नेहरु जी की पुण्यतिथि पर अग्निशेखर की कविता ‘जवाहर टनल’

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की पुण्यतिथि पर एक कविता अग्निशेखर की जिसका शीर्षक है ‘जवाहर टनल. आज के माहौल के बहुत अनुकूल है- मॉडरेटर
=======================

गीले और घने अँधेरे से भरी थी
जवाहर लाल नेहरू सुरंग
और हम दहशत खाए लोग
भाग रहे थे सहमी बसों में

जवाहर लाल नेहरू सुरंग में
जैसे कूट कूट कर भर गया था अँधेरा
इतने वर्ष
और टप टप गिरती बूँदें ये
ज़ार ज़ार रो रहा था पाँचाल पर्वत
नेहरू के गुमान पर
या हमारे हाल पर

हमारी बसें फँसी पड़ीं थीं सुरंग में और अब उनका धुआँ भी
शामिल था
अँधेरे में

कानों में अभी भी गूँज रही थी
जेहादियों की गालियाँ
उनके उद्घोष
धमकियाँ
ठांय ठायं !!
गोलियों की अठखेलियाँ
हथगोले और बमों के अट्टहास
अल जेहाद !
अल जेहाद ! अल जेहाद !

जवाहर लाल नेहरू सुरंग में
हमारे सिकुड़े शरीरों के अन्दर दबे कोलाहल में
छिपी बैठीं
लहुलुहान स्मृतियाँ इस समय
क्यों जाग रहीं थीं
गीले अँधेरे में
शून्य में उभर रही थीं
बलात्कृत हो रहीं थीं
छटपटाती बिलखती
हमारी बहनें

घरों के दरवाज़ों पर
खून की टपकतीं छींटें उकेरते
ये नये नये भित्ति चित्र
हमारे सामने

सुरंग में फँसे थे हम
नीले थे हमारे चेहरे
और होंठ थे पीले
पपड़ियाए
जैसे सूखी बिवाई फटी थी
हमारी धरती सौन्दर्यशास्त्र की
झेलती अकाल
दशकों से
टुकुर टुकुर देखती
सूने आकाश में कभी नहीं प्रकटा
इन्द्रधनुष यहाँ
कि गा उठती घुटनों तक फूलों से भरी
उपत्यका कोई
भीतर उस के

फिलहाल हमें सुरंग से होते हुए
निकलना था
पर्वतों के दूसरी तरफ
शेष हिन्दुस्तान में

एकमात्र था इत्मीनान
कि जैसे तैसे बचा लाए थे
हम खौफ ज़दा बहु बेटियाँ अपने साथ
बच्चों के स्कूली बस्ते
और कृषकाय बुज़ुर्गों की शेष ज़िन्दगी
यही थी उपलब्धि इस वक़्त
हमारे पाँच हज़ार वर्षों की

बाकी सब छूट गया था पीछे
अखरोट और चिनारों की हरी छाँव में
स्टापू का खेल
चिमेगोईयाँ
पर्वतों के धुँधलके में ओझल हो जातीं
चिड़ियों को देख
हमारा उदास हो जाना

पीछे छूट गया था
इतिहास और संवत्सर अपना
मिथक
देवता और तीर्थ अपने
मेले ठेले
तीज त्यौहार
घर बार अपना
उनकी स्मृतियाँ थीं हमारे साथ भागतीं
चुपचाप
जैसे मुँह अँधेरे भागते गाँव से
चली आई थीं दौड़ती कुछ दूर
हमारी गायें भी
सामान लदे ट्रकों के पीछे
बसें चिंघाड़ रहीं हैं अँधेरे में
जैसे लगा रही हों गुहार
जवाहर लाल नेहरू के ‘आनन्द भवन’ में
परंतु यह सच था
कि हम नहीं थे इलाहाबाद में इस समय
जहाँ गंगा थी
जमुना थी
सरस्वती थी
आपस में घुल मिल

हम थे अँधेरे में
ठिठुरती ठ्ण्ड में
सँकरी श्वास नली में अवरुद्ध
हवा के कण जैसे

और संसार था ईर्ष्या से भरा
हमारे प्रति
जबकि हम भाग रहे थे स्वर्ग से
भिंची हथेलियों में जान थी हमारी
कमीज़ अन्दर थे छिपाए
चिनार के पत्ते
और जेबों में ठूँस भरी थी
गाँव की मिट्टी

जहाँ तक मेरी बात है
मैंने कमीज़ के अन्दर खोंस रखी थीं
ललद्यद की कविताएं
जिन्हे छू छू कर
इस गीले और सघन अँधेरे में
मैं हो रहा था तनिक तनिक ज़िन्दा
“अरे पगले ,
कौन मरेगा और मारेंगे किस को ?”
कान में कह रही थी लल्द्यद मुझसे

तय था कि हम भाग रहे थे
और गढ़ी जा रही थी अफवाहें
सेंकी जा रही थीं
लोकतंत्र के तवे पर
झूठ की रोटियाँ

ये मानवाधिकारों के दिन थे
और हमारे नहीं थे मानवाधिकार
चुप थीं भेड़ें
और यही था सद्भाव
कसाई बाड़े का

चिंघाड़ रहे थे वाहन
आतुर थे हम
सुरंग से बाहर थी रोशनी सुरंग से बाहर थी उम्मीदें
सुरंग से बाहर थी सुरक्षा
सुरंग से बाहर थे कवि, कवि कलाकार
और संस्कृतिकर्मी

खुला था आसमान सुरंग से बाहर
और
हम उतरे पर्वतों से शरणार्थी केम्पों में
फैल गए सम्विधान के फफोले तम्बुओं में
बिलबिलाए कीड़ों की तरह
जुलूसों में
धरनों में
हम उछले नारों में
दब गए अत्याचारों में
यहाँ धूप थी
तेज़ाब था
लू थी
साँप थे बिच्छू थे
रोग थे
श्मशान था
ओढ़ने को आसमान था
सोने को हिन्दुस्तान था
मेरा देश महान था .

More From Author

मुक्तिबोध का लेख ‘दून घाटी में नेहरु’

नेहरु से बतियाने को भीष्म साहनी ने किया बचपना

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी