक बर्फ़ में खड़ा था वह| जैसे अचानक ग़ायब हुआ था, अम्मा के गुज़रने के ढाई साल बाद वैसे ही अचानक लौट आया था| वह जब लौटा तब उससे प्रेम और घृणा करने वाले दोनों ही लोग जा चुके थे| इस बार वह बहुत रिक्त होकर लौटा था और अम्मा को न पाने पर उसका यह ख़ालीपन उसे अपने भीतर खींच ले गया| मैंने कोशिश की थी कि तनाव की जो गाँठ सालों से हमारे बीच रही है वह खुल जाये पर ऐसा हुआ नहीं और मेरी कोशिशों के बाद भी वह बहुत अकेला रहने लगा|”
जब बेल बॉय सुनीता का सामान कमरे में रख कर वापस चला गया तो मेजर ने कहा|
“तुम थोड़ा सो लो, शाम को डिनर पर मिलेंगे| अगर तुमको अन-ईज़ी न लगे तो सुकांत को भी पूछ लूँ शाम को साथ आने के लिए|”
“अरे! इसमें असुविधा कैसी| जैसा आप को ठीक लगे|”
मेजर कमरे से बाहर निकला ही था कि सुनीता ने उसे टोका|
“क्या आपके पास वह पेंटिंग अभी भी है?”
“कौन सी?”
“सबावाला की ‘द राइडर्स’, जो आपके घर में लगी हुई थी|”
“हाँ, होनी तो चाहिए कहीं, शिफ्टिंग के बाद से काफ़ी कुछ सामान कभी खुला ही नहीं बस स्टोर्स में इधर-उधर जगह बदलता रहता है| मैं ढूंढवाता हूँ|”
उसे उस दोपहर यात्रा की थकान से, नवम्बर की ठंडी पहाड़ी हवा के छूने से, खिड़की के पार दूर तक साफ़ आकाश देखते हुए बैठे-बैठे नींद आ गई थी| छोटे-छोटे अंतरालों पर उसे तरह-तरह के सपने आते रहे जिन्हें जागने पर वह याद नहीं कर पायेगी ये उसे नींद में भी मालूम था| उसे ऐसे लगा जैसे किसी ने दरवाज़े पर हल्की दस्तक दी हो, उसने उठ कर बत्ती जलाई, दरवाज़ा खोला, कोई नहीं था| सुनीता ने जा कर खिड़की खोल दी, लॉन में जलती बत्तियों में उसने देखा कि सामने की ज़मीन गीली थी और पेड़ों से विलंबित गति से इक्का-दुक्का बूँदें नीचे गिर रही थीं, इसका मतलब जब वह सो रही थी तो बारिश हुई थी, दोपहर को तो आकाश कितना साफ़ था एक भी बादल नहीं था पर अब एक दम ही अँधेरा उतर आया था| वह कुछ देर वैसे ही खड़ी रही फिर कपड़े बदल कर नीचे लॉबी को चली गई जहाँ मेजर उसे साढ़े आठ बजे मिलने वाला था|
होटल अब काफी बदल गया था, उसकी स्मृति में बंद पिछले प्रवास से बिलकुल अलग था ये| अब जिस जगह ये नई लॉबी है वहां शायद पहले डायनिंग हॉल था जो उसे किसी ओपेरा हाउस जैसा लगता था| उसने देखा कि लॉबी के बीचोबीच एक झूमर जगमगा रहा है जिसकी रौशनी दाईं तरफ़ लगे एक नई डिज़ायन के आदमकद शीशे में झिलमिला रही थी| उसे याद आया ये जगह कभी बार हुआ करती थी| उसके सामने एक दृश्य पल भर को ठहरा जिसमें ऊंचे बार स्टूल पर सुकांत बैठा है और वह उसके एकदम पास खड़ी है| उसने आँखें बंद कर लीं|
“अरे तुम यहाँ हो?” मेजर की आवाज़ उसके बहुत नज़दीक थी|
“हाँ, बस अभी कुछ देर पहले ही आई| ये झूमर कितना सुन्दर है| उसने पलटते हुए कहा|
“फ़िरोज़ाबाद से मंगवाया था, मुझे ऐसे सोबर डिज़ाइन ही भाते हैं पापा की तरह तड़क-भड़क वाले नहीं|”
“हाँ, उन्हें हर चीज़ बहुत ग्रैंड चाहिये रहती थी, उनकी ग्रैंड, तड़क-भड़क पर्सनैलिटी को टक्कर देती हुई| वह हँस कर बोली|
“बिलकुल, हम चारों भाई-बहन की पर्सनैलिटी में उनका ग्रैंड पर्सोना था पर धीरे-धीरे कहीं खो गया| मेजर ने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा|
“एक दम से ठंडा हो गया न मौसम|” सुनीता ने बात का रुख बदला|
“हाँ, पहाड़ में ऐसे ही अचानक ठण्ड बढ़ जाती है| मैंने टेबल खुले में लॉन वाले सेट-अप में रिज़र्व की थी, चाहो तो अंदर रेस्टोरेंट में भी चल सकते हैं, वहाँ हीटर हैं|”
रेस्टोरेंट जैसा कि मेजर ने कहा था अपेक्षाकृत काफ़ी गरम था| हल्की रौशनी में डूबा हुआ जिसमें देर तक बैठे रहने पर किसी को भी घबराहट हो सकती थी|
“राधा आती है कभी यहाँ?”
“हाँ, कुछ-कुछ सालों के अंतराल के बाद आना हो जाता है|”
खाना लग चुका था, उड़ती हुई भाप दोनों के बीच अगरबत्ती के धुंए जैसी लहरा रही थी|
“तुमने मेरे प्रस्ताव का कोई उत्तर नहीं दिया?”
“क्या सुकांत नहीं आयेंगे खाने पर|” सुनीता ने मेजर को देख पूछा|
“घर पर नहीं था|” वह बोला
इसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई| मेजर उसे कमरे तक वापस छोड़ कर लौट गया, जाते-जाते उसने इतना ही कहा|
“किसी से कह कर हीटर भिजवाता हूँ, रात को वरना बहुत ठंड हो जाएगी|”
6
पिछले दो दिनों में सुनीता होटल में कई जगह घूम चुकी है पर उसे सुकांत कहीं नहीं दिखा| उसने सोचा था कि लिखने-पढने के लिए तो अपने कमरे पर आयेगा, पर शायद वह अपने सामान के साथ ही मेजर के घर पर रुका हुआ है| उसे जितनी उत्कंठा है सुकांत से मिलने की वह संभवतः उतना ही निर्लिप्त है उसके यहाँ होने से, वरना क्या यहाँ नहीं आता|
वह आज मेजर के घर जा रही है| घर पर तो होना ही चाहिए उसे, वहां सामने आने पर भी क्या वह वैसे ही चुप रहेगा जैसे कि स्टेशन पर था| सुकांत की उस दिन वाली झलक सुनीता की आँखों में डोलती रही| मन बार-बार क्यों पीछे की राह पकड़ लेता है, जहाँ से घायल हुए बिना वर्तमान में वापसी सम्भव नहीं| सुनीता को आज उस हादसे के बाद सुकांत की अधखुली आँखें और पीली उदास मुस्कान के साथ उन्हें गुड नाईट कहना याद आ रहा है|
बड़े लॉन के सामने घर अपेक्षाकृत छोटा लग रहा था| लॉन को पार कर, जिसमें दो गाड़ियाँ खड़ी हो सकें ऐसे पोर्च के सामने लगी तीन सीढियां चढ़ कर घर का मुख्य द्वार था| मुख्य द्वार से घुसते ही एक छोटा बरामदा था जिसके भीतर घर के कमरे और आँगन था| मेजर उसे बरामदे में रिसीव करने खड़ा था| सुनीता ने देखा मेजर के ठीक पीछे सबावाला की पेंटिंग अश्वारोही टंगी हुई थी जिसमें बंद दूसरा अश्वारोही अभी भी बाहर भाग निकलने की चेष्टा कर रहा था|
“पेंटिंग मिल गई आपको|”
“हाँ, स्टोर ही में थी ज़्यादा ढूँढना नहीं पड़ा| साफ़ करवा के टांग ली|”
इस घर को देख सुनीता को उस घर की याद आ गई जहाँ वह पहली बार आई थी| यहाँ भी वैसी ही दरवाज़े के बराबर वाली खिड़कियाँ थी जो घाटी में खुलती थीं, जिनसे झाँकने पर घाटी में कूदने का मन कर आता था| यहाँ घाटी उतनी गहरी नहीं थी, न अब उसका मन किसी घाटी में कूदने का करता है| क्या लम्बा अंतराल किसी भावना की गहराई को पाट देता है, उसने सोचा|
“सिर्फ एक इस पेंटिंग और कुछ एंटीक फर्नीचर को छोड़ पुराने घर का सामान यूँ ही बंद पडा है|” मेजर उससे मुखातिब था|
“क्या सारा ही सामान ऐसे पड़ा है|” सुनीता ने पूछा|
“नहीं सारा तो नहीं, कुछ बेच दिया, कुछ एंटीक होटल पहुँच गया, बाकी बचा हुआ यहाँ है उसमें से कुछ सही लगा तो दिल्ली पहुँचवा दूंगा| चलो, पीछे आँगन में चल कर बैठें, इस वक़्त धूप उतर आती है वहां, और सुकांत घर पर नहीं है पिछले दो दिन से|” मेजर ने उसकी कुछ ढूंढती आँखों की तरफ़ देखते हुए कहा| वह चुप रही तो उसने ख़ुद ही आगे बात बढ़ा दी|
“होटल ही होगा, दरअसल एक कमरा जो राधा के लिए रखते हैं हम कभी कभी उसमें रुक जाता है वह|”
“अच्छा|”
सुनीता ने देखा कि चमकती धूप में मेजर का माथा कितना सुंदर लग रहा है और उसका आगे खिसक आये बालों को हाथ से पीछे हटाना सुकांत की अदा से कितना मिलता है| कुर्सी को थोड़ा पेड़ की आड़ में ले कर उसने मेजर से पूछा|
“आप कितने बड़े हैं राधा से?”
“राधा से सात साल और सुकांत से तीन| राधा बहुत लाड़ली रही, खूब प्यार पाया उसने हम सबसे पर दोस्ती हम तीन की ही थी, मेरी, सुकांत की और हमारी उस बहन की जो एक्सीडेंट में मारी गई| उसकी डेथ के बाद हमारे बीच सब बदल गया|” मेजर बोला|
“कुछ हादसे हम सब के जीवन को एक ही साथ बदल देते हैं| एक ही साथ सब उसकी चपेट में आते हैं चाहे कहीं भी हों|”
“जब तुम यहाँ आई थी पहली बार तब कितनी उम्र थी तुम्हारी?” मेजर ने माहौल को हल्का करने की गरज से पूछा|
“उसी साल एम.एस.सी खत्म की थी तो तेईस साल थी उम्र| मुझमें और राधा में कुछ ही हफ़्तों का तो अंतर है बस|”
“मैं कल कचहरी के काम के लिए आधा दिन को शहर से बाहर जाऊँगा, साथ चलना चाहोगी, घूमना हो जायेगा|”
“नहीं, आप हो आइये, मैं माँ काली के मन्दिर घूम आऊँगी|”
नौकर आ कर मेज़ पर चाय रख गया था, धूप उनके पैरों की ओर सरक आई थी|
*****
अम्मा बिलकुल ऐसी ही गोल लाल बिंदी लगाती थीं जैसी तुमने अभी लगा रखी है| किसी ने उसके बहुत पास आ कर कहा| वह जानती थी ये कौन है? क्या इसे मेजर के बाहर जाने का इंतज़ार था? नहीं, सुकांत कभी इतना कमज़ोर तो नहीं रहा कि कोई भी काम चोरी छिपे करे| वह पलटी, उसका चेहरा सुकांत के चेहरे के बिलकुल सामने था| इतना पास की सुनीता ने उसके माथे पर किसी ऐसी चोट का निशान देख लिया जो उसकी पिछली याद में शामिल नहीं था|
“कहाँ जा रही हो?” सुकांत ने पूछा|
“माँ काली के मंदिर, जहाँ माँ जाया करती थीं|”
“ये रास्ता तो अब बंद हुआ, वहां जाने के लिए नया रास्ता बना है| चलो आज तुम्हारे साथ मैं भी चलता हूँ| अम्मा के साथ ही गया था आख़िरी बार|”
वह उसका हाथ पकड़े एक छोटी पगडण्डी की तरफ़ मुड़ गया|
माँ की ताम्रवर्णी मूर्ति आज भी वैसी ही चमक रही थी जैसी उसने पहली बार देखी थी| बस रौशनी के नए तरीकों के कारण अब अँधेरा कम था और मूर्ति के ऊपर मंडप बना छत्र लगा दिया था जिससे उसकी भव्यता बढ़ सके| तेज सुगंध वाले धुंए ने ऊपर उठ कर उसे घेर लिया, धुंए से उसकी आँखें बंद हुई जा रही थीं| उसने आँखें बंद कर माँ का ध्यान किया|
“माँ इस बार क्या माँगूं तुमसे, अब की यही मांगती हूँ कि जिसे तुम ठुकराओ नहीं, जो तुम्हें स्वीकार हो मेरे लिए वही देना|”
इस बार भी वह उसे होटल की लॉबी में छोड़ कर चला गया था, पर जाने से पहले सुनीता ने उससे वादा लिया कि जब तक वह यहाँ है सुकांत उससे मिलता रहेगा| यूँ भी वह मेजर के आग्रह पर अपनी छुट्टियाँ बढ़वा चुकी थी|
अगले तीन दिन वह उससे होटल के लॉन में मिलता रहा, चाय पीते, थोड़ी बहुत बातें करते और फिर वह वापस लौट जाता| इन तीन दिनों में से एक दिन मेजर भी उनके साथ था, उस दिन सुकांत बहुत चुप था बस उन को दोनों देखे जा रहा था जैसे किसी अनुमान की सत्यता परख रहा हो| चौथे दिन तड़के ही सुनीता के दरवाज़े पर उसने जोर से दस्तक दी, जब तक सुनीता ने दरवाज़ा खोल नहीं दिया वह अधीरता से दरवाज़ा बजाता ही रहा|
“जल्दी तैयार हो जाओ, तुम्हें एक जगह लिए चलता हूँ|”
सुनीता ने उसमें ऐसी अधीरता कभी नहीं देखी थी| उसे याद आया कि आज शाम उसे मेजर के साथ उसके किसी परिचित के घर चाय पर जाना है| उसने सोचा कि वह वापस आ कर मेजर को समझा देगी|
दिन अभी निकला नहीं था, पूर्व में एक पतली गुलाबी रेखा अपना आकर ले कर बस अभी थमी ही थी और किसी के इंतज़ार में थी जिसके स्पर्श से उसमें सोने की सी लपट जाग जाए| वे दोनों ढलान से नीचे उतर रहे थे, उनके साथ-साथ देर तक चोटी पर ठहरने के बाद धूप भी धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी| वह सुनीता से कुछ आगे जा रुक गया था, फिर पलट कर उसकी तरफ लौट आया| उसने आज वी गले का नीला स्वेटर पहन रखा था, पेड़ की किसी पत्ती से कट कर एक किरन उसके गले पर पड़ी| सुनीता को उसके गले के पास टांकों का एक निशान दिखा, उसकी आँखों में वह भयानक रात घूम गई| वह थक कर वहीं बैठ गई, सुकांत भी उसके पास खड़ा था| दोनों ठंडी सड़क के गर्म होने का इंतज़ार करने लगे, जैसे किसी कोयले को आग पा कर लाल होने का इंतज़ार हो| बीच-बीच में सड़क पर एक पारदर्शी सी अदृश्य लपट उठती और खो जाती|
“हम कहाँ चल रहे हैं सुकांत?”
“झील याद है तुम्हें?”
“झील|”
“हाँ वही जहाँ तुम्हारे लिए मैंने एक जलपाँखी मारा था, जिसे तुम मेरे संग-संग तैरते हुए एक किनारे से दूसरे तक लाई थीं| उसी झील पर अब फिर जलपाँखी लौट आये हैं| वे वहीं किनारों पर हमारा इंतज़ार कर रहे हैं सुनीता|”
वह टहलता हुआ कुछ दूर निकल गया, उसके पीछे-पीछे सुनीता की कांपती आवाज़ थी|
“मुझे वापस लौटना है सुकांत| वापस चलो|”
वह चलते-चलते ठिठका और मुड़ कर सुनीता के पास आया, उसकी तरफ देख, उसका हाथ पकड़ उससे कहा “दिल गये आफ़त आई जानों पर / यह फ़साना रहा ज़बानों पर”, फिर कभी बाद में चले चलेंगे हम, अब तो तुम मेरे पास लौट आई हो|
“मैं तुम्हारे लिए नहीं आई हूँ सुकांत, मुझे तुम्हारे भाई ने विवाह का प्रस्ताव दिया था, मैं तो उसी की स्वीकृति देने और कुछ समय उनके साथ बिताने आई थी| मझे तो पता भी नहीं था कि तुम यहाँ हो|”
“तुम तो मेरी छाया हो, तुम मुझ से कैसे अलग हो सकती हो, मुझे जिस रौशनी का इंतजार रहा सुनीता वह तुम ही हो|”
“छाया तो हमेशा जली हुई होती है, घनी, गहरी, भारी| सुकांत फिर रौशनी के दोनों तरफ़ ऐसे सिपाही खड़े होते हैं जिनका काम है कि रौशनी जिस भी देह पर गिरे ये उस देह की छाया को जला कर बाहर फेंक दे| रौशनी के ये सिपाही जलती हुई दोपहर में कहेंगे कि पेड़ों की तरफ़ मुड़ जाओ वहां छाया ही छाया है झुलसाने वाली धूप से बच जाओगे| बढोगे तो रोक लेंगे कि छाया के बदले छाया, पेड़ की छाया लो तो अपनी यहीं ज़मीन पर हमारे पैरों के पास गिरी छोड़ जाओ| छाया को आत्मा मानो तो समझो कि ये आत्मा के हेर-फेर का, गिरवी रखने का काम बहुत पुराना है| कब तक अपनी आत्मा को यूँ ही गिरवी रखोगे, अपनी आत्मा को निरंतर घायल करते रहोगे सुकांत| इसे जानो कि एक भावनात्मक रूप से कच्ची ज़मीन का व्यक्ति दूसरे कमज़ोर को कैसे सहारा दे सकता है| जीवन नदी है हर पल छलछलाती हुई, मैंने बहुत देर से समझा इसे| तुम कब तक उस किनारे सूखे टीले पर खड़े रहोगे मेरे दोस्त, नदी पार करो अश्वारोही, पार करो और इस किनारे आ कर ठहरो, अपने थकी हुई आत्मा पर ठन्डे पानी के छींटे मारो| अपने मन को विश्राम दो, जीवन में वापस लौटो, अपने लिए नया साथी तलाशो और पीछे छूटे साथी को दूर से दूसरे किनारे पर देख खुश होओ सुकांत| अपने मन भीतर से मेरी गिरवी रखी आत्मा को मुक्ति दो दोस्त ताकि मैं आगे बढ़ कर प्रेम के इस नए जल में ख़ुद को उतार पाऊँ|”
सुकांत ने उसका हाथ थामा और वापस उसी रास्ते पर मुड़ गया जहाँ से वे नीचे उतरे थे| पूरे रास्ते दोनों चुप थे जैसे कहने वाले सब शब्द कहीं गिर कर बिखर गए हों और अब उन्हें कौन बटोरे| वह उसे होटल तक छोड़ वापस लौट गया| उस शाम मेजर का फ़ोन आया कि वह उससे मिल नहीं सकता है, सुकांत को तेज़ बुखार है| सुनीता मेजर को बता ही नहीं पाई कि उनके बीच आज क्या हुआ था| उस रात तीनों में से कोई नहीं सोया था| वह डरती रही कि ऐसी ही एक रात पहले भी उस पर गुजरी थी, कहीं आज की रात भी वैसा ही दुःख दे कर न चली जाए|
दो दिन तेज़ बुखार में रहने के बाद आश्चर्यजनक रूप से उसका बुखार उतरने लगा था| वह वापस होटल अपने कमरे पर लौट आया था| सुनीता के वापस जाने में अब कुछ ही दिन बाकी रह गए थे, इधर वह रोज़ उससे मिलती रही है| उस दिन सुकांत ने ज़िद की कि सुनीता उसे ले कर लॉन में चले वह धूप में बैठना चाहता है कुछ देर|
मेजर ने कुछ ऊंचाई से उन्हें लॉन में बैठे देखा| वे भी मेजर को वहां खड़ा देख सकते थे| सुकांत ने हाथ हिला कर मेजर को नीचे आने का इशारा किया| उतरते हुए मेजर ने देखा कि उसने सुनीता के कान में कुछ कहा|
“अशोक के वृक्ष के नीचे सोया हुआ सफ़ेद चीता बार-बार अपनी आँखें खोल कर मुझे देख रहा है पर इस बार मैं सजग हूँ, संभला हुआ हूँ, उसे अपनी आत्मा पर घाव नहीं देने दूंगा| मैंने अपने भीतर से तुम्हारी छाया को मुक्ति दी दोस्त, जाओ जिधर प्रेम का ठंडा जल है उस ओर बढ़ जाओ|” वह सुनीता से बोला|
सुनीता उठी और लॉन की दूसरी तरफ़ बढ़ गई जबकि सुकांत खिसक कर वहीं लेट गया| मेजर ने देखा कि सुकांत आँखें बंद किये हुए है, वह उसके पास न रूक कर सुनीता के पास चला गया| सुनीता की आँखें भीगी हुई थीं, उसने मेजर से पूछा|
“आपने कलकत्ते में एक प्रश्न किया था मुझ से, याद है| क्यों किया था?”
“वह तो कुछ सूझा नहीं था कि अचानक मिलने पर कैसे बात शुरू करूँ| पर आज फिर पूछता हूँ कि ‘क्या तुम उससे अब भी प्यार करती हो?”
“जब हम बहुत छोटे होते हैं तो हमारी अस्थियों का मज्जा बहुत कोमल और हल्के रंग का होता है, शिराओं में बहता हुआ रक्त हल्का लाल होता है| फिर जैसे जैसे हम बढ़ते हैं यही अस्थिमज्जा गाढ़ा, ठोस और यही रक्त गहरा लाल हो जाता है जो जीवन को बनाये रखने के लिए आवश्यक है| उस उम्र में सुकांत के प्रति चाहना उसी कोमल मज्जा और हल्के लाल रक्त के जैसी थी पर अब जीवन ठोस है अब मुझे स्थायित्व की चाहना है| पर जैसे हर गहरा लाल रक्त अपने पहले के हल्के रंग की याद के बिना नहीं रह सकता वैसे ही आपके प्रति मेरा प्रेम सुकांत के प्रेम की याद के बिना नहीं रह सकता| उसका प्रेम अब मित्रता में ढला| मुझे आपका प्रस्ताव स्वीकार है मेजर साहब|”
सुनीता ने मेजर की बाँह से यूँ सर टिका लिया जैसे एक लम्बी यात्रा के थके हुए यात्री को मानो सहसा ज़रा देर राहत के लिए कुछ सहारा मिला हो| कहीं दूर दौड़ते-भागते अश्वारोही ने अपनी लगाम खींची और रुक गया, अब उसे ठहरने के लिए अपनी ज़मीन मिल गई थी| जॉर्जट के पीले पल्ले सी नवम्बर की तेज दोपहर कुछ मद्धम हो उन तीनों पर चमक रही थी|
वापस लौटने के तीन हफ़्ते बाद एक सुबह उसकी आँख फ़ोन बजने से खुली, आज तक पिछले कई सालों में ऐसा नहीं हुआ कि उसके घर इतनी सुबह किसी का फ़ोन आया हो| जब तक वह उठ कर कमरे से निकल बैठक में पहुँचती फ़ोन कट के दो-तीन बार बज चुका था| उसने लपक के हाँफते हुए फ़ोन उठाया|
“हेलो, कौन?”
“मैं बोल रहा हूँ|” वह मेजर की आवाज़ पहचान गई थी|
“आप? इतनी सुबह? सब ठीक है?”
“वह चला गया सुनीता|” कुछ देर चुप रह मेजर ने कहा|
“कहाँ?” सुनीता ने कुछ घबराई आवाज़ में पूछा|
दूसरी ओर गहरे घने बादल की तरह एक लम्बी चुप्पी छाई रही…. जिसमें से पानी की एक बूँद भी न बरसनी थी और जिसकी उमस दूर तक सब को जलाने वाली हो|
“कुछ कहते क्यों नहीं आप?”
“उसने आत्महत्या कर ली सुनीता| परसों से एक दिन पहले नाश्ता करके घर से होटल गया था| मैं जब शाम को होटल गया तो रोज़ की तरह उसके कमरे पर गया, देर तक दरवाज़ा खटखटाने पर जब डुप्लीकेट चाबी से खोला तो देखा बिस्तर पर लेटा हुआ था, मानो सोया हुआ हो| कलाई काट ली थी उसने|” कह कर वह ख़ामोश हो गया|
सुनीता को वहां बिताया अपना आख़िरी दिन रह-रह कर याद आता रहा…. उसे याद आया कि उस दिन जब मेजर के पास खड़े हो कर उसने सुकांत को देखा था तब उसने रुमाल से अपनी आँखें ढँक रखी थीं| फिर अब उसे अब क्यों लगा रहा है जैसे सुकांत ने कहीं से अपनी आँख खोल कर उस की तरफ़ देखा हो|
“मैं यहाँ से सब निबटा के अगले पच्चीस एक दिन में दिल्ली आऊंगा सुनीता फिर मिलते हैं या तुम को ठीक लगे तो तुम यहाँ का एक चक्कर लगा लो इस बीच|” अब तक चुप रहे मेजर ने उससे कहा|
“नहीं…….. मुझे नहीं लगता कि अब मिलने की गुंजाइश बचती है| इस आधे-अधूरे सम्बन्ध को ऐसे ही टूटना था, जिस एक स्वीकार से सब उथल-पुथल हो बिखर गया उसे कैसे बटोरा जायेगा| मेरे अशांत भाग्य की तलहटी से जो भाप उठी थी वह आज मुझे झुलसा गई मेजर साहब| एक अंदेशा जिसकी परछाईं हम दोनों को हमेशा दीखती रही वह आज हमको पार कर गई है, मैं इस साये को अब दुबारा नहीं लाँघ पाऊँगी|”
फ़ोन काट सुनीता ने नज़र घुमा के घर को देखा, दिसम्बर की सीली-धुँधली सुबह का अँधेरा हर ओर फैला हुआ था उसे यूँ लगा जैसे अशोक वृक्ष के नीचे सोया सफ़ेद चीता नींद से उठ कर उसकी तरफ़ बढ़ रहा हो, उसने डर कर अपनी आँखें बंद कर लीं| ये उसे अब समझ में आया था कि उस दिन क्यों चमकती हुई वह धूप अचानक हल्की पड़ गई थी, उस दिन मानो कहीं दूर कोई बादल उठा और उस धूप को धुँधला कर आज तेज बरसते हुए उसकी सूखी ज़मीन को हमेशा के लिए बहा ले गया| वह उठी, ज़मीन पर पड़े नीले शॉल को उठा कंधे पर डाला और घिसटते हुए पैरों से अंदर चली गई| कहीं दूर किसी सवार ने घोड़े की ज़ीन के साथ एड़ी रगड़ी, घोड़ा हिनहिनाया फिर चुप हो गया…….. दरवाज़े के साथ लगी खिड़की से सटी हुई दो आँखें चमकीं और उस सुबह के नीम अँधेरे में बुझ गईं…………. किसे मालूम ये किसकी आँखें थीं जो नींद से जाग उसके दरवाज़े तक आ गईं थीं|
अनघ शर्मा
+968-94534056
मस्कट- ओमान

