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  • कथा-कहानी
  •    श्रीधर करुणानिधि की कहानी ‘एक जिग जैग मुहब्बत’

    कल यानी 28 अगस्त को ‘हंस’ का प्रतिष्ठित कथा सम्मान दो लेखकों की कहानियों को दिया गया। एक लेखक आलोक रंजन की कहानी आप लोग पढ़ चुके हैं। अब पढ़ते हैं दूसरे पुरस्कृत लेखक श्रीधर करुणानिधि की कहानी ‘’एक जिग जैग मोहब्बत’। यह कहानी ‘हंस’ के अगस्त 2024 के अंक में प्रकाशित हुई थी। श्रीधर करुणानिधि का एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा भी उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे पहले बिहार वित्त सेवा में असिस्टेंट कमिश्नर थे। फ़िलहाल बिहार के प्रतिष्ठित गया कॉलेज, गया में हिन्दी पढ़ाते हैं। आप उनकी कहानी पढ़िए। हंस से साभार – मॉडरेटर

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                          एक जिग जैग मुहब्बत

    (यह कहानी एक लड़के की है। सिर्फ उस एक लड़के की। बाकी के पात्रों को लड़के ने बस यूँ ही रखा है कि यह न लगे कि लड़का स्वार्थी और आत्ममुग्ध है। लड़के ने कहानी के पाठक को यह छूट दी है कि वे यह मान सकते हैं कि यह सिर्फ उस लड़के की कहानी नहीं है। सच तो यह है कि उसके वश में कुछ भी नहीं….)

    लड़के ने वाट्सऐप के स्टेटस की लाइन्स में यूँ ही कह लिख दिया कि ‘‘यह दुनिया नकली लोगों की है। यहाँ हर कोई बस खुद को दिखाना चाहता है। इस चक्कर में उसकी निगाह से दूसरे अक्सर छूट जाते हैं।’’ हालाँकि लड़के ने यह दावा नहीं किया कि ये पंक्तियाँ उसी की हैं। यह तथ्य बहुत बड़ा सत्य है कि सबको सिर्फ अपने बारे में सोचना चाहिए। लड़का भी शायद सिर्फ अपने बारे में सोच लेता लेकिन…..

    अक्सर लोग अपने जीवन का कैलकुलेशन कर लेते हैं। लेकिन जो सोचते हैं वैसा नहीं हो पाता। कुछ दूसरी ही चीज घटित हो जाती है। दरअसल इस लड़के की कहानी भी ऐसी ही थी। वह लड़का खूब हँसता था। खूब खेलता था। वह खुद से खूब प्यार करता था।

    लड़के को अपनी जिन्दगी बहुत प्यारी लगती थी।

    लड़की उसके साथ खुश रह सकती थी।

    लेकिन लड़की ने कहा कि उसे घूमना पसंद है। हाँ तो क्या दिक्कत है? खूब घूमो!……लड़की खिलखिला उठी….लड़का मुस्कुरा दिया….लड़की की ओर जी भर देखने लगा। लड़की की आँखें चमक उठीं।

    लड़की ने फिर भाँप कर कहा ‘‘उसे बहुत पसंद है दूर तक चलते चले जाना… बिना बताए ही, किसी के भी साथ।’’ ‘हाँ तो क्या दिक्कत है? चले जाओ’ लड़के ने सोचा…फिर कुछ देर चुप रहा।

    लड़की ने उसकी ओर देखा….चेहरे का पूरा भाव पढ़ा…..। (नोट-लड़के ने पढ़ा था कहीं कि लड़कियाँ भाव पढ़ने में निपुण होती हैं। उसका सिक्थ सेंस तगड़ा होता है। वह सामने वाले को भाँप लेती हैं…..आदि आदि)

    ‘‘तुम किसी के साथ जाने को लेकर गलत तो नहीं सोच रहे। छी! छी! तुम इतना गंदा कैसे सोच सकते हो?’’

    लड़का थोड़ा असहज हुआ लेकिन उसने खुद को संभाला ‘‘अरे नहीं नही! जाओ! मैं तो बस तुम्हें देख रहा था।’’

    हाँ तो लड़की ने फिर कहा घूमने की खातिर वह कुछ भी कर सकती है। कुछ भी का मतलब कुछ भी……..

    लड़के ने इस बार बिना देर किए कहा-‘‘हाँ हाँ, करो करो, कुछ भी करो, लेकिन घूमो। उड़ो उड़ो, चिड़िया की तरह उड़ो। तम्हारे पंख कभी न कतरे जाएँ। लड़कियों को बहुत भुगतना पड़ता है भई। उनके पंखों को आकाश मिलना ही चाहिए। जाओ, ऐश करो। अब तो लौंडों के जमाने लद गए हैं। लौंडे के इतिहास में बहुत ऐश लिखी थी। अब जब भी इतिहास लिखा जाएगा लड़कियों के ऐश का चैप्टर भी जोड़ा जाएगा।’’

    लड़का जब यह बोल कर मुड़ा तो उसे खुद पर विश्वास नहीं हुआ कि वह ऐसा बोल गया। लेकिन वह अब हल्का महसूस कर रहा था।

    जब जब वह लड़की घूमने निकलती तो लड़के का एक ही काम रह जाता कि वह उसे फोन करता रहे। कॉल नॉट रिचेबल होने की स्थिति में भी लड़का व्हाट्स ऐप, मैसेंजर पर भी कॉल ट्राई करता। जब वहाँ भी कॉल नहीं लगता तो लड़का लेट कर किताबें पढ़ने लगता। लेकिन पढ़ते वक्त उसे जाने क्यों लगता कि उसका फोन साइलेंट पर तो नहीं। कहीं वह लड़की उसका फोन न ट्राई कर रही हो! फिर वह हर दो-तीन मिनट में यह देख लेता कि कहीं कोई कॉल या मैसेज तो नहीं आया है! वक्त ऐसे ही निकलता रहा। लड़का ऐसे ही अपने मोबाइल को देखता रहा। लड़की ऐसे ही घूमती रही। लड़के ने समय के खालीपन पर ढेर सारी कविताएँ लिखीं….जिसे वह कहीं दिखा नहीं सकता था। लड़की को भी नहीं क्योंकि जब भी वह लड़की से कविता की बात करता तो वह कहती कवि-लेखक पसंद नहीं हैं उसे….ये एक नंबर के ठरकी होते हैं। तो! तो क्या उसका मुँह खुला रह जाता।

    दरअसल यह कहानी तब की है जब वह मैथ के मास्टर श्री गोपाल प्रसाद  सिन्हा से पिटते मैट्रिक फेल घोड़लद्दों को छोड़कर शहर आ गया था कुछ करने। बड़ा आदमी बनने। हाँ! तो क्या! शहर में कई बरस गुजर गए पर लड़की ने लड़के को कुछ नहीं कहा था। लड़की कहाँ थी यह लड़के को भी नहीं मालूम था। लड़की दरअसल कहीं छुपी हुई थी। वह उस लड़के को नहीं दिखती थी। वही क्या कोई भी लड़की उस लड़के को नहीं दिखती थी। जबकि लॉज से निकलते ही संकरी गलियों में, ऑटो में बगल में बैठे हुए ढेरों खूबसूरत लड़कियों से लड़के की मुलाकात होती थी लेकिन कोई भी उसे लड़की के रूप में दिखती नहीं थी। लड़का कॉलेज, कोचिंग, मिश्रा की पब्लिक सर्विस कमीशन की किताबों की दुकान में जेनेरल अवेयरनेस और करंट अफेयर की किताबें ढूंढ़ने में लगा था। मैथ टीचर गोपाल प्रसाद सिन्हा का यह प्रश्न बार बार लड़के के सामने आ जाता था, नींद में भी….‘‘बताओ चंदू घोड़ागाड़ी में जुते घोड़ों की दोनों आँखों के साइड में चमड़े की पट्टी क्यों बंधी होती है? तुम दोनों भी बताओ भोथाधिराजों!’’ नहीं…..? भक! भकचौन्हरों…इतना भी कॉमन सेंस नहीं है तुम लोगों को जी। क्या खाते हो तुम लोग रे! अरे घोड़ा को इसलिए आँख में करिया लपेटा जाता है कि इधर-उधर तुम लोगों की तरह चुकुर-भुकुर न करे, सीधा देखे और दौड़े धड़पट….समझे। विद्यार्थी का भी जीवन ऐसा ही होता है। सुन लो तुम लोग और बात का गाँठ बांध लो। इधर-उधर ताक-झांक नहीं करना कभी।’’

    स्कूल मास्टर गोपाल प्रसाद सिन्हा खौफनाक मैथ टीचर! सिर्फ चंदू से ही प्यार से बातें कर सकते थे। वर्ना…..मैथ के सवाल नहीं बनाने पर माणिकचंद और दुलारचंद को पीट-पीट के अधमरा कर देते और एक ऐसी गाली देते जो चंदू को हमेशा अतिशयोक्ति और असंभव जैसी बात लगती….‘‘.अरे! मणिकचंदवा….। रे भोथा…।.दिमाग बेच के खा गया है रे। आंय रे तोरी मइया के घोड़ा चोदो…, कैसा हरबिराड़ के तरह मुह बा देता है रे घोड़लद्दा…! देखो तो मेरे हाथ में कितना चोट लग गया है रे तोरा पीटने में…। देह का चमड़ी कितना मोटा बना रखा है रे मादर चोद!’’  वे पिनकते तो पिनकते ही जाते।

    ‘‘ तोरी मइया के……तुम्हरे मुँह से घोड़े की लीद जैसी दुर्गंध क्यों आती है रे? ….नीम के या चिड़चिड़ी के दातुन से काहे नै मुँह धोता है ?…..कितना समझाएँ तुमको? हमसे इ सब भी नहीं सीखता है। देखता नहीं है हम सुबह पाँच किलोमीटर टहलते हैं नहरिया पर और कभी भांट, कभी चिरचिरी और कभी नीम का दातुन तोड़ के दांत घसते हुए मिलते हैं।’’ वे स्पीड पकड़ लेते तो रुकने का नाम ही नहीं लेते। अब बेचारा मणिकचंद और दुलारचंद क्या बोले…हाँ सर हाँ सर अब धोएँगे सर…अबकी गलती नहीं होगा सर….खूब पढ़ेंगे सर…हिसाब बनाएँगे सर…..

    इतनी क्लेरिफिकेशन देने और चाटने के बाद भी माणिकचंद और दुरालचंद की देह दो घंटे बैसाख की घूप में सूखती रहती आलू के चिप्स या कलाई दाल की बड़ी की तरह…..| लेकिन शाम को मैदान में मिलो तो इन दोनों को जैसे कोई फर्क ही न पड़ा हो। ऐसा ही होना चाहिए आदमी….साला! कोई फर्क ही न पड़े….कुछ भी हो जाए। जीवन ऐसा क्यों हो कि छुईमुई के पौधे की तरह छूते ही मुरझा जाए? वह भी अपना जीवन ऐसा ही बना लेगा कि कुछ भी हो जाए फर्क ही नहीं पड़े। अब तक बहुत फर्क पड़ा चुका अपने जीवन में।

    लड़के ने प्रतियोगिता में सफल होने तक ताक-झांक नहीं की। नौकरी का बोझ और खुशफहमी एक साथ उठाए वह उस शहर से दूसरे शहर, दूसरे शहर से तीसरे शहर जाता रहा। आप पूछेंगे कि लड़के के गाँव के घोड़दद्दों का क्या हुआ? तो कहानी यह है कि लड़का एक लंबे अर्से के बाद जब बड़े अधिकारी जैसी फिलिंग लिए गाँव पहुँचा तब गाँव का हर आदमी उससे इतना ही सवाल करे कि ‘आउटी इनकम कितना होता है?’ ‘तब हो चंदू अब तो खाली नोट छापते होगे!’ अरे हमरे हरदुआ को भी कहीं रखवा दो। यहाँ दिन भर लफंगई करता फिरता है।’ लड़का सिर्फ टाल के निकल जाता। उसकी चिंता में उसके साथी दोनों घोड़दद्दे घूम रहे थे। जब वो एक के पास पहुँचा तो देखा कि एक टूटे फूटे उजड़े घर के आगे फटी गंजी और लुंगी में एक आदमी धान ओसा रहा है। धूल और गर्द से लिपटे आदमी ने ही गर्मजोशी से कहा ‘‘अरे! चंदू तू! आओ आओ…..ऐ बौआ! थ(ख)टिया लाओ रे….माय को बोलो चाह बनाने….|’’ दरअसल वह पोपला मुँह हो गया था। आधे दांत टूटे हुए थे 35-40 साल की उम्र में ही 60 साल का बुड्ढा दिख रहा था। 14-15 साल के किशोर को देखकर लड़का अवाक रह गया ‘‘इ कौन है?’’ ‘‘इसको नहीं पहचाने? हम भी मूरख ही हैं तुम कैसे पहचानोगे? बिटवा है दिलफा। ऐ दिलीफ परनाम करो’’ ‘‘इतना बड़ा हो गया? ‘‘इससे बड़ी एक बिटिया भी है जिसका पार साल ही ब्याह कर दिए। अभी ससुराल में है। देख रहे हो ब्याह के तिलक दहेज के कारण इ हाल हो गया। अबे तुम काहे नहीं ब्याह किए हो। तुमको तो एक से एक मिलती होगी। लाखों लाख देने वाला पाटी सब’’ आँगन के टाट के ओट से भौजाई खीं खीं कर हँस रही हैं। देवर जी हैं बड़े खपसूरत! ‘‘भक तेरी के। ’’ दूसरा नंबर का घोड़लद्दा उर्फ़ दुलारचंद इस दुनिया से निकल लिया था इसलिए उसके पास जाने की जरूरत नहीं थी उस लड़के को। ‘‘कैसे हुआ’’ “पता नहीं क्या हो गया था। धीरे-धीरे सरीर गल गया और एकदम ठठरी होकर गया। कुछ भी पता नहीं चला।….’’

    हर बार जब वह रास्तों से जा रहा होता तो उसके सामने एक मोड़ आ जाता और वहाँ पहुँच कर वह पूछता। बताओ किधर जाना है? आपको क्या लगता है कि मोड़ उसको बताता होगा कि इधर जाओ। उधर जाओगे तो मुश्किल में पड़ जाओगे। लड़के ने कभी जीवन को इस दृष्टि से देखा ही नहीं था। मोड़़ को तो खैर क्या पड़ी थी? वह क्यों बताता? उसने सिर्फ इतना बताया कि रास्ते चलने की खातिर ही बने होते हैं और मोड़ मुड़ने की खातिर ही। जिस मोड़ पर तुम दुविधा में खड़े हो उससे होकर पहले भी लोग गुजरे हैं।

    मोड़ नंबर-5 (एक चौराहे पर चार मोड़ पहले से हैं। इसलिए मोड़ नंबर 5 से ही शुरू होती है लड़के की जिंदगी। ऐसा ही लड़के का भी मानना है।)

     

    लड़का खुद से ही कहता था। इसलिए उसने खुद से ही कहा कि वह फिल्में खूब देखेगा यह जानते हुए कि फिल्मों की सच्चाई एक परछाई भर है। जैसे जिंदगी की परछाईं है कहानी। असली तो जिन्दगी है। असली तो भूख है…। असली तो रोटी है…। अपने बारे में क्या सोचना? जीवन कितना कुछ करने के लिए होता है। मकान बनवाना है। भाई-बहनों को पढ़ाना है। वह खुद से ही कहता इत्तेफाक होते हैं वह यह तो मान सकता है लेकिन यह नहीं मान सकता कि कोई कविता इत्तिफाकन लिखी जाती है…। कविता के मूल में कुछ न कुछ गहरे बैठा होता है। कुछ जमा होता है।

    एक जाड़े की दोपहर में वह खुशबू की तलाश में निकला था। एक जगह ऐसी थी जहाँ से सुगंध की एक लहर रोज सुबह सुबह आती। हवा के एक झोंके की तरह। उसके नथुने मादक गंध से भर जाते। उसे लगता कि या तो किसी फूल की है या किसी इत्र की। यह सुगंधी दरअसल बिस्कुट फैक्ट्री से आती थी जो एकदम पास ही थी, यह बात लड़के को बहुत बाद में पता चली। पर उस लड़के को वह किसी फूल की सुगंध लगती। वह जाड़े की सुबहों में छत पर गमले में खिले रंगबिरंगे डहेलिये के फूलों को देखता तो उसे विश्वास नहीं होता कि इतने खूबसूरत फूल में खुशबू नहीं होती है। उसके दिमाग में यह बैठा हुआ था कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि इतना खूबसूरत फूल और सुगंधी न हो! तो बात सिर्फ फूल की नहीं थी। बात लड़की की भी थी, जिसे देखकर एक तपे तपाए अनुभवी आदमी ने कहा था कि सुन्दर फूलों की फितरत की तरह सुन्दर लड़कियों की भी फितरत यही होती है।

    लड़की को कबूतर बहुत पसंद होते हैं। लड़का कबूतरों से प्यार करने की कोशिश करता है। लड़की को शहर बहुत पसंद होता है। शहर का मार्केट, मॉल और सिनेमा हॉल। इसलिए लड़का शहर को अपनी भटकने की जगह में शामिल कर लेता है। अब शहर उसकी आँखों में बसा रहता है…उसके मोहल्ले में फ्लावर  मिल की ऊँची-ऊँची जेल की तरह दीवारें रहती हैं। जिसपर सैकड़ों कबूतर शाम की धूप के साथ अपने पंख फड़फड़ाते हैं। दीवारें ऊँची हैं पर कबूतर भी फाँदते नहीं, उड़ते हैं बंधु।..दीवारें हमेशा फलांगने के लिए ही नहीं बनतीं हैं। कई बार उसके पीछे कैद भी हो जाना पड़ता है…। क्या अंतर होता है हर जगह तो ईंट की इमारतें ही होती हैं? नहीं। हर शहर का एक खास ढंग-ढब होता है…। वही उसके दिल-दिमाग में ‘एस्थेटिक-सेन्स’ की तरह बस जाता है…।

    दरअसल भटकते कदमों के कारण यह शहर उसके मन-मिजाज पर धीरे-धीरे छा गया। शहर बहुत खूबसूरत तो नहीं था लेकिन उसके कई स्पॉट थे….एक बड़ा सा रेलवे स्टेशन था.. एक रेलवे का ओवर ब्रिज था…एक रेलवे की बड़ी-सी कॉलोनी थी… जहाँ की बिजली कभी नहीं कटती थी… और यदा कदा कटती भी तो कुछ मिनटों में आ जाती थी…ओवर ब्रिज बहुत ऊँचा था। वहाँ पहुँच जाओ तो लगभग पूरा शहर दिखता था। वहीं बांई ओर रेलवे को पानी सप्लाई करने के लिए दो बड़ी-बड़ी टंकियां बनी थीं, एक बड़ा सा तालाब बना था..जिसके पास से गुजरने पर हहते हुए पानी की धुन सुनाई पड़ती थी…। पानी की धुन उस लड़के को बहुत पसंद थी….। हालांकि लड़की के नापंसदगी के बावजूद लड़़के ने अपनी इस पसंद को कायम रखा था।

    लड़का बहुत पहले जब कभी उस शहर जाता

    तो पहले के कोयले वाले काले इंजन की रेलगाड़ी में सवार होकर

    अपने गाँव के पास के एक छोटे से स्टेशन से।

    उस स्टेशन पर वह हवाओं वाले सघन पेड़ों की छाया वाली जगह में बैठ जाता। वहाँ एक पट्टीदार लोहे की बैंच थी…. एक नाश्ते की दुकान थी… एक चापाकल था। उस दिन वहीं दुकान पर, किसी की साइकिल में लद-फद कर वह लड़का अपने जेब में रखे कुछ पैसे लिए पहुँचा और हड़बड़ी में कुछ आधा-छिधा खाकर टिकट काउंटर पर गया। उसे लगा कि टिकट काटने वाला उसे बहुत गौर से देख रहा है। खैर उसने उसकी परवाह नहीं की और जल्दी-जल्दी ट्रेन में बैठ गया जो दरअसल एक गोरैया की तरह रुक रुक कर फुदकती और एक भैंसे की तरह डगरती हुई उस शहर की ओर जा रही थी…खुद में मस्त। वह ट्रेन में खिड़की के पास बैठ कर पूरी दुनिया देख लेना चाहता था। इंजन के धुएँ के साथ हवा के झकोरों से जले हुए कोयले के टुकड़े खिड़की से उसके पास पहुँच रहे थे। उसके कपड़ों पर पड़ रहे थे। एक दो कण उसकी आँखों में भी चले गए| उसने दूसरी ओर देखना शुरू किया। वह अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता था। वह सारे के सारे दृश्य अपनी पलकों के पीछे छिपा लेना चाहता था। उसे नहीं पता था कि खिड़की से दिख रहे गेहूँ, सरसों के खेतों और आलू की क्यारियों के अलावा भी एक बड़ी दुनिया है और वह एक बड़ी दुनिया ही देखने के लिए निकला था। इसलिए उस शहर में वह खूब घूमा खूब!….उसने एक-एक बाजार घूम के देख लिया…फल और हरी सब्जियों के बाजार को भी नहीं छोड़ा …। थककर जब अपनी मस्ती में चूर होकर उसी शहर में अपनी मौसी के घर पहुँचा और जब बेल बजाई तब उसे अहसास हुआ कि वह घर से बताकर नहीं आया है। तो यह यह पूरा सफर नशे में या नींद में काटा था उसने!

       मोड नंबर-6

    एक लंबे अर्से बाद लड़का उसी शहर में जब फिर से आया। आने का कारण दूसरा था। उसने देखा उसके जीवन में बहुत कुछ बदल चुका है लेकिन नहीं बदला तो यह शहर। कमोवेश वो चीजें वहीं थीं जहाँ वो पहले थीं। फ्लावर मिल, नाका, सदर हॉस्पिटल, राजेन्द्र स्टेडियम, सिनेमा हॉल…चौक-चौराहे…. लेकिन कुछ चीजें बदल गयी थीं…पुराने समय-मापक यंत्र से जैसे रेत गिरती है वैसे ही समय खिसक जाता है। वैसे वह शहर कुछ जाना पहचाना और कुछ अनजाना लग रहा था…। वह लड़की जो अब यहाँ रह रही थी। लेकिन यह रहना दूसरे तरह का था। वह पहले भी रहती थी। लेकिन तब वह लड़का भी उसके इर्द गिर्द या उसके नहीं तो खुद के सपनों में ही सही रहता जरूर था। लेकिन अब ऐसी बात नहीं थी। लड़की के बारे में कई कथाएँ थी जो लड़के ने उड़ती हुई चिड़ियों के टूटे पंखों की तरह चुनी थी। एक पंख पर यह कहानी लिखी थी कि लड़की अपनी शादी के बाद या बिना शादी के ही शायद किसी पुरुष के साथ यहाँ रह रही है। लड़का उस लड़की को एक दीवानगी की हद तक देखता था और वह भी चाहता था कि लड़की की तरफ से भी कुछ ऐसा ही हो। लेकिन जैसा कि हर कहानी में होता है, यहाँ भी ऐसा ही हुआ।

    लड़की के किस्सों को जानने और सुनने में लड़के को भले ही तकलीफ हो लेकिन यह शहर लड़की के किस्सों का दीवाना हो गया था। वह तो उस लड़की को अपनी कविताएँ सुनाना चाहता था…. जो कविताएँ उसने लिखी अकेले में, एक खाली समय में। वो किसके लिए थी? लड़की के लिए? समय के लिए? या खुद के लिए? लड़की को कविताओं में कोई इंटरेस्ट नहीं था यह वह जानता था लेकिन फिर भी वह उस शहर क्यों आया था? क्यों? शायद यह बात लड़के को  भी नहीं नहीं मालूम थी।

         लेकिन लड़की की रुची घूमने में थी। उसने तो सिर्फ ये कहा था वह बस एक नौकरी चाहती है जिससे उसकी दूसरों पर निर्भरता खत्म हो जाए। वह अपने परिवार के लिए कभी भी उत्साह से बात करती नहीं मिलती थी। वह उस पुरुष के जाने कितने किस्से सुनाया करती थी। एक ऐसा पुरुष जो उसकी नजर में गुस्सैल था। बहुत अनुशासन में रखता था। पहरेदारी करता था लेकिन उसकी नजर में महान था। बल्कि वह उसे भगवान कहती थी। उस लड़के को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। वह सिर्फ उस लड़की की कहानी सुन लेता था। इस कथा के हर कथावाचक के पास अलग-अलग ऐंगल था। सबके पास अलग अलग कहानी थी। लेकिन सबकी कहानी में लड़की थी। उसका दुख था। उसकी समस्याएँ थीं।

    ‘‘अब क्या? अब तो तुम्हारी नौकरी लग गई है? …

    ‘‘हाँ सच में मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मैंने यह सब कुछ कर लिया। मेरी मेहनत सफल हो गई। मुझे इस बात की खुशी है कि अब मुझे पैसे के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने होंगे।’’

    ‘‘हाँ अब तो तुम अकेले भी घूम सकती हो।’’

    ‘‘हाँ! क्यों नहीं घूमंगी? ये पैसे मैं किसी को नहीं दूँगी। एक बड़ी सी कार खरीदूंगी।

    ‘‘उस कार पर मुझे बैठाओगी कि नहीं।’’

    ‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं। तुम खुद सक्षम हो। अपनी कार खरीदो।’’

    ‘‘अरे कार के भीतर नहीं तो कम से कम ऊपर बिठा लेना।……ही ही…ही……।’’

    ‘‘नहीं का मतलब नहीं! इसमें हँसने की क्या बात है?’’

    ‘‘तुम सचमुच मुझे नहीं बैठाने के लिए इतनी सीरियस हो?’’

    ‘‘छोड़ो मुझे आइसक्रीम खाना है और मुझे ढेर सारी हरी सब्जियाँ खरीदनी हैं। फल भी लेने हैं। कल चक्कर आ रहा था। किवी और अनार ले लेंगे। चलो मेरे साथ। मुझे एक अच्छी सैंडल भी खरीदनी है। ’’

    ‘‘फ्यूचर के बारे में कुछ सोचा है?’’

    ‘‘तुमसे मेरी खुशी बर्दास्त नहीं हो रही है। छोड़ दो, तुम जाओ। मैं अपनी सारी शॉपिंग खुद कर लूंगी। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि तुम मेरे साथ शॉपिंग में बहुत जल्दी ऊब जाते हो।’’

         उस फ्लावर मील की ऊँची मुंडेर के ऊपर बैठे कबूतरों के झुंड….उसका भोंपू ….आप कहीं भी हों वह समय बता देता है…दूर जूट मिल का सायरन बजता है आ….आ…….ई…मंगल बाजार के रिक्शे का भोंपू…शहीद चौक से उपर ओवर ब्रिज पर जाने का रास्ता….ठीक बीच पुल पर खड़े हो जाओ तो एक तरफ शहर का बड़ा सा स्टेशन और दूसरी तरफ दूर तक जाती हुई पटरियाँ.. पुल से थोड़ा उतर जाओ तो रेलवे क्वार्टर के लिए पानी की सप्लाई के लिए बनी, पानी की दो बड़ी-बड़ी टंकियां, तालाब…जहाँ खड़े होकर पानी की आवाज सुन सकते हैं… पानी की आवाज को हहाते सुनते रहने का सुख….। दो मोटे-मोटे पाइपों से गिरते पानी की हहराती आवाज…..

     वो गलियाँ वैसी ही है। वह शहर वैसा ही है। वे लोग भी वैसे ही हैं। कुछ भी नहीं बदला। न दोपहर न सुबहें न शामें। न रोशनी न परछाईं न अंधेरा.. न गलियों की उदासी न वे दुकानें। शृंगार स्टोर की भीड़ जहाँ ग्रामीण इलाके की महिलाएँ आती हैं। झुमके, बालियाँ और न जाने कितने तरह की चीजें… सोने की नहीं.. सस्ती । खूब तोल-मोल करती हैं वे… नहीं बदला कुछ भी। जब वो वहाँ पहुँचा तो….उसे जाने क्यों लगा कि अब उस अधूरी कविता की फितरत ही होती है उसका अधूरापन। उसे कभी भी पूरा करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए…..हाँ सच में….

    लड़के ने कहा कि “अगर मैं कहूँ कि मुझे पता है तुम अच्छी जगह रहोगी और खुश भी रहोगी फिर भी कह रहा हूँ…. खूब अच्छे से रहना और खूब खुश रहना। यादों का खैर क्या कहूँ? वो तो रहेंगी ही मेरे साथ पर धीरे-धीरे वक्त की धूल जम जाएगी और सब कुछ धुंधला होता जाएगा।”

    ‘‘हाँ?’’ लड़की हमेशा हाँ को प्रश्नवाचक लगा देती। जैसे यह वह जानती ही नहीं। लेकिन लड़के को पता है कि वह सब जानती है।

    ‘‘तो?’’ लड़का भी बात को चासनी में डालता है।

    “सचमुच ऐसा हो जाएगा? खैर अब मैं क्या कहूँ। हो जाता है तो हो जाने दो।’’

     लड़का सोचता है कि शायद लड़की यह कहे कि ‘‘मुझे पता है तुम्हें नींद नहीं आएगी। और यह सुनकर तो और भी नहीं कि मैं किसी दूसरे के साथ थी।’’ लेकिन लड़की कुछ नहीं बोलती। लड़की अपने सच को इस तरह से रखती है जैसे जिंदगी में सिर्फ उसी का सच है। दूसरे के सच की उसे रत्ती भर भी परवाह नहीं है।

    ‘‘सच कहता हूँ मैंने सपने में भी यह नहीं सोचा था। तुमने ना कहने का बहुत ही गलत वक्त चुना था। उस समय मैं हॉस्पीटल में पड़ा था और बुरी तरह हताश था। तुमसे कम से कम उस वक्त ऐसी कड़वी बातें सुनने की उम्मीद मैं नहीं कर रहा था। ’’

    ‘‘……हाँ! तुम्हें कड़वी लगी? तुमने यह नहीं सोचा कि मुझे कितना कड़वा लगा होगा जब तुमने एक डेडलाइन छोड़ दी थी कि या तो हाँ कहो या ना। उस समय एक परीक्षा के इंटरव्यू में असफल होकर लौटी थी और बहुत हताश थी और उस वक्त तुमने ऐसा पूछा?’’

    ‘‘…..हाँ लेकिन मैं न जाने कितने वर्षों से तुमसे यह सब पूछते पूछते थक सा गया था कि तुम कब अपने कैरियर और महत्वाकांक्षा को ही जीवन समझोगी। मैं तुम्हें झकझोरना चाहता था। तुम हाँ भी तो कह सकती थी। लेकिन तुम्हें तो ना ही चुनाना था और तुमने चुना भी वही…..’’…

    जिंदगी बदली नहीं है माई डियर। जिंदगी सिर्फ बदलने का भ्रम रच रही है। जैसे सबकुछ न दिखने पर भी सबकुछ दिखने का भ्रम हो रहा है। मैं तुम्हें नहीं देख पा रहा था पर फिर भी न जाने क्यों देख पाने का भ्रम हो रहा था। जैसे लगता था कि तुम मेरे बिल्कुल सामने हो। सुनो! तुम्हारी ओर एक छोटी पहाड़ी थी वो अब एक अपार्टमेंट की ऊँचाई से ढक गई है। पर फिर भी लगता है कि वो पहाड़ी आज भी दिख रही है और पहाड़ी इसलिए दिख रही है कि उसके पास तुम रहती हो। हमारे जीवन में ऊँचाई का महत्व है पर हम सभी जीवन के एक मोड़ पर आकर अपनी ऊँचाई के लिए कितने आक्रांत हो जाते हैं न!

    मोड़ नंबर-7

    यह एक मोड़ की शुरुआत थी…..यह उन दिनों की बात थी जब लड़का सोचा करता था कि एक साधारण लड़की भी प्यार में असाधारण हो जाती है। थोड़ा  खिल जाती है। कभी खो जाती… कभी चहकती है…. कभी खुद में गुम हो जाती है… एक साधारण लड़का प्यार में! ….थोड़ी तेज साइकिल चलाने लगता है….गालियाँ देना छोड़ देता है…अपने दोस्तों से कटने लगता है….थोड़ा पैसा बचाने लगता है… “प्यार की थ्यरी लिंग के परे जाती है…हाँ…इसका अहसास आपको पूरी तरह बदल देता है…”

         एक खरगोश जैसे दाँतों वाली लड़की जो अपनी ही आवाज को कुतर डालती है और फिर उस आवाज का आयतन फुस्स से फुटबाल के ब्लाडर की तरह कम होकर आस-पास हवा की मानिंद बिखर जाता है। लव गुरु कहते हैं कि देखना एक दिन तुम इसके प्यार में खो जाओगे…. हवा में उड़  जाओगे…. बादल बन जाओगे…. वो एक तितली है… वो एक खूबसूरत चिड़िया है…. तुम्हें इतना प्यार करेगी कि तुम ले नहीं पाओगे। तुम इस दुनिया के सबसे खुशकिस्मत इंसान होगे। जब सच में तुमसे प्यार करने लगेगी तो वो तुम्हारे लिए किसी से भी लड़ जाएगी।… खैर यह अलग बात थी कि लड़की लड़ी भी। लेकिन किससे?

             वो एक बरसात की दोपहरी है…एक पार्क की बेतरतीबी  चारों ओर फैली है…फूलों के पौधों में रखरखाव का आभाव है…वहाँ सबसे आकर्षक है झूला….लड़की झूला झूलना चाहती है…। उसने अपने गाँव में आम के बागीचे में खूब झूले झूले हैं…..लेकिन यहाँ लड़की के साथ? झूले पर बैठी लड़की खुद ब खुद खिलखिलाने लगती है…और खिलखिलाती लड़की को देखकर लड़का हौले से मुस्कुराकर लड़की की पीठ और उसके लहराते बाल देखता है… लड़की ने पर्पल कलर की सूट और ब्लैक कलर की लैगिंज पहनी है। उसका दुपट्टा सात रंगों से बना है। सैम्पू धुले बाल की खुशबू उसके नथूनों में भर जाती है…..तभी पूरब की तरफ बादल घने होने लगते हैं…। ‘‘बारिश होगी क्या? क्या हमें बारिश से पहले लौटना नहीं चाहिए?’’ ‘‘नहीं’’ ‘‘क्यों’’ ‘बारिश में भीगे हुए बहुत दिन हो गए। एक बार इंटर की क्लास में अंकल के साथ बाइक पर खूब भींगी थी। हम अपने गाँव के बाजार से आ रहे थे। बहुत बारिश हुई थी। मैंने अंकल से कहा बारिश चाहे जितनी हो बाइक नहीं रोकनी है। फिर हम दोनों बहुत हँसे थे।’’ अब  लड़का हँसता है। उसकी हँसी नहीं रुक रही है। ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘अरे अंकल के साथ कौन भींगता है?” इस बार लड़की गुस्सा हुई। एक बनावटी गुस्सा। ‘‘देखो मेरे अंकल के बारे में कुछ मत बोलो। तुम नहीं जानते अंकल मेरे लिए क्या हैं?’’

    “क्या हैं?

    “सब कुछ हैं मेरे लिए|”

    ‘और मैं?’ यह सवाल लड़का पूछ नहीं पाया|

    “अपने अंकल हैं?” “अपने नहीं हैं तो क्या अपने से बढ़कर है” लड़की रोने लगती है। लड़का खामोश हो जाता है। वह लड़की को मना रहा होता है। उसे बैंच पर बिठाता है। मूंगफली वाले को आवाज लगाता है।

    ‘‘और कुछ बताओ।’’ ‘‘तुम कल मुझे स्टेशन छोड़ दोगे? मुझे घर जाना है।’’ ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘नहीं मैंने कहा न मुझे घर जाना है।’’ ‘‘ओके छोड़ दूँगा। बताओ तो क्या हुआ।’’

    ‘‘नहीं! अपना दुःख इतनी जल्दी नहीं बताना चाहिए था।’’

    ‘‘अरे बताओगी नहीं तो कैसे जानूँगा।’’

    ‘‘मुझे नहीं बताना। सब ऐसे ही हँसते हैं हम पर। पिता का प्यार नहीं मिला न मुझे|”

    ‘‘क्यों पिता को क्या हुआ?’’ लड़का पिघल रहा है। लड़की की कातर आँखें और थरथाराती रुआंसी आवाज से उसका दिल बिंध रहा है। ‘‘पागल हैं मेरे पिता। एक तो वो किसी लायक नहीं हैं। कमाते-धमाते नहीं। वो मुझे और मेरी बहनों की पढ़ाई लिखाई के खिलाफ हैं। मेरी माँ ने पूरे गाँव से लड़कर मुझे भेजा है पढ़ने इस शहर।’’ ‘‘ओफ! ओ, अभी भी ऐसा है? सो डिसगस्टिंग!’’

    ‘‘नहीं तो मैं झूठ कर रही हूँ? तुम नहीं जानते मेरे पिता को। नहीं जानते मेरे गाँव को। वहाँ लड़कियों को बाहर भेजना लगभग असंभव है। मेरे लिए पंचायत बैठी थी। मुझे कुछ बन के दिखाना है। मुझे अपनी माँ के लिए कुछ करना है। इन सबमें  अंकल ने बहुत सपोर्ट किया| खैर तुम नहीं समझोगे| प्लीज मुझे सुबह स्टेशन छोड़ देना। मुझे माँ की बहुत याद आ रही है।’’

    लड़का चिंतित होकर बिल्कुल खामोश हो जाता है। लड़की सुबक रही है। लड़का उसके साथ कुछ दूर तक चलता है और फिर दोनों अलग-अलग दिशा की ओर मुड़ जाते हैं। सुबह वह अपने मित्र की बाइक से लड़की को स्टेशन छोड़ने जाता है। बहुत भीड़ है टिकट काउंटर पर। फिर भी लड़के ने टिकट ले लिया है और वह भागे-भागे पैसेंजर ट्रेन की बॉगी में पहुँचता है। जगह मिलने पर लड़की अब निश्चिंत हो गई है। ट्रेन खुलने वाली है। लड़का उतर कर खिड़की के पास चला आता है। लड़की लड़के का हाथ धीरे से छूती है। ‘‘अब जाओ। ट्रेन खुलने वाली है।’’ ‘‘हाँ जाता हूँ। ट्रेन खुल तो जाए।’’ ‘‘एक बात कहूँ?’’ ‘‘क्या’’ ‘‘किसी के होने के अहसास से कितना साहस आ जाता है न’’ खुलती हुई ट्रेन को देखकर लड़के को हमेशा रोमांच हो आता है। स्टेशन वहीं है। डिब्बे दूर जा रहे हैं। डिब्बे में बैठा आदमी भी तो दूर चला जाता है।

    लड़के को साफ सफ्फाक नदी की सतह याद आ रही है और याद आ रही है अपनी ही एक कविता …. मैं इस छोर हूँ

    पास आओ! उस पार मैं नहीं/ मेरी आवाज है…

    इस पल कुछ भी सच नहीं

    एक ध्वनि….!! नदिया का जल कभी थाह अभी अथाह….

    मोड़ नंबर-8

    प्रोफेसर के यहाँ बैठे हुए जब एक झब्बेदार बालों वाली लड़की अपनी सहेली के साथ बेतकल्लुफी से हेलो करती हुई सोफे पर बैठी तो पैंट और बिना अंडर सर्टिंग के कुर्तेनुमा शर्ट पहनने वाले और साइकिल चलाने वाले उस लड़ने ने बड़ी हिम्मत से उसे कनखी से ताका। भक्क सफेद चेहरे पर छोटे-छोटे घुंघराले बाल और एकदम सफेद दूध की तरह की कुर्ती! लड़का कई दिनों तक उस चेहरे को दोहराता रहा। लड़की कई दिनों तक अपनी दुनिया में खोई रही। लड़के को कुछ नहीं पता कि लड़की की दुनिया क्या है? लड़की का परिवार कैसा है? लड़की का समाज कैसा है? लड़की की जाति क्या है?

    लड़की को लड़के की जाति पता होती है।

    लड़के को भले लड़की की जाति पता न हो।

    भले लड़के को लड़की की जाति से मतलब न हो

    लड़की को लड़के की जाति से मतलब होता है।

    ये यथार्थ की बातें लवगुरु लड़के को बताते हैं। लवगुरु चाहते हैं कि लड़का प्रेम करे। लड़के की कविता में प्रेम उतरे। सिर्फ हवाई बातें नहीं। शरीर के स्पर्श से उपजा यथार्थ प्रेम। बिना शरीर के कैसा प्रेम? ‘‘अरे हमारे यहाँ ऐसे महान प्रोफेसर की परंपरा है जो छात्रों से सीधे पूछ बैठते हैं अरे तुमने किसी लड़की के होठों पर किस किया है? अरे किस यानी चुम्मा। नहीं? तब तुम खाक साहित्य समझोगे। बिहारी और विद्यापति को ऐसे ही शर्माकर पढ़ोगे चूतियों…….जहाँ पंडित विद्यापति ठाकुर कहते हैं….पहिल बदिर सम पुन नवरंग…… दिन-दिन बढ़ए पिरए अनंग। कामदेव द्वारा दी गई पीड़ा को तुम क्या समझोगे। तुमने स्त्री के कुच युगों को छुआ है कभी? हाथ में लिए हो? भक बुरचोन्हर तब तुम क्या कविता लिखोगे?’’

    लड़का मंत्रमुग्ध होकर सुनता है लवगुरु को। लवगुरु जब अपने उरूज पर आते हैं तो किसी को भी झकझोर देते हैं। टोटली मांइडवाश!

    ‘‘चिंता मत करो चंदू। हम सब पता कर लिए हैं। मोबाइल नंबर भी जुगाड़ लिए हैं उसका। लेकिन बाबू एक बात ध्यान रखना। जाति तुमसे ढेर ऊँची है? हाँ पंडित है वो। चेहरा-मोहरा तो देखिए रहे हो। लेकिन कोई नहीं लवगुरु है तुम्हरे साथ।’’

         ‘‘कौन-कौन हैं तुम्हारे यहाँ।’’    इस सवाल से लड़का थोड़ा खुल जाता है।

         ‘‘हमारे यहाँ सब हैं लेकिन किसी की नाक ऊँची नहीं है।’’

         ‘‘बढ़िया है। हमारे यहाँ तो उलटा है। नाक बहुत ऊँची है सबकी|”

     मोड़ नंबर-9

     गलियों से चलते हुए दोनों मुख्य सड़क पर आ गए हैं।

    “मेरे लिए एक रिक्शा ला दो। मुझे अंकल के पास जाना है। वो यहीं आए हुए हैं अपने एक दोस्त के पास।’’ लड़का रिक्शा लाने जाता है। लड़की रिक्शे पर बैठती हुई मुस्कुरा रही है| लड़का फिर लौट कर लड़की के बारे में सोच रहा है| अगले आठ दिन तक वह लड़की के फोन का इन्तजार करता है| लड़की फोन नहीं उठाती ना करती है| बीच-बीच में नंबर स्विच ऑफ हो जाता है या नॉट रिचेबुल हो जाता है| आठ दिन तक लड़का परेशान रहता है| वह कभी कभी जाकर उसकी गली तक घूम आता है| नवें दिन लड़की खुद फोन करती है और बताती है कि वह अंकल के साथ दिल्ली गई थी| “अंकल के साथ?” “ऐसे क्यों चौंक रहे हो| क्या अंकल के साथ नहीं जा सकती? वे बीमार थे…उन्हें एम्स में दिखाना जरूरी था|” “अच्छा.. अच्छा समझ गया|” “देखो मैं सब समझ रही हूँ कि तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है?” “अरे मैं कुछ नहीं समझ रहा| मैं तो बस इतना कह रहा हूँ कि अंकल की बीवी और उनके बच्चे कहाँ है? उन्हें जाना चाहिए था और तुमने मुझे कुछ बताया भी नहीं और अचानक से गायब हो गई| जानती हो मैं कितना परेशान हुआ?” “तुम शक कर रहे हो…? ओह…! सच में तुम सारे मर्द एक जैसे होते हो… शक्की… अरे अंकल को नहीं पसन्द कि उनके सामने कोई मोबाइल लेके बैठा रहे, और फिर मैं तुम्हें क्यों दूँ पल पल की खबर…? तुमने मुझे खरीद लिया है?  जानती हूँ कि तुम मेरी बहुत मदद करते हो, प्यार में इतना तो सब करते हैं और फिर इसका मतलब ये तो नहीं मैं जीवन भर तुम्हारे एहसान तले दबी रहूँ|… ये नहीं होगा मुझसे| तुम चाहो तो मुझसे अलग हो जाओ,मैं खुद को संभाल लूँगी|”

    लड़का डर जाता है, वो नहीं चाहता लड़की के बगैर जीना…

    “अच्छा आई एम सॉरी… रियली वेरी सॉरी… पर सच में तुम्हारी फिक्र हो रही थी…”  लड़की को अब शायद थोड़ी दया आ जाती है… “ओके ओके अब छोड़ो भी| मैं बताती हूँ वहाँ मैं कहाँ कहाँ घूमी? सच में मजा आ गया|” लड़का यात्रा की सारी कहानी सुनता रहा| उस कहानी में लड़की की खुशियाँ शामिल थीं … उसका चहकना शामिल था…इसलिए लड़का ना चाहते हुए भी सबकुछ सुनता रहा…| लड़के ने कई बार कोशिश की कि लड़की के अंकल से उसकी बात हो जाए, या एक बार मिलना हो जाए पर लड़की ने हमेशा टाल दिया। अंकल भगवान थे और भगवान की तरह ही हमेशा अदृश्य ही रहे| लड़का उन्हें कभी नहीं देख पाया|

    मोड नंबर-10

    कहानी के कई कथावाचक सामने आ रहे हैं और कहानी नए-नए रूप ले रही है। कहानी की यह फितरत है कि एक मोड़ पर जब वह वर्तमान में होती है तभी शुरू होने के लिए वह बहुत पीछे भी चली जाती है। कथावाचक जानता है कि लड़के को यह बात पता है कि लड़की को आम और सेब बहुत पसंद हैं। लड़की को अपनी माँ बहुत प्यारी लगती है। ‘‘मेरी माँ बहुत सुंदर है। पूरे गाँव में उतनी सुंदर कोई महिला नहीं।’’ यह लड़की का स्टेटमेंट है। कथावाचक जानता है कि लड़की अपनी बहनों को बहुत चाहती है और सबसे छोटी बहन को बुचिया कह कर पुकारती है। कथावाचक यह भी जानता है कि लड़का यह जानता है कि लड़की के गाँव में कैसे-कैसे लोग हैं? कि लड़की के पिता पागल हैं। लड़की के कहे अनुसार लड़का यह भी जानता है कि गाँव के लोग उनकी माँ और बहनों पर बुरी नजर रखते हैं। शायद यह भी जानता हो कि लड़का बहुत कुछ भांपने लगा है….जैसे कि चेहरा…..जैसे कि आवाज….जैसे कि सच और झूठ की परतें….जैसे कि हाव भाव….

    वह एक दूसरा आदमी था। एक दारोगा! हरदेव पासवान… शराब के नशे में चूर रहने वाला…..बलिष्ठ और हट्टाकट्टा और थोड़ा मनचला। गाँव में गश्ती दल के साथ आया और उसने लड़की की माँ को देखा और देखते ही उसपर लट्टू हो गया….। गाँव के बाजार का समय है और गाँव में सब्जी बेचने वाले नीचे बिछा कर सब्जी बेच रहे हैं। दूसरी तरफ कतारों में मिठाई की दुकाने हैं। महिला उस लड़की को लेकर आई है बाजार….लड़की भी भीड़ से साइड हट कर पुलिस वैन देख रही है। वो सोच रही है कि दारोगा अगर अच्छा निकला तो वह अपने चाचा और पिता के खिलाफ माँ की प्रताड़ना के लिए शिकायत कर सकेगी। दारोगा भीड़ को चीड़कर लड़की की माँ के पास आया। यह उस समय की बात है जब लड़की दूसरी ओर थी… चूड़ी की दुकान में। तभी दारोगा लड़की की माँ के कान में कुछ बोला और उसका हाथ पकड़ लिया। लेकिन उस महिला ने एक जोड़दार तमाचा जड़ दिया उस दारोगा को। दारोगा कुछ लिच्चड़ जैसा था। उसने इधर-उधर देखा तो उसे लगा कि किसी ने यह देखा नहीं है। वह भीड़ में गुम हो गया। कुछ ही देर बाद महिला ने देखा कि दारोगा लड़की के साथ है। उसका दिल डर से धुक धुक करने लगा। लड़की के हाथ में आम और सेब से भरी हुई पोलिथीन थी। दारोगा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। महिला लड़की का हाथ पकड़ कर तुरंत उसे लगभग घसीटते हुए  घर  ले गई।

    मोड़़ नंबर-11

    लड़की ने उस शहर से दूर एक दूसरे शहर में नौकरी कर ली है, हालाँकि यह स्थायी नहीं है पर लड़की उस नौकरी से बहुत खुश है। लड़का खुश है कि लड़की की पैरों पर खड़ा होने की इच्छा पूरी हो रही है। लड़का खुश है कि लड़की खुश है। लड़की उस शहर में रहती है। लड़की को शहर बहुत भाने लगा है। वह फोन पर यदा कदा शहर की प्रशंसा करती है। शहर के प्रति दीवानगी लड़के को इत्तेफाक नहीं लगती। लड़के को लगता है कि लड़की के खुद के पैसे आने लगे हैं इसलिए खुश है। इसलिए लड़की उड़ रही है। लेकिन एक दिन लड़की फोन नहीं उठाती। बार-बार फोन काटती है। फिर बहुत देर रात वह फोन उठाती है तो बोलती कुछ नहीं सिर्फ रोती है। सिर्फ रोने का कोई कारण लड़का नहीं समझ पाता है। लड़का परेशान होकर दूसरे दिन दूर सफर तय कर उस शहर जाता है। वहाँ लड़की खुश दिखती है। उसके साथ में उसकी बहन भी है। लड़की लड़के को अपनी आदत अनुसार बाहर ही इंतजार करवाती है और फिर ढेर सारा सामान लेकर गाड़ी में बैठती है। लड़की खुश है। लड़की उसे इस शहर के सब्जी बाजार से तरबूज खरीदने को कहती है। लड़का गाड़ी से उतरकर तरबूज खरीदता है। लड़की तरबूज को गोद में रखती है। लड़की कुछ-कुछ बोलती रहती है। फोन पर किसी से बात करती रहती है। लड़का इस बात से ही खुश है कि लड़की सही सलामत है। लेकिन वह इस बात को नहीं जान पाता है कि आखिर कल लड़की इतना क्यों रो रही थी?

    मोड नंबर-12

    लड़की अब और ज्यादा आत्मनिर्भर हो गई है। उसने एक प्रतिष्ठित परीक्षा पास कर ली और लड़के को बताया कि वह पास कर गई। लड़के के पास न खुश होने का कोई कारण नहीं है इसलिए वह इतना खुश हुआ कि लड़की उसके खुश होने से दुखी हो गई। लड़के का खुश होना उससे देखा नहीं गया। वह अपनी सफलता की सूचना के बाद दूर होने लगी। वह हर बात पर झल्ला जाती। लेकिन लड़के को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लड़की डिप्रेशन में जा रही है। लड़की को क्या लगा पता नहीं लेकिन इतना तो तय था कि वह डिप्रेशन में नहीं थी।

    मोड नंबर-13

    कथावाचक ने कहा कि दारोगा अपने पारिवारिक जीवन से भयानक असंतुष्ट था। लड़की के आगे बढ़ने में उसकी  मदद करने लगा। लड़की को अब एक दूसरा मददगार चाहिए था। दारोगा ने उसकी खूब मदद की। बाहर घूमने के भी कई मौके दिए। दरोगा के पास पावर था और लड़की को सुरक्षित महसूस करवाने के लिए इतना काफी था| उसके पास पैसे थे…गाड़ी थी….| अंकल की उसे अब जरूरत नहीं थी| वे कब के पीछे छूट चुके थे| हालाँकि लड़का यह नहीं जानता था कि वे कितना पीछे छूट चुके थे? छूटे भी थे या नहीं! खैर… वह दरोगा के साथ खुश थी| लड़के ने कथावाचक से कहा कि वह इस खेल में कहाँ था? वह तो लड़की के लिए किताबें लाता रहा। सब्जियाँ और फल खरीदता रहा। चिकेन मटन से लेकर उसकी हर इच्छा का ध्यान रखता रहा। न चाहते हुए और ऊब जाने के बावजूद भी लड़की के साथ शॉपिंग के लिए जाता रहा। उसकी ख़ुशी में खुश हुआ और दुःख में उसके साथ खड़ा रहा| लड़की ने एक बार कहा था कि तुम मुझे कभी छोड़ तो नहीं दोगे? और लड़का उसी एक वाक्य के ईद-गिर्द घूमता रहा….फिर लड़की ने ऐसा क्यों किया?

    लड़की की माँ ने एक कथावाचक को बतलाया था कि इस कहानी में न जाने और कितनी कहानियाँ बाकी हैं जिसे कोई दूसरा नहीं सिर्फ वह जानती है। लेकिन सच इतना भयानक और वीभत्स है कि वह यह बात खुद को अकेले में भी बताना नहीं चाहती।

    ‘‘वह बहुत ही साइको किस्म का आदमी है। अधेड़ है। उसके दो बच्चे हैं। मुझे नहीं पता कि वो कैसे फंस गई इन चीजों में।’’ वह लड़का सिर्फ सुन रहा है। ‘‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई बिना प्यार किए किसी के साथ ऐसे ही अटकी रहे।’’ लड़की काफी बोल्ड थी ,फिर ऐसे कैसे कोई भी फंसा सकता था …लड़का याद कर रहा है लड़की अक्सर कहती थी कि उसे अपना बच्चा चाहिए|  लड़का हँसते हुए टोकता केवल तुम्हारा कैसे होगा? तुम्हें मेरी मदद नहीं लगेगी? और लड़की हर बार चिढ़ जाती…नहीं लगेगी तुम्हारी मदद ,मैं काफी हूँ|

    कथावाचक डर डर कर कह रहा है ‘‘पूरी कहानी कभी स्थिर से सुनाऊँगा। मैं डरता हूँ। यह पूरी कहानी उसकी माँ ने सुनाई है।’’ लड़का सिर्फ सुन रहा है। वह दारोगा गाँव आया…. पहले तो उसने लड़की की शिकायत के आधार पर लड़की के पिता और चाचा को खूब पीटा और बांधकर थाने ले गया। वही पिता जिसे लड़की पागल कहती थी। लेकिन लड़का जानता है कि उसके पिता हमेशा से पागल नहीं थे| उस घटना के बाद पागल हो गए| लड़की ने ऐसा क्यों किया होगा?

    मोड़ विहीन सीधी सड़क-

    लड़के ने महसूस किया कि दृश्य सामने रहते हुए भी ओझल हो सकते हैं। सामने से बहुत कुछ पीछे छूट सकता है। किसी भी यात्रा की पहली शर्त है कुछ पीछे छूट जाना। आगे बढ़ने में एक अहंकार का भाव तो नहीं! लड़की रो रही है। उसे कुछ याद आ रहा है। कुछ! बहुत कुछ। अपनी सहेली से कही हुई बातें। तब जब लड़का अपनी कविता की किताब दे गया था। यह कहते हुए कि इसी साल उसकी कहानी की किताब भी आएगी। वह उसे जरूर देना चाहेगा। लड़की ने अजीब नजरों से देखा जैसे सोच रही हो …अबे ओ बड़े-बड़े जुल्फ टांगे गवैया के शक्ल वाले कबी! तुमको क्या लगता है कि मैं तुम्हारी कविताएँ पढूँगी? और कुछ नहीं तो तुम्हीं एक कवि पैदा हुए हो?

    ‘मैं किसी पे लट्टू नहीं हो सकती। चाहे कोई कितना भी हैंडसम हो।’

    ‘चल झूठी! देखा नहीं मैंने कैसे आँखें फाड़ के देख रही थी।’

    लड़की ने कहा वह लड़के से बहुत दूर जाना चाहती है। इतनी दूर कि उस तक उसकी कोई खबर न पहुँचे। सहेली ने उस लड़की से कहा कि इस ज़माने  में तुम्हें ऐसा कैसे लग सकता है कि तुम इतनी दूर जा सकती हो जहाँ से तुम्हारी कोई खबर न पहुँचे? वो हँस रही थी। लड़की उसकी हँसी देख रही थी। वह हँस नहीं सकती थी। उसे अपना चेहरा उदास दिखाना था। उदास चेहरे इस बात की तस्दीक करते हैं कि कोई दुख जरूर है। जबकि बात यह थी कि वह खुश थी। सोशल मीडिया पर डाली गई तस्वीरों में उसके हाथ कभी-कभी चूड़ियों से भरे दिख जाते थे|

         लड़के को किसी ने कहा था कि तुम किसी को किसी के साथ भी खुश रहने से नहीं रोक सकते हो। ‘दाख छौहड़ा छाड़ि अमृतफल……..डॉट डॉट डॉट…….अ बिग डॉट……..अ ब्लैंक लाइन्स……यू कैन फिल इट विथ एनी वन ह्विच यू कैन कंफर्टेबली चूज। सूरदास कहते हैं ‘‘उधो मन माने की बात!

         लड़का शहर घूम रहा है। शहर के चप्पे-चप्पे पर उसके कदमों के निशान इस बार अलग ढंग से उगे हैं। लड़का सोचता है कि यह शहर चालाक लोगों का है…जिन्हें अपनी चालाकियों पर घमंड होता है। लड़का चलते-चलते कलेक्ट्रियट पहुँचता है। वहीं ऑफिस के बोर्ड को बड़े गौर से देखता है जहाँ लड़की की नेम प्लेट टंगी है। मिस ……..मिश्रा….। लड़के का वश चले तो वह नेम प्लेट पर मिस की जगह मिस???? लिख दे।

    अब लड़का उस शहर के फ्लावर मिल के पीछे वाली गली में घूम रहा है। जहाँ से ऊपर मिल की चिमनी के नीचे एक बड़ी घड़ी दिख रही है। उसी मुंडेर पर सैकड़ों कबूतर बैठे हैं। कबूतर देखने में बहुत प्यारे लग रहे हैं। उसे अचानक उसी प्रेम के प्यासे कवि की कविता की पंक्तियाँ याद आ रही हैं- कबूतरों ने एक गजल गुनगुनाई… मैं समझ न सका, रदीफ-काफिए क्या थे….।****1 लड़के की नजरें मिल की लाल दीवारों से फिसलती हुई नीचे की ओर आ रही हैं….वहीं जहाँ मिल की चारदीवारी है। उन दीवारों के रंग कबूतरों के बीट से अजीब धब्बेदार हो गए हैं। ऊपर दीवार पर घड़ी दोपहर के सवा एक बजा रही है। लड़के को याद आता है यहाँ अगर गाँव के मैथ टीचर श्री श्री गोपाल प्रसाद सिन्हा होते तो कहते ‘‘अरे चंदुआ सुधरेगा नहीं रे! तुमको कितनी बार बोला है सवा एक नहीं सवा बोलो सवा।’’ और इतनी ही बात पर घोड़लद्दे दोस्त आम के अचार की तरह दो घंटे कान पकड़े स्कूल के चबूतरे पर धूप में सूखते मिलते। लेकिन शाम में फिर दोनों खेल के मैदान में वैसे ही मिलते।

         लड़का सोचता है कि आज की रात स्टेशन से किसी गाड़ी से वह चला जाएगा। लड़के ने वो खिड़की देख ली है जो लड़की की परछाईं तथा किसी और देह की परछाईं से हिलमिल कमरे की रोशनी से खिड़की के शीशे पर एक अजीब आकृति बनाती होगी। हो सकता है लड़की उस परछाईं के साथ में खिलखिलाती भी हो।

    अब शाम धीरे-धीरे सीढ़ियों पर धप-धप की आवाज के साथ उतर रही है। लड़का सोचता है कि कुछ देर बाद शहर की बत्तियाँ जल जाएँगी और चमकीली रोशनी शहर के सारे भद्देपन को छुपा लेगी। लेकिन जो इस शहर को जानते हैं और उसके भद्देपन से परिचित हैं उन्हें चमक-दमक से गुमराह नहीं किया जा सकता। तभी चलते हुए लड़के की नाक में हवा के झोंके के साथ एक गंध घुसती है। यह किसी फूल की गंध नहीं है। यह निश्चित रूप से बिस्कुट फैक्ट्री की गंध है। अब लड़का इस बात को जानता है।

    ***1 (शमशेर बहादुर सिंह की कविता का एक अंश)

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