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  • श्यौराज सिंह बेचैन की कहानियों का विमर्श

     

    दलित साहित्यकारों में श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनकी प्रिय कहानियों के संकलन ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ की कहानियों पर यह विस्तृत टिप्पणी लिखी है युवा अध्येता सुरेश कुमार ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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    दलित विमर्श और साहित्यिक महारथियों के बीच श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ को सर्वोच्च स्थान और प्रतिष्ठा प्राप्त है। इनके लेखन और चिंतन में जातिगत गोलबंदी और शोषण के विरुद्ध बड़ा मारक विमर्श गूंजता है। इनका लेखन वर्तमान और अतीत के विश्लेषण के आधार पर शोषणकारी व्यवस्था को चिन्हित करने का काम करता है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ दलित अधिकारों की दावेदारी और पैरोकारी बड़ी संजीदगी से अपने लेखन में करते हैं। दलित चिंतकों और साहित्यकारों ने आजादी के तुरंत बाद ही सवाल उठाना शुरु कर दिया था कि सवर्णों ने संसाधनों को बँटवारा सर्वसमावेशी उसूलों के आधार पर नहीं, बल्कि जाति को कसौटी बनाकर किया है। अस्सी और नब्बे के दशक तक आते-आते यह सवाल पूरे परिदृश्य में गूंजने लगा था कि समाज को सर्वसमावेशी बनाने के लिये जातिवादी मानसिकता को उखाड़ फेंकना निहायत जरुरी हो गया है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ ने अपने साहित्य में जाति व्यवस्था के सताये हुये दलित समाज की हौलनाक सच्चाई को सामने रखने का काम किया है। करीब दस साल पहले श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ का कहानी संग्रह ‘भरोसे की बहन’ (2010) वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया था। इस संग्रह की कहानियों के दायरे में दलित शोषण का सवाल बड़ी गंभीरता से उठाया गया था। इस संग्रह से यह विमर्श उभरा था कि सवर्णवादी संरचना और उसकी गतिविधियों ने दलितों को सामाजिक भागीदारी से बेदख़ल करने का काम किया है।
    श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ का दूसरा कहानी संग्रह करीब दस साल बाद ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ (2019) शीर्षक से राजपाल एण्ड सन्ज़, प्रकाशन  से प्रकाशित होकर आया है। यह संग्रह इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसकी भूमिका में और कहानियों में श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ ने बड़े मारक और तीखे सवाल उठाये हैं। इस संग्रह की कहानियां यह विमर्श सामने लाती हैं कि इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक निकल बीत जाने के बाद भी दलितों को उचित अवसर और प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ इस संग्रह की भूमिका में बड़ी मारक बात कहते हैं  कि हिंदी कहानी आंदोलन के सौ साल के इतिहास में कहानी लिखने वाले विशेष लेखक थे। इन लेखकों  ने बहिष्कृत और उपेक्षित समुदाय को अपनी कहानियों से उड़ा दिया था। बेचैन जी की दृष्टि में नई कहानी आंदोलन भी उतना नया नहीं था, क्योंकि इस आंदोलन में दलित कहानियों के पात्र हो सकते थे, लेकिन खुद लिख नहीं सकते थे। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’  हिंदी कहानी आंदोलनों को लेकर जो सवाल उठाये हैं, हिंदी आलोचकों और बुद्धिजीवियों को उन सवालों पर गंभीरता से सोचना होगा। दलित लेखकों ने वर्ग को शोषण का आधार बनाने के बजाय जातिगत शोषण को अपने चिंतन और सृजन का विषय बनाया है। दरअसल, वर्गवादी चेतना के आंदोलनों ने आजादी के बाद तक जातिगत सवालों को विमर्श के दायरे में नहीं माना था। जब दलित साहित्यकारों ने जाति के सवालों को केद्र में ला कर उसके भंयकर रुप को प्रस्तुत किया, तब कहीं जाकर वामपंथी विचारों के लेखक संघों ने जाति के सवालों को विमर्श के दायरे सामिल किया।
    जातिगत संरचना का ढाँचा लोकतंत्र के दायरे का विस्तार नहीं होने देता है। सवर्णवादी विचारधारा के पोषक दलितों को अधिकार और हक देने में दुविधाग्रस्त रहते हैं। ‘मेरी प्रिय कहानियां’ संकलन मे ‘क्रीमी लेयर’ शीर्षक से एक कहानी है। इस कहानी के भीतर यह विमर्श किया गया है कि दलितों और स्त्रियों को भागीदारी और अवसर देने के लिये सवर्ण समाज तैयार नहीं है। इस कहानी का नैरेटर सवर्ण देश-विदेश से अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद दलितों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को सवर्ण अधिकारों पर कुठाराघात मानता है। कथा का दूसरा पहलू यह है कि कथा नायक की पत्नी दलित प्रधिनिधित्व की प्रबल पैरोकार है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’  इस कहानी के भीतर भले ही सवर्ण महिलाओं की छवि बहुजन हितैषी होने की गढ़ रहे हों लेकिन बड़ी मजे की बात यह है कि जब ‘मंडल कमीशन’ की सिफ़ारिशें लागू हुई थीं तो सबसे पहले सवर्ण स्त्रियां ही पिछड़ों और दलितों के प्रतिनिधित्व के विरोध में सड़कों पर उतर आई थीं। इन्हीं उच्च श्रेणी वाली महिलाओं का कहना था कि यदि मंडल कमीशन लागू हुआ तो सवर्णों को नौकरियां नहीं मिलेगी। इन स्त्रियों का मंतव्य था कि मंडल कमीशन लागू होने से उनकी सुख सुविधाओं पर असर पड़ेगा। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि मंडल कमीशन के विरोध में शामिल स्त्रियों ने यह नहीं कहा कि हम जाति की हदबंदी को तोड़कर दलितों और पिछ़डों से शादी करके जातिगत संरचना को कमजोर कर देगीं। सामाजिक ढाँचे को दुरुस्त करने के लिये प्रतिनिधित्व और भागीदारी पर बल देन होगा। इससे दलित समुदाय की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में तब्दीली दिखाई देगी। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की कहानियों में सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक बराबरी का सवाल अहम बनकर उभरता है। इनकी कहानियों का दावा है कि यदि दलितों को शिक्षा और अवसर नहीं दिया गया तो उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में तब्दीलियां नहीं होंगी।
    श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ अपनी कहानियों में समाज में हो रही तब्दीलियां और जड़ता दोनों को सामने लाने का काम करते हैं । जातिवादी और पितृसत्ता के उसूलों को मानने वाले स्त्री को सीमित दायरे में रखने की हिमायत करते रहते हैं। इस तरह के लोग अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिये स्त्री पर नियंत्रण रखते हैं। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ के इस संग्रह की ‘बस्स इत्ती-सी बात’ कहानी पितृसत्ता और सामंती ठसक की सडांध को उघाड़ने का काम करती है। इस कहानी के मुताबिक दलित और स्त्रियों के समुचित विकास के लिये पितृसत्ता और जातिवादी मानसिकता का नाश जरुरी है। स्त्री हकों के पैरोकार एक लंबे समय से पितृसत्ता की खामियों पर विमर्श करते आ रहे हैं । पितृसत्ता के उसूलों को नकारने वालों का ख्याल है कि स्त्री अपनी इच्छाओं की खुद मालिक है। और, उसे पुरुष तंत्र शासित और संचालित नहीं कर सकता है। दूसरी ओर पितृसत्ता के पैरोकारों का दावा है कि स्त्रियों की इच्छाओं और आकांक्षाओं का निर्धारण करने का हक पिता, भाई, पति और पुत्र को है। इस कहानी के निचोड़ में कहा गया है कि पितृसत्ता और जाति-व्यवस्था की आपसी कदमताल दलितों और स्त्रियों के जीवन में तब्दीलियां नहीं होने दी है। जाति सवर्ण समाज की पीठ पर बैताल की तरह चिपकी रहती है। समाज के सभी हलकों में जाति का बैताल सवर्णों की पीठ पर सवार रहता है। इस समाज का उच्च शिक्षित और पढ़ा लिखा व्यक्ति भी जाति के मोह में गिरफ़्त रहता है। इस दृष्टि के लोगों के लिये मनुष्य नहीं, बल्कि जाति की श्रेष्ठता मायने रखती है। 21वीं सदी के दो दशक बीत जाने पर भी दलितों को अछूत माना जाता है। ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ संग्रह की एक कहानी ‘शिष्या-बहू’ में श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ दिखाते हैं कि पितृसत्ता और जातिसत्ता ने मिलकर दलितों और स्त्रियों की हालत बहुत खराब कर डाली है। जब दलित समाज की पढ़ी लिखी लड़की सवर्ण के घर की बहू बनकर जाती है तो पितृसत्ता और जातिसत्ता के आगे उसकी चेतना कुंद हो जाती है। कहानी का विमर्श इस ओर ध्यान दिलाता है कि पढ़े लिखे अभिजनों के मानस में दलितों को लेकर बहुत ज्यादा तब्दीली अभी नहीं आई है।
    दलित विमर्श ने जाति के सवालों को विमर्श के केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है। महानागरों से लेकर ग्रामीण जीवन तक जातिवाद का खौलता यथार्थ दलित कहानियों में देखने को मिल जायगा। नई कहानी आंदोलन से जाति का प्रश्न काफी हद तक नदारद रहा है। वहां मध्यवर्ग समाज की आंकाक्षाओं, इच्छाओं और संत्रास की अभिव्यक्ति को तरजीह मिलती है। दलित कहानी आन्दोलन ने जातिवाद और ब्राह्मणवाद की जुगलबंदी में पिसते दलितों की भयावाह स्थिति को सामने रखकर साहित्यिक और समाज विज्ञानी अध्येताओं का ध्यान जाति प्रश्न पर केन्द्रित किया है। ‘रावण’ श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की चर्चित कहानियों में से एक है। इस कहानी को भी ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ संग्रह में शामिल किया गया है। ‘रावण’ ग्रामीण परिवेश के जातिवादी शोषण के भंयकर उत्पात को सामने रखने वाली बड़ी मार्मिक कहानी है। दरअसल, जातिवाद एक प्रवृत्ति और मानसिकता है, वह किसी भी समाज के व्यक्ति को अपनी गिरफ़्त में ले सकती है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था अपने स्वार्थों के लिये पिछड़े समाज के लोगों को कैसे इस्तेमाल करती है, इसके सूत्र इस कहानी के भीतर मौजूद हैं। रामलीला में मेघनाथ, कुंभकरण और विभीषण का किरदार निभाने वाले रावण बने दलित कलाकर मूलसिंह के सामने अपना सिर झुकाने से मना कर देते हैं। अपने जातीय दंभ का प्रदर्शन करते हुये मूलसिंह की मंच पर ही अपने-अपने गदों से जमकर पिटाई करते हैं। इस घटना से आहत होकर मूलसिंह को गाँव छोड़ने का फैसला करता है। जातिवादी और सामंती शाक्तियां दलितों को पलायन करने के लिये मजबूर करती हैं। आज भी दबंग जातियों के लोग दलितों की झोपाड़िया दिन के उजाले में जला देते हैं। दलितों का पलायन रोकने के लिय सवर्ण समाज को अपनी मानसिकता में तब्दीलियां लानी होगी। भारतीय समाज की संरचना को समझने के लिये जाति के पहलुओं को समझना होगा। असल में सवर्ण समाज जाति श्रेष्ठता के आधार पर मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। श्यौराज सिंह बेचैन की एक बड़ी दिलचस्प कहानी ‘आँच की जाँच’ है। यह कहानी भी ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ संकलन में रखी गई है। इस कहानी का विमर्श इस बात पर जोर देता है कि इक्कीसवीं सदी का समाज जाति की जकड़न से मुक्त नहीं हो पाया है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ कहानी की कथा में दिखाते हैं कि एक बच्चे की जाति का पता लगाने के लिये उसके खून की जाँच करवा डालते हैं । इस कहानी के सवर्ण पात्रों का यकीन है कि मेडिकल सांइस में कोई ऐसी टेकनीक अवश्य होगी जो बता देगी की व्यक्ति की जाति क्या है? कहानी इस पहलू को भी रखती है कि जाति का पता लगाने के लिये कैसे ज्ञान- विज्ञान को धता बताया जा रहा है।
    श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ अपनी कहानियों में जाति व्यवस्था के बीहड़ इलाकों की शिनाख्त करते हैं। इनकी कहानियों में समाज की प्रगति जाति-पाँत के खंडन की कामना पर टिकी है। इनकी कहानियाँ दलितों को अधिकार, अवसर और सुविधाओं को देने का आग्रह करती हैं। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की कहानियों का विमर्श सामाजिक अधिकारों की दावेदारी का दावा मजबूत इरादों के साथ रखकर, जातिवादी लोगों के प्रति कार्रवाइयाँ की मांग करता है। इस संग्रह की कहानियां जातिवादी व्यवस्था की दमनकारी नीतियों की मुखालफ़त और दलितों और स्त्रियों के प्रति संवेदशील होने की सिफारिशभी करती हैं। इन कहानियों की रोशनी में सवर्णवादी मानसिकता का चेहरा बेनकाब होने के साथ सवर्णों के जातिगत शोषण की इबारत स्पष्ट तौर पढ़ी जा सकती है।

    [सुरेश कुमार  युवा आलोचक और अध्येता हैं ]

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    पुस्तक का प्रकाशन राजपाल एंड संज ने किया है।

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