पंजाबी भाषा के कवि गुरिंदर सिंह कलसी की कविताएँ

आज पढ़िए पंजाबी भाषा के कवि गुरिंदर सिंह कलसी की कविताएँ। अनुवाद किया है सुधीर कुमार ने- मॉडरेटर
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हम ही सिखाते हैं
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हम ही सिखाते हैं उसको
कि तुम हो कमज़ोर
कि ये तेरा घर नहीं
तेरा घर है कोई और

हम ही सिखाते हैं उसको
कि नमित होकर रहना
सब-कुछ सह जाना
बस चुपचाप ही रहना

हम ही सिखाते हैं उसको
कि नज़र कैसे झुकानी है
पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज़ुल्म सहने की
आदत कैसे बनानी है

हम ही सिखाते हैं उसको
कि रोज़मर्रा ज़िंदगी में
मशीन कैसे बनना है
हर किसी को खुश रखना है
और आंसूओं को कैसे छिपाना है

हम ही सिखाते हैं उसको
कि गुलामी को कुर्बानी में
कैसे तब्दील करना है
भारी भरकम लफ़्ज़ों के नीचे
स्वयं को कैसे दफ़नाना है
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फर्नीचर
(चित्रकार अमृता शेरगिल की जीवनी पड़ते वक्त)
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बहुत बार
किसी से कोई रिश्ता
ऐसा होता है
जैसे आदमी का
घर पड़े हुए फर्नीचर के साथ

जब वो मौजूद होता है
तब नज़र अंदाज़ सा
बस इस्तेमाल होता है

जब वहां से हटा दिया जाता है
तब कुछ अहसास होता है
उसकी गैरमौजूदगी
परेशाँ करती है

हू-ब-हू
एक सहूलियत का रिश्ता

फर्नीचर को बेशक इस्तेमाल करो
या ना करो
उसको बुलाएं
या ना बुलाएं

ना उसको
कोई फ़र्क पड़ता है
ना हमें

फर्नीचर के आगे बेशक
निर्वस्त्र हो जाए आदमी

संवेदना की
कोई अगरबत्ती नहीं सुलगती
धोखे का कोई काक्रोच
इधर उधर नहीं दौड़ता।
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कवियों को क्या मालूम
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अभिभावकों ने
परवरिश कर,शिक्षित कर
स्वावलंबी बनाकर
रवाना कर दिए दूर प्रदेशों को
अब वो कहां हैं
अभिभावकों को क्या मालूम।

अध्यापकों ने
तेजस्वी बनाकर विधार्थी
रूखसत कर दिए संसार में
अब वो कहां हैं
अध्यापकों को क्या मालूम।

कवियों ने
निखार कर कविताएं
किताबों पत्रिकाओं में
प्रकाशित कर
सौंप दीं पाठकों को
अब वो कहां हैं
किन-किन हाथों में हैं
निंदकों या प्रशंसकों के पास
कहां कहां हैं पहुंची
कवियों को क्या मालूम।
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बाढ़ और कविता
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कविता की बाढ़!
तो कई दफ़ा आई
लेकिन कविता में ‘बाढ़’
पहली दफ़ा आई

तटस्थ ही रहा
ये बाढ़ शब्द
सचमुच पराया था
अपना नहीं था

कविता में पहाड़ कई बार
आए
मगर इस तरह के
भग्न हो जाने वाले
खंडित हो जाने वाले
हौसला पस्त होने वाले नहीं थे

कविता में नदियां
ऐसे नहीं थीं चीख़ती थी
अपने किनारे नहीं थी
त्यागती

कविता में मवेशी
दौड़ते कूदते फांदते
मिलते थे
इस तरह बाढ़ में विवश बहते
खूंटों से बंधे
मरे हुए नहीं थे

पक्षी खेतों में भी उतरते
दाना चुगते
सिर्फ़ मुंडेरों पर ही
भीगकर नहीं बैठते थे

कारें सड़कों पर दौड़ती
जश्न मनाती
पानी में ना डूबती
पहाड़ों से ना लुढ़कती थी

कविता में बहुत कुछ
घटित होता
किंतु इस तरह से
हरगिज़ नहीं

कविता में दोस्त मित्र
रिश्तेदार
अन्य कई अजनबी भी
आते थे
परंतु लाश बनकर नहीं।
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अतिसुंदर हाथ
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नीले, स्लेटी,सुरमई,
सुनहरे
किसी भी रंग के बादलों को
देखने से इंकार कर दिया

अपने ही भीतर सृजित कर लिया है
काले भूरे बादलों का एक संसार
एक अंधेर अंध गुबार
त्याग दिया रंगीन
वस्तुओं का संसार

वो चीर दें मेरी आंख को
खोल के उधेड़ दें
तेज़ तर्रार नश्तरों से
जोड़कर मशीनें डाल दें
उधड़ा हुआ पर्दा
ख़राब शीशा
वक्र दृष्टि को दुरुस्त कर दें
शिथिल कर दें रक्त-वाहिनियां
और सजा दें नई तस्वीरें
काले भूरे बादलों में रंग भर दें
नूतन दिलकश सदाक़त रंग

हरसू निस्तब्धता के उपरांत
जब मेरी आंख खुले
तब मैं देखना चाहता हूंँ
वो अचरज मेहनतकशी चेहरे
वो दुनिया के
अतिसुंदर हाथ
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मेरी तरह
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हर रोज़
इन्हें पानी देना
कभी भूलना मत

थोड़ी सी खाद
मैंने डाल दी है
थोड़ी सी आगामी सप्ताह
और डाल देना

तेज़ बारिश अगर आप जाए
गमलों को बरामदे में कर देना
कीड़ों को आज़ादी से
पत्तों के ऊपर घूमने फिरने देना

और हां
हर रोज़ सुबह
इन पौधों के साथ
प्यार से पेश आना
बिल्कुल ख़ाली समय में
इनसे बातें भी करना

ध्यान रखना कि
फूलों के चौबीस बीजों में से
कितने अंकुरित हुए हैं
हर रोज़ एक एक की
ख़बर रखना

देखना कि
हरी लताओं के
और कितने पत्ते निकले
जैसे मैं रोज़ गिनता हूँ
हिसाब रखता हूँ

तुम बेशक कितने ही
उदास क्यों ना हो
फूलों लताओं के पास
खुश होकर ही जाना

अगर वो उदास हो गए
तो मुझको भी
उदास ही समझना।
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ज़लील
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उन्होंने खाना मांगा
यथेष्ट एक मुलायम मेमना

बड़े से रेस्टोरेंट के
एक छोटे से वेटर की
छोटी सी आर्डर कापी में
दर्ज़ हो गया
वो तेजतर्रार मिमियाता
टांगें घसीटता हुआ

लोहे की तीखी छड़ों में छेदा गया
आग की लपटों पर घूमता
धीरे-धीरे भूना गया

अचार,सलाद,विभिन्न चटनियों से भरी
बड़ी सी ट्रे के दरम्यान
टांगों के ऊपर टिका गया वेटर उसे
मसालों,महकों में लिपटा
लकड़ी के किसी पुतले के मानिंद

अब आ गए वो बनकर मेहमान
कोट पैंट टाई वाले
सभ्य और पढ़े-लिखे शख़्स
जो बिजनेस की बातें करते हुए
इसको और ज़लील करेंगे
मिर्च मसालों की कमियां निकालेंगे
नैपकिनों से हाथ पौंछते हुए
सिझे-अनसिझे का बकवास करेंगे
और नोच नोचकर खा जाएंगे
गिद्धों की तरह।
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वेदना के रंग
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वेदना के रंगों से
किस तरह से
पेंट होता है चेहरा

तकलीफ़ की काली पैंसिल
किस तरह
उभारती है नक्श

दुःखों का ब्रश
किस तरह
भरता है रंग

उदास ऋतुओं की हवा
किस तरह सुखाती है
गीली तस्वीर को

आपके चेहरे को देखकर
आज खत्म हुए
मेरे सभी सवाल।
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पत्थरों पर नक्काशित फ़ूल

कहीं ना कहीं
अक्सर दिखते हैं
पत्थरों पर नक्काशित फ़ूल

धार्मिक स्थलों पर
स्तम्भों पर
दीवारों,चौगाठों पर
तैलीय पत्तों से
धूप की सुगंध फैलाते

अंधेरी गुफ़ाओं में
तिलमिलाते

दूर से लुभाते
कहीं सफेद संगमरमरी
कहीं रंगदार
अपने पास बुलाते

झूमती हवाओं से
ना झूमते
प्राकृतिक ऋतुओं से
ना खिलते
ना मुस्कुराते
ना मुरझाते

दौड़ी चली आती तितलियां
चोटिल हो जाती

अजनबी भँवरे
पुरजोशी से जब
जा भिड़ते
मौत के मुंह में
जा गिरते

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