• लेख
  • मुसलमानों में जातिगत ऊँच-नीच का साहित्यिक दस्तावेज़

    सुहेल वहीद उर्दू-हिन्दी के जाने-माने पत्रकार-लेखक हैं। आज उनका यह लेख पढ़ते हैं जो यह बताता है कि मुसलमान समाज में जातिगत भेदभाव कितना है और हिन्दी के लेखकों के साहित्य में वह किस तरह से आया है। राही मासूम रज़ा, बदीउज्जमा, शानी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, असग़र वजाहत आदि लेखकों के साहित्य के हवालों से यह दिखाने का प्रयास किया है कि उनके साहित्य में यह भेदभाव किस तरह से आया है। बहुत ही अच्छा लेख है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

    ============================================

    राही मासूम रज़ा भारतीय साहित्य में जाना पहचाना नाम है। धारावाहिक ’महाभारत’ की पटकथा लिखकर शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचने वाले राही मासूम रज़ा बेहतरीन उर्दू शायर और उपन्यासकार के अलावा गीतकार भी थे। उनका टीवी धारावाहिक ’नीम का पेड़’ भी काफी मशहूर हुआ। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की। राही मासूम रजा के चर्चित नॉवेल ’आधा गांव’ ने भी खूब लोकप्रियता हासिल की जिसे हिंदी के दस सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शुमार किया जाता है। ’कटरा बी आर्ज़ू’ और ’टोपी शुक्ला’ भी उनकी विख्यात कृतियां हैं। उनकी करीब दर्जन भर किताबें हैं जिनमें कई बेस्ट सेलर जैसी हैं। बॉलीवुड में भी वह कम समय में ही प्रसिद्ध हो गए, 1975 में आई फिल्म ’मिली’ से उन्होंने अपना फिल्मी कॉरियर शुरु किया और ’मैं तुलसी तेरे आंगन की’ के डायलॉग पर उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड से नवाज़ा गया, उसके बाद ’तवायफ’ तथा ’लम्हे’ के डायलॉग्स के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड मिला। ’गोलमाल’, ’कर्ज़’ और ’डिस्को डांसर’ जैसी ब्लाक बस्टर फिल्मों में भी उन्होंने संवाद लिखे।

         राही मासूम रज़ा का सबसे ज्यादा मशहूर और बेस्ट सेलर नॉवेल ’आधा गांव’ है, इसका पहला पेपरबैक संस्करण 1984 में प्रकाशित हुआ था, अब तक इसके अब तक 27 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसे भारत विभाजन के पसमंज़र में लिखा गया नॉवेल माना जाता है, बंटवारे के दर्द और विभाजन की बुनियाद को बयान करता हुआ नॉवले कहा और माना गया। इसी आधार पर प्राख्यात आलोचक नामवर सिंह ने इसे जोधपुर विश्वविद्यालय के एमए के पाठयक्रम में शामिल करवा दिया जब वह वहां प्रोफेसर थे। नतीजे के तौर पर नामवर सिंह और आधा गांव, दोनों ही जोधपुर से निकाल दिए गए। प्रोफेसर नामवर सिंह के अलावा भी हिंदी के कई आलोचकों ने मुल्क के बंटवारे के पसमंजर में लिखे इस नॉवेल को बेहतरीन नॉवेल बताया है।

    लेकिन ’आधा गांव’ भारत विभाजन का ही नहीं, यह भारतीय मुस्लिम समाज, विशेषरूप से उत्तर भारत के मुस्लिम समाज में ज़ात पात के विभाजन का भी पहला प्रमाणिक और साहित्यिक दस्तावेज है। राही मासूम रज़ा ने इसमें गाजीपुर के ग्रामीण और शहरी परिवेश में मुस्लिम समाज में ज़ात बिरादरी, ऊंच नीच और भेदभाव की सच्चाई को बड़े सलीके से अपनी शानदार शैली में लिख दिया है। मुसलमानों के दरमियान सैय्यद, पठान और शेख़ जातियों की आक्रमकता, पूरे मुस्लिम समाज पर उनकी दादागीरी और जो सैय्यद, शेख़ या पठान नहीं हैं, उनके साथ कैसा घटिया सुलूक करते हैं सैय्यद लोग, इसे बेहद बोल्ड अंदाज़ में बयान किया है। राही मासूम रज़ा ने इस नॉवेल में सय्यदों के मुंह से गैर सय्यद मुसलमानों, कथित तौर से कमतर ज़ात वालों को मॉं बहन की भददी भददी गंदी गालियां दिलवाई हैं, और उन गालियों को जस का तस लिख भी दिया है। ’आधा गांव’ में करीब नब्बे बार शब्द ’सय्यद’, ’सय्यदज़ादा’, ’सैदानी’ वग़ैरह का जिक्र मिलता है और 65 से अधिक बार मां बहन की गालियां इन सय्यदज़ादों से राही मासूम रज़ा ने जुलाहों को विशेष रूप से दिलावाई हैं। जुलाहों के अलावा और दूसरी वह बिरादरियां जो सैय्यद, पठान या शेख़ नहीं हैं, उनके किरदारों से भी इसमें सैय्यद लोग बिना मां बहन किए बात नहीं करते या मुखातिब नहीं हो रहे हैं।

    ’’मगर ये जुलाहे’’

    ’’इनके लिए तो मौलाना आज़ाद सुब्हानी और मौलाना अब्दुल बाकी कल ही आ रहे हैं। मैं जुलाहों और बिहारियों से बातें नहीं कर सकता। दोनों साले मादरज़ाद चूतिये होते हैं।’’ (पृष्ठ-252)

    आधा गांव की इस तरह की और भी मिसालें दी जा सकती हैं। राही ने यह सबसे शरीफाना लहजे में गरियाया है, बाकी तो जो उन्होंने लिखा है, वह यहां नहीं लिखा जा सकता। राही लिख सकते थे, उन्होंने लिख दिया। हम यहां नहीं लिख सकते।

    ’’रकियाने वाले अम्मू से किसी मुकदमे के बारे में बातचीत कर रहे थे। ये लोग इतने दौलतमंद हैं कि जब चाहें, खड़े खड़े पूरे गांव को खरीद लें लेकिन ये कपड़े वाली कुर्सी पर नहीं बैठ सकते थे। इन लोगों के लिए लकड़ी या टीन की कुर्सियां रखी जाती थीं।’’ (पृष्ठ-51)

    राही मासूम रज़ा, यूपी के पूरब में गाजीपुर के एक शिया सैय्यद घराने में पैदा हुए। मुसलमानों में सैय्यद के घर पैदा होना बड़े गर्व की बात मानी जाती है। उनके अंदर सैय्यद होने का दंभ उसी तरह मौजूद था जैसा किसी जातिवादी व्यक्ति के अंदर होता है। शिया मुसलमानों के मौलाना काला साफा या पगड़ी बांधने और काला अमामा पहनने के लिए अधिकृत हैं और जो मौलाना या मुज्तहिद सय्यद नहीं है, वह काली पगड़ी, साफा या अमामा पहनने के लिए अधिकृत नहीं है, वह सफेद पगड़ी साफा बांधता है, यह मज़हबी भेदभाव पूरे शिया समाज में बाकायदा स्वीकार्य है। किसी भी शिया मुसलमानों की महफिल में रंगों से यह भेदभाव देखा जा सकता है। सैय्यद राही मासूम रज़ा की परवरिश इसी माहौल में हुई। उन्हें न जाने किस अदा के कारण प्रगतिशील कहा गया, जबकि वह घोर सामंतवादी व्यक्ति थे और खालिस मज़हबी सोच रखते थे। इसीलिए उन्हें वह ज़ात पात दिख रही थी जिसके वह स्वयं अभ्यस्त थे।

    सय्यद राही मासूम रज़ा गालियों को लिखे बिना भी नॉवेल मुकम्मल कर सकते थे। नॉवले में कई जगह गालियां गैर ज़रूरी महसूस हो रही हैं। वह चाहते तो उनके पास वह शैली, भाषा और बयान करने का लहजा और अंदाज़ था कि बिना गालियां लिखे भी गालियों का स्वाद पैदा कर सकते थे और पढ़ने वाला वही मज़ा ले सकता था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

    ’’वाजिद मियां लौंडों को फर्राटे से मां बहन की कई कई गालियां और एक एक हिस्सा तक़सीम कर रहे थे।’ (पृष्ठ-131)

    ’’उन्होंने मुसलमानों को बड़ी गालियां दीं।’ (पृष्ठ-173)

    ’’ठाकुर पृथ्वीपाल सिंह जब रजिया के मरने की खबर सुनकर गंगौली लपके तो उन्होंने वाजिद मियां की गालियां की आवाज़ सुनी।’’ (पृष्ठ-166)

    इससे साफ हो जाता है कि बिना गालियां लिखे नॉवेल मुकम्मल किया जा सकता था। फिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि उन्होंने गालियों का जस का तस लिख दिया। उनसे पहले शायद किसी और लेखक ने मां बहन की इतनी गंदी, भददी गालियां को अपने लेखन का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाया था। सय्यद राही मासूम रज़ा ने ही गालियां का चलन शुरु किया और अगर गालियां लिखना उनकी शैली का अनिवार्य हिस्सा था तो ’आधा गांव’ के अलावा उन्होंने अपने किसी और नॉवले में गालियां क्यों नहीं लिखीं। यानी कि आंधा गांव के बहाने जुलाहों और पिछड़ी जातियों को गालियां दी जानी थीं, तो दी गइंर्, क्योंकि यह वह तबका था जो पाकिस्तान का विरोधी था और वहां जाना नहीं चाहता था, और गया भी नहीं। सैय्यद, पठान और शेख़ गए, और यह वही लोग हैं जो जुलाहों, राकियां और अन्य गैर सैय्यदों को गरिया रहे हैं।

    सैय्यद राही मासूम रज़ा को बुनकर बिरादरी के जुलाहों से कितना बैर था इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने पृष्ठ-99 पर शायद पहली बार किसी जुलाहे का नाम लिखा है, अली हुसैन, क्योंकि नमाज़ का मामला था, वर्ना पूरे नॉवेल में उन्होंने किसी भी जुलाहा बिरादरी के किसी भी पात्र के लिए सिर्फ ’जुलाहा’ लिखने से ही काम चलाया है। राही मासूम रज़ा को अपने सय्यद होने का जबर्दस्त अहसास और उसका अभिमान उन्हें पिछड़े तबके के लोगों को गालियां लिखने पर मजबूर कर गया। किसी ब्राम्हण को भी उन्होंने गालियों से नहीं नवाज़ा क्योंकि वह भी ऊंची जाति वाले थे। अगर गालियां लिख ही रहे थे तो वह किसी ठाकुर को गालियां लिखने की बहादुरी दिखाते, लेकिन इतनी हिम्मत वह नहीं दिखा पाए। ठाकुर चूंकि ऊंची जाति वाले थे, और वह तो ठाकुर ठहरे….! उनके लिए कैसे लिख सकते थे। ठाकुरों के लिए उन्होंने मात्र एक पृष्ठ-83 पर 10 बार शब्द ’’ठाकुर साहब’’ लिखा है। यानी वह ठाकुर को ठाकुर नहीं ’ठाकुर साहब’ लिख रहे हैं।

    सय्यद राही मासूम रज़ा ने बीस से ज्यादा फिल्मों और टीवी सीरियल्स के स्क्रिप्ट और डॉयलाग्स लिखे, लेकिन इनमें से किसी में वह गालियां लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। जबकि उनकी लिखी कई फिल्में और सीरियल ऐसे थे जिनमें गालियों की गुंजाइश मौजूद थी। राही मासूम रज़ा को अपने सय्यद होने के अहंकार ने हिंदुस्तान की तमाम दबी कुचली अवाम की निगाहों में गिरा दिया, उनके इस क़दर गैर बराबरी भरे रवैय्ये ने उनका क़द छोटा कर दिया क्योंकि उन्होंने मुसलमानों की एक खास बिरादरी को टार्गेट किया, उसको ज़लील करने की नियत से उस बिरादरी के लोगों को गालियां लिख लिख कर उनका मज़ाक उड़ाया और उनकी औरतों के किरदार पर भी उंगली उठाई।

    सय्यद राही मासूम रज़ा का नॉवेल ’आधा गांव’ का पहला पेपर बैक एडीशन सन 1984 में प्रकाशित हुआ। बदीउज्ज़मा का नॉवेल ’छाको की वापसी’ उसके एक साल बाद 1985 में ही आया। जिस दौर में आधा गांव लिखा जा रहा था, लगभग उसी कालखंड में गंगौली, ग़ाजी़पुर से करीब 200 किलोमीटर पूरब में बिहार के जिला गया में ’छाको की वापसी’ लिखा जा रहा था, इस नॉवेल में आधा गांव से ज्यादा बेहतर तरीके और सलीके से मुल्क के बंटवारे के दर्द का मंजरनामा मौजूद है और जम कर ज़ात पात का किस्सा भी बयान किया गया है। इसमें भी सय्यद होने की ठसक मौजूद है और इस ठसके की वजह भी बयान की गई है लेकिन बिना किसी का दिल दुखाए हुए।

    ’’हम नहीं खेलते तुमरे साथ। तुम असराफ हो तो अपने घर के। हम कमीन हैं तो अपने घर के। नहीं खेलते तुमरे साथ।’’ (पृष्ठ-45)

    ’’हमारा खानदान सय्यदों का था। मुहल्ले में दो चार घर ही तो सय्यदों के थे। बाकी लोग तो जुलाहे, कसाई या दर्जी थे। इनकी गिनती शरीफों में कहां होती थी, यह कमीन और नीची ज़ात के लोग माने जाते थे।’’ (पृष्ठ-38)

    ’’खून और ज़ात बेबुनियाद चीज़ें नहीं हैं। जानवरों तक की नस्ल देखी जाती है। इंसान क्या जानवरों से भी गया गुज़रा है। जब जानवरों की कद्र भी उसकी नस्ल के लिहाज़ से की जाती है तो इंसान की नस्ल को अहमियत देना किस तरह गलत हो सकता है। जुलाहे जुलाहे ही रहेंगे और सय्यद सय्यद ही रहेंगे।’’ (पृष्ठ-38, 39)

    बदीउज़्ज़मा का पूरा नाम सय्यद मोहम्मद ख्वाजा बदीउज़्ज़मां है। उन्होंने राही मासूम रज़ा की तरह किसी जाति विशेष को निशाना बनाकर गालियां नहीं लिखी हैं। नॉवेल में जहां जरूरत थी, वहीं गालियां हैं, वह भी रोजमर्रा की ज़बान में अक्सर बातों बातों में अदा हो जाने वाली, गंदी वाली मां बहन की तो कतई नहीं।

    ’’ई सरवा बौरा गेलई है। अप्पन दुकान छोड़ दूसर दुकनवा में काम करे के चाह हइ बच्चोद…जा सार अपनी मैया के फलान में। हम कुछ न बोलबई सरवा के मामले में।’’ (पृष्ठ-65)

    बदीउज़्ज़मा के नॉवेल ’छाको की वापसी’ में आधा गांव से ज्यादा पाकिस्तान है, वहां का लालच है। पाकिस्तान पलायन कर जाने वाले हिंदुस्तानी मुसलमानों की खुशहाली और बदहाली का वहां से आने वाले खतों के ज़रिये जिक्र मौजूद है। ढाका में बंगाली मुसलमानों और गैर बंगाली मुसलमानों की दुश्मनी और दंगों का बयान बखूबी लिखा है। बंगाली मुसलमानों को पाकिस्तानी कितनी गिरी निगाह से देखते थे, उन्हें मुसलमान ही नहीं मानते थे…वगैरह वगैरह। मुस्लिम लीग पर कांग्रेस के हमले और गांधी भी, यह सब बड़े दिलचस्प ढंग से बयान किया गया है। मोहर्रम भी आधा गांव से ज्यादा छाको की वापसी में मिलता है। हिंदी में आधा गांव के 27 एडीशन छप और बिक चुके हैं और ’छाको की वापसी’ के सिर्फ तीन।

    बनारस के बुनकरों के शोषण के भयानक दर्द को दिलेरी से बयान करता हुआ अब्दुल बिसमिल्लाह का नॉवेल ’’झीनी झीनी बीनी चदरिया’’ 1987 में प्रकाशित हुआ और अब तक इसके 11 संस्करण बिक चुके हैं। इस नॉवेल में बनारस के बुनकरों के मोहल्ले हैं और उसमें रहने वाले लोग हैं, जो जैसी ज़बान बोलते हैं, वैसी ही नॉवेल में मौजूद है। हाजी रशीद नहीं ’हाजी रसीद’ और अस्सलामो अलैकुम नहीं, ’सलांवाले कुम’ गालियां भी मौके के हिसाब से मौजूद हैं, संवाद में पेवस्त हुई सी और उसी तरह की अदायगी करती हुईं। कहीं पर भी ऐसा नहीं मालूम होता है कि उन्हें नॉवेल में जान बूझकर पिरोया गया है। खूब मां बहन है इसमें आधा गांव की तरह लेकिन वह आपस की बातचीत के अंदाज़ में, कोई किसी एक फिरके या बिरादरी को नहीं बल्कि जो जैसे गालियां बक रहा है, वह बक रहा है। पूरब की भोजपुरी संस्कृति और उनके कल्चर के हिसाब से गालियां नॉवेल में जस की तस लिखी हुई हैं। इस नॉवेल को लिखने के लिए अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कई साल उसी इलाके में गुज़ारे। बुनकरों के हालात, सरकारी सुविधाएं, उनके बीच की सियासत, कर्ज और उसकी तरह तरह से अदायगी, करघे, सूत, रेशम और रंग…और रंग भरे अरमान, उनके बीच पाखंड, पैसे वालों और ग़रीबी के मारों के बीच भेदभाव और उनके भविष्य के ख़्वाब…सब कुछ नॉवेल में मौजूद है।

    ’’मतीन चाहता है कि इकबाल उसकी तरह करघे का कारीगर न बने। वह उसे जुलाहा नहीं बनाना चाहता। उसका यकीन है कि जुलाहा बनकर कोई तरक्की नहीं कर सकता। अरे बहुत होगा वह ’अंसारी’ हो जाएगा, और क्या। लेकिन बनारस का अंसारी होना भी जुलाहा होने से ज्यादा बड़ी चीज़ नहीं है, इसलिए वह चाहता है कि इकबाल पढ़ लिखकर बाबू बने। बाबू यानी क्लर्क नहीं, बल्कि अफसर।’’ (पृष्ठ-55)

    इस नॉवेल में भी पाकिस्तान, बंटवारा और मोहर्रम है, इसमें भी साम्प्रदायिकता है और इसमें भी वह सब मौजूद है जो ’आधा गांव’ और ’छाको की वापसी’ में है, लेकिन इसमें किसी जाति या बिरादरी को ज़लील करने की नीयत नज़र नहीं आती। अब्दुल बिस्मिल्लाह का एक और मशहूर नॉवेल है ’मुखड़ा क्या देखे’ यह भी मुसलमानों के दरमियान तरह तरह की कशमकश और मुल्क के बंटवारे के दर्द के साथ ही हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज में ज़ात पात की सच्चाइयों को आइना दिखा रहा है।

    ’’साहबो, हम देख रहे हैं कि यहां कल्लू भी हमारे साथ बैठा हुआ है। उसी टाट पर, जहां हम बैठे हुए हैं। हम कल्लू के साथ बैठकर खाना नहीं खा सकते।’’ (पृष्ठ-113)

    ’’क्या आप लोगों को पता नहीं है कि कल्लू चुड़िहार ने रहमान बेहना की लड़की को रख लिया है, एक चुड़िहार बेहना की लड़की को बीबी बनाए, क्या यह बर्दास करने की बात है। कल्लू ने पूरे मुड़वारा टाट की तौहीनी की है।’’ (पृष्ठ-114)

    ’’सबूत ! हम देंगे सबूत, बोलो कैसा सबूत चाहते हो।’’ शब्बीर दूनी आवाज़ से चीखा, ’’रहमान बेहना, उसका बाप सुलेमान बेहना, उसकी औलाद बेहना…।’’ (पृष्ठ-114)

    बाहर नीम के नीचे चुड़िहारों की एक मजलिस बैठी हुई थी, जिसमें एक पढ़े लिखे किस्म के नौजवान चुड़िहार के इस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी कि सभी चुड़िहारों को अपने नाम के आगे ’सिददीकी’ लिखना चाहिए। नौजवान बोल रहा था, ’’सिददीकी का मतलब है हज़रत सिददीक रज़ीअल्लाहो ताला की नस्ल वाले। हज़रत सिददीक रजिअल्लाह ताला वो पहले शख्स हैं जिन्होंने इस्लाम कुबूल किया था। हज़रत सिददीक़ चुड़िहार थे या नहीं, यह तो नहीं मालूम पर जैसे वे सच्चे इंसान थे वैसे ही चुड़िहार भी हैं। अपना काम सिदके दिल से करते हैं। इसीलिए उन्हें सिददीकी लिखना चाहिए।’’ (पृष्ठ-115)

    गुलशेर खां ’शानी’ हिन्दी के जाने माने फिक्शन राइटर हैं। उनके नॉवेल ’काला जल’ ने बेपनाह शोहरत हासिल की। इस पर टीवी सीरियल भी बना और इस नॉवेल का पहला पेपरबैक एडीशन 1985 में आया। अब तक इसके नौ एडीशन प्रकाशित हो चुके हैं। इसमें मध्य प्रदेश के एक छोटे शहर के मुस्लिम समाज की दास्तान है। एक मुसलमान दरोग़ा मिर्ज़ा को एक दलित औरत से मोहब्ब्त हो जाती है, नौकरी छोड़ कर वह शादी कर लेते हैं लेकिन फिर भी मुस्लिम समाज उनको स्वीकार नहीं करता। इधर उधर मेलों ठेलों में जाकर मिर्जा चूड़ियां बेचने लगते हैं। मौलवी लोग किसी न किसी बहाने उन्हें समझा बुझा कर एक मुस्लिम औरत से उनका निकाह कराकर ही मानते हैं। नतीजे के तौर पर उनकी जिंदगी तबाह बर्बाद हो जाती है। इसमें भी ज़ात पात के ताने बाने को बेहद उम्दा ढंग से इशारों में दिखाया गया है। शानी ने इस मामले में एहतियात बरती है, खुलकर नहीं लिखा है लेकिन सब कुछ कह दिया है।

    ’’तो भी क्या होता, अली अमीर न सही, अकबर फकीर की बेटी सही, रोशन कुआंरा तो न रह जाता।’’ (पृष्ठ-74)

    इस नॉवेल में भी मोमिनों की बस्ती मोमिनपुरा का जिक्र है जो यूपी की ओर से आए जुलाहों ने बस्तर में बसाई है। इस बस्ती के मोहर्रम को शानी ने बड़े खूबसूरत तरीके से बयान किया है। पाकिस्तान और बंटवारे का दर्द इसमें भी समाया हुआ है। लेकिन इसमें किसी एक जाति के मुसलमानों को टार्गेट नहीं किया गया है। समाज के किसी एक वर्ग को धुरी बनाकर नहीं लिखा गया है।

    इसी तरह की और भी मिसालें हैं, लेकिन हमने यहां पर सिर्फ उन साहित्यकारों के हवाले और संदर्भ दिए हैं जो मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखते हैं। मामला सिर्फ सय्यद राही मासूम रज़ा तक सीमित नहीं है, यहां तो पूरा का पूरा मुस्लिम लेखक, बुद्धिजीवी और कलाकार…सभी जाति के मारे हैं और ये लोग भी मौलवियों की तरह लगातार प्रचारित करते रहते हैं कि मुसलमानां में सब बराबर हैं, यहां कोई जात पात नहीं है। यही इनका सबसे बड़ा झूठ और दुष्प्रचार है और सबसे बड़ा फरेब है।

    सच्चाई यह है कि बज़ाहिर एक दिखने वाला, एक ही सफ या लाइन में बिना भेदभाव के मस्जिद में नमाज़ अदा करने वाला हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज, दरहकी़क़त दो बड़े हिस्सों ’अशराफ’ और ’अजलाफ’ में बंटा हुआ है। अशराफ वह हैं जो नस्ली एतबार से ऊंची ज़ात के हां, जैसे सय्यद, जिनका शजरा हज़रत अली, इमाम हुसैन, हज़रत फातिमा वगै़रह के शजरे की किसी नस्ल से मिलता हो। वह सय्यद होने का दावा करते हैं। वंश के हिसाब से हज़रत फातमा और हजरत अली के बेटे हज़रत हसन और हज़रत हुसैन के खानदान की नस्ल के लोग सय्यद होते हैं। हज़रत फातमा अल्लाह के रसूल मोहम्मद साहब की बेटी थीं, और हज़रत अली उनके शौहर और चौथे खलीफा। हालांकि सय्यद के शाब्दिक अर्थ उर्दू की विभिन्न शब्दकोष में इस तरह लिखे हैं : सरदार, जो नेतृत्व करे। सय्यद के बाद ऊंची ज़ात में शेख़ और पठान का शुमार होता है। इनके अलावा जो भी हैं, वह सब अजलाफ हैं..।

    मुसलमानों में सय्यद के घर पैदा होना बड़े ही गर्व की बात समझी जाती है। अपने को बेहद खुश्किस्मत मानते हुए ऐसे लोग अपने नाम से पहले सय्यद लिखते हैं। ये लोग बात बात में अपने आपको ’सय्यदज़ादा’ या ’सय्यदानी’ बताने से नहीं चूकते। कोई ग़लती हो जाए तो ’…इज़्ज़ते सादात भी गई’ जैसे जुमले उर्दू की महफिलों में खूब बोले और उछाले जाते हैं। मीर तक़ी मीर के एक शेर के दूसरे मिसरे को मुहावरे की शक्ल हासिल हो गई। पहले यह देखें कि मीर कहना आखिर क्या चाह रहे थे :

              फिरते  हैं मीर ख़्वार कोई पूछता नहीं

              इस आशिकी में इज़्ज़ते सादात भी गई

    शायद यही कि सय्यद होने का जो गर्व था, जो सम्मान और प्रतिष्ठा थी और वंश या खानदान का जो ग़ुरूर था, वह इस आशिकी के चक्कर में टूट गया इसीलिए हम तिरस्कृत माने जा रहे हैं… ! हालांकि हमारे सर्वश्रेष्ठ होने में कोई शक नहीं है, तब भी हमें कांई पूछ नहीं रहा है। इस शेर का साहित्यिक विश्लेषण कहता है कि शेर में मीर तक़ी मीर, नहीं बल्कि ग़ज़ल का पारंपरिक आशिक़ है, यही पढ़ाया जा रहा है। महसूस यह होता है कि मीर तक़ी मीर ग़ज़ल के मक़ते में संकीर्णता का शायद अनजाने में ही शिकार हो गए और अपनी ऊंची जाति के घमंड का ख्वामख्वाह इज़हार कर बैठे। मीर तक़ी मीर जिन्हें उर्दू साहित्य में ’खुदाए सुखन’ की उपाधि मिली हुई है, वह अगर चाहते तो महज़ काफिया तब्दील कर देने से सय्यदों की इज़्ज़त बचाई जा सकती थी।

    आग से सय्यद के हाथ नहीं जल सकते जैसे मिथक आस्था की हद तक आज भी क़ायम हैं। मोहर्रम के दौरान शिया मुसलमानों के आग के मातम के परिप्रेक्ष्य में कहीं न कहीं इस मिथक को मुसलसल हर साल मज़बूती बख्शी जाती रही है। हिंदुस्तान समेत दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के तकरीबन तमाम हिस्सों में ’सय्यद’ एक जाति के तौर पर क़ायम है और इसे आम स्वीकृति भी हासिल है। साहित्यकार डाक्टर आफताब असग़र इतिहास के पन्नों को टटोलते हुए लिखते हैं, ’तुग़लक खानदान के बाद लोधी खानादान से पहले सादात (सय्यद का बहुवचन) खानदान भी गुज़रा है जिसके बादशाह, बादशाह होने के बावजूद ’सय्यद’ कहलाते थे। इस शाही खानदान का प्रमुख सय्यद खिज़र ख़ान बड़ी विनयशीलता के साथ अंत तक बादशाह कहलाने के बजाए मुग़ल बादशाहों के पुरखे, अमीरे तैमूर का ’मसनदे आली’ यानी नायब अल सलतनत या मुख्यमंत्री ही समझता रहा। शाहाने सादात के अलावा मुग़लों के आखिरी दौरे में ’सय्यद बिरादरान’ भी सय्यद ही तो थे। इन दो भाइयों में से एक प्रधानमंत्री था तो दूसरा सेनापति। कुख्यात मीर जाफर और मीर सादिक़ भी तो सय्यद ही थे, जिनमें मीर जाफर ने बंगाल के नावब सिराजुददौला को धोखा दिया और मीर सादिक ने टीपू सुलतान के साथ दग़ा किया।

    ’जिन लाहौर नईं देख्या वो जन्मई ना…’ जैसे मशहूर नाटक और दर्जनों किताबों के विख्यात लेखक असग़र वजाहत ने अपने वतन बाक़रगंज की यादों को ’बाक़रगंज के सय्यद’ नामी किताब में संजोया है। वह अपनी जड़े तलाशते करते करते इस किताब के पृष्ठ-43पर लिखते़ हैं,

    ’’ग़ालिबनः यही वे जै़नुलआब्दीन हैं जिनकी मुझे तलाश है, यहीं यह भी पता चलता है कि जमाने भर में बदनाम मीर जाफ़र सय्यद ज़ैनुलआब्दीन के रिश्ते के चचा थे।’ इसी किताब की शुरुआत में वह लिखते हैं कि सय्यद इकरामदुदीन अहमद शहनशाह हुमायूं की पलटन के साथ ईरान से आए और सय्यद ज़ैनुलआब्दीन उनकी पांचवी छठी पीढ़ी से थे।’ शायद नतीजे के तौर पर लिखते हैंः

    ’’…और इस तरह बाक़रगंज के सय्यदों में कहीं मीर जाफ़र का ख़ून शामिल है।’’ (पृष्ठ-68)

         असग़र वजाहत के इस साहस को सलाम, यह काम आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कर दिखाया। जैसा कि किताब के शीर्षक से ही प्रतीत हो जाता है, यह किताब उनके खानदान के लोगों को ईरानी मूल के असली सय्यद साबित करने की कामयाब कोशिश है और शायद अपनी सय्यद ज़ात को ग्लैमराइज़ करने के साथ ही सय्यद होने का जो अहंकार था, और जो ऊंची नस्ल का होने का रुतबा़ था वह भी इसमें साफ झलक ही रहा है। यह वह घमंड है जिससे उन्हें अपने घर खानदान को मीर जाफर से जोड़ने में कोई अफसोस नहीं दिखता, बस मकसद पूरा हो जाए कि वह लोग ईरानी मूल के सय्यद हैं। जाति के ज़हर की इससे उम्दा मिसाल शायद ही कहीं मिले।

    मशहूर पत्रकार और लेखक सईद नक़वी अपनी अंग्रेज़ी किताब ’बीइंर्ग द अदर’ के उर्दू संस्करण ’वतन में ग़ैर’ में लिखते हैं,

         ’’ब्राहमणों की तरह सादात भी आलिमे दीन होते थे और अपने ज्ञान के कारण आमतौर से प्रतिष्ठित थे’। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए वह लिखते हैं, ’मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर नूरुल हसन का इस बारे में एक नज़रिया यह भी था, ’चूंकि सय्यद लोग मोहम्मद साहब के खानदान की औलादों में से थे और वह मंगोलों के हाथों खुरासान और मध्य एशिया की बर्बादी के बाद हिंदुस्तान में शरणार्थियों की हैसियत से आए थे, लिहाज़ा मुग़ल बादशाह जहांगीर ने उन्हें ’लश्करे दुआ’ (दुआ करने के लिए बनाई गई फौज) का खिताब दिया और पालन पोषण के लिए जागीरें प्रदान कीं।’ (पृष्ठ-36)

    सईद नक़वी का यह बयानिया असग़र वजाहत के जाति के अभिमान का एक्सटेंशन ही महसूस होता है। सईद नक़वी अपनी इसी किताब में फरमाते हैं,

    ’’मुस्लिम समाज में यह ऊंच नीच उतनी ही ठोस है जितनी कि ज़ात पात पर आधारित हिंदू समाज में। फर्क सिर्फ इतना है कि जहां ब्राह्मणों ने वर्ण और जाति के नाम पर तबकों को बांट दिया है, वहीं मुस्लिम समाज में तबकाती ऊंच नीच ज़मींदारी सिस्टम का फल है। जब उन्नीसवीं सदी के आखिर में सर सय्यद अहमद खां ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की तर्ज पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बुनियाद रखी, उन्हें पूरा इतमीनान और यकीन था कि यह कैम्पस अशराफ के लिए है। अशराफ से नीचे अजलाफ या जुलाहा और अरज़ाल यानी अदना तबका था। रसूले खुदा हजरत मोहम्मद का खानदान ’’पंजतन पाक’’ या पांच पाक अफराद कहलाता है। इसका मतलब हज़रत मोहम्मद, उनके चचाज़ाद भाई और दामाद हज़रत अली, हज़रत मोहम्मद की बेटी और हज़रत अली की बीवी हज़रत फातमा, और उनके दोनों बेटे हसन और हुसैन। यही खानवादा फैल कर ’’अहले बैत’’ कहलाया यानी चौदह ’मासूमीन’ और बारह आइम्मा, इनमें सबसे पहले अली हैं। सय्यद लोग इस बात पर फख्र करते हैं कि वह अहले बैत के खानदान से हैं। मुसलमान ’तबका ए ख्वास’ (इलीट) के अंदर, जिसमें ज़मींदार, शेखों और पठानों जैसी ऊंची जातियां शामिल थीं, वहां सैय्यदों का सबसे ज्यादा असर था। मुस्लिम समाज में इन्हें वही दर्जा हासिल था जो ब्राह्मणों  को हिंदुओं में हासिल है।’’ (पृष्ठ-49)

    आम तौर पर माना जाता है कि हिंदुस्तान में मुसलामानों में ज़ात पात के खेल को हिंदुओं से ले लिया गया है। मनुस्मृति के आधार पर हिंदुओं की जातियों की तरह ही मुसलमानों ने अपनी जातियां बना ली हैं। सईद नकवी तो बाकायदा अपनी जाति की श्रेष्ठता को ब्राम्हणों के समकक्ष मान ही रहे हैं। लेकिन हकीकत दरअसल कुछ और भी है। भारत में मुसलमानों की हुकूमतों के कायम होने के बाद सियासी, समाजी और आर्थिक कारणों से जब यहां के लोगों ने इस्लाम कुबूल करना शुरु किया तो इसका असर हाकिमों पर उलटा हुआ। उनको महसूस हुआ कि इन देसी लोगों को अगर अपने बराबर मान लिया, इनसे बराबरी का सुलूक कर शासन सत्ता में शामिल कर लिया गया तो फिर इन्हें भी हुकूमत की चाशनी में हिस्सेदार बनाना पड़ेगा, जिसे बाद में यह अपना अधिकार मानने लगेंगे।

    हिंदुस्तान में मुसलमानों की जो भी हुकूमतें शुरुआत में कायम हुईं, उनमें तुर्क नस्ल के लोगों का दबदबा था जिन्हें यहां के लोगों के साथ कोई हमदर्दी नहीं थी। हुकूमत में बड़े ओहदों पर वही थे, सारे बड़े मनसब उन्हीं के पास थे। इसी भेदभाव का नतीजा था कि जब रज़िया सुलतान ने अपने श्याम अतालीक़ (उस्ताद) कुतुबुददीन याकूत को बड़ा ओहदा दिया तो शासन में बैठे इन तुर्कों ने न सिर्फ इसका जबर्दस्त विरोध किया बल्कि उसे सत्ता से ही बेदखल कर दिया। जबकि रज़िया का बाप भी तुर्क नस्ल का ही था लेकिन गुलाम फिरके से उसका सम्बंध रहा था।

    उस दौर के विख्यात इतिहासकार जियाउददीन बर्नी ने अपनी मशहूर किताब ’तारीख़ फिरोज़शाही’ में तुर्क मुस्लिम बादशाहों के ऐसे फैसलों और नस्ली नीति की खूब तारीफ की है। ऊंच नीच और ज़ात पात का खेल मुग़ल दौर में भी खूब जारी रहा। मुगलों के शासन की कमान ईरान और मध्य एशिया से आए हुए लोगों के हाथों में थी। मुगलों के यहां भी तुर्कों के अलावा सय्यदों को आला आहेदों पर बिराजमान होने का हक हासिल था। आईने अकबरी में बड़ी आसानी से बड़े और छोटे खानदानों के लोगों के लिए अलग अलग जुर्मानों की तफसील बयान की गई है। पूरा मुग़ल दौर मुसलानों में ज़ात पात की ऊंच नीच और भेदभाव में गुजरा और इस जातीय प्रबंधन को मजबूती ही प्रदान की गई।                                                                                                                                                                                                                                                             इस्लामिक इतिहास के अमेरिकन विद्वान फिरास अल ख़तीब की मशहूर किताब ’लॉस्ट इस्लामिक हिस्ट्री, रिक्लेमिंग मुस्लिम सिविलाइज़ेशन ऑफ पास्ट’ के पेज नौ पर लिखा है ’’अरब में कुछ खानदानों के ग्रुप जो साथ साथ सफर करते थे, और सफर लंबा होता था, तो वह एक कबीले का रूप ले लेता था। इस तरह के कई कबीलों को मिलाकर एक बड़ा कबीला या फिरका बन जाता था, जिसका नेतृत्व करने वाले को ’शेख़’ कहते थे। यानी कि बात वही है जो सय्यद के साथ है, जो रहनुमाई करे, नेतृत्व करे, उसे शे़ख कहा जाएगा। सय्यद की तर्ज पर शे़ख भी अपने यहां बाकायदा एक जाति है और मुस्लिम ज़ात बिरादरी के प्रचलित प्रबंधन में सय्यद के बाद शेख़ नंबर दो की हैसियत वाली ज़ात है। जो सय्यद, शेख़ और पठान नहीं है, ज़ात बिरादरी के इस सिस्टम में बेचारा है। वह किसी अरबी हडडी के हसब (वंश) से महरूम है, तो अजलाफ है। अजलाफ के शाब्दिक अर्थ उर्दू के शब्दकोशों में ’कमीना’ और ’नीच ज़ात का शख्स’ लिखा हुआ है, यानी एक तरह से ’मुस्लिम दलित’।

    हिंदुस्तान के मुसलमानों मे ज़ात पात का सिस्टम गहरा है और बड़े तगड़े ढंग से लागू किया गया है। कहीं कहीं तो यह हिंदुओं से भी ज्यादा असरदार लगता है। मज़हबी आस्था की बुनियाद पर विश्व स्तर पर मुसलमान शिया और सुन्नी दो हिस्सों में बंटे हैं। शिया मुसलमानों की कई शाखें हैं, मसलन ज़ैदिया, इस्माईलिया और सबाईया। ईरान, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, इराक़ और लेबनान में असना अशरी शिया ही हैं। सुन्नी मुसलमान आधिकारिक तौर पर हनफी, शाफई, हम्बली और मालिकी जैसे चार मसलकों में बंटे हुए हैं। नमाज़ पढ़ने के सभी के अलग अलग तौर तरीके़ हैं, जिंदगी और मौत के मज़हबी रस्मो रिवाज भी जुदा हैं और कुछ कुछ मज़हबी आस्थाएं भी। तकरीबन हर मसलक के अंदर अंदर दर्जनों की तादाद में फिरक़े बन गए हैं और मुसलसल बनते जा रहे हैं।

    हिंदुस्तान में सुन्नी मुसलमानों में सबसे मशहूर बरेलवी और देवबंदी फिरके हैं। सूफियों की राहें भी एक जैसी नहीं हैं। सूफी सुन्नियों में कादरी, नक्शबंदी, चिश्ती और सोहरावर्दी चार फिरके हैं, जिन्हें सूफियों के चार सिलसिले कहा जाता है। ईसाइयों की तर्ज़ पर मुसलमान मज़हबी मामलात में ज्यादा बंटे दिखते हैं। ईसाइयों में चर्च सिस्टम है। रोमन कैथोलिक, जैकोबाइन और मलंकारा आर्थोडाक्स सीरियन, ईस्ट ऑफ असीरियन जैसे चर्च पोप को मानते हैं। जबकि आर्थोडॉक्स, मैथोडिस्ट, एंग्लिकन और प्रोटेस्टेंट चर्च वाले ईसाई पोप को लगभग नहीं मानते। पोप को मानने और न मानने वालों के बीच शादियां न के बराबर होती हैं। अपने यहां भी तकरीबन ऐसा ही है। हिंदुस्तान समेत दक्षिण एशिया के समुद्री इलाकों में कुछ हम्बली भी हैं, बाकी यहां सभी हनफी सुन्नी मुसलमान हैं। कुछ अहले हदीस हैं तो कुछ क़ादियानी वग़ैरह। शिया मुसलमानों की एक शाख़ बोहरों की है, कुछ बोहरे सुन्नी भी पाए जाते हैं। आग़ा खानी शिया भी मुसलमानों की ऐसी ही एक शाख़ है। इनमें भी आपस में शादियां और रिश्ते न के बराबर ही होते हैं। मुसलमानों में ज़ात बिरादरी के ताने बाने पर दरअसल एक मोटा मज़हबी मुलम्मा चढ़ा हुआ है, जिसका खौफ जान बूझकर कम नहीं होने दिया जा रहा है।

    हैरत इस बात पर है कि सच्चाई के इज़हार का डंका पीटने वाले उर्दू साहित्यकारों ने अपने यहां ज़ात बिरादरी की बुनियाद पर होने वाले नाबराबारी भरे भेद भाव पर कलम नहीं उठाया। पुराने लोगों में अहमद नदीम क़ासमी के अलावा किसी ने यह हौसला नहीं दिखाया, हालांकि उन्होंने भी ज़मींदारी के सीमित दायरे के अंदर ज़ात के जंजाल का नक्शा पेश किया। अंजुमन तरक्की पसंद मुसन्नेफीन (प्रलेस) से से जुड़े लेखकों में रशीद जहां ने ’दुलारी’ में इस तरफ इशारा किया लेकिन आस पास की सच्चाई नहीं लिखी। इस्मत चुग़ताई ज़रूर निचले तबके और मध्य वर्ग की लड़कियों की बिपदा बयान करते करते वहां तक पहुंच गई थीं, ज़रा और हिम्मत दिखातीं तो ’गेंदा’ और ’जड़ें’ जैसी कहानियों को तबके के बजाए ज़ात के सच के और ज़्यादा करीब पहुंचा सकती थीं। मंटो ने इस तरफ मुड़ कर देखा तक नहीं।

    तरक्की पसंद तहरीक, जनवादी लेखक संघ जैसे अदबी संगठनों से जुड़े हुए ज्यादातर अदीब, शायर और कलमकार कथित रूप से ऊंची ज़ात के लोग थे। क़ाज़ी अब्दुस्सत्तार की बुनियादी पहचान ज़मींदारी खत्म होने के दर्द के बयानिया से ही जुड़ी हुई है, इस पर उन्होंने खूब आंसू बहाए, ’पीतल का घंटा’ और ’रज़्ज़ो बाजी’ जैसी बेहतरीन कहानियां लिखीं। बाद में ’दारा शिकोह’ और ’ग़ालिब’ जैसे नॉवेल भी लिखे, उन्हें भी पदमश्री हासिल हुआ…। उनकी तहरीरों में जागीरदारी की सत्ता की बूबास महसूस की जा सकती है। प्रोफेसर मोहम्मद हसन जनवादी लेखक संघ और प्रोफेसर कमर रईस तरक्की पसंद तहरीक के बेहद अहम लोग थे। इन दोनों संगठनों के जलसों में शायद ही कभी मुस्लिम समाज में ज़ात बिरादरी के सिस्टम से पैदा हुई किसी तहरीर पर बात हुई हो। प्रोफेसर मोहम्मद हसन मुरादाबाद के जागीरदार सय्यद घराने से ताल्लुक रखते थे तो कमर रईस शाहजहांपुर के रईस पठान खानदान से थे। इन दोनों के सैकड़ों शागिर्द हैं, किसी से भी इन लोगों ने उर्दू अदब में ज़ात पात पर लिखने या शोध के विषय नहीं दिए। दोनों ही ग़ज़ल, अफसाने, नॉवेल, इंशाइया, रिपोर्ताज वग़ैरह में मुस्लिम मआशरे की ज़ात पात और बिरादरियों के आपसी संघर्ष को नहीं देख पाए। पूरा का पूरा उर्दू अदब इलीट तबके का ही अदब महसूस होता है, उर्दू वाले अपने प्रेमचंद की परंपरा को भी कायम नहीं रख पाए।

    कुर्रतुलऐन हैदर ने अवध के ज़मींदार घरानों की तहज़ीब को मुस्लिम तहज़ीब और अदब बताया, वह उसी माहौल में पली बढ़ी थीं, बाक़ायदा इलीट थीं, उर्दू के पहले कथाकार की बेटी थीं। अंग्रेजी पत्रकारिता में जाने के बाद उनकी दुनिया कुछ खुली और उन्होंने दूसरे विषयों को भी अपना विषय बनाया। उन्हें ’पदमभूषण’ से भी नवाज़ा गया। उनके नॉवेल ’आखिरे शब के हमसफर’ पर ज्ञानपीठ मिलने के बाद हिंदी दैनिक ’नवभारत टाइम्स’ के परवेज़ अहमद ने उनका इंटरव्यू किया था, जो 22 जुलाई 1990 को ’रविवार्ता’ में प्रकाशित हुआ। उसमें उन्होंने खुद ही तसलीम किया है कि ’आम आदमी मेरा विषय कभी नहीं रहा’। उनके नॉवेल ’आग के दरिया’ से उन्हें बेपनाह शोहरत मिली और वह बड़ी साहित्यकार के तौर पर स्वीकार कर ली गईं। ’आग का दरिया’ में लिखती हैं,

    ’’कदीर और कमरुन, रामऔतार और रमदैया…गांव के किसान और इक्केवाले और पनवाड़ी और चिकन काढ़ते काढ़ते अंधे हो जाने वाले और…बाग़ों के कुंजड़े और पालकियों के कहार…’’। (पृष्ठ-355)

    आम आदमी भी उन्हें वही दिखे जो जागीरदारों के खिदमत गुज़ार थे। यह सब दरअसल सामंती सिस्टम के बैकग्राउंड के तौर पर ही उन्होंने लिखा। इस तबके के किसी शख्स को अपने फिक्शन का किरदार बनाने के लायक नहीं मान सकीं। उन पर क़लम उठाना उन्हें गवारा नहीं हुआ….हसब नसब ने उनका क़लम रोक लिया। कुर्रतुलऐन हैदर ने अपने अलावा जो कुछ देखा वह शायद ’’गुलफिशां’’ कोठी की ऊंची दीवारों तक ही सीमित हो गया। ’आग का दरिया’ में लिखती हैं,

    ’’सारे बावर्चियों के नाम हुसैनी, हुसैनबख्श या मदारबख्श होते हैं। सारे धोबी नत्थू कहलाते हैं, सब कोचवान गंगादीन हैं। सारी नौकरानियों के नाम बुलाकन, रसूलिया, हमीदन की मां और मंजुरिन्न्सां होते हैं और सारे बैरे ’अब्दुल’ कहलाते हैं’’। (पृष्ठ-192)

    उनका यह बयान व्यंग्य जैसा है और ऐसा महसूस हो रहा है कि वह लिखते वक्त वह कुछ कुछ खुश जैसी हो रही हैं। अगर कुर्रतुलऐन हैदर हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज की सच्चाई अपने फिक्शन में बयान करने का हौसला दिखातीं तो उनमें वह कला थी कि ज़ात पात की बुनियाद पर डीएच लारेंस के ’’लेडी चैटरलीज़ लवर’’ जैसा शाहकार लिख देतीं, वैसा नही तो शरत चंद्र चटोपाध्याय के ’देवदास’ की तरह का नॉवेल जरूर लिख सकती थीं।

    लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया। उर्दू साहित्य में कोई बड़ा नॉवेल या कोई अन्य कृति पिछली करीब एक शताब्दी में इसीलिए सामने नहीं आ पाई क्योंकि जिनके हाथों में कलम थी, वह लोग अशराफिया तबके के थे। मुस्लिम समाज से कटे हुए, सच्चाइयों से रूबरु होने का हौसला इसलिए नहीं किया क्योंकि उनके तबके के हितों पर आंच आ जाती। राही मासूम रज़ा ने इस मामले में सबसे पहले लिखा और मुस्लिम समाज की सच्चाई को सामने लाए, और जो सच्चाई सामने आई वह भयानक ज़ात बिरादरी वाली है। गालियों वाली है और गंदी गालियों वाली है।

    राही मासूम रजा इस नॉवेल को बीच में रोक कर दो पेज की भूमिका में लिखते हैं कि उन्होंने इसे लिखने के लिए ’पूरे गांव को नहीं चुना, बल्कि केवल गांव के उस टुकड़े को चुना, जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूं। कथाकार के लिए यह जरूरी है कि वह उन लोगों को अच्छी तरह जानता हो जिनकी कहानी वह सुना रहा है।’ (पृष्ठ-289)

    इसी भूमिका में वह आगे लिखते हैं :

    ’मैं उस नील के गोदाम का हूं जिसे गिलक्रिस्ट ने बनवाया था। मैं उस गढ़ई का हूं जिसने गंगा की तरह गंगौली को अपनी गोद में ले रखा है। मैं पांचवीं और आठवीं मोहर्रम का गश्त हूं। मैं करघों की उन आवाजों का हूं जो दिन रात चलते रहते हैं, कभी नहीं रुकते। मैं गया का अहीर, हरिया बढ़ई और कोमिला चमार का हूं।’ (पृष्ठ-290)

    इसे लेखक की ईमानदारी कहा जाए या चतुराई, फैसला राही की लेखन शैली खुद कर रही है। ’टोपी शुक्ला’ की भूमिका में लिखते हैंः ’आधा गांव में बेशुमार गालियां थीं। मौलाना ’टोपी शुक्ला’ में एक भी गाली नहीं है। परंतु यह पूरा उपन्यास एक गंदी गाली है। और मैं यह गाली डंके की चोट पर बक रहा हूं। यह उपन्यास अश्लील है-जीवन की तरह।’ इसके बाद वह ’कटरा बी आर्जू’ की भूमिका में लिखते हैंः

    ’मनकि राही मासूम रज़ा पुत्र स्वर्गीय सैय्यद बशीर हसन आब्दी, एक़रार करता हूं कि यह एक झूठी कहानी है। इसके पात्र झूठे हैं, जगहों के नाम ग़लत हैं। घटनाएं गढ़ी हुई हैं। परंतु यह झूठ बोलने पर मैं शर्मिंदा नहीं हूं।’

    सैय्यद राही मासूम रज़ा की अपनी खुद की इस बयानबाज़ी को क्या समझा जाए, क्या गलत और क्या सही, किस पर विश्वास किया जाए, मुश्किल है। हां, इतना तो समझ आता है कि आधा गांव में जो उन्हांने लिखा है, वह गलत नहीं लगता है। इसीलिए क्योंकि उसमें मुस्लिम समाज का सच सामने आ गया है।

    —————–

     सेतु प्रकाशन से अगले माह जुलाई में प्रकाशित होने वाली पुस्तक, ’’तश्तरी’’ ’मुस्लिम समाज में जातिगत ऊंच नीच पर केंद्रित उर्दू कहानियां’ की भूमिका के अंशों पर आधारित लेख।

    ——————-

    संदर्भ ग्रंथ

    1-आधा गांव, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 25 वां संस्करण 2022

    2-टोपी शुक्ला, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 19वां संस्करण 2023

    3-कटरा बी आर्जू, राजकमल प्रकाशन, आठवां संस्करण, 2023

    4-हिंदुस्तान में ज़ात पात और मुसलमान, मसूद आलम फलाही, अल काजी, दिल्ली, 2020

    5-वतन में ग़ैर, सईद नक़वी, फारस मीडिया, दिल्ली, 2018

    6-बाकर गंज के सैय्यद, असग़र वजाहत, राजपाल, दिल्ली, 2015

    7-आग का दरिया, उर्दू किताब घर, दिल्ली

    8-तारीख फिरोज़शाही, कुतुबखाना रज़ा, रामपुर

    9-छाको की वापसी, राजकमल, दिल्ली, तीसरा संस्करण, 2024

    10-झीनी झीनी बीनी चदरिया, राजकमल, दिल्ली, 11वां संस्करण 2023

    11-काला जल, शानी, राजकमल, दिल्ली, नवां संस्करण, 2023

    12-मुखड़ा क्या देखे, अब्दुल बिस्मिल्लाह, राजकमल, दिल्ली, तीसरा संस्करण 2023

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins
    WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify FH Mega Menu – jQuery Bootstrap 3 Mega Menu Plugin Fivo Docs – WordPress Documents and Attachments Manager Block Quote addon for elementor WooCommerce Advanced CAPTCHA – Google Cloudflare hCaptcha WP BioLink – Bio Links Page Builder for WordPress Ninja Widget Extra Add-on Portfolio Manager Pro – WordPress Responsive Portfolio & Gallery RSS Transmute – Copy, Translate, Spin, Merge RSS Feeds Animation CSS3 Effects WordPress Plugin NewsPilot – Automatic News Aggregator & Script