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  • पिराउद: आत्मकथात्मक स्मृतियों का आधुनिक आख्यान

    प्रसिद्ध लेखक उदयन वाजपेयी के कहानी संग्रह ‘पिराउद’ की कुछ कहानियों पर यह विस्तृत टिप्पणी लिखी है कवयित्री स्मिता सिन्हा ने। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित  इस संग्रह पर इस टिप्पणी को आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    जब मैंने पहली बार उदयन वाजपेयी की ‘पिराउद’ हाथ में ली, तो लगा कि यह भी हिंदी के अन्य कहानी-संग्रहों की तरह ही होगी। कुछ कहानियाँ पसंद आएँगी, कुछ भूल जाऊँगी। लेकिन जैसे-जैसे पढ़ना शुरू किया, लगा कि मैं किसी और ही संसार में प्रवेश कर रही हूँ। यह संग्रह केवल कहानियों का संकलन नहीं है, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और जीवन की उलझनों का एक निजी एल्बम है। यह संग्रह मेरे लिए किसी आत्मकथात्मक यात्रा की तरह रहा। इसमें लेखक की उपस्थिति इतनी गहरी है कि पढ़ते-पढ़ते लगता है कि वह मेरे बगल में बैठे हैं, अपनी स्मृतियाँ मुझे सुना रहे हैं…कभी धीमे स्वर में, कभी बेचैनी के साथ।

    उदयन वाजपेयी का कहानी–संग्रह ‘पिराउद’ हिंदी कथा-साहित्य में स्मृति, अधूरेपन और आत्मीयता की गहन पड़ताल है। यह पुस्तक केवल कहानियों का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, रिश्तों की तरलता और लेखक के आत्म-संघर्ष का साहित्यिक मानचित्र है। इसे पढ़ना किसी पुराने संदूक को खोलने जैसा है, जिसमें बचपन की गंध, रिश्तों की गरमाहट और बीते समय की धूल एक साथ उड़ती है। यह अनुभव केवल नॉस्टेल्जिया नहीं जगाता, बल्कि पाठक को जीवन और उसकी नश्वरता पर विचार करने को विवश करता है।

    हिंदी कथा-साहित्य में उदयन वाजपेयी एक ऐसे रचनाकार के रूप में पहचाने जाते हैं, जिन्होंने जीवन के गहरे अनुभवों, सांस्कृतिक स्मृतियों और मानवीय संबंधों की जटिलताओं को नए ढंग से कथा में पिरोया है। उनकी पुस्तक ‘पिराउद’ इस अर्थ में एक महत्वपूर्ण संग्रह है कि यह पारंपरिक कहानी कहने की रेखा से हटकर एक नई कथा-संवेदना का परिचय देती है। यह पुस्तक केवल कहानियों का संकलन नहीं, बल्कि लेखक की निजी संवेदनाओं और जीवन-अनुभवों का साहित्यिक रूपांतरण है। यहाँ साधारण घटनाओं के बहाने जीवन की गहरी परतें खुलती हैं—जहाँ स्मृति, आत्मीयता और पहचान के प्रश्न एक साथ सामने आते हैं। उदयन वाजपेयी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी कहानियों में केवल कथावाचक नहीं रहते, बल्कि एक जीवंत उपस्थिति बनकर आते हैं—कभी पिता, कभी स्मृति-रक्षक, कभी आत्म-संघर्षरत रचनाकार। उनकी रचनाएँ पाठक को निजी अनुभवों की दुनिया में ले जाती हैं और यह अनुभव धीरे-धीरे सामूहिक हो जाता है।

    संग्रह की सबसे मार्मिक कहानियों में से एक है ‘गोद की चोरी’। ‘गोद की चोरी’ केवल बच्चों की मासूम माँग और पिता की बेचैनी की कहानी नहीं है, बल्कि यह रिश्तों के भीतर छिपी मानवीय आकांक्षाओं, भय और जिम्मेदारी का गहन रूपक है। लेखक ने ‘गोद’ को एक साधारण शारीरिक क्रिया से आगे बढ़ाकर एक भावनात्मक प्रतीक में रूपांतरित कर दिया है। यह गोद केवल बच्चों को उठाने की जगह नहीं, बल्कि जीवन में सुरक्षा, विश्वास और प्रेम का आश्रय-स्थान है। कहानी में गोद का गायब हो जाना दरअसल उस सतर्क सोच का प्रतिरूप है कि यदि यह भावनात्मक आश्रय खो जाए तो जीवन और रिश्ते अस्थिर हो सकते हैं। पिता की सारी कोशिश हमें यह दिखाती है कि यह केवल बच्चों की सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि वह रिश्तों की गहराई और उनके भविष्य को लेकर एक गहरी उम्मीद से भरा है। पिता के मन में कहीं कोई संदेह नहीं। वह जानता है कि उसकी कोशिशें एक दिन बच्चों के मन में गहरी जड़ें बन जाएँगी।

    कहानी का दृश्य विन्यास डूबता सूरज, पेड़ों के पीछे उतरता अँधेरा, हवा में डोलते कपड़े, इस आंतरिक बेचैनी का दृश्यात्मक विस्तार है। बाहर का अंधेरा बच्चों के भीतर की आशंका को और गहरा कर देता है, जबकि पिता मजबूती से हर दृश्य में बना रहता है। इस प्रकार दृश्य और मनःस्थिति एक-दूसरे के प्रतिबिंब बन जाते हैं। यहीं पर यह कहानी हमें चीनी शॉर्ट फ़िल्म “Father” की याद दिलाती है, जिसमें एक लंबा कोट तूफ़ान और बारिश झेलते हुए भी तार पर टंगा रहता है और अंत में उसी में से बच्चों और स्त्री के कपड़े निकलते हैं। यह दृश्य इस बात का रूपक है कि चाहे जीवन कितने भी झंझावात क्यों न झेले, प्रेम और परिवार का धागा अंततः बना रहता है। इसी तरह ‘गोद की चोरी’ में भी गोद खो जाने का डर अंततः उस स्नेह के महत्व को रेखांकित करता है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद बना रहता है और हर नये दिन के साथ पुनः जन्म लेता है।

    यह कहानी अपने छोटे-से कथानक में रिश्तों की सबसे गहरी परत को छू लेती है। यह केवल बच्चों की जिद या पिता की चिंता की कहानी नहीं, बल्कि यह जीवन में प्रेम और आश्रय की अनिवार्यता पर एक गंभीर विमर्श है। लेखक ने प्रतीक और दृश्यात्मकता का उपयोग कर इसे भावनात्मक गहराई प्रदान की है। यही कारण है कि यह कहानी पाठक के भीतर ठहर जाती है और उसे यह सोचने पर विवश करती है कि हमारी अपनी ‘गोद’ अर्थात प्रेम और सुरक्षा का आश्रय  कितनी कीमती और संरक्षित होनी चाहिए।

    पिता की यह आश्वस्ति कहीं न कहीं पिराउद और प्रारब्ध की गहरी स्वीकृति से जुड़ी है। मानो वह जानता हो कि जीवन में हर सहारा स्थायी नहीं होता, हर गोद एक दिन खाली होनी ही है। फिर भी वह अपना सब कुछ लगा देता है, क्योंकि यही उसका प्रारब्ध है। उसके हिस्से में यही लिखा था कि वह अपने बच्चों के लिए यह भावनात्मक आश्रय गढ़े। लेखक इस भाव को समझते हुए मानो कह रहा है कि पिता की कोशिशें केवल वर्तमान को नहीं थाम रहीं, वे भाग्य के साथ एक गुप्त संवाद करते हुए बच्चों के भविष्य को निश्चिन्त बना रही हैं। वह जानता है कि भविष्य में शायद बच्चों को यह सहारा स्वयं ढूँढ़ना होगा और उसकी शुरुआत अभी इसी क्षण से करनी होगी। यह आत्मविश्वास कहीं लेखक के निजी अनुभव का भी हिस्सा है, जब उसने स्वयं जीवन के कठिन समय में किसी सहारे के खो जाने का दर्द और उसके लौट आने की तड़प महसूस की थी पिराउद और प्रारब्ध की यही गहरी स्वीकार्यता शीर्षक कहानी ‘पिराउद’ से भी जुड़ी नज़र आती है। यह कहानी विचारोत्तेजक और जटिल दोनों है। ‘पिराउद’ शब्द हिन्दी पाठक के लिए नया और अनजाना है। इसका अर्थ साफ़ न होने के बावजूद यह शीर्षक पाठक को अपनी ओर खींचता है। दरअसल यह अस्पष्टता ही संग्रह की बुनियादी रणनीति है। उदयन वाजपेयी यह जताते हैं कि जीवन और साहित्य के कई अर्थ शब्दों से बाहर होते हैं।

    इसमें पेरिस और भोपाल जैसे दो भौगोलिक-सांस्कृतिक संसार एक-दूसरे के सामने रखे गए हैं। पेरिस आधुनिकता, रचनात्मक स्वतंत्रता और बौद्धिक खुलापन है, जबकि भोपाल स्मृति, पारिवारिक जुड़ाव और आत्मीयता का केंद्र। कहानी में फ्रांस से आई एक अधूरी पांडुलिपि है, जिसे लेखक कई बार पूरा करने की कोशिश करता है, लेकिन वह अधूरी ही रह जाती है। यह अधूरापन ही कहानी की आत्मा बन जाता है। मानो लेखक कहना चाहते हों कि जीवन और स्मृतियाँ कभी पूरी नहीं होतीं। वे हमेशा टुकड़ों में ही हमारे पास रहती हैं। राजकुमार का भटकाव इस कहानी का सबसे प्रभावशाली प्रतीक है। वह जंगलों, मैदानों, नदियों और पहाड़ों में भटकता है, पर कहीं ठहर नहीं पाता। यह भटकाव केवल स्थानिक नहीं है, यह आधुनिक मनुष्य की बेचैनी और अस्तित्वगत अस्थिरता का रूपक है। प्रकृति के बिंब हवा, पानी, चाँदनी, कीट-पतंगे, इस बेचैनी को और गहराई देते हैं।

    उदयन वाजपेयी इस कहानी में जीवन के बिखराव को जोड़ने की कोशिश नहीं करते। वे उसे वैसे ही रखते हैं जैसे वह है…अधूरा, अनिश्चित और प्रश्नों से घिरा हुआ। यही दृष्टि आधुनिक साहित्य और अस्तित्ववाद की पहचान है। यह हमें काफ्का, जेम्स जॉयस और बेकेट जैसे लेखकों की याद दिलाती है, जिन्होंने जीवन को इसी बिखराव में देखा और दिखाया।

    संग्रह की अन्य कहानियाँ रास्ते, लम्बे राजा के आँसू, रात के मुसाफ़िर, मेट्रो और चोरी भी इसी संवेदनशीलता का विस्तार हैं। ‘रास्ते’ घड़ी न पहन पाने की छोटी-सी घटना को समय और असुरक्षा के गहरे प्रतीक में बदल देती है। ‘लम्बे राजा के आँसू’ सत्ता, अकेलेपन और मानवीय विडंबना को गहन प्रतीकात्मकता में रचती है। ‘रात के मुसाफ़िर’, ‘मेट्रो’ और ‘चोरी’ शहरी जीवन की बेचैनी, निजी क्षतियों और संबंधों की जटिलताओं को सहज भाषा में उजागर करती हैं। इन कहानियों में लेखक की सेल्फ-रिफ्लेक्सिविटी स्पष्ट दिखाई देती है। वे केवल कहानी नहीं कहते, बल्कि कहानी कहने की प्रक्रिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, मानो पाठक से संवाद कर रहे हों।

    एक पाठक के रूप में ‘पिराउद’ से जुड़ना आसान भी है और चुनौतीपूर्ण भी। आसान इसलिए कि भाषा पारदर्शी और काव्यमय है, जो पाठक को तुरंत अपने भीतर खींच लेती है। कठिन इसलिए कि कहानियाँ सीधी-सपाट नहीं हैं। वे टुकड़ों और स्मृतियों में बुनी गई हैं, जिन्हें समझने के लिए पाठक को भी सक्रिय रूप से हिस्सा लेना पड़ता है। यह संग्रह हिंदी कथा-साहित्य में आत्मकथात्मकता, स्मृति और आत्मीयता के नए आयाम खोलता है। इसमें सांस्कृतिक स्मृति का रूपांतरण, पात्रों की आंतरिकता का विस्तार और अस्तित्वगत बेचैनी, तीनों एक साथ मिलते हैं।

    ‘पिराउद’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उदयन वाजपेयी अपने लिखे हर शब्द में मौजूद हैं। ‘गोद की चोरी’ में वे आत्मीयता और सुरक्षा की स्मृति के साथ दिखाई देते हैं, जबकि ‘पिराउद’ में अधूरेपन, भटकाव और प्रश्नों के रूप में। यही सर्वत्र उपस्थिति इस संग्रह को विशेष बनाती है। यह केवल कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि एक आत्मीय सांस्कृतिक दस्तावेज़ है, जहाँ निजी अनुभव सामूहिक स्मृति में बदल जाते हैं और साहित्य पाठक के जीवन का जीवित हिस्सा बन जाता है। ‘पिराउद’ हिन्दी कथा-साहित्य में एक नई ज़मीन तैयार करता है, जहाँ स्मृतियाँ सिर्फ़ नॉस्टेल्जिया नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व के प्रश्न बन जाती हैं। कभी-कभी कोई किताब हाथ में आती है और लगता है जैसे किसी पुराने बक्से का ढक्कन खुल गया हो। भीतर से हल्की-सी धूल उड़ती है, बचपन की गंध आती है और कोई भूली हुई आवाज़ अचानक कानों में गूँजने लगती है।  ‘पिराउद’ मेरे लिए ऐसी ही किताब रही। यह सिर्फ़ कहानियों का संग्रह नहीं है। यह स्मृतियों का जंगल है। पन्ने पलटते ही जैसे मैं किसी सुनसान पगडंडी पर चलने लगती हूँ। कहीं पक्षियों की आवाज़ सुनाई देती है, कहीं नदियों का कल-कल बहना। और कहीं अचानक… अपने भीतर की चुप्पी।

    इन कहानियों की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा है। वाजपेयी का गद्य बिना किसी आडंबर के सहज है। वह छोटी सी घटना या मामूली सा वाक्य लेकर पाठक को गहरे सवालों की ओर धकेल देता है। संग्रह में शामिल दो संस्मरण इसे और विशिष्ट बनाते हैं। पहला संस्मरण दिवंगत बड़े भाई की स्मृति पर आधारित है। यहाँ लेखक अपने निजी शोक को एक ऐसी भाषा में बदलते हैं, जो हर पाठक को अपने खोए प्रियजनों की याद दिलाती है। दूसरा संस्मरण अशोक वाजपेयी के जीवन–वृत्त पर केंद्रित है। इसमें भाई के रचनात्मक जीवन, जिम्मेदारियों और संघर्ष का ईमानदार चित्रण है।

    इन दोनों संस्मरणों में निजी अनुभव सार्वजनिक संवेदना का रूप ले लेते हैं।

    ‘पिराउद’ को पढ़ते हुए लगता है कि यह पुस्तक पारंपरिक सीमाओं को तोड़ती है। यह न केवल कथाओं का संग्रह है और न ही केवल आत्मकथात्मक लेखन। यह दोनों का संगम है, जहाँ स्मृति और कल्पना एक–दूसरे को सहारा देती हैं। कहानियों में रूपक और प्रतीक हैं, तो संस्मरणों में आत्मीयता और कृतज्ञता। इस दृष्टि से ‘पिराउद’ को एक संवेदनात्मक प्रयोग कहा जा सकता है। यह साहित्य को घटनाओं का वृत्तांत नहीं, बल्कि मनुष्यता की भीतरी यात्रा मानता है। उदयन वाजपेयी का ‘पिराउद’ हिन्दी कथा–परंपरा में एक विशिष्ट जोड़ है। इसकी कहानियाँ सरल होते हुए भी गहरी हैं और संस्मरण आत्मीय होते हुए भी सार्वभौमिक। इसे पढ़ना जीवन की उन छोटी–छोटी दरारों में झाँकना है, जहाँ से सत्य की झलक मिलती है। यह पुस्तक हमें सिखाती है कि साहित्य केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं, बल्कि स्मृति, शोक और आत्मीयता को अर्थ देने का भी साधन है।

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