‘मेघे ढाका तारा’ के लेखक शक्तिपाद राजगुरु के बारे में आप जानते हैं?

ऋत्विक घटक की फिल्म ‘मेघे ढाका तारा’ देखते हुए यह ध्यान ही नहीं आया था कि इतनी अच्छी कहानी लिखी किसने थी. प्रकाश के. रे का यह लेख नहीं पढ़ा होता तो शक्तिपाद राजगुरु नामक लेखक के बारे में जाना ही नहीं होता, अभी 12 जून को इस लेखक की पुण्यतिथि थी. न पढ़ा हो तो यह लेख जरूर पढियेगा- मॉडरेटर

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जीवन की अर्थहीनता मनुष्य को उसका अर्थ रचने के लिए विवश करती है. यह अर्थ-रचना लिखित हो सकती है, विचारों के रूप में हो सकती है, इसे फ़िल्म के रूप में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है. महान फिल्मकार स्टेनली क्यूब्रिक के इस कथन को हम किसी लिखित या वाचिक अभिव्यक्ति को फ़िल्म का रूप देने या किसी फिल्म को कहने या लिखने की स्थिति में रख दें, जो जीवन के अर्थ रचने की प्रक्रिया जटिलतर हो जाती है. शायद ऐसी स्थितियों में ही देश और काल से परे कृतियों का सृजन होता होगा तथा ऐसी कृतियां स्वयं में एक अलग जीवन रच देती होंगी जिनके अर्थों की पुनर्चना की आवश्यकता होती होगी या जिनसे पूर्वरचित अर्थों को नये मानी मिलते होंगे. ॠत्विक घटक की फिल्म मेघे ढाका तारा (1960) एक ऐसी ही रचना है. इस फिल्म की मूल कथा शक्तिपाद राजगुरु (1922-2014) ने लिखी थी.

बंगाल के एक गाँव में 1922 में जन्मे शक्तिपाद राजगुरु का पहला उपन्यास कोलकता में पढ़ाई करते हुए 1945 में प्रकाशित हुआ. उन्होंने अपने लंबे सृजनात्मक जीवन में सौ से अधिक उपन्यासों की रचना की. बांग्ला के अन्यतम साहित्यकारों- बिभूतिभूषण बंधोपाध्याय और ताराशंकर बंधोपाध्याय- से प्रभावित राजगुरु ने कोलकाता से दूरस्थ स्थानों में अपने सामान्य चरित्रों को स्थित कर गूढ़तम, लेकिन अत्यंत मानवीय घटनाक्रमों में पिरोया. उनकी साहित्यिक रचनाओं की संख्या और बांग्ला के पाठकों में उनकी लोकप्रियता इस बात का स्वत: प्रमाण हैं कि लगातार लिखने के बावजूद उनकी कथाओं, कथानकों और चरित्रों में अनोखापन बरकरार रहा. यही कारण है कि राजगुरु की कई रचनाएं किताबी आशियाने से निकल कर सिनेमा की भाषा और भाव-भंगिमा में भी रचीं और बसीं. अनुवाद के ज़रिये तो उनके कुछ उपन्यास ही दूसरी भाषाओं के पाठकों तक पहुंच सके, लेकिन फ़िल्मों के माध्यम से राजगुरु के चरित्रों और उनका विशिष्ट जीवन देश की अनेक भाषाओं में अनुदित हुआ.

मेघे ढाका तारा के अतिरिक्त शक्तिपाद राजगुरु की कृतियों पर अमानुष (शक्ति सामंत, 1975), जीबन कहिनी (राजेन तरफदेर, 1964), बरसात की एक रात (शक्ति सामंत, 1981), तिल थेके ताल (शांतिमय बनर्जी, 1985), गायक (शांतनु भौमिक, 1987), अंतरंग (दिनेन गुप्ता, 1988), आशा-ओ-भालोबाशा (1989) आदि फ़िल्में बनीं जो उनके उपन्यासों की तरह ही दर्शकों द्वारा सराही गयीं. उनके साहित्यिक रचना-कर्म और रचना-प्रक्रिया के विविध पहलुओं की समीक्षा तो साहित्य के सुधी आलोचक व पाठकों का जिम्मा है, उसी तरह उनके सिनेमाई लेखन और अपनी रचनाओं को पटकथा में परिवर्तित करने के तौर-तरीके पर विस्तार से विश्लेषण किया जाना चाहिए. साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंधों में साहित्यिक कृति का सिनेमाई रूपांतरण हमेशा से विवादों में रहा है. माना जाता है कि सिनेमा कृति के स्तर से हमेशा निम्न होता है क्योंकि पटकथा के जरूरत के मुताबिक मूल रचना के कई हिस्सों को छोड़ देना पड़ता है और कभी-कभी संदर्भों से अलग घटना-क्रम या परिस्थितियों को समाहित कर दिया जाता है. एक बड़ी आलोचना यह भी होती है कि फिल्मकार मूल पाठ के गहन अर्थों को परदे पर उतार पाने में असफल रहता है. सिनेमा की दृश्यात्मकता भी कथा के चरित्रों, वस्तुओं, स्थलों और स्थितियों को एक निश्चित ढांचे में समाहित कर देती है जिससे कथा के अर्थों को विस्तार ले सकने की सीमा बंध जाती है.

बहरहाल, इस विवाद के तर्क-प्रतितर्क हैं, लेकिन, शक्तिपाद राजगुरु के संदर्भ में यह बहस काफी हद तक बेमानी हो जाती है क्योंकि रचनाकार अपनी कृतियों के सिनेमाई अवतरण की प्रक्रिया में स्वयं ही गहरे से जुड़ा हुआ है और फ़िल्मकार के रूप में उसे संवेदनशील और साहित्यानुरागी लोग मिले.

इस बारे में आगे बात करने के लिए हम उनकी दो बहुचर्चित फ़िल्मों को ले सकते हैं, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपने कथ्य और शिल्प की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रखती हैं. घटक की मेघे ढाका तारा और शक्ति सामंत की अमानुष सिनेमाई व्याकरण की हद को बड़ा विस्तार देती हैं और इसी कारण उन्हें अप्रतिम क्लासिक फ़िल्मों की श्रेणी में रखा जाता है.

मेघे ढाका तारा की पृष्ठभूमि भारत-विभाजन की त्रासदी है, जिसमें पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आये एक शरणार्थी परिवार के अंतर्संबंधों और अंतर्द्वंद्वों की कथा है. भारत-विभाजन की हिंसा और अपनी जडों से उखड़ने का दुख सबसे अधिक दोनों तरफ के पंजाब और बंगाल ने भोगा था. दुनिया के इतिहास में इस स्तर पर कभी भी लोगों का पलायन नहीं हुआ था और न ही कभी लोगों में एक-दूसरे के प्रति हिंसा और नफरत का ऐसा विभत्स तांडव देखा या सुना गया था. बंगाली साहित्य और सिनेमा ने इस त्रासदी के अलग-अलग पहलुओं को बख़ूबी दर्ज किया है. मेघे ढाका तारा इस त्रासदी की अनवरत उपस्थिति का उल्लेखनीय दस्तावेज है. फ़िल्म शरणार्थी स्मृतियों और स्थगित भविष्य से उत्पन्न असाधारण विलगन को रेखांकित करती है, जहां परिवार के सदस्य भी मानवीय आदर्शों और मूल्यों को विस्मृत कर देते हैं. परंतु, कला आशा का दामन नहीं छोड़ती है. जीवन ठहर जाता है, लेकिन गति की आस नहीं छोड़ता है. इस फ़िल्म में भी नैराश्य के अंधेरे सुनसान में विश्वास के लौ मौजूद हैं.

यह फ़िल्म शक्तिपाद राजगुरु की कहानी चेनामुख पर आधारित है जिसे एक अख़बार में ॠत्विक घटक ने पढ़ा था. इस कहानी की संवेदनशीलता से प्रभावित होकर उन्होंने इसकी पटकथा तैयार की और मेलोड्रामा की अपनी पसंदीदा शैली में परदे पर उतारा. फिल्म में पार्श्व संगीत और पौराणिकता के अद्भूत संयोग से राजगुरु की कहानी की त्रासदी अपने चरम को प्राप्त करती है. उल्लेखनीय है कि राजगुरु के पहले उपन्यास दिनगुली मोर में भी शरणार्थियों की दुर्दशा केंद्र में है. यह फ़िल्म निश्चित रूप से ॠत्विक घटक की फ़िल्म है, लेकिन इस कहानी के पात्रों और उनके जीवन को राजगुरु ने रचा है. फ़िल्म की तैयारी में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही थी. इस लिहाज से यह उनकी उपलब्धि भी है.

1975अमानुष आजाद भारत की त्रासदी का बयान है जहां शोषण और अत्याचार है और इस परिस्थिति में एक साधारण इंसान अपने अस्तित्व को भूल आत्महंता की भूमिका निभाने के लिए विवश हो जाता है. मेघे ढाका तारा की त्रासदी दो देशों के अनियंत्रित इतिहास की पैदाइश है. अमानुष की त्रासदी अपना इतिहास स्वयं लिखने की ज़िद्द में बेसुध देश की यंत्रणा है. सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था एक भलेमानुष को अमानुष तो बना देती है, लेकिन उसके भीतर के मानुष को पूरी तरह नहीं मार पाती और वह मानुष अपने ही जैसे लोगों पर हो रहे अनाचार के प्रतिरोध में बोल उठता है. वह नहीं चाहता कि उसकी तरह अन्य लोग भी अमानुष होने का अभिशाप जीने के लिए विवश हों.

साहित्य के पाठ और सिनेमा के फ़्रेम के भीतर और बाहर को लेकर बड़ी-बड़ी बहसें होती रही हैं. शक्तिपाद राजगुरु के लेखन और उन पर बनी फिल्मों के संदर्भ में भी ये बहसें प्रासंगिक हो सकती हैं, लेकिन इनका पाठन और दर्शन हमें आत्म और आत्म के बाहर बसे जीवन को समझने में तो निश्चित ही सहायता करती हैं.

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